श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-35
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
पैंतीसवाँ अध्याय
भगवती द्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा तथा कुण्डली जागरण की विधि बताना
देवीगीतायां मन्त्रसिद्धिसाधनवर्णनम्

हिमालय बोले – हे महेश्वरि ! अब आप ज्ञान प्रदान करने वाले योग का सांगोपांग वर्णन कीजिये, जिसकी साधना से मैं तत्त्वदर्शन की प्राप्ति के योग्य हो जाऊँ ॥ १ ॥

देवी बोलीं यह योग न आकाश मण्डल में है, न पृथ्वी तल पर है और न तो रसातल में ही है । योगविद्या के विद्वानों ने जीव और आत्मा के ऐक्य को ही योग कहा है ॥ २ ॥ हे अनघ ! उस योग में विघ्न उत्पन्न करने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य नामक ये छ: प्रकार के दोष बताये गये हैं ॥ ३ ॥ अतः योग के अंगों के द्वारा उन विघ्नों का उच्छेद करके योगियों को योग की प्राप्ति करनी चाहिये । योगियों के लिये योग सिद्धि हेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग बताये गये हैं ॥ ४-५ ॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धृति, परिमित आहार और शौच ये दस प्रकार के यम कहे गये हैं ॥ ६ ॥ हे पर्वतराज ! तप, संतोष, आस्तिकता, दान, देवपूजन, शास्त्रसिद्धान्तोंका श्रवण, लज्जा, सद्बुद्धि, जप और हवन ये दस नियम मेरे द्वारा कहे गये हैं ॥ ७ ॥

पद्मासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, वज्रासन और वीरासन क्रमशः ये पाँच आसन बतलाये गये हैं। दोनों पैरों के दोनों शुभ तलवों को सम्यक् रूप से जंघों पर रखकर पीठ की ओर से हाथों को ले जाकर दाहिने हाथ से दाहिने पैर के अँगूठेको और बायें हाथ से बायें पैर के अँगूठे को पकड़े; योगियों के हृदय में प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला यह पद्मासन कहा गया है ॥ ८-१० ॥ जाँघ और घुटने के बीच में पैर के दोनों सुन्दर तलवों को अच्छी तरह करके योगी को शरीर सीधाकर बैठना चाहिये। इसे स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ ११ ॥ सीवनी के दोनों ओर दोनों एड़ियों को अण्डकोष के नीचे अच्छी तरह रखकर दोनों पैरों को हाथों से पकड़कर बैठना चाहिये । योगियों के द्वारा सम्यक् पूजित यह आसन भद्रासन कहा गया है ॥ १२१/२

दोनों पैरों को क्रमशः दोनों जाँघों पर रखकर दोनों घुटनों के निचले भाग में सीधी अँगुली वाले दोनों हाथ स्थापित करके बैठने को अत्युत्तम वज्रासन कहा गया है ॥ १३१/२

एक पैर को नीचे करके उसके ऊपर दूसरे पैर का जंघा रखकर योगी को शरीर सीधा करके बैठना चाहिये; यह वीरासन कहा गया है ॥ १४१/२

योगी सोलह बार प्रणव का उच्चारण करने में लगने- वाले समय तक इडा अर्थात् बायीं नासिका से बाहर की वायु को खींचे (पूरक), पुन: इस पूरित वायु को चौंसठ बार प्रणव के उच्चारण समय तक सुषुम्ना के मध्य रोके रहे (कुम्भक) और इसके बाद योगविद् को  चाहिये कि बत्तीस बार प्रणव उच्चारण में जितना समय लगे – उतने समय में धीरे-धीरे पिंगला नाडी अर्थात् दायीं नासिका के द्वारा उस वायु को बाहर करे ( रेचक) । योगशास्त्र के विद्वान् इस प्रक्रिया को ‘प्राणायाम’ कहते हैं ॥  १५-१७ ॥ इस प्रकार पुनः-पुनः बाहर की वायु को लेकर क्रम से पूरक, कुंभक तथा रेचक करके प्राणायाम का अभ्यास मात्रा (प्रणव के उच्चारण के समय ) – की वृद्धि के अनुसार करना चाहिये । इस प्रकार प्राणायाम पहले बारह बार, तदनन्तर सोलह बार इसके बाद क्रमशः उत्तरोत्तर वृद्धि करनी चाहिये ॥ १८ ॥ जो प्राणायाम [ अपने इष्ट के ] जप- ध्यान आदि से युक्त होता है, उसे विद्वज्जनों ने सगर्भ प्राणायाम और उस जप- ध्यान से रहित प्राणायाम को विगर्भ प्राणायाम कहा है ॥ १९ ॥

इस प्रकार क्रम से अभ्यास करते हुए मनुष्य के शरीर में पसीना आ जाय तो उसे अधम, कम्पन उत्पन्न होने पर मध्यम और जमीन छोड़कर ऊपर उठने पर उत्तम प्राणायाम कहा गया है । जब तक उत्तम प्राणायाम तक पहुँचा जाय, तब तक अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ २० ॥ अपने-अपने विषयों में स्वच्छन्दरूप से विचरण करती हुई इन्द्रियों को उन विषयों से बलपूर्वक हटाने को प्रत्याहार कहा जाता है ॥ २११/२

