श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-25
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चविंशोऽध्यायः
पच्चीसवाँ अध्याय
तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसीस्तवन का वर्णन
तुलसीपूजाविधिवर्णनम्

नारदजी बोले — जिस समय विष्णुप्रिया तुलसी की पूजा की गयी थी, उस समय उनके लिये किये गये पूजन- विधान तथा स्तोत्र को अब आप मुझे बताइये । हे मुने! सर्वप्रथम किसने उनकी पूजा की, किसने उनका स्तवन किया और किस प्रकार वे सर्वत्र पूज्य हुईं — यह सब आप मुझे बताइये ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले — हे मुनीश्वरो ! नारद का वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारायण ने हँसकर सभी पापों का नाश करने वाली, पुण्यमयी तथा श्रेष्ठ कथा कहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

श्रीनारायण बोले — भगवान् श्रीहरि तुलसी की विधिवत् पूजा करके उस साध्वी के साथ आनन्द करने लगे। उन्होंने तुलसी को गौरव प्रदान करके उसे लक्ष्मी के समान सौभाग्यवती बना दिया ॥ ४ ॥ लक्ष्मी और गंगा ने तो उस तुलसी के नवसमागम तथा सौभाग्य-गौरव को सहन कर लिया, किंतु अत्यधिक क्षोभ उत्पन्न होने के कारण सरस्वती इसे सहन नहीं कर सकीं ॥ ५ ॥ उस मानिनी सरस्वती ने कलह में श्रीहरि के समक्ष तुलसी को बहुत पीड़ित किया। इससे लज्जा और अपमान के कारण तुलसी अन्तर्धान हो गयीं ॥ ६ ॥ ज्ञानियों के लिये सर्वसिद्धेश्वरी तथा सिद्धयोगिनी देवी तुलसी कोप के कारण भगवान् श्रीहरि की आँखों से ओझल हो गयीं ॥ ७ ॥ जब भगवान् श्रीहरि ने तुलसी को कहीं नहीं देखा, तब सरस्वती को समझा-बुझाकर तथा उससे आज्ञा लेकर वे तुलसीवन की ओर चल दिये ॥ ८ ॥

वहाँ पहुँचकर श्रीहरि ने विधिवत् स्नान किया और उन साध्वी तुलसी का पूजन किया । तत्पश्चात् उनका ध्यान करके भगवान् ने भक्तिपूर्वक की स्तुति की। उन्होंने लक्ष्मीबीज (श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और वाणीबीज (ऐं) – इन बीजों को पूर्व में लगाकर ‘वृन्दावनी’ – इस शब्द के अन्त में ‘ङे’ (चतुर्थी) विभक्ति लगाकर तथा अन्त में वह्निजाया (स्वाहा ) – का प्रयोग करके दशाक्षर मन्त्र (श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा ) से पूजन किया था ॥ ९-१० ॥

हे नारद! जो इस कल्पवृक्षरूपी मन्त्रराज से विधिपूर्वक तुलसी की पूजा करता है, वह निश्चितरूप से समस्त सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥ हे नारद! घृत का दीपक, धूप, सिन्दूर, चन्दन, नैवेद्य और पुष्प आदि उपचारों तथा स्तोत्र से भगवान् श्रीहरि के द्वारा सम्यक् पूजित होकर तुलसीदेवी वृक्ष से तत्काल प्रकट हो गयीं । वे कल्याणकारिणी तुलसी प्रसन्न होकर श्रीहरि के चरणकमल की शरण में चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ तब भगवान् विष्णु ने उन्हें यह वर प्रदान किया ‘तुम सर्वपूज्या हो जाओ । सुन्दर रूपवाली तुमको मैं अपने मस्तक तथा वक्षःस्थल पर धारण करूँगा और समस्त देवता आदि भी तुम्हें अपने मस्तक पर धारण करेंगे’ — ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि उन तुलसी को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये ॥ १४-१५ ॥

नारदजी बोले — हे महाभाग ! तुलसी का ध्यान क्या है, स्तवन क्या है तथा पूजा-विधान क्या है ? यह मुझे बताने की कृपा कीजिये ॥ १६ ॥

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] उस समय तुलसी के अन्तर्धान हो जाने पर भगवान् श्रीहरि विरह से व्यथित हो उठे और वृन्दावन जाकर उन तुलसी की इस प्रकार स्तुति * करने लगे ॥ १७ ॥

