शिवमहापुराण — वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] — अध्याय 27
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] सत्ताईसवाँ अध्याय
शिवपूजनमें अग्निकर्मका वर्णन

उपमन्यु बोले – [हे कृष्ण !] अब मैं अग्निकार्यका वर्णन करूँगा। कुण्डमें, स्थण्डिलपर, वेदीमें, लोहेके हवनपात्रमें या नूतन सुन्दर मिट्टीके पात्रमें विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके उसका संस्कार करे । तत्पश्चात् वहाँ महादेवजीकी आराधना करके होमकर्म आरम्भ करे ॥ १-२ ॥ कुण्ड दो या एक हाथ लम्बा – चौड़ा होना चाहिये। वेदीको गोल या चौकोर बनाना चाहिये। साथ ही मण्डल भी बनाना आवश्यक है । कुण्ड विस्तृत और गहरा होना चाहिये। उसके मध्यभागमें अष्टदल कमल अंकित करे। वह दो या चार अंगुल ऊँचा हो । कुण्डके भीतर दो बित्तेकी ऊँचाईपर नाभिकी स्थिति बतायी गयी है। मध्यमा अंगुलिके मध्यम और उत्तम पर्वोंके बराबर मध्यभाग या कटिभाग जानना चाहिये ॥ ३–५ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


साधु पुरुष चौबीस अंगुलके बराबर एक हाथका परिमाण बताते हैं । कुण्डकी तीन, दो या एक मेखला होनी चाहिये। इन मेखलाओंका इस तरह निर्माण करे, जिससे कुण्डकी शोभा बढ़े। सुन्दर और चिकनी योनि बनाये, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति अथवा हाथीके अधरोष्ठके समान हो ॥ ६-७ ॥ कुण्डके दक्षिण या पश्चिम भागमें मेखलाके बीचोबीच सुन्दर योनिका निर्माण करना चाहिये, जो मेखलासे कुछ नीची हो । उसका अग्रभाग कुण्डकी ओर हो तथा वह मेखलाको कुछ छोड़कर बनायी गयी हो । वेदीके लिये ऊँचाईका कोई नियम नहीं है । वह मिट्टी या बालूकी होनी चाहिये ॥ ८-९ ॥ गायके गोबर या जलसे मण्डल बनाना चाहिये । पात्रका परिमाण नहीं बताया गया है । कुण्ड और मिट्टीकीवेदीको गोबर और जलसे लीपना चाहिये ॥ १० ॥

पात्रको धोकर तपाये तथा अन्य वस्तुओंका जलसे प्रोक्षण करे। अपने – अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार कुण्डमें और वेदीपर उल्लेखन (रेखा) करे । [रेखाओंपरसे मृत्तिका लेकर ईशानकोणमें फेंक दे।] फिर अग्निके उस आसनका कुशों अथवा पुष्पोंद्वारा जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् पूजन और हवनके लिये सब प्रकारके द्रव्योंका संग्रह करे ॥ ११-१२ ॥ धोनेयोग्य वस्तुओंको धोकर प्रोक्षणीके जलसे उनका प्रोक्षण करके उन्हें शुद्ध करे। इसके बाद सूर्यकान्तमणिसे प्रकट, काष्ठसे उत्पन्न, श्रोत्रियकी अग्निशालामें संचित अथवा दूसरी किसी उत्तम अग्निको आधारसहित ले आये । उसे कुण्ड अथवा वेदीके ऊपर तीन बार प्रदक्षिणक्रमसे घुमाकर अग्निबीज (रं) – का उच्चारण करके उस अग्निको उक्त कुण्ड या वेदीके आसनपर स्थापित कर दे । कुण्डमें स्थापित करना हो तो योनिमार्गसे अग्निका आधान करे और वेदीपर अपने सामनेकी ओर अग्निकी स्थापना करे ॥ १३–१५ ॥

योनिप्रदेशके पास स्थित विद्वान् पुरुष समस्त कुण्डको अग्निसे संयुक्त करे। साथ ही यह भावना करे कि अपनी नाभिके भीतर जो अग्निदेव विराजमान हैं, वे ही नाभिरन्ध्रसे चिनगारीके रूपमें निकलकर बाह्य अग्निमें मण्डलाकार होकर लीन हुए हैं ॥ १६१/२ ॥ अग्निपर समिधा रखनेसे लेकर घीके संस्कारपर्यन्त सारा कार्य मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे मूलमन्त्रद्वारा सम्पन्न करे । तदनन्तर शिवमूर्तिकी पूजा करके दक्षिण पार्श्वमें मन्त्र – न्यास करे और घृतमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे ॥ १७ – १८१ / २ ॥

स्रुक् और स्रुवा – ये दोनों धातुके बने हुए हों तो ग्रहण करनेयोग्य हैं । परंतु काँसे, लोहे और शीशेके बने हुए स्रुक्, स्रुवाको नहीं ग्रहण करना चाहिये अथवा यज्ञसम्बन्धी काष्ठके बने हुए स्रुक्, स्रुवा भी ग्राह्य हैं। स्मृति या शिल्पशास्त्रमें जो विहित हों, वे भी ग्राह्य हैं अथवा ब्रह्मवृक्ष ( पलास या गूलर ) आदिके छिद्ररहित तथा ऊपरकी ओर उभारवाले बिचले दो पत्ते लेकर उन्हें कुशसे पोंछे और अग्निमें तपाकर फिर उनका प्रोक्षण करे । [ उन्हीं पत्तोंको स्रुक् और स्रुवाका रूप दे] उनमें घी उठाये और अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे शिवबीज () – सहित आठ बीजाक्षरोंद्वारा अग्निमें आहुति दे । इससे अग्निका संस्कार सम्पन्न होता है ॥ १९–२११/२ ॥

वे बीज इस प्रकार हैं-श्रुं स्तुं बुं श्रुं पुं डुं त्रुं। ये सात हैं, इनमें शिवबीज () – को सम्मिलित कर लेनेपर आठ बीजाक्षर होते हैं । उपर्युक्त सात बीज क्रमशः अग्निकी सात जिह्वाओंके हैं। उनकी मध्यमा जिह्वाका नाम बहुरूपा है। उसकी तीन शिखाएँ हैं । उनमें से एक शिखा दक्षिणमें और दूसरी वाम दिशा (उत्तर)-में प्रज्वलित होती है और बीचवाली शिखा बीचमें ही प्रकाशित होती है। ईशानकोणमें जो जिह्वा है, उसका नाम हिरण्या है । पूर्वदिशामें विद्यमान जिह्वा कनका नामसे प्रसिद्ध है। अग्निकोणमें रक्ता, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्णा और वायव्यकोणमें सुप्रभा नामकी जिह्वा प्रकाशित होती है। इनके अतिरिक्त पश्चिममें जो जिह्वा प्रज्वलित होती है, उसका नाम मरुत् है । इन सबकी प्रभा अपने- अपने नामके अनुरूप है ॥ २२–२५ ॥