अँगूठा, एड़ी, घुटना, जाँघ, गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कण्ठ, भ्रूमध्य और मस्तक – इन बारह स्थानों में प्राणवायु को विधिपूर्वक धारण किये रखने को धारणा कहा जाता है ॥ २२-२३१/२

चेतन आत्मा में मन को स्थित करके एकाग्रचित्त होकर अपने भीतर अभीष्ट देवता का सतत चिन्तन करने को ध्यान कहा जाता है ॥ २४१/२

मुनियों ने जीवात्मा और परमात्मा में नित्य ‘समत्व’ भावना रखने को समाधि कहा है । यह मैंने आपको अष्टांगयोग का लक्षण बतला दिया । अब मैं आपसे उत्कृष्ट मन्त्र योग का वर्णन कर रही हूँ ॥ २५-२६ ॥

हे नग ! इस पंचभूतात्मक शरीर को ‘विश्व’ कहा जाता है। चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेज से युक्त होने पर (इडा-पिंगला-सुषुम्ना में योगसाधन से) जीव- ब्रह्म की एकता होती है ॥ २७ ॥ इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। उनमें दस नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं । उनमें भी तीन नाड़ियों को प्रधान कहा गया है। चन्द्र, सूर्य तथा अग्निस्वरूपिणी  ये नाड़ियाँ मेरुदण्ड में व्यवस्थित रहती हैं । चन्द्ररूपिणी श्वेत ‘इडा’ नाड़ी उसके बायीं ओर स्थित है । शक्तिरूपा वह इडा नाड़ी साक्षात् अमृतस्वरूपिणी है। दायीं ओर जो ‘पिंगला’ नामक नाड़ी है, वह पुरुषरूपिणी तथा सूर्यमूर्ति है । उनके बीच में जो सर्वतेजोमयी तथा अग्निरूपिणी नाड़ी स्थित है, वह ‘सुषुम्ना’ है ॥ २८-३० ॥

उसके भीतर ‘विचित्रा’ नामक नाड़ी स्थित है और उसके भीतर इच्छा-ज्ञान – क्रियाशक्ति से सम्पन्न करोड़ों सूर्यों के तेज के समान स्वयम्भूलिंग है। उसके ऊपर बिन्दुनाद ( ँ) – सहित हरात्मा (हकार, रेफ तथा ईकार) – स्वरूप मायाबीज (ह्रीं) विराजमान है। उसके ऊपर रक्त विग्रहवाली शिखा के आकार की कुण्डलिनी है । हे पर्वतराज हिमालय ! वह देव्यात्मिका कही गयी है और मुझसे अभिन्न है ॥ ३१–३३ ॥ कुण्डलिनी के बाह्यभाग में स्वर्णवर्ण के चतुर्दल कमल [मूलाधार]-का चिन्तन करना चाहिये, जिस पर व, श, ष, स – ये चार बीजाक्षर स्थित हैं। उसके ऊपर छः दलवाला उत्तम स्वाधिष्ठान पद्म स्थित है, जो अग्नि के समान तेजोमय, हीरे की चमकवाला और ब, भ, म, य, र, ल — इन छः बीजाक्षरों से युक्त है । आधार षट्कोण पर स्थित होने के कारण मूलाधार तथा स्व शब्द से परम लिंग को इंगित करने के कारण स्वाधिष्ठान संज्ञा है ॥ ३४–३६ ॥ इसके ऊपर नाभिदेश में मेघ तथा विद्युत् के समान कान्ति वाला अत्यन्त तेजसम्पन्न और महान् प्रभा से युक्त मणिपूरक चक्र है। मणि के सदृश प्रभावाला होने के कारण यह ‘मणिपद्म’ भी कहा जाता है। यह दस दलों से युक्त है और ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ इन अक्षरों से समन्वित है । भगवान् विष्णु के द्वारा अधिष्ठित होने के कारण यह कमल उनके दर्शन का महान् साधन है ॥ ३७-३८१/२

उसके ऊपर उगते हुए सूर्य के समान प्रभा से सम्पन्न अनाहत पद्म है । यह कमल क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ — इन अक्षरों से युक्त बारह पत्रों से प्रतिष्ठित है । उसके मध्य में दस हजार सूर्यों के समान प्रभावाला बाणलिंग स्थित है। बिना किसी आघात के इसमें शब्द होता रहता है । अतः मुनियों के द्वारा उस शब्दब्रह्ममय पद्म को ‘अनाहत’ कहा गया है। परम पुरुष द्वारा अधिष्ठित वह चक्र आनन्दसदन है ॥ ३९-४११/२ ॥ उ

