शिवमहापुराण — वायवीयसंहिता [ पूर्वखण्ड] — अध्याय 31
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
वायवीयसंहिता [ पूर्वखण्ड] इकतीसवाँ अध्याय
शिवजीकी सर्वेश्वरता, सर्वनियामकता तथा मोक्षप्रदताका निरूपण

वायुदेवताने कहा – ब्राह्मणो ! आपलोगोंने युक्तियोंसे प्रेरित होकर जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है; क्योंकि किसी बातको जाननेकी इच्छा अथवा तत्त्वज्ञानके लिये उठाया गया प्रश्न साधु-बुद्धिवाले पुरुषोंमें नास्तिकताका उत्पादन नहीं कर सकता। मैं इस विषयमें ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करूँगा, जो सत्पुरुषोंके मोहको दूर करनेवाला है। असत् पुरुषोंका जो अन्यथा भाव होता है, उसमें प्रभु शिवकी कृपाका अभाव ही कारण है ॥ १-२ ॥ परिपूर्ण परमात्मा शिवके परम अनुग्रहके बिना कुछ भी कर्तव्य नहीं है, ऐसा निश्चय किया गया है । परानुग्रह कर्ममें स्वभाव ही पर्याप्त (पूर्णतः समर्थ) है, अन्यथा निःस्वभाव पुरुष किसीपर भी अनुग्रह नहीं कर सकता । पशु और पाशरूप सारा जगत् ही पर कहा गया है। वह अनुग्रहका पात्र है। परको अनुगृहीत करनेके लिये पतिकी आज्ञाका समन्वय आवश्यक है। पति आज्ञा देनेवाला है, वही सदा सबपर अनुग्रह करता है । उस अनुग्रहके लिये ही आज्ञा – रूप अर्थको स्वीकार करनेपर शिव परतन्त्र कैसे कहे जा सकते हैं ? ॥ ३-६ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


अनुग्राहककी अपेक्षा न रखकर कोई भी अनुग्रह सिद्ध नहीं हो सकता । अतः स्वातन्त्र्य – शब्दके अर्थकी अपेक्षा न रखना ही अनुग्रहका लक्षण है । जो अनुग्राह्य है, वह परतन्त्र माना जाता है; क्योंकि पतिके अनुग्रहके बिना उसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ७-८ ॥ जो मूर्त्यात्मा हैं, वे भी अनुग्रहके पात्र हैं; क्योंकि उनसे भी शिवकी आज्ञाकी निवृत्ति नहीं होती – वे भी शिवकी आज्ञासे बाहर नहीं हैं । यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो शिवकी आज्ञाके अधीन न हो । सकल (सगुण या साकार) होनेपर भी जिसके द्वारा हमें निष्कल (निर्गुण या निराकार) शिवकी प्राप्ति होती है, उस मूर्ति या लिंगके रूपमें साक्षात् शिव ही विराज रहे हैं । वह ‘शिवकी मूर्ति है’ यह बात तो उपचारसे कही जाती है ॥ ९-१० ॥ जो साक्षात् निष्कल तथा परम कारणरूप शिव हैं, वे किसीके द्वारा भी साकार अनुभावसे उपलक्षित नहीं होते, ऐसी बात नहीं है। यहाँ प्रमाणगम्य होना उनके स्वभावका उपपादक नहीं है, प्रमाण अथवा प्रतीकमात्रसे अपेक्षा-बुद्धिका उदय नहीं होता। वे परम तत्त्वके उपलक्षणमात्र हैं, इसके सिवा उनका और कोई अभिप्राय नहीं है ॥ ११-१२ ॥

