शिवमहापुराण — कोटिरुद्रसंहिता — अध्याय 16
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
कोटिरुद्रसंहिता
सोलहवाँ अध्याय
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंगके प्राकट्यका वर्णन

ऋषि बोले — हे सूतजी ! आप व्यासजीकी कृपासे सब कुछ जानते हैं; इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथा सुनकर हमें तृप्ति नहीं हो रही है । अतः हे प्रभो ! हमलोगोंपर विशेषरूपसे अतुलनीय कृपा करके अब आप तीसरे ज्योतिर्लिंगका वर्णन कीजिये ॥ १—२ ॥

सूतजी बोले— हे ब्राह्मणो! आप श्रीमानोंकी संगति प्राप्तकर मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया; क्योंकि सज्जनोंकी संगति धन्य होती है। अतः मैं इसे अपना सौभाग्य मानकर पवित्र, पापका नाश करनेवाली तथा दिव्य कथाको कहूँगा; आपलोग आदरपूर्वक सुनिये ॥ ३—४ ॥ शिवजीको प्रिय, परमपुण्यमयी, संसारको पवित्र करनेवाली तथा समस्त प्राणियोंको मुक्ति देनेवाली मनोहर अवन्ती नामक [एक प्रसिद्ध ] नगरी है ॥ ५ ॥ वहाँपर शुभ आचरणमें तत्पर, वेदाध्ययन करनेवाले तथा नित्य वैदिक अनुष्ठानमें निरत एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। वे ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र करते और शिवपूजामें संलग्न रहते थे; वे प्रतिदिन पार्थिव लिंगका पूजन करते थे ॥ ६—७ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


उन वेदप्रिय ब्राह्मणने सारे कर्मोंका फल प्राप्तकर भलीभाँति ज्ञानपरायण होकर अन्तमें सज्जनोंकी गति प्राप्त की । हे मुनीश्वरो ! उनके चारों पुत्र भी उसी प्रकार शिवपूजामें तत्पर तथा सदा माता — पिताकी आज्ञा माननेवाले थे। उनमें सबसे बड़ा देवप्रिय, उसके बाद प्रियमेधा, तीसरा सुकृत नामवाला और चौथा धर्मनिष्ठ सुव्रत था ॥ ८—१० ॥ उनके पुण्यप्रतापसे पृथ्वीपर सुख बढ़ रहा था । जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ता है, उसी प्रकार उनके सुखदायक गुण भी वहाँ निरन्तर बढ़ रहे थे । उस समय वह नगरी ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो गयी ॥ ११—१२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! इसी बीच वहाँ जो उत्तम घटना घटी, उसे सुनिये; जैसा कि मैंने सुना है, वैसा कह रहा हूँ ॥ १३ ॥

रत्नमालपर्वतपर दूषण नामक एक महान् असुर रहता था। धर्मसे द्वेष करनेवाला वह महाबलवान् दैत्यराज ब्रह्माजीके वरदानसे जगत् को तुच्छ समझता था। उसने देवगणोंको पराजितकर उन्हें उनके स्थानसे निकाल दिया ॥ १४—१५ ॥ उस दुष्टने पृथ्वीपर सभी प्रकारके वेदधर्मों तथा स्मृतिधर्मोंको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे सिंह खरगोशोंको नष्ट कर देता है । जितने भी वेदधर्म थे, उन सबको उसने नष्ट कर दिया और प्रत्येक तीर्थ तथा क्षेत्रसे धर्मको दूर हटा दिया ॥ १६—१७ ॥

एकमात्र रम्य अवन्ती नगरी ही दिखायी दे रही है’, [जहाँ वैदिक धर्म अभी प्रतिष्ठित है ] — ऐसा विचारकर उसने जो किया, उसे आप लोग सुनें ॥ १८ ॥ उस महान् असुर दूषणने बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको उद्देश्य करके चढ़ाई कर दी । वहाँ आकर विप्रद्रोही एवं महाखल उस दैत्येन्द्रने अपने चार दैत्यश्रेष्ठ सेनापतियोंको बुलाकर यह वचन कहा—॥ १९—२० ॥

दैत्य बोला— ये दुष्ट ब्राह्मण मेरी आज्ञाका पालन क्यों नहीं करते हैं? अतः मेरे विचारसे वेदधर्ममें तत्पर ये सब दण्डके योग्य हैं ॥ २१ ॥ हे दैत्यसत्तमो ! मैंने संसारमें सभी देवताओं तथा राजाओंको पराजित कर दिया है; क्या इन ब्राह्मणोंको वशमें नहीं किया जा सकता है ? ॥ २२ ॥ यदि ये लोग जीना चाहते हैं, तो शिवधर्म तथा वेदोंके परम धर्मका त्यागकर सुख प्राप्त करें; अन्यथा इनके जीवित रहनेमें संशय हो जायगा, मैं यह सत्य कहता हूँ, तुमलोग निःशंक होकर इस कार्यको करो ॥ २३—२४ ॥

सूतजी बोले— इस प्रकार विचारकर वे चारों दैत्य चारों दिशाओंमें प्रलयकालीन अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे। तब दैत्योंके इस प्रयासको सुनकर भी उस समय शिवध्यानपरायण उन ब्राह्मणोंको कुछ भी दुःख नहीं हुआ ॥ २५—२६ ॥ उस समय वे ब्राह्मण शिवध्यानसे रेखामात्र भी विचलित नहीं हुए और धैर्य धारण किये रहे ; शिवजीके आगे वे बेचारे दैत्य क्या हैं ! इसी बीच वह उत्तम नगरी दैत्योंसे व्याप्त हो गयी । तब उन दैत्योंसे पीड़ित सभी लोग ब्राह्मणोंके पास आये ॥ २७—२८ ॥

