शिवमहापुराण — उमासंहिता — अध्याय 45
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
उमासंहिता
पैंतालीसवाँ अध्याय
भगवती जगदम्बाके चरितवर्णनक्रममें सुरथराज एवं समाधि वैश्यका वृत्तान्त तथा मधु-कैटभके वधका वर्णन

मुनिगण बोले- हे सूतजी ! हमलोगोंने अनेक आख्यानोंसे युक्त मनोहर शिवकथा सुनी, जो अनेक अवतारोंसे सम्बन्धित तथा मनुष्योंको मुक्ति एवं भुक्ति देनेवाली है । हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ! अब हमलोग आपसे भगवती जगदम्बाके मनोहर चरित्रको सुनना चाहते हैं । परब्रह्म महेश्वरकी जो सनातनी आद्या शक्ति हैं, वे उमा नामसे विख्यात हैं । वे ही त्रिलोकीको उत्पन्न करनेवाली पराशक्ति हैं । उनके दक्षकन्या सती तथा हैमवती पार्वती- ये दो अवतार हमने सुने । हे महामते सूतजी ! अब आप उनके अन्य अवतारोंका वर्णन कीजिये ॥ १-४ ॥ उन श्रीमाताके गुणोंका श्रवण करनेसे भला कौन बुद्धिमान् विरत होना चाहेगा, [जबकि ] ज्ञानीलोग भी उनके गुणानुवाद-श्रवणका त्याग नहीं करते ॥ ५ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


सूतजी बोले- आप सभी महात्मा धन्य एवं कृतकृत्य हैं, जो सर्वदा पराम्बा भगवती पार्वतीका महान् चरित्र पूछते हैं ॥ ६ ॥ मुनियोंने जगदम्बाका चरित्र पूछनेवालों, सुननेवालों तथा पढ़नेवालोंके चरणकमलोंकी धूलिको ही तीर्थ कहा है। जिन लोगोंका चित्त परमसंवित्स्वरूपिणी श्रीदेवीके चिन्तनमें लीन रहता है, वे धन्य हैं, कृतकृत्य हैं और उनकी जननी तथा कुल भी धन्य हैं ॥ ७-८ ॥ जो लोग समस्त कारणोंकी कारणभूता जगदम्बाकी स्तुति नहीं करते हैं, वे मायाके गुणोंसे मोहित और भाग्यहीन ही रहते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥ जो करुणारसकी सिन्धुस्वरूपा महादेवीका भजन नहीं करते, वे संसाररूपी घोर अन्धकूपमें पड़ते हैं ॥ १० ॥ जो मनुष्य देवीको छोड़कर दूसरे देवताओंकी शरण लेता है, वह मानो गंगाजीको छोड़कर मरुस्थलके जलाशयके पास जाता है ॥ ११ ॥ जिनके स्मरणमात्रसे चारों पुरुषार्थ [ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] बिना परिश्रमके प्राप्त हो जाते हैं, उन देवीका कौन श्रेष्ठ पुरुष त्याग करेगा ? पूर्व समयमें महात्मा सुरथने मेधा ऋषिसे यही पूछा था, तब मेधाने जो कहा था, उसीको मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनिये ॥ १२-१३ ॥

पहले स्वारोचिष मन्वन्तरमें विरथ नामक राजा हुआ था, उसका पुत्र सुरथ महाबली एवं पराक्रमशाली था । वह दानमें निपुण, सत्यवादी, अपने धर्ममें कुशल, सफल, देवीभक्त, दयासागर और प्रजापालक था ॥ १४-१५ ॥ इन्द्रके समान तेजसम्पन्न वह राजा जब पृथ्वीका शासन कर रहा था, उस समय नौ राजा ऐसे थे, जो उसका राज्य लेनेको उद्यत हो गये । उन्होंने उस राजाकी कोला नामक राजधानी को घेर लिया और उनके साथ [सुरथका] भयंकर संग्राम हुआ। उन महाबली शत्रुओंने युद्धमें उस राजाको पराजित कर दिया और उसका सारा राज्य छीनकर उसे कोलापुरीसे बाहर निकाल दिया ॥ १६-१८ ॥ वह राजा अपनी पुरीमें आकर अपने मन्त्रियोंके साथ राज्य करने लगा, किंतु वहाँ भी उसके प्रबल शत्रुओंने उसे पराजित कर दिया । दैवयोगसे शत्रुता करके उसके मन्त्री आदि प्रमुख सहायकोंने कोषमें जो भी धन स्थित था, वह सब स्वयं ले लिया ॥ १९-२० ॥

