शिवमहापुराण — कोटिरुद्रसंहिता — अध्याय 11
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
कोटिरुद्रसंहिता
ग्यारहवाँ अध्याय
उत्तरदिशामें विद्यमान शिवलिंगोंके वर्णन — क्रममें चन्द्रभाल एवं पशुपतिनाथलिंगका माहात्म्य — वर्णन

ऋषिगण बोले— हे महाभाग ! हे सूतजी ! शिवजीमें आसक्त चित्तवाले आप धन्य हैं, जो कि आपने महाबलेश्वर लिंगकी यह अद्भुत कथा हमें सुनायी । अब उत्तर दिशामें स्थित जो शिवलिंग हैं, उनका पापनाशक निर्मल माहात्म्य आप सुनायें ॥ १—२ ॥

सूतजी बोले — हे ब्राह्मणो ! मैं उत्तर दिशामें विराजमान मुख्य—मुख्य शिवलिंगोंके माहात्म्यका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ; आपलोग आदरपूर्वक सुनिये ॥ ३ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


गोकर्ण नामक एक दूसरा भी पापनाशक क्षेत्र है; वहाँपर एक पवित्र तथा अति विस्तृत महावन है ॥ ४ ॥ वहाँपर चन्द्रभाल नामक उत्तम तथा सर्वसिद्धि— दायक शिवलिंग है, जिसे रावण सद्भक्तिपूर्वक लाया था। हे मुनीश्वरो ! वहाँपर उस करुणासागर शिवलिंगकी स्थिति सारे संसारके हितके लिये वैद्यनाथ नामक ज्योतिलिंगके तुल्य है ॥ ५—६ ॥ गोकर्णमें स्नानकर तथा चन्द्रभालका पूजनकर मनुष्य अवश्य ही शिवलोकको प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ भक्तोंके ऊपर स्नेह करनेवाले उन चन्द्रभाल नामक शिवकी महिमा बड़ी अद्भुत है; विस्तारसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है । चन्द्रभाल नामक महादेवके लिंगकी महती महिमाका वर्णन मैंने जिस — किसी प्रकार कर दिया; अब दूसरे लिंगका माहात्म्य सुनिये ॥ ८—९ ॥

मिश्रर्षि (मिसरिख) नामक उत्तम तीर्थमें दाधीच नामक शिव—लिंग है, जिसे दधीचिमुनिने परम प्रीतिपूर्वक स्थापित किया था। वहाँ जाकर उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नानकर दाधीचेश्वर शिवलिंगका आदरपूर्वक पूजन अवश्य ही करना चाहिये ॥ १०—११ ॥ तीर्थयात्राका फल शीघ्र प्राप्त करनेकी इच्छावालोंको शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये वहाँपर विधिपूर्वक दधीचिकी मूर्तिका पूजन करना चाहिये ॥ १२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और इस लोकमें सभी सुख भोगकर परलोकमें सद्गति प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

नैमिषारण्यमें सभी ऋषियोंद्वारा स्थापित ऋषीश्वर नामक सुखदायक शिवलिंग है । हे मुनीश्वरो ! उसके दर्शन एवं पूजनसे पापी लोगोंको भी इस लोकमें भोग तथा परलोकमें मोक्ष प्राप्त होता है ॥ १४—१५ ॥ हत्याहरण तीर्थमें पापोंको दूर करनेवाला तथा करोड़ों हत्याओंका नाश करनेवाला शिवलिंग है, उसकी विशेष रूपसे पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ देवप्रयागतीर्थमें ललितेश्वर नामक शिवलिंग है, उस लिंगकी हमेशा पूजा करनी चाहिये, जिससे सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं ॥ १७ ॥ पृथिवीपर प्रसिद्ध नेपाल नामक पुरीमें पशुपतीश्वर नामक शिवलिंग है, जो सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करता है । वह शिवलिंग शिरोभागमात्रसे वहाँ स्थित है, उसकी कथा केदारेश्वरवर्णनके प्रसंगमें कहूँगा ॥ १८—१९ ॥ उसके समीप मुक्तिनाथ नामक अत्यन्त अद्भुत शिवलिंग है, उसके दर्शन एवं अर्चनसे भोग तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥

हे मुनीश्वरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे चारों दिशाओंमें स्थित शिवलिंगोंका उत्तम वर्णन किया; अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ २१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें चन्द्रभालपशुपतिनाथलिंगमाहात्म्य— वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

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