कोई-न-कोई मूर्ति ही आत्माका साक्षात् उपलक्षण होती है । ‘शिवकी मूर्ति है’ इस कथनका अभिप्राय यह है कि उस मूर्तिके रूपमें परम शिव विराजमान हैं । मूर्ति उनका उपलक्षण है। जैसे काष्ठ आदि आलम्बनका आश्रय लिये बिना केवल अग्नि कहीं उपलब्ध नहीं होती, उसी प्रकार शिव भी मूर्त्यात्मामें आरूढ़ हुए बिना उपलब्ध नहीं होते। यही वस्तुस्थिति है ॥ १३-१४ ॥ जैसे किसीसे यह कहनेपर कि ‘तुम आग ले आओ’ उसके द्वारा जलती हुई लकड़ी आदिके सिवा साक्षात् अग्नि नहीं लायी जाती, उसी प्रकार शिवका पूजन भी मूर्तिरूपमें ही हो सकता है, अन्यथा नहीं । इसीलिये पूजा आदिमें ‘मूर्त्यात्मा’ की परिकल्पना होती है; क्योंकि मूर्त्यात्माके प्रति जो कुछ किया जाता है, वह साक्षात् शिवके प्रति किया गया ही माना गया है ॥ १५-१६ ॥ लिंग आदिमें, विशेषतः अर्चाविग्रहमें जो पूजनकृत्य होता है, वह भगवान् शिवका ही पूजन है । उन-उन मूर्तियोंके रूपमें शिवकी भावना करके हमलोग शिवकी ही उपासना करते हैं। जैसे परमेष्ठी शिव मूर्त्यात्मापर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार मूर्त्यात्मामें स्थित शिव हम पशुओंपर अनुग्रह करते हैं। परमेष्ठी शिवने लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही सदाशिव आदि सम्पूर्ण मूर्त्यात्माओंको अधिष्ठित— अपनी आज्ञामें रखकर अनुगृहीत किया है ॥ १७–१९ ॥

आत्माओं [जीवों]-के ही भोग तथा मोक्षके लिये विशेष रूपसे तात्त्विक तथा अतात्त्विक स्वरूपोंवाले मूर्त्यात्माओंमें शिवकी अवस्थिति देखी जाती है ॥ २० ॥ सुख-दुःखात्मक फलभोग तो किये गये कर्मोंका ही परिणाम माना जाता है तो फिर कर्मफलोंका भोग किस प्रकार हो सकेगा? भगवान् शिव सबपर अनुग्रह ही करते हैं, किसीका निग्रह नहीं करते, क्योंकि निग्रह करनेवाले लोगों में जो दोष होते हैं, वे शिवमें असम्भव हैं। ब्रह्मा आदिके प्रति जो निग्रह देखे गये हैं, वे भी श्रीकण्ठमूर्ति शिवके द्वारा लोकहितके लिये ही किये गये हैं ॥ २१ – २३ ॥ भगवान् शंकर [ संसारके नियमन आदिकी] क्रीडामें निरत श्रीकण्ठ नामक स्वरूपमें अधिष्ठित हैं और वह श्रीकण्ठमूर्ति ही इस ब्रह्माण्डपर अधिकार करके स्थित है, इसमें सन्देह नहीं है । अपराधयुक्त होनेके कारण देवगण भी [ शिवजीके द्वारा ] उचित रीतिसे अनुशासित किये गये थे, इससे वे पापरहित हो गये और प्रजाजनोंका क्लेश भी दूर हो गया । विद्वानोंकी दृष्टिमें निग्रह भी स्वरूपसे दूषित नहीं है । ( जब वह राग-द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है, तभी निन्दनीय माना जाता है | ) इसीलिये दण्डनीय अपराधियोंको राजाओंकी ओरसे मिले हुए दण्डकी प्रशंसा की जाती है ॥ २४–२६ ॥ जिन्होंने अपने ऐश्वर्यके द्वारा समस्त कार्योंको पूर्ण किया था, वे यदि अपने ऐश्वर्यको प्रकट न करें तो उन्हें संसार ईश्वर कैसे मानेगा ? भगवान् शिवकी इच्छा ही उनका विधानकर्तृत्व है और विधान उनकी सामर्थ्यशालिनी आज्ञा है । ‘ यह कर्तव्य है और यह कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकारके अनुशासनका नाम आज्ञा है ॥ २७-२८ ॥

