September 23, 2024 | aspundir | Leave a comment शिवमहापुराण – शतरुद्रसंहिता – अध्याय 20 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण शतरुद्रसंहिता बीसवाँ अध्याय शिवजीका हनुमान् के रूपमें अवतार तथा उनके चरितका वर्णन नन्दीश्वर बोले – हे मुने! अब इसके पश्चात् शिवजीने जिस प्रकार हनुमान् जी के रूपमें अवतार लेकर मनोहर लीलाएँ कीं, उस हनुमच्चरित्रको प्रेमपूर्वक सुनिये ॥ १ ॥ उन परमेश्वरने प्रेमपूर्वक [ हनुमद्रूपसे ] श्रीरामका परम हित किया, हे विप्र ! सर्वसुखकारी उस सम्पूर्ण चरित्रका श्रवण कीजिये ॥ २ ॥ महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥ एक बार अत्यन्त अद्भुत लीला करनेवाले तथा सर्वगुणसम्पन्न उन भगवान् शिवने विष्णुके मोहिनी रूपको देखा ॥ ३ ॥ [उस मोहिनी रूपको देखते ही ] कामबाणसे आहतकी भाँति शम्भुने अपनेको विक्षुब्ध कर दिया और उन ईश्वरने श्रीरामके कार्यके लिये अपने तेजका उत्सर्ग कर दिया ॥ ४ ॥ शिवजीके मनकी प्रेरणासे प्रेरित हुए सप्तर्षियोंने उनके तेजको रामकार्यके लिये आदरपूर्वक पत्तेपर स्थापित कर दिया ॥ ५ ॥ तत्पश्चात् उन महर्षियोंने शम्भुके उस तेजको श्रीरामके कार्यके लिये गौतमकी कन्या अंजनीमें कानके माध्यमसे स्थापित कर दिया ॥ ६ ॥ समय आनेपर वह शम्भुतेज महान् बल तथा पराक्रमवाला और वानर शरीरवाला होकर हनुमान् के नामसे प्रकट हुआ ॥ ७ ॥ वे महाबलवान् कपीश्वर हनुमान् जब शिशु ही थे, उसी समय प्रात:काल उदय होते हुए सूर्यबिम्बको छोटा फल जानकर निगल गये थे ॥ ८ ॥ तब देवताओंकी प्रार्थनासे उन्होंने सूर्यको उगल दिया। उन्हें महाबली शिवावतार जानकर देवताओं तथा ऋषियोंके द्वारा प्रदत्त वरोंको उन्होंने प्राप्त किया ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्न हनुमान् जी अपनी माताके निकट गये और आदरपूर्वक उनसे वह वृत्तान्त कह सुनाया ॥ १० ॥ इसके बाद माताकी आज्ञासे नित्यप्रति सूर्यके पास जाकर धैर्यशाली हनुमान् जीने बिना यत्नके ही उनसे सारी विद्याएँ पढ़ लीं ॥ ११ ॥ उसके बाद माताकी आज्ञा प्राप्तकर रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी सूर्यकी आज्ञासे [प्रेरित हो ] सूर्यके अंशसे उत्पन्न हुए सुग्रीवके पास गये । वे सुग्रीव अपने ज्येष्ठ भ्राता वालि, जिसने उनकी स्त्रीका बलात् हरण कर लिया था, तिरस्कृत हो ऋष्यमूक पर्वतपर हनुमान् जीके साथ निवास करने लगे ॥ १२-१३ ॥ तब वे सुग्रीवके मन्त्री हो गये । शिवजीके अंशसे उत्पन्न परम बुद्धिमान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् जीने सब प्रकारसे सुग्रीवका हित किया। उन्होंने भाई [लक्ष्मण ] -के साथ वहाँ आये हुए अपहृत पत्नीवाले दुखी रामके साथ उनकी सुखदायी मित्रता करवायी ॥ १४-१५ ॥ रामचन्द्रजीने भाईकी स्त्रीके साथ रमण करनेवाले, महापापी एवं अपनेको वीर माननेवाले कपिराज वालिका वध कर दिया ॥ १६ ॥ हे तात! तदनन्तर वे महाबुद्धिमान् वानरेश्वर हनुमान् रामचन्द्रजीकी आज्ञासे बहुतसे वानरोंके साथ सीताकी खोजमें लग गये ॥ १७ ॥ सीताको लंकामें विद्यमान जानकर वे कपीश्वर दूसरोंके द्वारा न लाँघे जा सकनेवाले उस समुद्रको बड़ी शीघ्रतासे लाँघकर वहाँ गये ॥१८॥ वहाँ उन्होंने पराक्रमयुक्त अद्भुत कार्य किया और जानकीको प्रीतिपूर्वक अपने प्रभुका उत्तम [मुद्रिकारूप ] चिह्न प्रदान किया । जानकीके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला रामवृत्त सुनाकर उन वीर वानरनायकने शीघ्र ही उनके शोकको दूर कर दिया ॥ १९-२० ॥ उन्होंने रावणकी अशोकवाटिका उजाड़कर बहुत- से राक्षसोंका वध कर दिया; फिर सीतासे स्मरणचिह्न लेकर रामचन्द्रके पास लौटने लगे ॥ २१ ॥ उस समय महालीला करनेवाले उन्होंने अत्यन्त निर्भय होकर रावणके पुत्र तथा अनेक राक्षसोंको मारकर वहाँ लंकामें महान् उपद्रव किया ॥ २२ ॥ हे मुने! जब महाबलशाली रावणने तैलसे सने हुए वस्त्रोंको उनकी पूँछमें दृढ़तापूर्वक लपेटकर उसमें आग लगा दी, तब महादेवके अंशसे उत्पन्न हनुमान् जीने इसी बहानेसे कूद-कूदकर समस्त लंकाको जला दिया ॥ २३-२४ ॥ तदनन्तर वे कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान् [ केवल ] विभीषणके घरको छोड़कर सारी लंकाको जला करके समुद्रमें कूद पड़े ॥ २५ ॥ वहाँ अपनी पूँछ बुझाकर शिवके अंशसे उत्पन्न वे समुद्रके दूसरे किनारेपर आये और प्रसन्न होकर श्रीरामजीके पास गये ॥ २६ ॥ सुन्दर वेगवाले कपिश्रेष्ठ हनुमान् जीने शीघ्रतापूर्वक श्रीरामके निकट जाकर उन्हें सीताजीकी चूड़ामणि प्रदान की ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे वानरोंके साथ उन बलवान् तथा वीर हनुमान् जी ने अनेक विशाल पर्वतोंको लाकर समुद्रपर पुल बाँधा ॥ २८ ॥ तब पार जानेकी कामनावाले श्रीरामचन्द्रजीने विजय प्राप्त करनेकी इच्छासे शिवलिंगको यथाविधि प्रतिष्ठितकर तदुपरान्त उसका पूजन किया ॥ २९ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने पूज्यतम शिवजीसे विजयका वरदान प्राप्त करके समुद्र पारकर वानरोंके साथ लंकाको घेरकर राक्षसोंसे युद्ध किया ॥ ३० ॥ उन वीर हनुमान् जी ने राक्षसोंका वध किया, श्रीरामचन्द्रजीकी सेनाकी रक्षा की तथा शक्तिसे घायल लक्ष्मणको संजीवनी बूटीके द्वारा पुनः जीवित कर दिया ॥ ३१ ॥ इस प्रकार महादेवके पुत्र प्रभु उन हनुमान् जीने लक्ष्मणसहित श्रीरामजीको सब प्रकारसे सुखी बनाया और सम्पूर्ण सेनाकी रक्षा की ॥ ३२ ॥ महान् बल धारण करनेवाले उन कपिने बिना श्रमके परिवारसहित रावणका विनाश किया और देवताओंको सुखी बनाया ॥ ३३ ॥ उन्होंने महिरावण नामक राक्षसको मारकर लक्ष्मणसहित रामकी रक्षा करके उसके स्थानसे उन्हें अपने स्थानपर ला दिया ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उन कपिपुंगवने सब प्रकारसे श्रीरामका कार्य शीघ्र ही सम्पन्न किया, असुरोंका वध किया एवं नाना प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ ३५ ॥ सीतारामको सुख देनेवाले वानरराजने स्वयं श्रेष्ठ भक्त होकर भूलोकमें रामभक्तिकी स्थापना की ॥ ३६ ॥ वे लक्ष्मणके प्राणोंके रक्षक, सभी देवताओंका गर्व चूर करनेवाले, रुद्रके अवतार, भगवत्स्वरूप और भक्तोंका उद्धार करनेवाले थे ॥ ३७ ॥ वे हनुमान् जी महावीर, सदा रामका कार्य सिद्ध करनेवाले, लोकमें रामदूतके रूपमें विख्यात, दैत्योंका संहार करनेवाले तथा भक्तवत्सल थे ॥ ३८ ॥ हे तात! इस प्रकार मैंने हनुमान् जी का श्रेष्ठ चरित्र कहा, जो धन, यश, आयु तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाला है ॥ ३९ ॥ जो सावधान होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है अथवा सुनाता है, वह इस लोकमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें परम मोक्षको प्राप्त करता है ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें हनुमदवतारचरित्र-वर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe