May 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-48 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः अड़तालीसवाँ अध्याय भगवती मनसा का पूजन-विधान, मनसा-पुत्र आस्तीक का जनमेजय के सर्पसत्र में नागों की रक्षा करना, इन्द्र द्वारा मनसादेवी का स्तवन करना मनसोपाख्यानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने देवी मनसा के विषय में विधानपूर्वक कह दिया । अब आप मुझसे सुनिये ॥ १ ॥ उनके सामवेदोक्त ध्यान तथा पूजा-विधान के विषय में — श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां नागयज्ञोपवीतिनीम् ॥ २ ॥ महाज्ञानयुतां तां च प्रवरज्ञानिनां वराम् । सिद्धाधिष्ठातृदेवीं च सिद्धां सिद्धिप्रदां भजे ॥ ३ ॥ ‘भगवती मनसा श्वेत चम्पकपुष्प के वर्ण के समान आभावाली हैं, ये रत्नमय आभूषणों से अलंकृत हैं, इन्होंने अग्नि के समान विशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, ये नागों के यज्ञोपवीत से युक्त हैं, महान् ज्ञान से सम्पन्न हैं, प्रसिद्ध ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं, सिद्ध पुरुषों की अधिष्ठात्री देवी हैं, सिद्धिस्वरूपिणी हैं तथा सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं – ऐसी भगवती मनसा की मैं आराधना करता हूँ’ ॥ २-३ ॥ इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्र से देवी मनसा की विधिवत् पूजा करनी चाहिये । वेदोक्त मूलमन्त्रों का उच्चारण करके विविध प्रकार के नैवेद्य, धूप, पुष्प तथा पवित्र गन्ध-द्रव्यों के अनुलेपन से उनकी पूजा सम्पन्न करनी चाहिये। हे मुने! भगवती का द्वादशाक्षर मन्त्र पूर्णरूप से सिद्ध हो जाने पर कल्पतरु नामक वृक्ष की भाँति भक्तों को वांछित फल प्रदान करने वाला हो जाता है। वह मन्त्र ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मनसादेव्यै स्वाहा’ – ऐसा बताया गया है । पाँच लाख जप करने से मनुष्यों के लिये इस मन्त्र की सिद्धि हो जाती है । जिसकी मन्त्रसिद्धि हो जाती है, वह पृथ्वीतल परसिद्ध हो जाता है। उसके लिये विष भी अमृत के समान हो जाता है और वह धन्वन्तरितुल्य हो जाता है ॥ ४-७ ॥ हे ब्रह्मन् ! जो मनुष्य संक्रान्ति के दिन स्नान करके यत्नपूर्वक किसी गुप्त स्थान में अति भक्ति से सम्पन्न होकर भगवती मनसा का आवाहन करके इनकी पूजा करता है तथा पंचमी तिथि को मन से ध्यान करते हुए देवी को नैवेद्य अर्पण करता है, वह निश्चितरूप से धनवान्, पुत्रवान् तथा कीर्तिमान् होता है ॥ ८-९ ॥ हे महाभाग ! मैं देवी मनसा की पूजा का विधान बतला चुका, अब मैं उनके उपाख्यान का वर्णन आपसे कर रहा हूँ, जिसे मैंने साक्षात् धर्मदेव के मुख से सुना, उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ १० ॥ मानव नागों के भय से आक्रान्त हो गये थे। तब वे सब प्राचीन काल में एक बार भूमण्डल के सभी मुनिश्रेष्ठ कश्यप की शरण में गये ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् अत्यन्त भयभीत मुनि कश्यप ने ब्रह्माजी के साथ मिलकर मन्त्रों की रचना की । उन्होंने वेदबीजमन्त्रों के अनुसार तथा ब्रह्माजी के उपदेश से मन्त्रों का सृजन किया था। साथ ही उन्होंने अपने मन से मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवी उन भगवती मनसा का सृजन भी किया, अतः तपस्या तथा मन से सृजित होने के कारण वे ‘मनसा’ नाम से विख्यात हुईं ॥ १२-१३ ॥ कुमारी अवस्था में विद्यमान वे भगवान् शिव के धाम में चली गयीं । कैलास पर उन्होंने भक्तिपूर्वक विधिवत् शिवजी की पूजा करके उनकी स्तुति की। इस प्रकार दिव्य एक हजार वर्षों तक उस मुनि-कन्या ने शिवजी की उपासना की ॥ १४१/२ ॥ आशुतोष भगवान् शिव उन पर प्रसन्न हो गये। हे मुने! तब उन्होंने मनसादेवी को महाज्ञान प्रदान किया तथा सामवेद पढ़ाया और श्रीकृष्ण के कल्पवृक्ष स्वरूप अष्टाक्षर मन्त्र का उपदेश किया। लक्ष्मीबीज, मायाबीज और कामबीज का पूर्व में प्रयोग करके कृष्ण शब्द के अन्त में ‘ङ’ (चतुर्थी) विभक्ति लगाकर उसके बाद ‘नमः’ जोड़ देने पर बना हुआ अष्टाक्षर ( श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः ) मन्त्र है ॥ १५-१६१/२ ॥ भगवान् मृत्युंजय शिव से त्रैलोक्यमंगल नामक कवच, पूजनक्रम, सर्वसम्मत तथा वेदोक्त पुरश्चरण-क्रम और मन्त्र प्राप्त करके वे मुनिकन्या साध्वी मनसा भगवान् शंकर की आज्ञा से तपस्या करने के लिये पुष्करक्षेत्र में चली गयीं। वहाँ तीन युगों तक परमेश्वर श्रीकृष्ण की तपस्या करके वे देवी सिद्ध हो गयीं और उन्होंने अपने समक्ष साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये ॥ १७–१९१/२ ॥ उस समय कृपानिधि भगवान् श्रीकृष्ण ने कृश शरीर वाली उन बाला को कृपापूर्वक देखकर उनकी स्वयं पूजा की तथा दूसरों से भी पूजा करायी। उन्होंने उन देवी को यह वर भी दिया कि ‘तुम जगत् में पूजित होओ’ । कल्याणी मनसादेवी को यह वर प्रदान करके भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ॥ २०-२११/२ ॥ इस प्रकार वे मनसादेवी सर्वप्रथम परमात्मा श्रीकृष्ण के द्वारा पूजित हुईं। दूसरी बार भगवान् शिव ने उनकी पूजा की और इसके बाद कश्यप, देवता, मुनि, मनु, नाग एवं मानव आदि के द्वारा वे सुव्रता तीनों लोकों में पूजित हुईं ॥ २२-२३१/२ ॥ इसके बाद कश्यपजी ने उन देवी मनसादेवी को जरत्कारुमुनि को सौंप दिया। कामनारहित होते हुए भी मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु ने ब्रह्माजी की आज्ञा से उन्हें पत्नीरूप में स्वीकार कर लिया । विवाह करने के पश्चात् चिरकालीन तपस्या से थके हुए महायोगी मुनि जरत्कारु पुष्करक्षेत्र में एक वटवृक्ष के नीचे देवी मनसा के जंघा पर लेट गये और निद्रेश्वर भगवान् शिव का स्मरण करके सो गये ॥ २४-२६ ॥ इतने में सूर्य अस्त हो गये। तब सायंकाल उपस्थित होने पर परम साध्वी देवी मनसा धर्मलोप के भय से अपने मन में विचार करके यह सोचने लगीं कि ‘ब्राह्मणों के लिये नित्य की सायंकालीन सन्ध्या न करके मेरे पतिदेव ब्रह्महत्या आदि पाप के भागी होंगे। जो मनुष्य प्रातः तथा सायंकाल की सन्ध्या नहीं करता, वह सब प्रकार से सदा अपवित्र होकर ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है – ऐसा वेदोंमें कहा गया है’ — यह सोचकर उस सुन्दरी ने अपने पति को जगा दिया। हे मुने! जग जाने पर मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु मनसादेवी पर अत्यधिक कुपित हो उठे ॥ २७–३०१/२ ॥ मुनि बोले — हे साध्वि ! तुमने सुखपूर्वक सोये हुए मेरी निद्रा क्यों भंग कर दी ? जो स्त्री अपने पति का अपकार करती है, उसके व्रत आदि निरर्थक हो जाते हैं। अपने पति का अपकार करने वाली स्त्री का जो भी तप, उपवास, व्रत, दान आदि है; वह सब निष्फल हो जाता है ॥ ३१-३२१/२ ॥ जिस स्त्री ने अपने पति की पूजा की, उसने मानो साक्षात् श्रीकृष्ण की पूजा कर ली । पतिव्रता नारियों के व्रत लिये स्वयं भगवान् श्रीहरि पतिरूप में विराजमान रहते हैं ॥ ३३१/२ ॥ समस्त दान, यज्ञ, तीर्थसेवन, व्रत, तप, उपवास, धर्म, सत्य और सभी देवताओं का पूजन आदि जो भी पुण्य-कर्म है, वह सब पति की सेवा की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है ॥ ३४-३५१/२ ॥ जो स्त्री पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में पति की सेवा करती है, वह अपने पति के साथ वैकुण्ठधाम जाती है और वहाँ परब्रह्म भगवान् श्रीहरि के चरणों में शरण पाती है ॥ ३६१/२ ॥ हे साध्वि ! असत्कुल में उत्पन्न जो स्त्री अपने पति प्रतिकूल आचरण करती है तथा उससे अप्रिय वचन बोलती है, उसके कृत्य का फल सुनो। वह स्त्री कुम्भीपाक नरक में जाती है और वहाँ सूर्य तथा चन्द्रमा के स्थितिकाल तक निवास करती है । तत्पश्चात् वह चाण्डाली होती है और पति तथा पुत्र से विहीन रहती है ॥ ३७-३८१/२ ॥ ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु के ओष्ठ प्रस्फुरित होने लगे, जिससे वह साध्वी भय से काँपने लगी और वह अपने पति से कहने लगी ॥ ३९१/२ ॥ साध्वी बोली — हे महाभाग ! आपकी सन्ध्या के लोप के भय से ही मैंने आपकी निद्रा भंग की है। हे सुव्रत ! मुझ दुष्टा का यह अपराध अवश्य है, अब आप शान्त हो जाइये ॥ ४० ॥ जो मानव श्रृंगार, आहार और निद्रा का भंग करता है, वह सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थितिपर्यन्त कालसूत्रनरक में वास करता है ॥ ४११/२ ॥ ऐसा कहकर भयभीत मनसादेवी भक्तिपूर्वक अपने स्वामी के चरणकमलों पर गिर पड़ीं और बार- बार विलाप करने लगीं ॥ ४२१/२ ॥ मुनि जरत्कारु को कुपित होकर सूर्य को शाप के लिये उद्यत देखकर भगवान् सूर्य देवी सन्ध्या को साथ लेकर वहाँ आ गये। हे नारद! उन देवी के साथ स्वयं भगवान् भास्कर वहाँ आकर भयभीत होकर विनयपूर्वक मुनि से सम्यक् प्रकार से यथोचित बात कहने लगे ॥ ४३-४४१/२ ॥ भास्कर बोले — हे विप्र ! सूर्यास्त का समय जानकर साध्वी मनसा ने धर्मलोप के भय से आपको जगा दिया है। हे भगवन्! मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, मुझे क्षमा कर दीजिये। हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! मुझे शाप देना आपके लिये उचित नहीं है । ब्राह्मणों का हृदय तो सदा नवनीत के समान कोमल होता है, उनके आधे क्षणमात्र के क्रोध से सारा संसार भस्म हो सकता है, द्विज फिर से जगत् की सृष्टि भी कर सकता है, द्विज से बढ़कर तेजस्वी दूसरा कोई नहीं है । ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान, ब्रह्मज्योतिस्वरूप तथा ब्रह्मवंश ब्राह्मण को निरन्तर सनातन भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करनी चाहिये ॥ ४५–४८१/२ ॥ सूर्य का वचन सुनकर द्विज जरत्कारु प्रसन्न हो गये । भगवान् सूर्य भी विप्र जरत्कारु का आशीर्वाद लेकर अपने स्थान को चले गये । प्रतिज्ञा की रक्षा के लिये उन विप्र ने विक्षुब्ध हृदय से रुदन करती हुई तथा शोकसन्तप्त देवी मनसा का परित्याग कर दिया ॥ ४९-५० ॥ उस विपत्ति में भय से व्याकुल देवी मनसा ने अपने गुरुदेव शिव, इष्टदेवता ब्रह्मा, भगवान् श्रीहरि तथा जन्मदाता कश्यपजी का स्मरण किया ॥ ५११/२ ॥ मन से देवी मनसा के ध्यान करने पर गोपियों के ईश भगवान् श्रीकृष्ण, शंकर, ब्रह्मा और कश्यपजी वहाँ आ गये ॥ ५२१/२ ॥ प्रकृति से परे तथा निर्गुण अपने अभीष्ट देव को देखकर मुनि जरत्कारु ने उनकी स्तुति की तथा बार- बार उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। उन्होंने भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा कश्यप को भी नमस्कार किया । ‘हे देवगण! यहाँ आप लोगों का आगमन किसलिये हुआ है ?’ उन्होंने ऐसा प्रश्न किया ॥ ५३-५४१/२ ॥ मुनि जरत्कारु का वचन सुनकर ब्रह्माजी ने भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल को प्रणाम करके सहसा समयोचित उत्तर दिया — ‘हे मुने ! यदि आप अपनी साध्वी तथा धर्मपरायणा पत्नी मनसा का त्याग ही करना चाहते हैं, तो इसे स्त्रीधर्म – पालन के योग्य बनाने हेतु पहले इससे पुत्र उत्पन्न कीजिये । अपनी भार्या से पुत्र उत्पन्न करने के बाद आप इसका त्याग कर सकते हैं; क्योंकि जो विरागी पुरुष पुत्र उत्पन्न किये बिना ही अपनी प्रिय भार्या का त्याग करता है, उसका पुण्य चलनी से बहकर निकल जाने वाले जल की भाँति नष्ट हो जाता है ‘ ॥ ५५-५८ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजी का वचन सुनकर मुनीश्वर जरत्कारु ने मन्त्रोच्चारण करते हुए योगबल का आश्रय लेकर मनसादेवी की नाभि का स्पर्श किया। तत्पश्चात् मुनिवर जरत्कारु उन देवी से कहने लगे ॥ ५९१/२ ॥ जरत्कारु बोले — हे मनसे! तुम्हारे इस गर्भ से जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ, धार्मिक, ब्राह्मणों में अग्रणी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी, गुणसम्पन्न और वेदवेत्ताओं — ज्ञानियों- योगियों में श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होगा । वह धार्मिक तथा विष्णुभक्त पुत्र कुल का उद्धार करेगा । ऐसे पुत्र के जन्म मात्र से पितृगण हर्षपूर्वक नाच उठते हैं। प्रिय पत्नी वही है; जो मृदुभाषिणी, सुशीला, पतिव्रता, धर्मिष्ठा, सुपुत्रकी माता, कुलस्त्री तथा कुल का पालन करने वाली होती है । श्रीहरि की भक्ति प्रदान करने वाला ही सच्चा बन्धु होता है, न कि अभीष्ट सुख देने वाला । भगवत्प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाला बन्धु ही सच्चा पिता है । जो आवागमन से मुक्त कर देने वाली है, वही सच्ची माता होती है। वही बहन दयास्वरूपिणी है, जो यम के त्रास से छुटकारा दिला दे ॥ ६०-६५ ॥ गुरु वही है, जो विष्णु का मन्त्र प्रदान करने वाला तथा भगवान् श्रीहरि के प्रति भक्ति उत्पन्न करने वाला हो । ज्ञानदाता गुरु वही है, जो भगवान् श्रीकृष्ण का चिन्तन कराने वाला ज्ञान प्रदान करे; क्योंकि तृण से लेकर ब्रह्मपर्यन्त चराचर सम्पूर्ण विश्व आविर्भूत होकर पुनः विनष्ट हो जाता है, तो फिर अन्य वस्तु से ज्ञान कैसे हो सकता है ? वेद अथवा यज्ञ से जो भी सारतत्त्व निकलता है, वह भगवान् श्रीहरि की सेवा ही है। यही हरिसेवा समस्त तत्त्वों का सारस्वरूप है, भगवान् श्रीहरि की सेवा के अतिरिक्त अन्य सब कुछ विडम्बनामात्र है ॥ ६६–६८१/२ ॥ [हे देवि !] इस प्रकार मैंने तुम्हें ज्ञानोपदेश कर दिया। ज्ञानदाता स्वामी वही है, जो ज्ञान के द्वारा बन्धन से मुक्त कर देता है और जो बन्धन में डालता है, वह शत्रु है ॥ ६९१/२ ॥ जो गुरु भगवान् श्रीहरि में भक्ति उत्पन्न करने वाला ज्ञान नहीं देता, वह शिष्यघाती तथा शत्रु है; क्योंकि वह बन्धन से मुक्त नहीं करता । जो जननी के गर्भजनित कष्ट तथा यमयातना से मुक्त न कर सके; उसे तात तथा बान्धव कैसे कहा जाय ? जो गुरु, भगवान् श्रीकृष्ण के परमानन्दस्वरूप सनातन मार्ग का निरन्तर दर्शन नहीं कराता, वह मनुष्यों के लिये कैसा बान्धव है ? ॥ ७०–७२१/२ ॥ अतः हे साध्वि ! तुम निर्गुण तथा अच्युत परब्रह्म श्रीकृष्ण की आराधना करो। उनकी उपासना से मनुष्यों का सारा कर्म निर्मूल हो जाता है। हे प्रिये ! मैंने छलपूर्वक तुम्हारा परित्याग किया है, अतः मेरे इस अपराध को क्षमा करो सत्त्वगुण के प्रभाव से क्षमाशील साध्वी नारियों में क्रोध नहीं रहता । हे देवि ! मैं तप करने के लिये पुष्करक्षेत्र जा रहा हूँ। तुम भी यहाँ से सुखपूर्वक चली जाओ। भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल में अनुराग ही नि:स्पृह प्राणियों का एकमात्र मनोरथ होता है ॥ ७३-७५१/२ ॥ मुनि जरत्कारु का वचन सुनकर शोक से व्याकुल तथा अश्रुपूरित नेत्रोंवाली मनसादेवी अपने प्राणप्रिय पतिदेव से विनम्रतापूर्वक कहने लगीं ॥ ७६१/२ ॥ मनसा बोलीं — हे प्रभो ! निद्राभंग कर देने के कारण जो आप मेरा त्याग कर रहे हैं, इसमें मेरा दोष नहीं है । [ अतः आपसे मेरी यही प्रार्थना है कि ] मैं जहाँ भी आपका स्मरण करूँ, वहीं आप मुझे सदा दर्शन दीजियेगा ॥ ७७ ॥ अपने बन्धुओं का वियोग अत्यन्त कष्टदायक होता है, पुत्र का वियोग उससे भी अधिक कष्टदायक होता है, किंतु प्राणेश्वर पतिदेव का वियोग प्राण- विच्छेद के तुल्य होने के कारण सबसे अधिक कष्टकर होता है ॥ ७८१/२ ॥ पतिव्रता स्त्रियों के लिये पति सौ पुत्रों से भी अधिक प्रिय होता है। स्त्रियों के लिये पति सबसे बढ़कर प्रिय होता है, अतः विद्वान् पुरुषों ने पति को प्रिय की संज्ञा प्रदान की है ॥ ७९१/२ ॥ जिस प्रकार एक पुत्र वाले लोगों का मन पुत्र में, वैष्णवजनों का भगवान् श्रीहरि में, एक नेत्रवालों का नेत्र में, प्यासे प्राणियों का जल में, भूखे प्राणियों का अन्न में, कामासक्त-जनों का मैथुन में चोरों का पराये धन में, स्वेच्छाचारिणी स्त्रियों का व्यभिचारी पुरुष में, विद्वानों का शास्त्र में तथा वैश्यों का मन वाणिज्य में लगा रहता है; उसी प्रकार हे प्रभो ! पतिव्रता स्त्रियों का मन सदा अपने पति में लगा रहता है ॥ ८०-८२१/२ ॥ ऐसा कहकर मनसादेवी अपने स्वामी के चरणों पर गिर पड़ीं। कृपानिधि मुनिवर जरत्कारु ने कृपा करके क्षणभर के लिये उन्हें अपनी गोद में ले लिया । मुनि ने अश्रु से मनसादेवी को सम्पृक्त कर दिया । वियोगजन्य भय से व्याकुल तथा अश्रुपूरित नेत्रों वाली देवी मनसा ने भी अपने आँसुओं से उन मुनि की गोद को सींच डाला ॥ ८३-८४१/२ ॥ तत्पश्चात् मुनि जरत्कारु तथा देवी मनसा – – वे दोनों ही ज्ञान द्वारा शोक से मुक्त हो गये। अपनी प्रिया को समझाकर बार- बार परमात्मा श्रीकृष्ण के चरणकमल का ध्यान करते हुए मुनि जरत्कारु तपस्या के लिये चले गये और देवी मनसा भी अपने गुरु भगवान् शिव के धाम कैलास पर चली गयीं। वहाँ पार्वती ने शोकसन्तप्त देवी मनसा को बहुत समझाया और कल्याण-निधान भगवान् शिव ने भी उसे अत्यन्त मंगलकारी ज्ञान प्रदान किया ॥ ८५-८७१/२ ॥ तदनन्तर देवी मनसा ने अत्यन्त प्रशस्त तथा मंगलमय वेला में एक पुत्र को जन्म दिया, जो भगवान् नारायण का अंश और योगियों तथा ज्ञानियों का भी गुरु था। वह बालक गर्भ में स्थित रहते हुए ही भगवान् शिव के मुख से महाज्ञान का श्रवण करके योगियों तथा ज्ञानियों का गुरु और योगीश्वर हो गया था ॥ ८८-८९ ॥ भगवान् शिव ने उस शिशु का जातकर्म – संस्कार कराया तथा उसके कल्याण के लिये स्वस्तिवाचन और वेदपाठ कराया ॥ ९०१/२ ॥ शिवजी ने बहुत से मणि, रत्न तथा मुकुट ब्राह्मणों को दान दिये और पार्वतीजी ने लाखों गौएँ तथा भाँति-भाँति के रत्न उन्हें प्रदान किये ॥ ९९१/२ ॥ भगवान् शिव ने उस बालक को चारों वेद तथा वेदांग पढ़ाये और उसे श्रेष्ठ मृत्युंजय – ज्ञान का उपदेश दिया ॥ ९२१/२ ॥ अपने पति, अभीष्ट देवता तथा गुरु में उस मनसा की अत्यधिक भक्ति थी, इसलिये उसके पुत्र का नाम ‘आस्तीक’ हुआ ॥ ९३१/२ ॥ मुनि जरत्कारु पहले ही शिवजी की आज्ञा से भगवान् विष्णु की तपस्या करने के लिये पुष्करक्षेत्र में चले गये थे। वहाँ परमात्मा श्रीकृष्ण का महामन्त्र प्राप्त करके वे तपोधन महायोगी जरत्कारु दिव्य तीन लाख वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात् भगवान् शिव को नमस्कार करने के लिये आये । शंकर को नमस्कार करके वे वहीं रुक गये । बालक भी वहीं पर था ॥ ९४–९६ ॥ तत्पश्चात् वे देवी मनसा अपने पिता कश्यपमुनि के आश्रम में आ गयीं । पुत्रसहित उस पुत्री को देखकर प्रजापति कश्यप अत्यन्त हर्षित हुए। हे मुने! कश्यपजी ने शिशु के कल्याण के लिये ब्राह्मणों को करोड़ों रत्नों का दान किया और असंख्य ब्राह्मणों को भोजन कराया ॥ ९७-९८ ॥ हे परंतप ! प्रजापति कश्यप की दिति, अदिति तथा अन्य सभी पत्नियाँ परम प्रसन्न हुईं। उस समय देवी मनसा अपने पुत्र के साथ दीर्घकाल तक अपने पिता के आश्रम में स्थित रहीं । अब उनका आगे का आख्यान पुनः कहूँगा, उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ९९१/२ ॥ हे ब्रह्मन्! एक समय की बात है, अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित् दैव की प्रेरणा से अपने द्वारा किये गये सदोष कर्म के कारण ब्रह्मशाप से सहसा ग्रस्त हो गये । श्रृंगीऋषि कौशिकी नदी का जल लेकर उन्हें शाप दे दिया कि एक सप्ताह व्यतीत होते ही तक्षकनाग तुम्हें डँस लेगा ॥ १००-१०११/२ ॥ श्रृंगीऋषि का वह शाप सुनकर राजा परीक्षित् ऐसे सुरक्षित स्थान पर आ गये, जहाँ वायु भी प्रवेश नहीं कर सकता था । अपने देह की रक्षा में तत्पर रहते हुए राजा परीक्षित् एक सप्ताह तक वहाँ रहे ॥ १०२१/२ ॥ राजा परीक्षित् को विषमुक्त करने के लिये जाते हुए धन्वन्तरि ने सप्ताह बीतने पर राजा को डँसने के लिये जा रहे तक्षक को मार्ग में देखा ॥ १०३१/२ ॥ उन दोनों में बातचीत होने लगी और परस्पर बड़ी प्रीति हो गयी । तक्षक ने अपनी इच्छा से उन्हें मणि दे दी और धन्वन्तरि ने मणि ग्रहण कर ली । मणि पाकर वे सन्तुष्ट हो गये और प्रसन्नचित्त होकर लौट गये । इसके बाद तक्षक ने मंच पर बैठे हुए राजा को डँस लिया। इसके परिणामस्वरूप राजा परीक्षित् तत्काल देह त्यागकर परलोक चले गये। तब राजा जनमेजय ने अपने पिता का समस्त और्ध्वदैहिक संस्कार कराया ॥ १०४-१०६१/२ ॥ हे मुने ! तत्पश्चात् राजा ने सर्पसत्र नामक यज्ञ आरम्भ किया, जिसमें ब्रह्मतेज के कारण अनेक सर्प प्राण त्यागने लगे। तब तक्षक भयभीत होकर इन्द्र की शरण में चला गया । विप्रसमुदाय इन्द्रसहित तक्षक को मारने के लिये उद्यत हुआ ॥ १०७-१०८१/२ ॥ ऐसी स्थिति में इन्द्रसहित सभी देवगण देवी मनसा के पास गये। वहाँ पर भयातुर तथा व्याकुल इन्द्र ने उन भगवती मनसा की स्तुति की ॥ १०९१/२ ॥ तदनन्तर मुनिवर आस्तीक ने माता की आज्ञा से यज्ञ में आकर श्रेष्ठ राजा जनमेजय से इन्द्र और तक्षक के प्राणों की याचना की । तब महाराज जनमेजय ने उन्हें कृपापूर्वक प्राणदान का वर दे दिया और ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ का समापन करके विप्रों को प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा दी ॥ ११०-११११/२ ॥ तत्पश्चात् ब्राह्मण, मुनि तथा देवताओं ने देवी मनसा के पास जाकर पृथक्-पृथक् उनकी पूजा तथा स्तुति की। इन्द्र भी सभी पूजन सामग्री एकत्र करके पवित्र होकर परम आदरपूर्वक मनसादेवी का पूजन तथा स्तवन किया। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर देवी को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करके उन्हें षोडशोपचार तथा प्रियपदार्थ प्रदान किये। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शिव की आज्ञा के अनुसार देवी मनसा की पूजा करके वे सब अपने-अपने स्थान को चले गये। [हे मुने!] इस प्रकार मैंने मनसादेवी का सम्पूर्ण आख्यान कह दिया, अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं?॥ ११२–११५१/२ ॥ नारदजी बोले — [ हे भगवन्!] देवराज इन्द्र ने किस स्तोत्र से देवी मनसा की स्तुति की ? साथ ही मैं उन देवी के पूजा-विधान का क्रम यथार्थरूप में सुनना चाहता हूँ ॥ ११६१/२ ॥ श्रीनारायण बोले — [हे नारद!] देवराज इन्द्र ने विधिपूर्वक स्नान किया। इसके बाद पवित्र होकर तथा आचमन करके उन्होंने दो शुद्ध वस्त्र धारण किये, फिर देवी मनसा को भक्तिपूर्वक रत्नमय सिंहासन पर विराजित किया। तत्पश्चात् इन्द्र ने वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुए रत्नमय कलश में भरे हुए स्वर्ग गंगा के जल से भगवती को स्नान कराया और अग्नितुल्य शुद्ध दो मनोहर वस्त्र पहनाये। देवी के सम्पूर्ण अंगों में चन्दन लगाकर उन्हें भक्तिपूर्वक पाद्य तथा अर्घ्य अर्पण करने के अनन्तर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती — इन छः देवताओं की विधिवत् पूजा करके इन्द्र ने साध्वी मनसा का पूजन किया ॥ ११७-१२०१/२ ॥ इन्द्र ने ‘ॐ ह्रीं श्रीं मनसादेव्यै स्वाहा’ — इस दशाक्षर मूल मन्त्र के द्वारा यथोचितरूप से सभी पूजन-सामग्री अर्पित की। इस तरह भगवान् विष्णु की प्रेरणा पाकर देवराज इन्द्र ने सोलह प्रकार के दुर्लभ पूजनोपचार अर्पण करके प्रसन्नतापूर्वक भक्ति के साथ देवी मनसा की पूजा की । उस समय इन्द्र ने नाना प्रकार के वाद्य बजवाये ॥ १२१–१२३ ॥ देवताओं के प्रिय इन्द्र की आज्ञा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव की आज्ञा से देवी मनसा के ऊपर आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी। तत्पश्चात् पुलकित शरीर वाले इन्द्र नेत्रों में आँसू भरकर भगवती मनसा की स्तुति करने लगे ॥ १२४१/२ ॥ ॥ पुरन्दर उवाच ॥ देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि साध्वीनां प्रवरां वराम् ॥ १२५ ॥ परात्परां च परमां न हि स्तोतुं क्षमोऽधुना । स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वभावाख्यानतत्परम् ॥ १२६ ॥ न क्षमः प्रकृते वक्तुं गुणानां गणनां तव । शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं कोपहिंसादिवर्जिता ॥ १२७ ॥ न च शक्तो मुनिस्तेन त्यक्तुं याञ्चा कृता यतः । त्वं मया पूजिता साध्वी जननी मे यथादितिः ॥ १२८ ॥ दयारूपा च भगिनी क्षमारूपा यथा प्रसूः । त्वया मे रक्षिताः प्राणाः पुत्रदाराः सुरेश्वरि ॥ १२९ ॥ अहं करोमि त्वत्पूजां प्रीतिश्च वर्धतां सदा । नित्या यद्यपि पूज्या त्वं सर्वत्र जगदम्बिके ॥ १३० ॥ तथापि तव पूजां च वर्धयामि सुरेश्वरि । ये त्वामाषाढसङ्क्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः ॥ १३१ ॥ पञ्चम्यां मनसाख्यायां मासान्ते वा दिने दिने । पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते च धनानि वै ॥ १३२ ॥ यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः । ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः ॥ १३३ ॥ लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा । त्वं स्वयं सर्वलक्ष्मीश्च वैकुण्ठे कमलालया ॥ १३४ ॥ नारायणांशो भगवाञ्जरत्कारुर्मुनीश्वरः । तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता ॥ १३५ ॥ अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा । मनसादेवि शक्त्या त्वं स्वात्मना सिद्धयोगिनी ॥ १३६ ॥ तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भव । ये भक्त्या मनसां देवाः पूजयन्त्यनिशं भृशम् ॥ १३७ ॥ तेन त्वां मनसां देवीं प्रवदन्ति मनीषिणः । सत्यस्वरूपा देवि त्वं शश्वत्सत्यनिषेवणात् ॥ १३८ ॥ यो हि त्वां भावयेन्नित्यं स त्वां प्राप्नोति तत्परः । पुरन्दर बोले — हे देवि ! पतिव्रताओं में अति-श्रेष्ठ, परात्पर तथा परमा आप भगवती की मैं स्तुति करना चाहता हूँ; किंतु इस समय आपकी स्तुति कर पाने में समर्थ नहीं हूँ। हे प्रकृते ! मैं वेद में वर्णित आपके स्तोत्रों के लक्षण तथा आपके चरित्रसम्बन्धी आख्यान आदि का वर्णन करने में सक्षम नहीं हूँ । [ हे देवि ! ] मैं आपके गुणों की गणना नहीं कर सकता ॥ १२५-१२६१/२ ॥ आप शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं तथा क्रोध, हिंसा आदि से रहित हैं । मुनि जरत्कारु आपका त्याग कर सकने में समर्थ नहीं थे, इसलिये उन्होंने आपसे क्षमायाचना की थी । आप साध्वी मेरी माता अदिति के समान ही मेरी पूजनीया हैं । आप दयारूप से मेरी भगिनी तथा क्षमारूप से मेरी जननी हैं ॥ १२७-१२८१/२ ॥ हे सुरेश्वरि ! आपके द्वारा मेरे प्राण, पुत्र और स्त्री की रक्षा हुई है, अतः मैं आपकी पूजा करता हूँ । आपके प्रति मेरी प्रीति निरन्तर बढ़ती रहे । हे जगदम्बिके! यद्यपि आप सनातनी भगवती सर्वत्र पूज्य हैं, फिर भी मैं आपकी पूजा का प्रचार कर रहा हूँ । हे सुरेश्वरि ! जो मनुष्य आषाढ़ मास की संक्रान्ति, मनसा- पंचमी (नागपंचमी), मास के अन्त में अथवा प्रतिदिन भक्तिपूर्वक आपकी पूजा करेंगे, उनके पुत्र-पौत्र आदि तथा धन की वृद्धि अवश्य ही होगी और वे यशस्वी, कीर्तिमान्, विद्यासम्पन्न तथा गुणी होंगे। जो प्राणी आपकी पूजा नहीं करेंगे तथा अज्ञान के कारण आपकी निन्दा करेंगे, वे लक्ष्मीविहीन रहेंगे और उन्हें सदा नागों से भय बना रहेगा ॥ १२९–१३३१/२ ॥ [ हे देवि ! ] आप स्वयं सर्वलक्ष्मी हैं तथा वैकुण्ठ में कमलालया हैं और मुनीश्वर भगवान् जरत्कारु नारायण के अंश हैं। आपके पिता ने हम लोगों की रक्षा के उद्देश्य से ही तपस्या और तेज के प्रभाव से मन के द्वारा आपका सृजन किया है, अतः आप ‘मनसा’ नाम से विख्यात हैं ॥ १३४- १३५१/२ ॥ हे मनसादेवि ! आप अपनी शक्ति से सिद्धयोगिनी हैं, अतः आप मनसादेवी सबके द्वारा पूजित और वन्दित हों । देवगण भक्तिपूर्वक मन से निरन्तर आपकी श्रेष्ठ पूजा करते हैं, इसीलिये विद्वान् पुरुष आपको ‘मनसादेवी’ कहते हैं । हे देवि ! सत्य की सर्वदा उपासना करने के कारण आप सत्यस्वरूपिणी हैं । जो मनुष्य तत्पर होकर निरन्तर आपका ध्यान करता है, वह आपको प्राप्त कर लेता है ॥ १३६-१३८१/२ ॥ [हे मुने!] इस प्रकार मनसादेवी की स्तुति करके और उन भगिनीरूप देवी से वर प्राप्त कर देवराज इन्द्र अनेकविध भूषणों से अलंकृत अपने भवन को चले गये ॥ १३९१/२ ॥ मनसादेवी ने अपने पुत्र के साथ पिता कश्यप के आश्रम में दीर्घकाल तक निवास किया । भ्राताओं के द्वारा वे सदा पूजित, सम्मानित और वन्दित हुईं ॥ १४० ॥ हे ब्रह्मन्! तदनन्तर सुरभि गौ ने गोलोक से वहाँ आकर इन्द्र द्वारा सुपूजित उन मनसादेवी को अपने दुग्ध से स्नान कराकर आदरपूर्वक उनकी पूजा की और उन देवी ने उन्हें अत्यन्त दुर्लभ तथा गोपनीय सम्पूर्ण ज्ञान का उपदेश दिया। तत्पश्चात् उस सुरभि तथा देवताओं के द्वारा पूजित वे देवी मनसा पुनः स्वर्गलोक को चली गयीं ॥ १४१-१४२१/२ ॥ जो मनुष्य पुण्यबीजस्वरूप इस इन्द्रस्तोत्र का पाठ करता है तथा भगवती मनसा की पूजा करता है, उसे तथा उसके वंशजों के लिये नागों का भय नहीं रह जाता। यदि मनुष्य इस स्तोत्र को सिद्ध कर ले, तो उसके लिये विष भी अमृत तुल्य हो जाता है। इस स्तोत्र का पाँच लाख जप कर लेने से मनुष्य को इसकी सिद्धि हो जाती है और वह निश्चय ही सर्प पर शयन करने वाला तथा सर्प पर सवारी करने वाला हो जाता है ॥ १४३–१४५ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘मनसोपाख्यानवर्णन’ नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥ Content is available only for registered users. 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