जो लोग उनके इस अनुशासनका पालन करते हैं, वे ही साधुजन हैं तथा [शिवानुशासनसे] विपरीत आचरण करनेवाला असाधु कहलाता है । अतएव सभी लोग साधु नहीं हो पाते। यदि साधुकी रक्षा करनी है तो असाधुका निवारण करना ही होगा। पहले साम आदि तीन उपायोंसे असाधुके निवारणका प्रयत्न किया जाता है। यदि यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ तो अन्तमें चौथे उपाय दण्डका ही आश्रय लिया जाता है। यह दण्डान्त अनुशासन लोकहितके लिये ही किया जाना चाहिये । यही उसके औचित्यको परिलक्षित कराता है। यदि अनुशासन इसके विपरीत हो तो उसे अहितकर कहते हैं ॥ २९–३१ ॥ जो सदा हितमें ही लगे रहनेवाले हैं, उन्हें ईश्वरका दृष्टान्त अपने सामने रखना चाहिये। (ईश्वर केवल दुष्टोंको ही दण्ड देते हैं, इसीलिये निर्दोष कहे जाते हैं ।) अतः जो दुष्टों को ही दण्ड देता है, वह उस निग्रह – कर्मको लेकर सत्पुरुषोंद्वारा लांछित कैसे किया जा सकता है ? ॥ ३२ ॥ अयुक्त अर्थात् अनुचित कर्म करनेवाले लोग विवेकी पुरुषके द्वारा गर्हित माने जाते हैं और जो कर्म लोगोंको उद्विग्न करता है, वह कर्म अयुक्त कहलाता है लोकमें जहाँ कहीं भी निग्रह होता है, वह यदि विद्वेषपूर्वक न हो, तभी श्रेष्ठ माना जाता है । जो पिता पुत्रको दण्ड देकर उसे अधिक शिक्षित बनाता है, वह उससे द्वेष नहीं करता । तटस्थ भावसे जो व्यक्ति दण्डनीय लोगोंको अनुशासित करता है, उसमें भी यत्किंचित् कठोरता देखी ही जाती है ॥ ३३-३५ ॥

यदि उसमें कठोरता न हो तो वह अपराधी पुरुषोंको दण्डित ही कैसे करेगा, पर वह मध्यस्थ भावमें स्थित रहकर भी अज्ञ पुरुषोंको दण्डित करता है ॥ ३६ ॥ इसलिये [भले ही वह मध्यस्थ भाववाला क्यों न हो, पर] दण्डित करता हुआ व्यक्ति निर्दय होता ही है – ऐसा कुछ लोग कहते हैं और दूसरे लोग कहते हैं कि ऐसा कोई [ निश्चित ] नियम नहीं है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार रोगके कारणको जाननेवाला वैद्य रोगीके प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार करता हुआ भी [ वस्तुत: ] तनिक भी निर्दयी नहीं होता, अपितु उसका यह व्यवहार दयासे ही प्रेरित होता है ॥ ३८ ॥ हिंसाके लिये उद्यत शत्रुके प्रति की गयी दया उपकारिणी नहीं होती, यदि कदाचित् वैसे लोगोंके प्रति व्यक्ति भ्रमवश दयावान् हो भी जाय तो अन्ततोगत्वा उसे निर्दय होना ही पड़ता है । रक्षणीय व्यक्तिकी रक्षा न करना और दण्डनीय व्यक्तिको दण्ड न देना – यह दोनों ही प्रकारकी उपेक्षा दोषपूर्ण है। सामर्थ्यके होनेपर भी यदि रक्षणीय व्यक्तिकी रक्षा न की जाय तो शीघ्र ही रक्षणीय व्यक्तिका नाश हो जाता है । सर्पके मुखमें जाते हुए व्यक्तिको देखते हुए भी जो पुरुष दोषाभासोंका अनुमानकर उस रक्षणीय व्यक्तिकी उपेक्षा कर देता है, वस्तुतः वह भी निर्दय ही होता है ॥ ३९ – ४१ ॥