॥ श्रीभगवानुवाच ॥
वृन्दरूपाश्च वृक्षाश्च यदैकत्र भवन्ति च ।
विदुर्बुधास्तेन वृन्दां मत्प्रियां तां भजाम्यहम् ॥ १८ ॥
पुरा बभूव या देवी त्वादौ वृन्दावने वने ।
तेन वृन्दावनी ख्याता सौभाग्या तां भजाम्यहम् ॥ १९ ॥
असंख्येषु च विश्वेषु पूजिता या निरन्तरम् ।
तेन विश्वपूजिताऽऽख्यां पूजितां च भजाम्यहम् ॥ २० ॥
असंख्यानि च विश्वानि पवित्राणि त्वया सदा ।
तां विश्वपावनीं देवीं विरहेण स्मराम्यहम् ॥ २१ ॥
देवा न तुष्टाः पुष्पाणां समूहेन यया विना ।
तां पुष्पसारां शुद्धां च द्रष्टुमिच्छामि शोकतः ॥ २२ ॥
विश्वे यत्प्राप्तिमात्रेण भक्तानन्दो भवेद्‌ ध्रुवम् ।
नन्दिनी तेन विख्याता सा प्रीता भवतादिह ॥ २३ ॥
यस्या देव्यास्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च ।
तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रियाम् ॥ २४ ॥
कृष्णजीवनरूपा सा शश्वत्प्रियतमा सती ।
तेन कृष्णजीवनी सा सा मे रक्षतु जीवनम् ॥ २५ ॥

 श्रीभगवान् बोले — जब वृन्दा (तुलसी) – रूप वृक्ष तथा अन्य वृक्ष एकत्र होते हैं, तब विद्वान् लोग उसे ‘वृन्दा’ कहते हैं। ऐसी ‘वृन्दा’ नाम से प्रसिद्ध अपनी प्रिया की मैं उपासना करता हूँ ॥ १८ ॥ जो देवी प्राचीन काल में सर्वप्रथम वृन्दावन में प्रकट हुई थी और इसलिये जो ‘वृन्दावनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई, उस सौभाग्यवती देवी की मैं उपासना करता हूँ॥ १९ ॥ असंख्य विश्वों में सदा जिसकी पूजा की जाती है, इसलिये ‘विश्वपूजिता ‘ नाम से प्रसिद्ध उस सर्वपूजित भगवती तुलसी की मैं उपासना करता हूँ ॥ २० ॥ तुम असंख्य विश्वों को सदा पवित्र करती हो, अत: तुम ‘विश्वपावनी’ नामक देवी का मैं विरह से आतुर होकर स्मरण करता हूँ ॥ २१ ॥ जिसके विना प्रचुर पुष्प अर्पित करने पर भी देवता प्रसन्न नहीं होते हैं, मैं शोकाकुल होकर ‘पुष्पसारा’ नाम से विख्यात, पुष्पों की सारभूत तथा शुद्धस्वरूपिणी उस देवी तुलसी के दर्शन की कामना करता हूँ ॥ २२ ॥ संसार में जिसकी प्राप्तिमात्र से भक्त को निश्चय ही आनन्द प्राप्त होता है, इसलिये ‘नन्दिनी’ नाम से विख्यात वह देवी अब मुझ पर प्रसन्न हो ॥ २३ ॥ सम्पूर्ण विश्वों में जिस देवी की कोई तुलना नहीं है, अतः ‘तुलसी’ नाम से विख्यात अपनी उस प्रिया की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥ २४ ॥ वह साध्वी तुलसी श्रीकृष्ण की जीवनस्वरूपा तथा उन्हें निरन्तर प्रेम प्रदान करने वाली है, इसलिये ‘कृष्णजीवनी’ नामसे प्रसिद्ध वह देवी मेरे जीवन की रक्षा करे ॥ २५ ॥

इस प्रकार स्तुति करके लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि वहीं विराजमान हो गये। तभी उन्होंने साक्षात् तुलसी को सामने देखा । वह साध्वी उन श्रीहरि के चरणकमलों में अपना मस्तक झुकाये हुए थी और अपमान के कारण वह मानिनी तुलसी रो रही थी । ऐसी मानपूजित प्रिया को देखकर प्रेममूर्ति श्रीहरि ने उसे अपने वक्ष पर स्थान दिया ॥ २६-२७ ॥ तत्पश्चात् सरस्वती से आज्ञा लेकर श्रीहरि उसे अपने भवन में ले गये और वहाँ शीघ्र ही सरस्वती के साथ उसकी प्रीति करवायी । श्रीहरि ने उसे वर प्रदान किया — ‘तुम सबके लिये तथा मेरे लिये पूजनीय, सिर पर धारण करने योग्य, वन्दनीय तथा मान्य हो जाओ’ ॥ २८-२९ ॥ भगवान् विष्णु के इस वरदान से वे देवी तुलसी परम सन्तुष्ट हो गयीं और सरस्वती ने उन्हें पकड़कर अपने पास बैठा लिया ॥ ३० ॥

