October 20, 2024 | aspundir | Leave a comment शिवमहापुराण — वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] — अध्याय 38 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] अड़तीसवाँ अध्याय योगमार्गके विघ्न, सिद्धि-सूचक उपसर्ग तथा पृथ्वीसे लेकर बुद्धितत्त्वपर्यन्त ऐश्वर्यगुणोंका वर्णन, शिव – शिवाके ध्यानकी महिमा उपमन्यु कहते हैं— श्रीकृष्ण ! आलस्य, तीक्ष्ण व्याधियाँ, प्रमाद, स्थान- संशय, अनवस्थितचित्तता, अश्रद्धा, भ्रान्ति-दर्शन, दुःख, दौर्मनस्य और विषय – लोलुपता- ये दस योगसाधनमें लगे हुए पुरुषोंके लिये योगमार्गके विघ्न कहे गये हैं *॥ १-२ ॥ योगियोंके शरीर और चित्तमें जो अलसताका भाव आता है, उसीको यहाँ ‘ आलस्य’ कहा गया है । वात, पित्त और कफ – इन धातुओंकी विषमतासे जो दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हींको ‘व्याधि’ कहते हैं । कर्मदोषसे इन व्याधियोंकी उत्पत्ति होती है । असावधानीके कारण योगके साधनोंका न हो पाना ‘प्रमाद’ है। ‘यह है या नहीं है’ इस प्रकार उभयकोटिसे आक्रान्त हुए ज्ञानका नाम ‘स्थान – संशय’ है । मनका कहीं स्थिर न होना ही अनवस्थितचित्तता (चित्तकी अस्थिरता) है। योगमार्गमें भावरहित (अनुरागशून्य) जो मनकी वृत्ति है, उसीको ‘अश्रद्धा’ कहा गया है ॥ ३–५ ॥ महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥ विपरीतभावनासे युक्त बुद्धिको ‘भ्रान्ति’ कहते हैं । [‘दुःख’ कहते हैं कष्टको, उसके तीन भेद हैं- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक । ] मनुष्योंके चित्तका जो अज्ञानजनित दुःख है, उसे आध्यात्मिक दुःख समझना चाहिये । पूर्वकृत कर्मोंके परिणामसे शरीरमें जो रोग आदि उत्पन्न होते हैं, उन्हें आधिभौतिक दुःख कहा गया है । विद्युत्पात, अस्त्र-शस्त्र और विष आदिसे जो कष्ट प्राप्त होता है, उसे आधिदैविक दुःख कहते हैं। इच्छापर आघात पहुँचनेसे मनमें जो क्षोभ होता है, उसीका नाम है ‘दौर्मनस्य’ । विचित्र विषयोंमें जो सुखका भ्रम है, वही ‘विषयलोलुपता’ है ॥ ६-८ ॥ योगपरायण योगीके इन विघ्नोंके शान्त हो जानेपर जो ‘दिव्य उपसर्ग’ (विघ्न) प्राप्त होते हैं, वे सिद्धिके सूचक हैं । प्रतिभा, श्रवण, वार्ता, दर्शन, आस्वाद और वेदना—ये छः प्रकारकी सिद्धियाँ ही ‘उपसर्ग’ कहलाती हैं, जो योगशक्तिके अपव्ययमें कारण होती हैं ॥ ९-१० ॥ जो पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म हो, किसीकी ओटमें हो, भूतकालमें रहा हो, बहुत दूर हो अथवा भविष्यमें होनेवाला हो, उसका ठीक-ठीक प्रतिभास (ज्ञान) हो जाना ‘प्रतिभा’ कहलाता है। सुननेका प्रयत्न न करनेपर भी सम्पूर्ण शब्दोंका सुनायी देना ‘ श्रवण’ कहा गया है। समस्त देहधारियोंकी बातोंको समझ लेना ‘वार्ता’ है। दिव्य पदार्थोंका बिना किसी प्रयत्नके दिखायी देना ‘दर्शन’ कहा गया है, दिव्य रसोंका स्वाद प्राप्त होना आस्वाद’ कहलाता है, अन्तःकरणके द्वारा दिव्य स्पर्शोका तथा ब्रह्मलोकतकके गन्धादि दिव्य भोगोंका अनुभव ‘वेदना’ नामसे विख्यात है ॥ ११- १४ ॥ सिद्ध योगीके पास स्वयं ही रत्न उपस्थित हो जाते हैं और बहुत-सी वस्तुएँ प्रदान करते हैं । मुखसे इच्छानुसार नाना प्रकारकी मधुर वाणी निकलती है । सब प्रकारके रसायन और दिव्य ओषधियाँ सिद्ध हो जाती हैं। देवांगनाएँ इस योगीको प्रणाम करके [मनोवांछित वस्तुएँ] देती हैं। यह मैंने जैसे देखा या अनुभव किया है, तदनुसार योगसिद्धिके एकदेशका भी साक्षात्कार हो जाय तो मोक्षमें मन लग जाता है अर्थात् मोक्ष भी हो सकता है ॥ १५-१७ ॥ कृशता, स्थूलता, बाल्यावस्था, वृद्धावस्था, युवावस्था, नाना जातिका स्वरूप; पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु- इन चार तत्त्वोंके शरीरको धारण करना, नित्य अपार्थिव एवं मनोहर गन्धको ग्रहण करना – ये पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुण बताये गये हैं ॥ १८-१९ ॥ जलमें निवास करना, पृथ्वीपर ही जलका निकल आना, इच्छा करते ही बिना किसी आतुरताके स्वयं समुद्रको भी पी जानेमें समर्थ होना, इस संसार में जहाँ चाहे वहीं जलका दर्शन होना, घड़ा आदिके बिना हाथमें ही जलराशिको धारण करना, जिस विरस वस्तुको भी खानेकी इच्छा हो, उसका तत्काल सरस हो जाना, जल, तेज और वायु – इन तीन तत्त्वोंके शरीरको धारण करना तथा देहका फोड़े, फुंसी और घाव आदिसे रहित होना- पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुणोंको मिलाकर ये सोलह जलीय ऐश्वर्यके अद्भुत गुण हैं ॥ २०–२३ ॥ शरीरसे अग्निको प्रकट करना, अग्निके तापसे जलनेका भय दूर हो जाना, यदि इच्छा हो तो बिना किसी प्रयत्नके इस जगत्को जलाकर भस्म कर देनेकी शक्तिका होना, पानीके ऊपर अग्निको स्थापित कर देना, हाथमें आग धारण करना, सृष्टिको जलाकर फिर उसे ज्यों- का-त्यों कर देनेकी क्षमताका होना, मुखमें ही अन्न आदिको पचा लेना तथा तेज और वायु – दो ही तत्त्वोंसे शरीरको रच लेना – ये आठ गुण जलीय ऐश्वर्यके उपर्युक्त सोलह गुणोंके साथ चौबीस होते हैं। ये चौबीस तैजस ऐश्वर्यके गुण कहे गये हैं ॥ २४ – २५१/२ ॥ मनके समान वेगशाली होना, प्राणियोंके भीतर क्षणभरमें प्रवेश कर जाना, बिना प्रयत्नके ही पर्वत आदिके महान् भारको उठा लेना, भारी हो जाना, हलका होना, हाथमें वायुको पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागकी चोटसे भूमिको भी कम्पित कर देना, एकमात्र वायुतत्त्वसे ही शरीरका निर्माण कर लेना – ये आठ गुण तैजस ऐश्वर्यके चौबीस गुणोंके साथ बत्तीस हो जाते हैं । विद्वानोंने वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके ये ही बत्तीस गुण स्वीकार किये हैं ॥ २६–२८१/२ ॥ शरीरकी छायाका न होना, इन्द्रियोंका दिखायी न देना, आकाशमें इच्छानुसार विचरण करना, इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंका समन्वय होना – आकाशको लाँघना, अपने शरीरमें उसका निवेश करना, आकाशको पिण्डकी भाँति ठोस बना देना और निराकार होना – ये आठ गुण अग्निके बत्तीस गुणोंसे मिलकर चालीस होते हैं। ये चालीस ही वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके गुण हैं । यही सम्पूर्ण इन्द्रियोंका ऐश्वर्य है, इसीको ‘ऐन्द्र’ एवं ‘ आम्बर’ ( आकाशसम्बन्धी ) ऐश्वर्य भी कहते हैं ॥ २९–३११/२ ॥ इच्छानुसार सभी वस्तुओंकी उपलब्धि, जहाँ चाहे वहाँ निकल जाना, सबको अभिभूत कर लेना, सम्पूर्ण गुह्य अर्थका दर्शन होना, कर्मके अनुरूप निर्माण करना, सबको वशमें कर लेना, सदा प्रिय वस्तुका ही दर्शन होना और एक ही स्थानसे सम्पूर्ण संसारका दिखायी देना- ये आठ गुण पूर्वोक्त इन्द्रियसम्बन्धी ऐश्वर्य – गुणोंसे मिलकर अड़तालीस होते हैं । चान्द्रमस ऐश्वर्य इन अड़तालीस गुणोंसे युक्त कहा गया है। यह पहलेके ऐश्वर्योंसे अधिक गुणवाला है। इसे ‘मानस ऐश्वर्य’ भी कहते हैं ॥ ३२-३४ ॥ छेदना, पीटना, बाँधना, खोलना, संसारके वशमें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको ग्रहण करना, सबको प्रसन्न रखना, पाना, मृत्युको जीतना तथा कालपर विजय पाना- ये सब अहंकारसम्बन्धी ऐश्वर्यके अन्तर्गत हैं। आहंकारिक ऐश्वर्यको ही ‘प्राजापत्य’ भी कहते हैं ॥ ३५-३६ ॥ चान्द्रमस ऐश्वर्यके गुणोंके साथ इसके आठ गुण मिलकर छप्पन होते हैं। महान् आभिमानिक ऐश्वर्यके ये ही छप्पन गुण हैं । संकल्पमात्रसे सृष्टि रचना करना, पालन करना, संहार करना, सबके ऊपर अपना अधिकार स्थापित करना, प्राणियोंके चित्तको प्रेरित करना, सबसे अनुपम होना, इस जगत्से पृथक् नये संसारकी रचना कर लेना तथा शुभको अशुभ और अशुभको शुभ कर देना- यह ‘बौद्ध ऐश्वर्य’ है । प्राजापत्य ऐश्वर्यके गुणोंको मिलाकर इसके चौंसठ गुण होते हैं । इस बौद्ध ऐश्वर्यको ही ‘ब्राह्म ऐश्वर्य’ भी कहते हैं ॥ ३७ – ३९ ॥ इससे उत्कृष्ट है गौण ऐश्वर्य, जिसे प्राकृत भी कहते हैं । उसीका नाम ‘वैष्णव ऐश्वर्य’ है। तीनों लोकोंका पालन उसीके अन्तर्गत है । उस सम्पूर्ण वैष्णव- पदको न तो ब्रह्मा कह सकते हैं और न दूसरे ही उसका पूर्णतया वर्णन कर सकते हैं । उसीको पौरुषपद भी कहते हैं । गौण और पौरुषपदसे उत्कृष्ट गणपतिपद है । उसीको ईश्वरपद भी कहते हैं । उस पदका किंचित् ज्ञान श्रीविष्णुको है । दूसरे लोग उसे नहीं जान सकते ॥ ४०-४१ ॥ ये सारी विज्ञान – सिद्धियाँ औपसर्गिक हैं । इन्हें परम वैराग्यद्वारा प्रयत्नपूर्वक रोकना चाहिये । इन अशुद्ध प्रातिभासिक गुणोंमें जिसका चित्त आसक्त है, उसे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला निर्भय परम ऐश्वर्य नहीं सिद्ध होता ॥ ४२-४३ ॥ इसलिये देवता, असुर और राजाओंके गुणों तथा भोगोंको जो तृणके समान त्याग देता है, उसे ही उत्कृष्ट योगसिद्धि प्राप्त होती है । अथवा यदि जगत्पर अनुग्रह करनेकी इच्छा हो तो वह योगसिद्ध मुनि इच्छानुसार विचरे । इस जीवनमें गुणों और भोगोंका उपभोग करके अन्तमें उसे मोक्षकी प्राप्ति होगी ॥ ४४-४५ ॥ अब मैं योगके प्रयोगका वर्णन करूँगा । एकाग्रचित्त होकर सुनो। शुभ काल हो, शुभ देश हो, भगवान् शिवका क्षेत्र आदि हो, एकान्त स्थान हो, जीव-जन्तु न रहते हों, कोलाहल न होता हो और किसी बाधाकी सम्भावना न हो—ऐसे स्थानमें लिपी – पुती सुन्दर भूमिको गन्ध और धूप आदिसे सुवासित करके वहाँ फूल बिखेर दे, चंदोवा आदि तानकर उसे विचित्र रीतिसे सजा दे तथा वहाँ कुश, पुष्प, समिधा, जल, फल और मूलकी सुविधा हो । [ फिर वहाँ योगका अभ्यास करे ।] अग्निके निकट, जलके समीप और सूखे पत्तोंके ढेरपर योगाभ्यास नहीं करना चाहिये ॥ ४६–४८ ॥ जहाँ डाँस और मच्छर भरे हों, साँप और हिंसक जन्तुओंकी अधिकता हो, दुष्ट पशु निवास करते हों, भयकी सम्भावना हो तथा जो दुष्टोंसे घिरा हुआ हो- ऐसे स्थानमें भी योगाभ्यास नहीं करना चाहिये । श्मशानमें, चैत्यवृक्षके नीचे, बाँबीके निकट, जीर्ण-शीर्ण घरमें, चौराहेपर, नदी-नद और समुद्रके तटपर, गली या सड़क के बीचमें, उजड़े हुए उद्यानमें, गोष्ठ आदिमें अनिष्टकारी और निन्दित स्थानमें भी योगाभ्यास न करे ॥ ४९ – ५०१ / २ ॥ जब शरीरमें अजीर्णका कष्ट हो, खट्टी डकार आती हो, विष्ठा और मूत्रसे शरीर दूषित हो, सर्दी हुई हो या अतिसार रोगका प्रकोप हो, अधिक भोजन कर लिया गया हो या अधिक परिश्रमके कारण थकावट हुई हो, जब मनुष्य अत्यन्त चिन्तासे व्याकुल हो, अधिक भूख-प्यास सता रही हो तथा जब वह अपने गुरुजनोंके कार्य आदिमें लगा हुआ हो, उस अवस्थामें भी उसे योगाभ्यास नहीं करना चाहिये ॥ ५१-५२१ / २ ॥ जिसके आहार-विहार उचित एवं परिमित हों, जो कर्मोंमें यथायोग्य समुचित चेष्टा करता हो तथा जो उचित समयसे सोता और जागता हो एवं सर्वथा आयासरहित हो, उसीको योगाभ्यासमें तत्पर होना चाहिये । आसन मुलायम, सुन्दर, विस्तृत, सब ओरसे बराबर और पवित्र होना चाहिये । पद्मासन और स्वस्तिकासन आदि जो यौगिक आसन हैं, उनपर भी अभ्यास करना चाहिये। अपने आचार्यपर्यन्त गुरुजनोंकी परम्पराको क्रमशः प्रणाम करके अपनी गर्दन, मस्तक और छातीको सीधी रखे । ओठ और नेत्र अधिक सटे हुए न हों। सिर कुछ-कुछ ऊँचा हो । दाँतोंसे दाँतोंका स्पर्श न करे ॥ ५३–५६ ॥ दाँतोंके अग्रभागमें स्थित हुई जिह्वाको अविचलभावसे रखते हुए, एड़ियोंसे दोनों अण्डकोशों और प्रजननेन्द्रियकी रक्षापूर्वक दोनों जाँघोंके ऊपर बिना किसी यत्नके अपनी दोनों भुजाओंको रखे। फिर दाहिने हाथके पृष्ठभागको बायें हाथकी हथेलीपर रखकर धीरेसे पीठको ऊँची करे और छातीको आगेकी ओरसे सुस्थिर रखते हुए नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये । अन्य दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करे ॥ ५७–५९ ॥ प्राणका संचार रोककर पाषाणके समान निश्चल हो जाय। अपने शरीर के भीतर मानस – मन्दिरमें हृदय- कमलके आसनपर पार्वतीसहित भगवान् शिवका चिन्तन करके ध्यान-यज्ञके द्वारा उनका पूजन करे ॥ ६०१ / २ ॥ मूलाधार चक्रमें, नासिकाके अग्रभागमें, नाभिमें, कण्ठमें, तालुके दोनों छिद्रोंमें, भौंहोंके मध्यभागमें, द्वारदेशमें, ललाटमें या मस्तकमें शिवका चिन्तन करे । शिवा और शिवके लिये यथोचित रीतिसे उत्तम आसनकी कल्पना करके वहाँ सावरण या निरावरण शिवका स्मरण करे । द्विदल, चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल अथवा षोडशदल कमलके आसनपर विराजमान शिवका विधिवत् स्मरण करना चाहिये। दोनों भौंहोंके मध्यभागमें द्विदल कमल है, जो विद्युत्के समान प्रकाशमान है ॥ ६१–६४ ॥ भ्रूमध्यमें स्थित जो कमल है, उसके क्रमशः दक्षिण और उत्तर भागमें दो पत्ते हैं, जो विद्युत् के समान दीप्तिमान् हैं। उनमें दो अन्तिम वर्ण ‘ह’ और ‘क्ष’ अंकित हैं। षोडशदल कमलके पत्ते सोलह स्वररूप हैं, [जिनमें ‘अ’ से लेकर ‘अः’ तकके अक्षर क्रमशः अंकित हैं।] यह जो कमल है, उसकी नालके मूलभागसे बारह दल प्रस्फुटित हुए हैं, जिनमें ‘क’ से लेकर ‘ठ’ तकके बारह अक्षर क्रमशः अंकित हैं । सूर्यके समान प्रकाशमान इस कमलके उन द्वादश दलोंका अपने हृदयके भीतर ध्यान करना चाहिये ॥ ६५–६७ ॥ तत्पश्चात् गो-दुग्धके समान उज्ज्वल कमलके दस दलोंका चिन्तन करे। उनमें क्रमशः ‘ड’ से लेकर ‘फ’ तकके अक्षर अंकित हैं। इसके बाद नीचेकी ओर दलवाले कमलके छः दल हैं, जिनमें ‘ब’ से लेकर ‘ल’ तक के अक्षर अंकित हैं । इस कमलकी कान्ति धूमरहित अंगारके समान है ॥ ६८१/२ ॥ मूलाधारमें स्थित जो कमल है, उसकी कान्ति सुवर्णके समान है। उसमें क्रमशः ‘व’ से लेकर ‘स’ तकके चार अक्षर चार दलोंके रूपमें स्थित हैं। इन कमलोंमेंसे जिसमें ही अपना मन रमे, उसीमें महादेव और महादेवीका अपनी धीर बुद्धिसे चिन्तन करे ॥ ६९-७० ॥ उनका स्वरूप अँगूठेके बराबर, निर्मल और सब ओरसे दीप्तिमान् है । अथवा वह शुद्ध दीपशिखाके समान आकारवाला है और अपनी शक्तिसे पूर्णतः मण्डित है। अथवा चन्द्रलेखा या ताराके समान रूपवाला है अथवा वह नीवारके सींक या कमलनालसे निकलेवाले सूतके समान है। कदम्बके गोलक या ओसके कणसे भी उसकी उपमा दी जा सकती है। वह रूप पृथिवी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करनेवाला है। ध्यान करनेवाला पुरुष जिस तत्त्वपर विजय पानेकी इच्छा रखता हो, उसी तत्त्वके अधिपतिकी स्थूल मूर्तिका चिन्तन करे ॥ ७१–७३१/२ ॥ ब्रह्मासे लेकर सदाशिवपर्यन्त तथा भव आदि आठ मूर्तियाँ ही शिवशास्त्रमें शिवकी स्थूल मूर्तियाँ निश्चित की गयी हैं । मुनीश्वरोंने उन्हें ‘घोर’, ‘शान्त’ और ‘मिश्र’ तीन प्रकारकी बताया है। फलकी आशा न रखनेवाले ध्यानकुशल पुरुषोंको इनका चिन्तन करना चाहिये। यदि घोर मूर्तियोंका चिन्तन किया जाय तो वे शीघ्र ही पाप और रोगका नाश करती हैं ॥ ७४–७६ ॥ मिश्र मूर्तियोंमें शिवका चिन्तन करनेपर चिरकालमें सिद्धि प्राप्त होती है और सौम्यमूर्तिमें शिवका ध्यान किया जाय तो सिद्धि प्राप्त होनेमें न तो अधिक शीघ्रता होती है और न अधिक विलम्ब ही । सौम्यमूर्तिमें ध्यान करनेसे विशेषतः मुक्ति, शान्ति एवं शुद्ध बुद्धि प्राप्त होती है। क्रमशः सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७७-७८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें योगगतिमें विघ्नोत्पत्तिवर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ * योगदर्शन, समाधिपादके ३०वें सूत्रमें नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको योगका अन्तराय बताया गया है और ३१ वें सूत्रमें पाँच ‘विक्षेपसहभू’ संज्ञक विघ्न अथवा प्रतिबन्धक कहे गये हैं । किंतु यहाँ शिवपुराणमें दस प्रकारके अन्तराय बताये गये हैं। इनमें योगदर्शनकथित ‘अलब्धभूमिकत्व’ को छोड़ दिया गया है और ‘विक्षेपसहभू’ में परिगणित दुःख और दौर्मनस्यको सम्मिलित कर लिया गया है। योगसूत्रमें ‘स्त्यान और संशय- ये दो पृथक्-पृथक् अन्तराय’ हैं और यहाँ ‘ स्थान – संशय ‘ नामसे एक ही अन्तराय माना गया है; साथ ही इस पुराणमें ‘ अश्रद्धा’ को भी एक अन्तरायके रूपमें गिना गया है। Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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