इसलिये दया प्रत्येक समय कल्याणकारिणी ही होती है – ऐसा मानना उचित नहीं है। अतएव आवश्यकतानुरूप व्यवहार ही उचित है तथा उसके अतिरिक्त व्यवहार अनुचित कहा गया है ॥ ४२ ॥ मूर्त्यात्माओंमें भी राग आदि दोष होते ही हैं, पर वे दोष वस्तुतः उनके ही समझने चाहिये, [सर्वव्यापक होनेपर भी] शिवमें दोषोंकी स्थिति सर्वथा नहीं है ॥ ४३ ॥ मलसे युक्त ताम्रका अग्निमें प्रक्षेप होनेपर भी वह अग्नि [समल] ताम्रके संसर्गसे मलिन नहीं होती ॥ ४४ ॥ अपवित्र वस्तुओंका संसर्ग होनेपर भी अग्निमें अपवित्रता नहीं देखी जाती, किंतु अग्निके संसर्गसे अपवित्र वस्तु पवित्र हो जाती है । इस प्रकार शुद्ध करनेयोग्य [मलावृत] जीवके संसर्गसे शिवजी अशुद्ध नहीं होते, अपितु उनके संसर्गसे अशुद्ध जीव शुद्ध हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥ जैसे अग्निमें गिरे हुए लोहेमें जो दाहकता है, वह लोहेकी नहीं अपितु अग्निकी ही है, उसी प्रकार मूर्त्यात्मामें स्थित जो ऐश्वर्य है, वह वस्तुतः शिवका ही है, आत्माओं [मूर्त्यात्मा ] – का नहीं ॥ ४७ ॥ काष्ठ कभी ऊपरकी ओर नहीं जलता अपितु अग्नि [ – की शिखा ] ही ऊपरकी ओर जलती है । इसी प्रकार काष्ठ ही अंगारके रूपमें देखा जाता है, न कि अग्नि- ऐसा ही इस विषयमें भी समझ लेना चाहिये । इसलिये इस संसारमें भी काष्ठ, पाषाण, मृत्तिका आदिमें शिवकी व्याप्ति होनेके कारण उनका शिवरूपसे व्यवहार किया जाता है । मैत्री आदि गुण चित्तवृत्तिरूप होनेके कारण गौण कहे गये हैं। उन्हीं गुणोंसे उपरत होनेके कारण [ जीवोंके] कर्म दोषयुक्त तथा गुणयुक्त हो जाते हैं ॥ ४८-४९ ॥

ये गुणात्मक वृत्तियाँ चाहे प्रधान हों या अप्रधान हों, पर इससे अनुग्रहकर्ता भगवान् शिवमें न दोषकी स्थिति होती है और न गुणकी ही स्थिति होती है । अनुग्रह शब्दके तात्पर्यको विद्वानोंने लाक्षणिक नहीं कहा है, उनके मतमें यह अर्थ संसारबन्धनसे छुड़ानेवाला तथा कल्याणकारी शिवादेश है ॥ ५०-५१ ॥ शिवकी आज्ञाका पालन ही हित है और जो हित है, वही उनका अनुग्रहहै। अतएव सबको हितमें नियुक्त करनेवाले शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले कहे गये हैं । जो ‘उपकार’ शब्दका अर्थ है, उसे भी अनुग्रह ही कहा गया है; क्योंकि उपकार भी हितरूप ही होता है । अत: सबका उपकार करनेवाले शिव सर्वानुग्राहक हैं । शिवके द्वारा जड- चेतन सभी सदा हितमें ही नियुक्त होते हैं । परंतु सबको जो एक साथ और एक समान हितकी उपलब्धि नहीं होती, इसमें उनका स्वभाव ही प्रतिबन्धक है ॥ ५२-५४ ॥ जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सभी कमलोंको विकासके लिये प्रेरित करते हैं, परंतु वे अपने-अपने स्वभावके अनुसार एक साथ और एक समान विकसित नहीं होते, स्वभाव भी पदार्थोंके भावी अर्थका कारण होता है, किंतु वह नष्ट होते हुए अर्थको कर्ताओंके लिये सिद्ध नहीं कर सकता। जैसे अग्निका संयोग सुवर्णको ही पिघलाता है, कोयले या अंगारको नहीं, उसी प्रकार भगवान् शिव परिपक्व मलवाले पशुओंको ही बन्धनमुक्त करते हैं, दूसरोंको नहीं ॥ ५५-५७ ॥