हे नारद! उस समय लक्ष्मी और गंगा के मुख पर मुसकराहट आ गयी और उन्होंने विनम्रता-पूर्वक उन साध्वी तुलसी को पकड़कर घर में प्रवेश करवाया ॥ ३१ ॥

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी ।
पुष्पसारा नन्दनी च तुलसी कृष्णजीवनी ॥ ३२ ॥
एतन्नामाष्टकञ्चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् ।
यः पठेत्तां च संपूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ३३ ॥

वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी तथा कृष्णजीवनी — ये तुलसी के आठ नाम हैं । जो मनुष्य तुलसी की विधिवत् पूजा करके नाम के अर्थों से युक्त आठ नामों वाले इस नामाष्टकस्तोत्र का पाठ करता है, वह अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥

कार्तिक पूर्णिमा तिथि को तुलसी का मंगलमय प्राकट्य हुआ था । उस समय सर्वप्रथम भगवान् श्रीहरि ने उनकी पूजा सम्पन्न की थी । अतः जो मनुष्य उस दिन उन विश्वपावनी तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है ॥ ३४-३५ ॥ जो व्यक्ति कार्तिक महीने में भगवान् विष्णु को तुलसीपत्र अर्पण करता है, वह दस हजार गायों के दान का फल निश्चितरूप से प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥ इस नामाष्टकस्तोत्र के श्रवणमात्र से पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त हो जाता है, भार्याहीन को भार्या मिल जाती है, बन्धुविहीन को बन्धुओं की प्राप्ति हो जाती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ व्यक्ति बन्धन से छूट जाता है, भयभीत मनुष्य निर्भय हो जाता है और पापी पाप से छूट जाता है ॥ ३७-३८ ॥

[ हे नारद!] इस प्रकार मैंने आपको तुलसीस्तोत्र बतला दिया। अब उनका ध्यान तथा पूजाविधि सुनिये। आप भी तो वेद में कण्व-शाखा के अन्तर्गत प्रतिपादित इनके ध्यान के विषय में जानते ही हैं ॥ ३९ ॥ तुलसी का ध्यान पापों का नाश करने वाला है, अतः उनका ध्यान करके बिना आवाहन किये ही तुलसी के वृक्ष में विविध पूजनोपचारों से पुष्पों की सारभूता, पवित्र, अत्यन्त मनोहर और किये गये पापरूपी ईंधन को जलाने के लिये प्रज्वलित अग्नि की शिखा के समान साध्वी तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये ॥ ४०-४१ ॥

पुष्पेषु तुलना यस्या नास्ति वेदेषु भाषितम् ।
पवित्ररूपा सर्वासु तुलसी सा च कीर्तिता ॥ ४२ ॥
शिरोधार्या च सर्वेषामीप्सिता विश्वपावनी ।
जीवन्मुक्तां मुक्तिदां च भजे तां हरिभक्तिदाम् ॥ ४३ ॥

पुष्पों में किसी से भी जिनकी तुलना नहीं है, जिनका महत्त्व वेदों में वर्णित है, जो सभी अवस्थाओं में सदा पवित्र बनी रहती हैं, जो तुलसी नाम से प्रसिद्ध हैं, जो भगवान्‌ के लिये शिरोधार्य हैं, सबकी अभीष्ट हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करने वाली हैं; उन जीवन्मुक्त, मुक्तिदायिनी तथा श्रीहरि की भक्ति प्रदान करने वाली भगवती तुलसी की [मैं उपासना करता हूँ ॥ ४२-४३ ॥

हे नारद!] विद्वान् पुरुष को चाहिये कि इस प्रकार से देवी तुलसी का ध्यान, पूजन तथा स्तवन करके उन्हें प्रणाम करे। मैंने आपसे तुलसी के उपाख्यान का वर्णन कर दिया; अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं ॥ ४४ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकोंवाली श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणसंहिताके अन्तर्गत नौवें स्कन्धका ‘तुलसीपूजाविधिवर्णन’ नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥

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