अपने-अपने बीजके अनन्तर क्रमशः इनका नाम लेना चाहिये और नामके अन्तमें स्वाहाका प्रयोग करना चाहिये। इस तरह जो जिह्वामन्त्र 1 बनते हैं, उनके द्वारा क्रमशः प्रत्येक जिह्वाके लिये एक-एक घीकी आहुति दे, परंतु मध्यमाकी तीन जिह्वाओंके लिये तीन आहुतियाँ दे । कुण्डके मध्यभागमें ‘रं वह्नये स्वाहा’ बोलकर तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ घी अथवा समिधासे देनी चाहिये। आहुति देनेके पश्चात् अग्निमें जलका सेचन करे ॥ २६-२७ ॥ ऐसा करनेपर वह अग्नि भगवान् शिवकी हो जाती है। फिर उसमें शिवके आसनका चिन्तन करे और वहाँ अर्धनारीश्वर भगवान् शिवका आवाहन करके पूजन करे । पाद्य- अर्घ्य आदिसे लेकर दीपदानपर्यन्त पूजन करके अग्निका जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् समिधाओंकी आहुति दे । वे समिधाएँ पलासकी या गूलर आदि दूसरे यज्ञिय वृक्षकी होनी चाहिये। उनकी लम्बाई बारह अंगुलकी हो । समिधाएँ टेढ़ी न हों । स्वतः सूखी हुई भी न हों। उनके छिलके न उतरे हों तथा उनपर किसी प्रकारकी चोट न हो । सब समिधाएँ एक-सी होनी चाहिये । दस अंगुल लम्बी समिधाएँ भी हवनके लिये विहित हैं। उनकी मोटाई कनिष्ठिका अंगुलिके समान होनी चाहिये अथवा प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीपर्यन्त) लम्बी समिधाएँ उपयोगमें लानी चाहिये । यदि उपयुक्त समिधाएँ न मिलें तो जो मिल सकें, उन सबका ही हवन करना चाहिये ॥ २८-३० ॥

समिधा-हवनके बाद घीकी आहुति दे । घीकी धारा दूर्वादलके समान पतली और चार अंगुल लम्बी हो। उसके बाद अन्नकी आहुति देनी चाहिये, जिसका प्रत्येक ग्रास सोलह – सोलह माशेके बराबर हो । लावा, सरसों, जौ और तिल – इन सबमें घी मिलाकर यथासम्भव भक्ष्य, लेह्य और चोष्यका भी मिश्रण करे तथा इन सबकी यथाशक्ति दस, पाँच या तीन आहुतियाँ दे अथवा एक ही आहुति दे ॥ ३१ – ३३ ॥ स्रुवासे, समिधासे, स्रुक्से अथवा हाथसे आहुति देनी चाहिये। उसमें भी दिव्य तीर्थसे अथवा ऋषितीर्थसे आहुति देनेका विधान है; यदि उपर्युक्त सभी द्रव्य न मिलें तो किसी एक ही द्रव्यसे श्रद्धापूर्वक आहुति देनी चाहिये। प्रायश्चित्तके लिये मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तीन आहुतियाँ दे ॥ ३४-३५ ॥

फिर होमावशिष्ट घृतसे स्रुक्को भरकर उसके अग्रभागमें फूल रखकर उसे दर्भसहित अधोमुख स्रुवासे ढक दे। इसके बाद खड़ा हो उसे अंजलिमें लेकर ‘ओं नमः शिवाय वौषट्’ का उच्चारण करके
जौके तुल्य घीकी धाराकी आहुति दे ॥ ३६-३७ ॥ इस प्रकार पूर्णाहुति करके अग्निमें पूर्ववत् जलका छींटा दे। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवका विसर्जन करके अग्निकी रक्षा करे । फिर अग्निका भी विसर्जन करके भावनाद्वारा नाभिमें स्थापित करके नित्य यजन करे ॥ ३८१/२ ॥ अथवा शिवशास्त्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार वागीश्वरीके गर्भसे प्रकट हुए अग्निदेवको लाकर विधिवत् संस्कार करके उनका पूजन करे। फिर समिधाका आधान करके सब ओरसे परिधियोंका निर्माण करे। इसके बाद वहाँ दो-दो पात्र रखकर शिवका यजन करके प्रोक्षणीपात्रका शोधन करे । उस पात्रके जलसे पूर्वोक्त वस्तुओंका प्रोक्षण करके जलसे भरे हुए प्रणीतापात्रको ईशानकोणमें रखे । घीके संस्कार- तकका सारा कार्य करके स्रुक् और स्रुवाका संशोधन करे ॥ ३९–४२ ॥

तदनन्तर पिता शिवद्वारा माता वागीश्वरीके गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन – संस्कार [ की भावना ] करके प्रत्येक संस्कारके निमित्त पृथक् पृथक् आहुति दे और गर्भसे अग्निके उत्पन्न होनेकी भावना करे।