जो वस्तु जैसी होनी चाहिये, वैसी वह स्वयं नहीं बनती। वैसी बननेके लिये कर्ताकी भावनाका सहयोग होना आवश्यक है। कर्ताकी भावनाके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है, अतः कर्ता सदा स्वतन्त्र होता है ॥ ५८ ॥ सबपर अनुग्रह करनेवाले शिव जिस तरह स्वभावसे ही निर्मल हैं, उसी तरह ‘जीव’ संज्ञा धारण करनेवाली आत्माएँ स्वभावतः मलिन होती हैं । यदि ऐसी बात न होती तो वे जीव क्यों नियमपूर्वक संसारमें भटकते और शिव क्यों संसार-बन्धनसे परे रहते ? विद्वान् पुरुष कर्म और मायाके बन्धनको ही जीवका ‘संसार’ कहते हैं । यह बन्धन जीवको ही प्राप्त होता है, शिवको नहीं । इसमें कारण है, जीवका स्वाभाविक मल । वह कारणभूत मल जीवोंका अपना स्वभाव ही है, आगन्तुक नहीं है । यदि आगन्तुक होता तो किसीको भी किसी भी कारणसे बन्धन प्राप्त हो जाता । जो यह हेतु है, वह एक है; क्योंकि सब जीवोंका स्वभाव एक-सा है ॥ ५९–६२ ॥ यद्यपि सबमें एक-सा आत्मभाव है, तो भी मलके परिपाक और अपरिपाकके कारण कुछ जीव बद्ध हैं और कुछ बन्धनसे मुक्त हैं। बद्ध जीवोंमें भी कुछ लोग लय और भोगके अधिकारके अनुसार उत्कृष्ट और निकृष्ट होकर ज्ञान और ऐश्वर्य आदिकी विषमताको प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ लोग अधिक ज्ञान और ऐश्वर्यसे युक्त होते हैं तथा कुछ लोग कम। कोई मूर्त्यात्मा होते हैं और कोई साक्षात् शिवके समीप विचरनेवाले होते हैं ॥ ६३-६४ ॥

मूर्त्यात्माओंमें भी कोई तो शिवस्वरूप हो छहों अध्वाओंके ऊपर स्थित होते हैं, कोई अध्वाओंके मध्यमार्गमें महेश्वर होकर रहते हैं और कोई निम्नभागमें रुद्ररूपसे स्थित होते हैं ॥ ६५ ॥ शिवके समीपवर्ती स्वरूपमें भी मायासे परे होनेके कारण उत्कृष्ट, मध्यम और निकृष्टके भेदसे तीन श्रेणियाँ होती हैं – वहाँ निम्न स्थानमें आत्माकी स्थिति है, मध्यम स्थानमें अन्तरात्माकी स्थिति है और जो सबसे उत्कृष्ट श्रेणीका स्थान है, उसमें परमात्माकी स्थिति है। ये ही क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर कहलाते हैं। कोई पशु (जीव) परमात्मपदका आश्रय लेनेवाले होते हैं, कोई अन्तरात्मपदपर और आत्मपदपर प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ६६-६७१ / २ ॥ शैव शान्त्यतीत पदका तथा माहेश्वरगण शान्तिपदका सेवन करते हैं । विद्यापदमें रौद्रगण एवं प्रतिष्ठापदमें वैष्णव स्थितिलाभ करते हैं। निवृत्तिपद में ब्रह्माजी तथा उनके शरीरसे उत्पन्न दिव्यात्माएँ निवास करती हैं ॥ ६८-६९ ॥ अष्टविध देवयोनियाँ प्रधान मानी गयी हैं, मनुष्ययोनि मध्यम हैं और पंचविध पशुयोनियाँ अधम कही गयी हैं । इस प्रकार ये चौदह योनियाँ कही गयी हैं ॥ ७० ॥ संसारी जीवका उत्कृष्ट तथा अपकृष्ट भाव ही वस्तुतः उसका स्वाभाविक मल कहा गया है, जिस प्रकार खायी गयी भोज्य वस्तुकी पूर्वावस्थाको आम कहते हैं और खानेके उपरान्त उसी वस्तुकी पक्व संज्ञा हो जाती है । उसी प्रकार मल भी पक्व और आमके भेदसे दो प्रकारका होता है, यह द्विविध मल ही [जन्म- मरणादिरूप] संसारका कारण होता है ॥ ७११/२ ॥

