May 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-29 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-एकोनत्रिंशोऽध्यायः उन्नतीसवाँ अध्याय सावित्री-धर्मराज के प्रश्नोत्तर और धर्मराज द्वारा सावित्री को वरदान सावित्र्युपाख्याने कर्मविपाकवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] सावित्री की बात सुनकर यमराज आश्चर्य में पड़ गये और हँसकर उन्होंने प्राणियों के कर्मफल के विषय में बताना आरम्भ किया ॥ १ ॥ धर्म बोले — हे वत्से ! इस समय तुम्हारी अवस्था तो मात्र बारह वर्ष की है, किंतु तुम्हारा ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, ज्ञानियों और योगियों से भी बढ़कर है ॥ २ ॥ हे पुत्रि ! तुम भगवती सावित्री के वरदान से उन्हीं की कला से जन्म लेकर सती सावित्री नाम से विख्यात हो । प्राचीन काल में राजा अश्वपति ने अपनी की गयी तपस्या के द्वारा उन्हीं सावित्री के सदृश तुम्हें कन्यारूप में प्राप्त किया है ॥ ३ ॥ जिस प्रकार लक्ष्मी विष्णु की गोद में तथा भवानी भगवान् शिव के वक्षःस्थल पर विराजमान रहती हैं एवं जैसे अदिति कश्यप के, अहल्या गौतम के, शची महेन्द्र के, रोहिणी चन्द्रमा के, रति कामदेव के, स्वाहा अग्नि के, स्वधा पितरों के, सन्ध्या सूर्य के, वरुणानी वरुण के, दक्षिणा यज्ञ के, पृथ्वी वाराह के और देवसेना कार्तिकेय के पास उनकी सौभाग्यवती प्रिया बनकर सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार हे प्रिये ! तुम भी सत्यवान् की सौभाग्यवती प्रिया के रूप में सुशोभित होओ। यह वर मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया । हे देवि ! हे महाभागे ! इसके अतिरिक्त और भी जो दूसरा वर तुम्हें अभीष्ट हो, उसे माँग लो; मैं तुम्हें सभी अभिलषित वर प्रदान करूँगा ॥ ४–८ ॥ सावित्री बोली — हे महाभाग ! सत्यवान् से मुझे सौ औरस पुत्र प्राप्त हों, यह मेरा अभीष्ट वर है । मेरे पिता के भी सौ पुत्र हों, मेरे श्वसुर को नेत्र-ज्योति मिल जाय और उन्हें राज्य भी प्राप्त हो जाय — यह मेरा अभिलषित वर है । हे जगत्प्रभो ! अन्त में एक लाख वर्ष बीतने के पश्चात् मैं सत्यवान् के साथ भगवान् श्रीहरि के धाम चली जाऊँ — यह वर भी आप मुझे दीजिये ॥ ९–११ ॥ जीव के कर्मों का फल तथा संसार से उसके उद्धार का उपाय सुनने के लिये मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है, अत: वह सब मुझे बताने की आप कृपा कीजिये ॥ १२ ॥ धर्मराज बोले — हे महासाध्वि ! तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं जीवों के कर्मफल के विषय में बता रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो ॥ १३ ॥ पुण्यभूमि भारतवर्ष में ही शुभ और अशुभ कर्मों की उत्पत्ति होती है, अन्यत्र नहीं । दूसरी जगह लोग केवल कर्मों का फल भोगते हैं । हे पतिव्रते ! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसादि ये ही शुभाशुभ कर्म करने वाले हैं, दूसरे पशु आदि प्राणी नहीं । देवादि विशिष्ट प्राणी ही सभी योनियों का फल भोगते हैं, सभी योनियों में भटकते हैं और शुभाशुभ कर्मों का फल स्वर्ग तथा नरक में भोगते हैं ॥ १४–१६ ॥ वे विशिष्ट प्राणी समस्त योनियों में भ्रमण करते रहते हैं और पूर्वजन्म में अर्जित किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल भोगते रहते हैं । शुभ कर्म के प्रभाव से प्राणी स्वर्गादि लोकों में जाते हैं तथा अशुभ कर्म के कारण वे विभिन्न नरकों में पड़ते हैं ॥ १७-१८ ॥ कर्म के नि:शेष हो जाने पर भक्ति उत्पन्न होती है । हे साध्वि ! वह भक्ति दो प्रकार की बतलायी गयी है । एक निर्वाणस्वरूपा भक्ति है और दूसरी ब्रह्मरूपिणी भगवती प्रकृति के लिये की जाने वाली भक्ति है ॥ १९ ॥ प्राणी पूर्वजन्म में किये गये कुकर्म के कारण रोगी और शुभ कर्म के कारण रोगरहित होता है । इस प्रकार अपने कर्म से ही जीव दीर्घजीवी, अल्प आयुवाला, सुखी तथा दुःखी होता है । प्राणी अपने कुत्सित कर्म के प्रभाव से नेत्रहीन तथा अंगहीन होता है । सर्वोत्कृष्ट कर्म के द्वारा प्राणी अपने दूसरे जन्म में सिद्धि आदि भी प्राप्त कर लेता है ॥ २०-२१ ॥ हे देवि ! साधारण बात कह चुका, अब विशेष बात सुनो। हे सुन्दरि ! यह अत्यन्त दुर्लभ विषय पुराणों और स्मृतियों में वर्णित है । इसे पूर्णरूप से गुप्त रखना चाहिये ॥ २२ ॥ भारतवर्ष में समस्त योनियों में मानवयोनि परम दुर्लभ है। सभी मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। वह सम्पूर्ण कर्मों में प्रशस्त माना गया है। हे साध्वि ! उनमें ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण भारतवर्ष में अधिक गरिमामय माना जाता है । हे साध्वि ! सकाम तथा निष्काम भेद से ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं । सकाम होने से वह कर्मप्रधान होता है । निष्काम केवल भक्त होता है । सकाम कर्मफल भोगता है और निष्काम समस्त सुखासुख भोगों के उपद्रवों से रहित रहता है। हे साध्वि! वह शरीर त्यागकर भगवान् का जो निरामय धाम है, उसे प्राप्त करता है और हे साध्वि ! उन निष्काम जनों को पुनः इस लोक में नहीं आना पड़ता। वे द्विभुज परमात्मा श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं और अन्त में वे भक्त दिव्यरूप धारणकर गोलोक को प्राप्त होते हैं ॥ २३–२७ ॥ सकाम वैष्णव वैकुण्ठधाम में जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्ष में लौट आते हैं और यहाँ पर द्विजातियों के कुल में उनका जन्म होता है। वे सभी कुछ समय बीतने पर क्रमशः निष्काम भक्त बन जाते हैं और मैं उन्हें अपनी निर्मल भक्ति प्रदान कर देता हूँ; यह सर्वथा निश्चित है । जो सकाम ब्राह्मण तथा वैष्णवजन हैं, अनेक जन्मों में भी विष्णुभक्ति से रहित होने के कारण उनकी बुद्धि निर्मल नहीं हो पाती ॥ २८-३० ॥ हे साध्वि ! जो द्विज तीर्थों में रहकर सदा तपस्या में संलग्न रहते हैं, वे ब्रह्मलोक जाते हैं और समयानुसार पुनः भारतवर्ष में आते हैं ॥ ३१ ॥ जो तीर्थों में अथवा कहीं अन्यत्र रहकर सदा अपने ही धर्म-कर्म में लगे रहते हैं, वे सत्यलोक पहुँचते हैं और पुनः भारतवर्ष में जन्म लेते हैं ॥ ३२ ॥ जो ब्राह्मण अपने धर्म में संलग्न रहकर भारतवर्ष में सूर्य की उपासना करते हैं, वे सूर्यलोक जाते हैं और समयानुसार लौटकर पुनः भारतवर्ष में जन्म लेते हैं ॥ ३३ ॥ जो धर्मपरायण तथा निष्काम मानव मूलप्रकृति भगवती जगदम्बा की भक्ति करते हैं, वे मणिद्वीप लोक में जाते हैं और फिर वहाँ से लौटकर नहीं आते ॥ ३४ ॥ जो अपने धर्मों में संलग्न रहते हुए शिव, शक्ति और गणपति की उपासना करते हैं; वे शिवलोक जाते हैं और कुछ समय पश्चात् वहाँ से पुनः भारतवर्ष में लौट आते हैं ॥ ३५ ॥ हे साध्वि ! जो ब्राह्मण अपने धर्म में निरत रहकर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे विभिन्न लोकों में जाते हैं और समयानुसार पुनः भारतवर्ष में जन्म लेते हैं ॥ ३६ ॥ जो द्विज अपने धर्म में संलग्न रहते हुए निष्काम भाव से भगवान् श्रीहरि की भक्ति करते हैं, वे उस भक्ति के प्रभाव से क्रम से श्रीहरि के लोक को प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥ जो विप्र सदा अपने धर्म से विमुख, आचारहीन, कामलोलुप तथा देवाराधन से रहित हैं, वे अवश्य ही नरक में पड़ते हैं ॥ ३८ ॥ चारों वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म में संलग्न रहकर ही शुभ कर्म का फल भोगने के अधिकारी होते हैं ॥ ३९ ॥ जो अपने कर्तव्य से विमुख हैं, वे अवश्य ही नरक में जाते हैं और अपने कर्म का फल भोगते हैं । वे भारतवर्ष में नहीं आ सकते। अतः चारों वर्णों के लोगों को अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिये ॥ ४०१/२ ॥ हे साध्वि ! अपने धर्म में तत्पर रहने वाले जो ब्राह्मण अपने धर्म में संलग्न ब्राह्मण को अपनी कन्या प्रदान करते हैं, वे चन्द्रलोक में जाते हैं और वहाँ पर चौदह इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त निवास करते हैं । कन्या को अलंकारों से विभूषित करके दान करने से दुगुना फल कहा जाता है । सकाम भाव से दान करने वाले उसी चन्द्रलोक में जाते हैं, किंतु निष्काम भाव से दान करने वाले साधुपुरुष वहाँ नहीं जाते, फल की इच्छा से रहित वे विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं ॥ ४१–४३१/२ ॥ जो लोग ब्राह्मणों को गव्य, चाँदी, सोना, वस्त्र, घृत, फल और जल प्रदान करते हैं; वे चन्द्रलोक में जाते हैं और हे साध्वि ! वे उस लोक में एक मन्वन्तर तक निवास करते हैं । उस दान के प्रभाव से ही वे लोग वहाँ इतने दीर्घकाल तक सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ ४४-४५१/२ ॥ हे साध्वि ! जो लोग पवित्र ब्राह्मण को सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि देते हैं, वे सूर्यलोक में जाते हैं और हे साध्वि ! वे वहाँ उस लोक में दस हजार वर्षों तक निवास करते हैं । वे उस विस्तृत लोक में निर्विकार होकर दीर्घकाल तक निवास करते हैं ॥ ४६-४७१/२ ॥ जो मनुष्य ब्राह्मणों को भूमि तथा प्रचुर धन प्रदान करता है, वह भगवान् विष्णु के श्वेतद्वीप नामक मनोहर लोक में पहुँच जाता है और वहाँ पर चन्द्र- सूर्य की स्थितिपर्यन्त निवास करता है। हे मुने ! वह पुण्यवान् मनुष्य उस महान् लोक में विपुल काल तक वास करता है ॥ ४८-४९१/२ ॥ जो लोग विप्र को भक्तिपूर्वक गृह का दान करते हैं, वे चिरकाल तक स्थिर रहने वाले सुखदायी विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं । हे साध्वि ! वे मनुष्य दान में दिये गये उस गृह के रजकण की संख्या के बराबर वर्षों तक उस अत्यन्त श्रेष्ठ तथा विशाल विष्णुलोक में निवास करते हैं । जो मनुष्य जिस किसी भी देवता के उद्देश्य से मन्दिर का दान करता है, वह उस देवता के लोक में जाता है और उस लोक में उतने ही वर्षों तक वास करता है, जितने उस मन्दिर में रजकण होते हैं। अपने घर पर दान करने से चार गुना, किसी पवित्र तीर्थ में दान करनेसे सौ गुना और किसी श्रेष्ठ स्थान में दान करने से दुगुना पुण्यफल प्राप्त होता है — ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ॥ ५०–५३१/२ ॥ जो व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होने के लिये तड़ाग का दान करता है, वह जनलोक जाता है और उस तड़ाग में विद्यमान रेणु-संख्या के बराबर वर्षों तक उस लोक में रहता है । वापी का दान करने से मनुष्य उससे भी दस गुना फल प्राप्त कर लेता है । वापी के दान से तड़ाग-दान का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है । चार हजार धनुष के बराबर लम्बा तथा उतना ही अथवा उससे कुछ कम चौड़ा जिसका प्रमाण हो, उसे वापी कहा गया है ॥ ५४-५६१/२ ॥ यदि कन्या किसी योग्य वर को प्रदान की जाती है, तो वह दान दस वापी के दान के समान होता है और यदि कन्या अलंकारों से सम्पन्न करके दी जाती है, तो उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है । जो फल तड़ाग के दान से मिलता है, वही फल उस तड़ाग के जीर्णोद्धार से भी प्राप्त हो जाता है। किसी वापी का कीचड़ दूर कराकर उसका उद्धार करने से वापी-दान के समान पुण्य प्राप्त हो जाता है ॥ ५७-५८१/२ ॥ हे साध्वि ! जो मनुष्य पीपल का वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह तपोलोक पहुँचता है और वहाँ पर दस हजार वर्षों तक निवास करता है । हे सावित्रि! जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के लिये पुष्पोद्यान का दान करता है, वह दस हजार वर्षों तक ध्रुवलोक में निश्चितरूप से निवास करता है ॥ ५९-६०१/२ ॥ हे साध्वि ! जो मनुष्य विष्णु के उद्देश्य से भारत में विमान का दान करता है, वह पूरे एक मन्वन्तर तक विष्णुलोक में निवास करता है। चित्रयुक्त तथा विशाल विमान का दान करने पर उसके दान का चौगुना फल होता है । शिविका का दान करने से मनुष्य उसका आधा फल प्राप्त करता है — यह निश्चित है। जो व्यक्ति भगवान् श्रीहरि के उद्देश्य से भक्तिपूर्वक दोला-मन्दिर का दान करता है, वह भी विष्णुलोक में सौ मन्वन्तर तक निवास करता है ॥ ६१-६३१/२ ॥ हे पतिव्रते ! जो मनुष्य आरामगृहों से युक्त राजमार्ग का निर्माण कराता है, वह दस हजार वर्षों तक इन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ६४१/२ ॥ ब्राह्मणों अथवा देवताओं को दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्म में दिया गया है, जन्मान्तर में उसी का फल प्राप्त होता है और जो नहीं दिया गया है, उसका फल नहीं मिलता । पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि लोकों के सुख भोगकर भारतवर्ष में क्रमशः उत्तम से उत्तम ब्राह्मणकुलों में जन्म ग्रहण करता है। इस प्रकार वह पुण्यवान् विप्र भी पुनः स्वर्ग में अपने कर्मफल का भोग करके भारतवर्ष में ब्राह्मण होकर जन्म प्राप्त करता है। क्षत्रिय आदि के लिये भी ऐसा ही है । क्षत्रिय हो अथवा वैश्य – कोई करोड़ों कल्प के तपस्या के प्रभाव से भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त कर सकता – ऐसा श्रुतियों में सुना गया है ॥ ६५–६८१/२ ॥ करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी बिना भोग प्राप्त किये कर्म का क्षय नहीं होता। अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्म का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। देवता और तीर्थ की सहायता से तथा कायव्यूह ( तप) – से प्राणी शुद्ध हो जाता है। हे साध्वि ! ये कुछ बातें मैंने तुम्हें बतला दीं; अब आगे क्या सुनना चाहती हो ? ॥ ६९-७० ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नारायण-नारद- संवाद के सावित्री-उपाख्यान में कर्मविपाकवर्णन’ नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥ Content is available only for registered users. 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