सके ऊपर सोलह दलों से युक्त ‘विशुद्ध’ नामक कमल है। महती प्रभा से युक्त तथा धूम्रवर्ण वाला यह कमल अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लृ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः – इन सोलह स्वरोंसे सम्पन्न है। इसमें हंसस्वरूप परमात्माके दर्शनसे जीव विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीलिये इसे विशुद्ध पद्म (विशुद्ध चक्र ) कहा गया है । इस महान् अद्भुत कमल को ‘आकाशचक्र’ भी कहा गया है ॥४२-४३१/२

उसके ऊपर परमात्मा के द्वारा अधिष्ठित श्रेष्ठ ‘ आज्ञाचक्र’ है। उसमें परमात्मा की आज्ञा का संक्रमण होता है, इसी से उसे ‘ आज्ञाचक्र’ ऐसा कहा गया है। वह कमल दो दलोंवाला, ह तथा क्ष इन दो अक्षरों से युक्त और अत्यन्त मनोहर है ॥ ४४-४५ ॥ उसके ऊपर ‘कैलास’ नामक चक्र और उसके भी ऊपर ‘रोधिनी’ नामक चक्र स्थित है । हे सुव्रत ! इस प्रकार मैंने आपको आधार चक्रों के विषय में बता दिया। इसके और भी ऊपर सहस्र दलों से सम्पन्न बिन्दुस्थानरूप ‘सहस्रारचक्र’ बताया गया है। यह मैंने आपसे सम्पूर्ण श्रेष्ठ योगमार्ग का वर्णन कर दिया ॥ ४६-४७ ॥

सर्वप्रथम पूरक प्राणायाम के द्वारा मूलाधार में मन लगाना चाहिये। तत्पश्चात् गुदा और मेढ्र के बीच में वायु के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को समेटकर उसे जाग्रत् करना चाहिये । पुनः लिंग-भेदन के क्रम से स्वयम्भूलिंग से आरम्भ करके उस कुण्डलिनी शक्ति को बिन्दुचक्र [सहस्रार] – तक ले जाना चाहिये । इसके बाद उस परा शक्ति का सहस्रार में स्थित परमेश्वर शम्भु के साथ ऐक्यभाव से ध्यान करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥ वहाँ द्रवीभूत लाक्षारस के समान उत्पन्न अमृत का योगसिद्धि प्रदान करने वाली माया नामक उस शक्ति को पान कराकर षट्चक्र में स्थित देवताओं को उस अमृतधारा से सन्तृप्त करे। इसके बाद बुद्धिमान् साधक उसी मार्ग से कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार तक वापस लौटा लाये ॥ ५०-५१ ॥ इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करने पर साधक के पूर्वोक्त सभी दूषित मन्त्र भी निश्चितरूप से सिद्ध हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है । इसके द्वारा साधक जरा-मरण आदि दु:खों तथा भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। जो गुण मुझ जगज्जननी भगवती में जिस प्रकार विद्यमान हैं, वे सभी गुण उसी प्रकार उस श्रेष्ठ साधक में उत्पन्न हो जाते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥५२-५३१/२

हे तात! इस प्रकार मैंने आपसे इस श्रेष्ठ प्राणायाम का वर्णन किया है। अब आप सावधान होकर मुझसे धारणा नामक योग का श्रवण कीजिये । दिशा, काल आदि से अपरिच्छिन्न मुझ भगवती में चित्त स्थिर करके जीव और ब्रह्म का ऐक्य हो जाने से शीघ्र ही साधक तन्मय हो जाता है और यदि चित्त के मलयुक्त रहने के कारण शीघ्रतापूर्वक सिद्धि प्राप्त न हो तो योगी को चाहिये कि मेरे विग्रह के अंगों में [ अपना मन स्थित करके ] निरन्तर योग का अभ्यास करता रहे। हे पर्वत ! साधक को मेरे करचरणादि मधुर अंगों में चित्त को एक-एक करके केन्द्रित करना चाहिये और इस प्रकार विशुद्धचित्त होकर उसे मेरे समस्त रूप में मन को स्थिर करना चाहिये। हे पर्वत ! जब तक ज्ञानरूपिणी मुझ भगवती में मन का लय न हो जाय, तबतक मन्त्र जापक को जप- – होम के द्वारा अपने इष्ट मन्त्र का अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ५४–५९ ॥ मन्त्राभ्यास- योग के द्वारा ज्ञेय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। योग बिना मन्त्र सिद्ध नहीं होता और मन्त्र के बिना योग सिद्ध नहीं होता । अतः योग और मन्त्र- इन दोनों का अभ्यास- योग ही ब्रह्मसिद्धि का साधन है । अन्धकार से आच्छादित घर में स्थित घड़ा दीपक के प्रकाश में दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार माया से आवृत आत्मा मन्त्र के द्वारा दृष्टिगोचर होने लगता है । इस प्रकार मैंने अंगोंसहित सम्पूर्ण योगविधि इस समय आपको बतला दी। गुरु के उपदेश से ही यह योग जाना जा सकता है, इसके विपरीत करोड़ों शास्त्रों के द्वारा भी यह प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ६०–६२ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत सातवें स्कन्ध का ‘देवीगीता में मन्त्रसिद्धि साधन वर्णन’ नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

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