अपक्व मल जीवगणोंकी अधोगतिका कारण होता है और पक्व मल उनकी क्रमशः ऊर्ध्वगतिका कारण बनता है। ये पशु जीवात्मा एक, दो तथा तीन मलोंसे युक्त होते हैं। एक मलसे युक्त जीव यहाँ श्रेष्ठ कहा गया है, दो मलोंवाला मध्यम तथा तीन मलवाला जीव अधम कहा गया है। ये मलावृत जीव उत्तरोत्तर अधिष्ठित हैं। तीन मलवालोंपर दो मलवाले तथा उनपर एक मलवाले अधिष्ठित होते हैं । इस प्रकार मलरूप उपाधिके कारण संसारी जीवोंका भेद परिकल्पित किया गया है ॥ ७२–७४ ॥ एक, दो तथा तीन मलवाले सभी जीवोंपर एकमात्र भगवान् शिवका आधिपत्य है । यह जगत् जिस प्रकार अशिवात्मक अर्थात् अभद्र होकर भी शिवसे अधिष्ठित है, उसी प्रकार अरुद्रात्मक होकर भी रुद्रोंद्वारा अधिष्ठित होता है । [ समस्त ] ब्रह्माण्डात्मिका यह महाभूमि शतरुद्र आदिके द्वारा अधिष्ठित है तथा उनसे अधिष्ठित यह महाभूमि मायासे आवेष्टित और अन्तरिक्षसे निरन्तर आवृत तथा अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले अमरेशादि देवगणोंसे अधिष्ठित है ॥ ७५–७७ ॥ महामायापर्यन्त यह द्युलोक वाम आदि भुवनपतियोंके द्वारा अधिष्ठित है तथा साक्षात् सम्बन्ध न होनेपर भी [पूर्वोक्त] षडध्वाके अन्तर्वर्ती देवगणोंसे भी अधिष्ठित है। वामादि दिविषद्, अमरेशादि अन्तरिक्षसद् तथा शतरुद्रादि पृथिवीषद् – इन देवगणोंका देवोपासक [ मुनिगण] सर्वदा स्तवन करते रहते हैं ॥ ७८-७९ ॥ संसाररोगके कारणभूत, [ अल्प पक्व, ] पक्व तथा अपक्व—इन तीनों मलोंके द्वारा मनुष्य [ जन्म-मरणरूप] संसाररोगसे ग्रस्त होते हैं ॥ ८० ॥