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उनके तीन पैर, सात हाथ, चार सींग और दो मस्तक हैं । मधुके समान पिंगल – वर्णवाले तीन नेत्र हैं। सिरपर जटाजूट और चन्द्रमाका मुकुट है ॥ ४३-४४ ॥ उनकी अंगकान्ति लाल है। लाल रंगके ही वस्त्र, चन्दन, माला और आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। सब लक्षणोंसे सम्पन्न, यज्ञोपवीतधारी तथा त्रिगुण मेखलासे युक्त हैं। उनके दायें हाथोंमें शक्ति, स्रुक् और स्रुवा है तथा बायें हाथोंमें तोमर, ताड़का पंखा और घीसे भरा हुआ पात्र है ॥ ४५-४६ ॥

इस आकृतिमें उत्पन्न हुए अग्निदेवका ध्यान करके उनका ‘जातकर्म’ संस्कार करे । तत्पश्चात् नालच्छेदन करके सूतककी शुद्धि करे । फिर आहुति देकर उस शिवसम्बन्धी अग्निका रुचि नाम रखे । इसके बाद माता-पिताका विसर्जन करके चूडाकर्म और उपनयन आदिसे लेकर आप्तोर्याम पर्यन्त संस्कार करे ।2 तत्पश्चात् घृतधारा आदिका होम करके स्विष्टकृत् होम करे  ॥ ४७ – ४९ ॥ इसके बाद ‘रं‘ बीजका उच्चारण करके अग्निपर जलका छींटा डाले। फिर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश, लोकेश्वरगण और उनके अस्त्रोंका सब ओर क्रमशः पूजन करके धूप, दीप आदिकी सिद्धिके लिये अग्निको अलग निकालकर कर्मविधिका ज्ञाता पुरुष पुनः घृतयुक्त पूर्वोक्त होम- द्रव्य तैयार करके अग्निमें आसनकी कल्पना (भावना) करे और उसपर पूर्ववत् महादेव और महादेवीका आवाहन, पूजन करके पूर्णाहुति पर्यन्त सब कार्य सम्पन्न करे ॥ ५०-५२१ / २ ॥

अथवा अपने आश्रमके लिये शास्त्र – विहित अग्निहोत्रकर्म करके उसे भगवान् शिवको समर्पित करे । शिवाश्रमी पुरुष इन सब बातोंको समझकर होमकर्म करे । इसके लिये दूसरी कोई विधि नहीं है । शिवाग्निका भस्म संग्रहणीय है। अग्निहोत्रकर्मका भस्म भी संग्रह करनेके योग्य है ॥ ५३-५४ ॥ वैवाहिक अग्निका भस्म भी जो परिपक्व, पवित्र एवं सुगन्धित हो, संग्रह करके रखना चाहिये । कपिला गायका वह गोबर, जो गिरते समय आकाशमें ही दोनों हाथोंपर रोक लिया गया हो, उत्तम माना गया है। वह यदि अधिक गीला वा अधिक कड़ा न हो, दुर्गन्धयुक्त और सूखा हुआ न हो तो अच्छा माना गया है। यदि वह पृथ्वीपर गिर गया हो तो उसमेंसे ऊपर और नीचेके हिस्सेको त्यागकर बीचका भाग ले ले ॥ ५५-५६ ॥

उस गोबरका पिण्ड बनाकर उसे शिवाग्नि आदिमें मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक छोड़ दे। जब वह पक जाय, तब उसे निकाल ले । उसमें जितना अधपका हो, उसको और जो भाग बहुत अधिक पक गया हो, उसको भी त्यागकर श्वेत भस्म ले ले और उसे घोटकर चूर्ण बना दे। इसके बाद उसे भस्म रखनेके पात्रमें रख दे। भस्मपात्र धातुका, लकड़ीका, मिट्टीका, पत्थरका अथवा और किसी वस्तुका बनवा ले। वह देखनेमें सुन्दर होना चाहिये। उसमें रखे हुए भस्मको धनकी भाँति किसी शुभ, शुद्ध एवं समतल स्थानमें रखे ॥ ५७–५९ ॥ प्रस्थानकालमें स्वयं या सेव्यके द्वारा भस्म ग्रहण करे । किसी अयोग्य या अपवित्रके हाथमें भस्म न दे। नीचे अपवित्र स्थानमें भी न डाले । नीचेके अंगोंसे उसका स्पर्श न करे । भस्मकी न तो उपेक्षा करे और न उसे लाँघे ही । शास्त्रोक्त समयपर उस पात्रसे भस्म लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अपने ललाट आदिमें लगाये। दूसरे समयमें उसका उपयोग न करे और न अयोग्य व्यक्तियोंके हाथमें उसे दे ॥ ६०-६१ ॥

भगवान् शिवका विसर्जन न हुआ हो, तभी भस्म- संग्रह कर ले; क्योंकि विसर्जनके बाद उसपर चण्डका अधिकार हो जाता है ॥ ६२ ॥ जब अग्निकार्य सम्पन्न कर लिया जाय, तब शिवशास्त्रोक्त मार्गसे अथवा अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिसे बलिकर्म करे । तदनन्तर अच्छी तरह लिपे – पुते मण्डलमें विद्यासनको बिछाकर विद्याकोशकी स्थापना करके क्रमशः पुष्प आदिके द्वारा यजन करे ॥ ६३-६४ ॥ विद्याके सामने गुरुका भी मण्डल बनाकर वहाँ श्रेष्ठ आसन रखे और उसपर पुष्प आदिके द्वारा गुरुकी पूजा करे । तदनन्तर पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करे और भूखों को भोजन कराये। इसके बाद स्वयं सुखपूर्वक शुद्ध अन्न भोजन करे ॥ ६५-६६ ॥

वह अन्न तत्काल भगवान् शिवको निवेदित किया गया हो अथवा उनका प्रसाद हो । उसे आत्मशुद्धिके लिये श्रद्धापूर्वक भोजन करे । जो अन्न चण्डको समर्पित हो, उसे लोभवश ग्रहण न करे । गन्ध और पुष्पमाला आदि जो अन्य वस्तुएँ हैं, उनके लिये भी यह विधि समान ही है अर्थात् चण्डका भाग होनेपर उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिये। वहाँ विद्वान् पुरुष ‘मैं ही शिव हूँ’ ऐसी बुद्धि न करे ॥ ६७-६८ ॥ भोजन और आचमन करके शिवका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए मूलमन्त्रका उच्चारण करे । शेष समय शिवशास्त्रकी कथाके श्रवण आदि योग्य कार्यों में बिताये । रातका प्रथम प्रहर बीत जानेपर मनोहर पूजा करके शिव और शिवाके लिये एक परम सुन्दर शय्या प्रस्तुत करे ॥ ६९-७० ॥

उसके साथ ही भक्ष्य, भोज्य, वस्त्र, चन्दन और पुष्पमाला आदि भी रख दे। मनसे और क्रियाद्वारा भी सब सुन्दर व्यवस्था करके पवित्र हो महादेवजी और महादेवीके चरणोंके निकट शयन करे। यदि उपासक गृहस्थ हो तो वह वहाँ अपनी पत्नीके साथ शयन करे । जो गृहस्थ न हों, वे अकेले ही सोयें ॥ ७१-७२ ॥ उषःकाल आया जान सर्वप्रथम मूलमन्त्रका आवर्तन करे और मन-ही-मन पार्वतीदेवी तथा पार्षदोंसहित अविनाशी भगवान् शिवको प्रणाम करके देशकालोचित कार्य तथा शौच आदि कृत्य पूर्ण करे । फिर यथाशक्ति शंख आदि वाद्योंकी दिव्य ध्वनियोंसे महादेव और महादेवीको जगाये। इसके बाद उस समय खिले हुए परम सुगन्धित पुष्पोंद्वारा शिवा और शिवकी पूजा करके पूर्वोक्त कार्य आरम्भ करे ॥ ७३–७५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें अग्निकार्यवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

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