May 2, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-षष्ठ स्कन्धः-अध्याय-23 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पूर्वार्द्ध-षष्ठ स्कन्धः-त्रयोविंशोऽध्यायः तेईसवाँ अध्याय भगवती के सिद्धिप्रदायक मन्त्र से दीक्षित एकवीर द्वारा कालकेतु का वध, एकवीर और एकावली का विवाह तथा हैहयवंश की परम्परा एकवीरैकावल्योर्विवाहवर्णनम् व्यासजी बोले — हे राजन् ! उस यशोवती की बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीर का मुखारविन्द प्रसन्नता से खिल उठा और वे उससे कहने लगे — ॥ १ ॥ राजा बोले — हे रम्भोरु ! जो तुमने सुन्दर वाणी में मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो। एकवीर नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ ॥ २ ॥ [ एकावली के विषय में वर्णन करके] तुमने मेरे मन को परतन्त्र बना दिया है। विरह से अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? ॥ ३ ॥ तुमने सर्वप्रथम एकावली के सम्पूर्ण लोक को तिरस्कृत कर देने वाले रूप का जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाण से आहत होकर व्याकुल हो उठा है ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणों का मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है। पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत विस्मय हो गया है। दानव कालकेतु के सामने एकावली ने यह बात कही थी कि मैं हैहय का वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी अन्य का वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है । हे तन्वंगि! एकावली के इस कथन के द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है। हे सुन्दर केशोंवाली ! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनों के लिये क्या करूँ ?॥ ५-७ ॥ हे सुलोचने! मैं उस दुष्टात्मा राक्षस कालकेतु के स्थान को नहीं जानता। और फिर उस नगर तक पहुँच सकने की मेरी सामर्थ्य भी नहीं है। हे विशाल नयनोंवाली ! अब तुम्हीं उपाय बताओ। मुझे वहाँ पहुँचाने में तुम्हीं समर्थ हो । अतएव जहाँ तुम्हारी सुन्दर सखी एकावली विराजमान है, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचाओ ॥ ८-९ ॥ उस क्रूर राक्षस का वध करके मैं इसी समय विवश तथा शोक सन्तप्त तुम्हारी प्रिय सखी राजकुमारी एकावली को मुक्त करा लूँगा ॥ १० ॥ राजकुमारी एकावली को संकट से मुक्ति दिलाकर शीघ्र ही उसे तुम्हारे पुर में पहुँचा दूँगा और उसके पिता को सौंप दूँगा ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् परम तपस्वी राजा रैभ्य अपनी पुत्री का विवाह कर सकेंगे। हे प्रियंवदे! इस प्रकार तुम्हारे सहयोग से मेरे तथा तुम्हारे मन की कामना अब पूरी हो जायगी। तुम मुझे उस कालकेतु का नगर शीघ्र दिखा दो, फिर मेरा पराक्रम देखो। हे वरवर्णिनि ! मैं जिस प्रकार उस दुराचारी तथा परस्त्री का हरण करने वाले कालकेतु का वध कर सकूँ, तुम वैसा ही उपाय करो; क्योंकि तुम हित- साधन करने में पूर्ण सक्षम हो। उस दानव के दुर्गम नगर का मार्ग तुम मुझे आज ही दिखाओ ॥ १२-१४१/२ ॥ व्यासजी बोले — एकवीर की यह प्रिय वाणी सुनकर यशोवती प्रसन्न हो गयी और वह लक्ष्मीपुत्र एकवीर से नगर पहुँचने का उपाय आदरपूर्वक बताने लगी — हे राजेन्द्र ! पहले आप भगवती जगदम्बा के सिद्धिप्रदायक मन्त्र को ग्रहण कीजिये । तत्पश्चात् मैं आपको अनेक राक्षसों द्वारा रक्षित उस कालकेतु का नगर आज ही दिखाऊँगी। हे महाभाग ! एक विशाल सेना से युक्त होकर आप मेरे साथ वहाँ चलने के लिये तैयार हो जाइये। वहाँ युद्ध होगा। कालकेतु स्वयं महापराक्रमी है तथा बलवान् राक्षसों से युक्त रहता है। अतएव भगवती का मन्त्र ग्रहण करके ही आप मेरे साथ वहाँ चलिये। मैं उस दुष्टात्मा नगर का मार्ग आपको दिखाऊँगी। अब आप उस पापकर्मपरायण दानव को मारकर मेरी सखी को शीघ्र मुक्त कीजिये ॥ १५-१९१/२ ॥ उसका यह वचन सुनकर एकवीर ने वहाँ पर दैवयोग से पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियों में श्रेष्ठ दत्तात्रेयजी से त्रिलोकी का तिलक कहे जाने वाले योगेश्वरी के महामन्त्र को उसी क्षण ग्रहण कर लिया ॥ २०-२१ ॥ उस मन्त्र के प्रभाव से एकवीर को सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमन की क्षमता प्राप्त हो गयी। इसके बाद वे यशोवती के साथ कालकेतु के दुर्गम नगर के लिये शीघ्र प्रस्थित हुए ॥ २२ ॥ वह नगर राक्षसों द्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, जैसे सर्पो द्वारा पाताल की निरन्तर सुरक्षा होती रहती है। कालकेतु के ऐसे नगर में अब यशोवती तथा विशाल सेना के साथ राजा एकवीर आ गये ॥ २३ ॥ एकवीर को आते देखकर कालकेतु के दूत भय से व्यग्र हो गये और चीखते-चिल्लाते हुए बड़ी तेजी से भागकर उसके पास पहुँचे ॥ २४ ॥ उस समय एकावली के पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतु को अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे ॥ २५ ॥ दूतों ने कहा — हे राजन् ! इस कामिनी की सहचारिणी जो यशोवती नाम की स्त्री है, वह एक राजकुमार के साथ विशाल सेना लेकर आ रही है ॥ २६ ॥ हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय। बल के अभिमान से मत्त वह राजकुमार सेना के साथ चला आ रहा है ॥ २७ ॥ हे राजेन्द्र ! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्ध की स्थिति सामने आ गयी है। अब आप या तो इस देवपुत्र के साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनी को मुक्त कर दीजिये ॥ २८ ॥ उसकी सेना यहाँ से मात्र तीन योजन की दूरी पर है। अतएव हे राजन् ! अब आप तैयार हो जाइये और रण-दुंदुभी बजाने की तुरंत आज्ञा दीजिये ॥ २९ ॥ व्यासजी बोले — दूतों के मुख से वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोध से मूर्च्छित हो गया। उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसों को उत्साहित करते हुए कहा — हे राक्षसो ! तुम सब हाथों में शस्त्र लेकर शत्रु के सामने जाओ ॥ ३०१/२ ॥ उन्हें आज्ञा देकर कालकेतु ने अपने निकट बैठी हुई अत्यन्त विवश तथा दुःखित एकावली से विनम्रता-पूर्वक पूछा — ‘ हे तन्वंगि! तुम्हें लेने के लिये सेनासहित यह कौन आ रहा है ? ये तुम्हारे पिता हैं अथवा कोई अन्य पुरुष ? हे कृशोदरि ! सच सच बताओ । यदि विरह से व्यथित होकर तुम्हारे पिता तुम्हें लेने के लिये आ रहे हों, तो यह जानकर कि ये तुम्हारे पिता हैं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अपितु उन्हें घर लाकर उनकी पूजा करूँगा तथा बहुमूल्य रत्न, वस्त्र तथा अश्व भेंट करके घर में आये हुए उनका विधिवत् आतिथ्य करूँगा । यदि कोई अन्य व्यक्ति आया होगा तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से उसे मार डालूँगा । निश्चित ही महान् काल ने उसे मरने के लिये यहाँ ला दिया है। अतएव हे विशाल नयनोंवाली ! मुझ अपराजेय, कालरूप तथा अपार बलसम्पन्न के विषय में न जानकर यह कौन मन्दमति चला आ रहा है ? यह तुम मुझे बताओ’ ॥ ३१-३६१/२ ॥ एकावली बोली — हे महाभाग ! मैं यह नहीं जानती कि इतनी तेजी से यह कौन आ रहा है? आपके बन्धन में पड़ी हुई मैं नहीं जानती कि यह कौन है ? ये न तो मेरे पिता हैं और न मेरे भाई ही । यह दूसरा ही कोई महान् पराक्रमी पुरुष है, यह किसलिये यहाँ आ रहा है, यह भी मैं निश्चितरूप से नहीं जानती ॥ ३७-३८१/२ ॥ दैत्य बोला — ये दूत तो कह रहे हैं कि तुम्हारी सखी यशोवती ही प्रयत्नपूर्वक उस वीर को साथ में लेकर आयी है। हे कान्ते! कार्य सिद्ध करने में अत्यन्त चतुर तुम्हारी वह सखी कहाँ गयी ? कोई अन्य मेरा शत्रु भी नहीं है, जो मेरा विरोधी हो ॥ ३९-४०१/२ ॥ व्यासजी बोले — इसी बीच दूसरे दूत वहाँ आ गये । भयभीत उन दूतों ने महल में बैठे कालकेतु से तुरंत कहा — हे महाराज ! आप निश्चिन्त क्यों हैं ? शत्रुसेना समीप आ पहुँची है। आप एक विशाल सेना के साथ शीघ्र ही नगर से बाहर निकलिये। उनकी यह बात सुनकर महान् बलशाली कालकेतु शीघ्र ही रथ पर चढ़कर अपने नगर से बाहर निकल गया ॥ ४१-४३१/२ ॥ कामिनी एकावली के विरह से व्याकुल प्रतापी एकवीर भी घोड़े पर आरूढ़ होकर अचानक वहीं पर आ गया। उन दोनों का वृत्रासुर तथा इन्द्र की भाँति युद्ध होने लगा। उस युद्ध में छोड़े गये विविध अस्त्र-शस्त्रों से दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं ॥ ४४-४५१/२ ॥ भीरुजनों को भयभीत कर देने वाले उस युद्ध में लक्ष्मीपुत्र एकवीर ने दानव कालकेतु पर अपनी गदा से प्रहार किया। गदाप्रहार से वह कालकेतु वज्र से आहत पर्वत की भाँति प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब भयभीत होकर अन्य सभी राक्षस भाग गये ॥ ४६-४७१/२ ॥ तत्पश्चात् यशोवती ने विस्मय में पड़ी एकावली के पास जाकर प्रसन्नतापूर्वक मधुर वाणी में उससे कहा — हे सखि ! इधर आओ। कालकेतु के साथ भीषण युद्ध करके धीरता सम्पन्न राजकुमार एकवीर ने उस राक्षस को मार गिराया है। इस समय वे राजकुमार एकवीर थक जाने के कारण अपने शिविर में विद्यमान हैं। तुम्हारे रूप तथा के विषय में सुनकर वे तुम्हारा दर्शन करना चाहते हैं। हे कुटिलापांगि! कामदेव सदृश उन राजकुमार को तुम देखो। मैं उनसे तुम्हारे विषय में गंगा तट पर पहले ही बता चुकी हूँ। इससे तुम्हारे प्रति उनका पूर्ण अनुराग हो जाने के कारण वे विरहातुर राजकुमार अब तुझ सुन्दर रूपवाली का दर्शन करना चाहते हैं ॥ ४८-५२१/२ ॥ यशोवती की बात सुनकर कुमारी अवस्था में होने के कारण लज्जित होती हुई भी उसने अत्यन्त प्रेमपूर्वक वहाँ जाने का मन बना लिया। मैं एक अत्यन्त विवश कुमारी कन्या उनका मुख कैसे देखूँगी ? वह साध्वी एकावली इससे चिन्तित हो उठी कि वे कामासक्त राजकुमार मुझे ग्रहण कर लेंगे। तब वह एकावली मलिन वस्त्र धारण करके अत्यन्त उदास होकर पालकी में बैठकर यशोवती के साथ उनके शिविर में पहुँच गयी ॥ ५३-५५१/२ ॥ उस विशाल नयनों वाली एकावली को वहाँ आयी हुई देखकर राजकुमार ने उससे कहा — हे तन्वंगि! मुझे दर्शन दो। मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शन के लिये तृष्णाकुल हैं ॥ ५६१/२ ॥ एकवीर को कामातुर तथा एकावली को लज्जा से युक्त देखकर नीति का ज्ञान रखने वाली तथा श्रेष्ठजनों के मार्ग का अनुसरण करने वाली यशोवती ने उस एकवीर से कहा — हे राजकुमार ! इसके पिता भी इसे आपको ही देना चाहते हैं। यह एकावली भी आपके वशीभूत है; इसलिये इसके साथ आपका मिलन अवश्य होगा, किंतु हे राजेन्द्र ! कुछ समय प्रतीक्षा करके पहले इसे इसके पिता के पास पहुँचा दीजिये । वे विधिपूर्वक विवाह करके इसे आपको निश्चितरूप से सौंप देंगे ॥ ५७-५९१/२ ॥ यशोवती की बात को उचित मानकर उन दोनों कन्याओं – एकावली तथा यशोवती को साथ में लेकर सेना- सहित वे राजकुमार एकवीर उसके पिता के स्थान पर पहुँचे ॥ ६०१/२ ॥ राजपुत्री को आयी हुई सुनकर राजा रैभ्य प्रेमपूर्वक मन्त्रियों के साथ उसके सम्मुख शीघ्रता से पहुँच गये। मलिन वस्त्र धारण की हुई उस पुत्री को राजा ने बहुत दिनों के बाद देखा, पुनः यशोवती ने रैभ्य को सारा वृत्तान्त विस्तार के साथ बताया। तत्पश्चात् एकवीर से मिलकर राजा रैभ्य उन्हें आदरपूर्वक घर ले आये । पुनः उन्होंने शुभ दिन में विधि-विधान से दोनों का विवाह सम्पन्न कराया। तदुपरान्त राजा ने पर्याप्त वैवाहिक उपहार देकर एकवीर को भली-भाँति सम्मानित करके पुत्री को यशोवतीसहित विदा कर दिया ॥ ६१-६४१/२ ॥ इस प्रकार विवाह हो जाने पर लक्ष्मीपुत्र एकवीर हर्षित हो गये और घर पहुँचकर अपनी भार्या एकावली के साथ नानाविध सुखोपभोग करने लगे । यथासमय उस एकावली से कृतवीर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस कृतवीर्य के पुत्र कार्तवीर्य हुए। इस प्रकार मैंने आपसे इस हैहयवंश का वर्णन कर दिया ॥ ६५-६६ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत षष्ठ स्कन्ध का ‘एकवीर और एकावली के विवाह का वर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥ Content is available only for registered users. 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