इस संसाररोगकी औषधि ज्ञानके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। कल्याणस्वरूप, परमकारण भगवान् शिव ही आज्ञारूप औषधि प्रदान करनेवाले वैद्य हैं ॥ ८१ ॥ भगवान् शिव तो अनायास ही समस्त पशुओंको बन्धनसे मुक्त करनेमें समर्थ हैं । फिर वे उन्हें बन्धनमें डाले रखकर क्यों दुःख देते हैं ? यहाँ ऐसा विचार या संदेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि सारा संसार दुःखरूप ही है, ऐसा विचारवानोंका निश्चित सिद्धान्त है। जो स्वभावतः दुःखमय है, वह दु:खरहित कैसे हो सकता है। स्वभावमें उलट-फेर नहीं हो सकता ॥ ८२-८३ ॥ वैद्यकी दवासे रोग अरोग नहीं होता। वह रोगपीड़ित मनुष्यका अपनी दवासे सुखपूर्वक उद्धार कर देता है । इसी प्रकार जो स्वभावतः मलिन और स्वभावसे ही दुखी हैं, उन पशुओंको अपनी आज्ञारूपी ओषधि देकर शिव दुःखसे छुड़ा देते हैं। रोग होनेमें वैद्य कारण नहीं है, परंतु संसारकी उत्पत्तिमें शिव कारण हैं । अतः रोग और वैद्यके दृष्टान्तसे शिव और संसारके दान्तमें समानता नहीं है। इसलिये इसके द्वारा शिवपर दोषारोपण नहीं किया जा सकता। जब दुःख स्वभाव – सिद्ध है, तब शिव उसके कारण कैसे हो सकते हैं ? जीवोंमें जो स्वाभाविक मल है, वही उन्हें संसारके चक्रमें डालता है ॥ ८४–८७ ॥ विद्वानोंका कहना है कि संसारका कारणभूत जो मल—अचेतन माया आदि है, वह शिवका सांनिध्य प्राप्त किये बिना स्वयं चेष्टाशील नहीं हो सकता। जैसे चुम्बकमणि लोहेका सांनिध्य पाकर ही उपकारक होता है— लोहेको खींचता है, उसी प्रकार शिव भी जड माया आदिका सांनिध्य पाकर ही उसके उपकारक होते हैं, उसे सचेष्ट बनाते हैं ॥ ८८-८९ ॥

उनके विद्यमान सांनिध्यको अकारण हटाया नहीं जा सकता। अतः जगत् के लिये जो सदा अज्ञात हैं, वे शिव ही इसके अधिष्ठाता हैं । शिवके बिना यहाँ कोई भी प्रवृत्त (चेष्टाशील) नहीं होता, उनकी आज्ञाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता । उनसे प्रेरित होकर ही यह सारा जगत् विभिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, तथापि वे शिव कभी मोहित नहीं होते ॥ ९०-९१ ॥ उनकी आज्ञारूपिणी जो शक्ति है, वही सबका नियन्त्रण करती है। उसका सब ओर मुख है । उसीने सदा इस सम्पूर्ण दृश्यप्रपंचका विस्तार किया है, तथापि उसके दोषसे शिव दूषित नहीं होते । यह समस्त जगत् शिवसे प्रेरित होता है, किंतु इससे शिवका स्वस्वरूप विकृत नहीं होता। प्रेरणा अथवा शासनका कार्य शिवकी आज्ञाके द्वारा सम्पन्न होता है ॥ ९२-९३ ॥ जो दुर्बुद्धि मानव मोहवश इसके विपरीत मान्यता रखता है, वह नष्ट हो जाता है । शिवकी शक्तिके वैभवसे ही संसार चलता है, तथापि इससे शिव दूषित नहीं होते ॥ ९४ ॥
इसी समय आकाशसे शरीररहित वाणी सुनायी दी – ‘सत्यम् ओम् अमृतं सौम्यम् ‘ इन पदोंका वहाँ स्पष्ट उच्चारण हुआ, उसे सुनकर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। उनके समस्त संशयोंका निवारण हो गया तथा उन मुनियोंने विस्मित हो प्रभु पवनदेवको प्रणाम किया । इस प्रकार उन मुनियोंको संदेहरहित करके भी वायुदेवने यह नहीं माना कि इन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया । ‘ इनका ज्ञान अभी प्रतिष्ठित नहीं हुआ है’ ऐसा समझकर ही वे इस प्रकार बोले— ॥ ९५–९७ ॥

वायुदेवताने कहा— मुनियो ! परोक्ष और अपरोक्षके भेदसे ज्ञान दो प्रकारका माना गया है। परोक्ष ज्ञानको अस्थिर कहा जाता है और अपरोक्ष ज्ञानको सुस्थिर । युक्तिपूर्ण उपदेशसे जो ज्ञान होता है, उसे विद्वान् पुरुष परोक्ष कहते हैं। वही श्रेष्ठ अनुष्ठानसे अपरोक्ष हो जायगा। अपरोक्ष ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं होता, ऐसा निश्चय करके तुमलोग आलस्यरहित हो श्रेष्ठ अनुष्ठानकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करो ॥ ९८–१०० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें ज्ञानोपदेश नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

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