लोग बोले— हे स्वामियो ! अब क्या करना चाहिये; वे दुष्ट आ गये हैं, उन्होंने बहुत से लोगोंको मार डाला, इसलिये हमलोग आपके पास आये हैं ॥ २९ ॥

सूतजी बोले— उन लोगोंकी यह बात सुनकर शिवमें सदा विश्वास करनेवाले वे ब्राह्मण वेदप्रियके पुत्र उन लोगोंसे कहने लगे—॥ ३० ॥

ब्राह्मण बोले— आपलोग सुनिये, हमारे पास दुष्टों को भय देनेवाला सैन्यबल नहीं है और न शस्त्र ही हैं, जिससे हम उन्हें पराजित कर सकें ॥ ३१ ॥ सामान्य व्यक्तिका आश्रय लेनेपर भी मनुष्यका अपमान नहीं होता; फिर हमलोग तो सर्वसमर्थ शिवजीके आश्रित हैं, हमारा अपमान ये असुर किस प्रकार कर सकते हैं! ॥ ३२ ॥ अतः भगवान् शिव ही असुरोंके भयसे हमारी रक्षा करेंगे। भक्तवत्सल सदाशिवको छोड़कर संसारमें अब हमें कोई शरण देनेवाला नहीं है ॥ ३३ ॥

सूतजी बोले— इस प्रकार वे ब्राह्मण धैर्य धारणकर भलीभाँति पार्थिव — पूजनकर शिवजीके ध्यानमें तत्पर रहे। उसी समय उस बलवान् दूषण दैत्यने उन ब्राह्मणोंको देखा और यह वचन कहा — इनको मारो, इनका वध कर दो। किंतु शिवके ध्यानमें परायण उन वेदप्रियके पुत्रोंने उस दैत्यके द्वारा कहा गया वचन नहीं सुना ॥ ३४—३५ ॥ उसके बाद ज्यों ही उस दुष्टात्माने उन ब्राह्मणोंको मारना चाहा, तभी उस पार्थिवके स्थानपर शब्द करता हुआ एक गड्ढा हो गया ॥ ३६ ॥ उस गड्ढेसे विकटरूपधारी, महाकाल नामसे विख्यात, दुष्टोंका संहार करनेवाले एवं सज्जनोंको गति देनेवाले शिवजी प्रकट हो गये ॥ ३७ ॥

‘अरे दुष्ट ! [ मैं महाकाल हूँ और ] तुम्हारे जैसे दुष्टोंके लिये महाकालरूपमें प्रकट हुआ हूँ; तुम इन ब्राह्मणोंके समीपसे दूर भाग जाओ’ – ऐसा कहकर महाकाल शंकरने हुंकारमात्रसे ही सैन्यसहित उस दूषणको शीघ्र भस्म कर दिया ॥ ३८—३९ ॥ उन्होंने कुछ सैनिकोंको मार डाला और कुछ सेना भाग गयी। उन परमात्मा शिवने वहींपर दूषणका वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्यको देखकर अन्धकार पूर्ण रूपसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार शिवको देखकर उसकी सेना विनष्ट हो गयी ॥ ४० — ४१ ॥ उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और फूलोंकी वर्षा होने लगी । ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता वहाँपर उपस्थित हो गये । ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर लोककल्याण करनेवाले उन भगवान् शंकरको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति की ॥ ४२—४३ ॥ तब महाकालरूपधारी स्वयं महेश्वरने प्रसन्न होकर उन ब्राह्मणोंको आश्वस्त करके उनसे कहा – ‘वर माँगिये’। तब यह सुनकर वे सभी ब्राह्मण हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर भक्तिपूर्वक शिवजीको प्रणाम करके कहने लगे ॥ ४४—४५ ॥

द्विज बोले— हे महाकाल ! हे महादेव ! दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हे प्रभो ! हे शम्भो ! हे शिव! आप हमें संसारसागरसे मुक्ति दीजिये। हे शिव ! हे शम्भो ! हे प्रभो! आप संसारकी रक्षाके लिये यहीं पर निवास करें और अपने दर्शन करनेवाले मनुष्योंका आप सदा उद्धार कीजिये ॥ ४६—४७ ॥

सूतजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर शिवजी उन्हें सद्गति प्रदानकर भक्तोंके रक्षार्थ उस परम सुन्दर गर्तमें स्थित हो गये ॥ ४८ ॥ इस प्रकार वे ब्राह्मण मुक्त हो गये और वहाँ चारों दिशाओंमें एक कोस परिमाणवाला स्थान लिंगरूपी शिवजीका कल्याणमय क्षेत्र हो गया ॥ ४९ ॥ तभीसे महाकालेश्वर नामक शिव पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। हे द्विजो ! उनका दर्शन करनेसे स्वप्नमें भी कोई दुःख नहीं होता है। जो मनुष्य जिस—जिस कामनाकी अपेक्षा करके उस लिंगकी उपासना करता है, वह उस मनोरथको प्राप्त कर लेता है और परलोकमें मोक्ष भी प्राप्त करता है । हे सुव्रतो ! महाकालकी उत्पत्ति तथा उनका माहात्म्य — मैंने कह दिया; अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ ५०–५२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें महाकाल — ज्योतिर्लिंग— माहात्म्यवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

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