इसके बाद असहाय वह राजा आखेटके बहाने घोड़ेपर चढ़कर घने वनमें चला गया ॥ २१ ॥ वहाँ इधर-उधर भटकते हुए उस राजाने किसी मुनिके उत्तम आश्रमको देखा, जो चारों ओरसे पुष्प- वाटिकाओंसे सुशोभित था, वेदध्वनिसे गुंजित, शान्त जन्तुओंसे परिव्याप्त और उनके शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्योंसे सभी ओरसे घिरा हुआ था ॥ २२-२३ ॥ हे महामते ! उन द्विजवरके प्रभावसे उस आश्रममें महाबलवान् व्याघ्र आदि जन्तु निर्बल जन्तुओंको पीड़ा नहीं पहुँचाते थे ॥ २४ ॥ वहाँपर परम दयालु तथा बुद्धिमान् राजा मुनिवर्यके द्वारा मधुर वचन, भोजन, आसन, पान आदिसे सत्कृत होकर निवास करने लगा ॥ २५ ॥

एक समय वह राजा अत्यधिक चिन्तामग्न होकर सोचने लगा। आश्चर्य है कि मुझ भाग्यहीन, बुद्धिहीन एवं निस्तेजका सम्पूर्ण राज्य मदोन्मत्त शत्रुओंने छीन लिया । मेरे पूर्वजोंसे रक्षित राज्यका उपभोग इस समय शत्रु कर रहे हैं ॥ २६-२७ ॥ इस चैत्रवंशमें मेरे जैसा [ अभागा ] कोई राजा नहीं हुआ। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और किस प्रकार अपना राज्य प्राप्त करूँ ? ॥ २८ ॥ जो मेरे परम्परागत अमात्य तथा मन्त्री थे, वे इस समय न जाने किस राजाका आश्रय लेकर निवास करते होंगे। वे इस राज्यका विनाश करके न जाने अब किस गतिको प्राप्त हुए होंगे। युद्धभूमिमें महान् उत्साहवाले एवं शत्रुवर्गका छेदन करनेवाले मेरे जो महान् शूरवीर थे, वे दूसरे राजाके आश्रयमें होंगे। पर्वतके समान हाथियों और वायुके समान वेगशाली घोड़ों तथा पहलेके पूर्वजोंद्वारा अर्जित मेरे कोषकी रक्षा वे इस समय करते होंगे अथवा नहीं। इस प्रकार विचार करता हुआ वह परम धार्मिक राजा मोहके वशीभूत हो गया ॥ २९–३२ ॥

इसी बीच कोई वैश्य वहाँ आया । राजाने उससे पूछा- तुम कौन हो ? और किसलिये यहाँ आये हो? ॥ ३३ ॥ इस समय तुम इतने दुखी क्यों दिखायी पड़ रहे हो, इसे मुझे बताओ। राजाके द्वारा कहे गये इस मनोहर वचनको सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ समाधि अपने नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ प्रेम और विनययुक्त वाणीमें राजासे कहने लगा—॥ ३४-३५ ॥

वैश्य बोला- हे महीपते ! मैं धनियोंके वंशमें उत्पन्न समाधि नामक वैश्य हूँ; मेरे स्त्री- पुत्र आदिने धनलोभके कारण मेरा त्याग कर दिया है ॥ ३६ ॥ हे राजन्! अपने [पूर्वकृत ] कर्मसे दुःखित होकर मैं इस वनमें आया हूँ। हे करुणासागर! हे प्रभो ! मैं अपने पुत्रों, पौत्रों, स्त्रियों, भाइयों, भतीजों एवं अन्य सुहृदोंका कुशल भलीभाँति नहीं जान पा रहा हूँ ॥ ३७-३८ ॥

राजा बोला – दुराचारी तथा धनके लोभी जिन पुत्र आदिने तुम्हें [ घरके बाहर ] निकाल दिया, उनसे तुम मूर्ख प्राणीके समान प्रीति क्यों करते हो ? ॥ ३९ ॥

वैश्य बोला— हे राजन् ! आपने सचमुच सारगर्भित बात कही है, किंतु स्नेहपाशसे जकड़े रहनेके कारण मेरा मन अत्यन्त मोहग्रस्त हो रहा है ॥ ४० ॥

[सूतजी बोले- ] हे मुनिश्रेष्ठ ! तदुपरान्त इस प्रकार मोहसे व्याकुल राजा एवं वैश्य दोनों ही मुनिवर सुमेधाके पास गये । वैश्यवरसहित उस प्रतापी महाधैर्यशाली राजाने सिर झुकाकर योगिराजको प्रणाम किया ॥ ४१-४२ ॥ उसके अनन्तर राजाने हाथ जोड़कर मुनिसे यह वचन कहा—हे भगवन् ! इस समय आप हम दोनोंका संशय दूर करनेकी कृपा कीजिये। मैं अपनी राज्यलक्ष्मीसे त्यक्त होकर इस गहन वनमें आया हूँ, तथापि राज्यके अपहरण हो जानेके कारण मुझे शान्ति नहीं है । यह वैश्य भी अपने कुटुम्बियोंद्वारा घरसे निकाल दिया गया है, फिर भी इसकी ममता दूर नहीं हो रही है । इसमें क्या कारण है, उसे कहिये, जानकार होते हुए भी हम दोनोंका मन मोहसे व्याकुल हो गया है, यह तो महान् मूर्खता है ! ॥ ४३ – ४६ ॥

ऋषि बोले – हे राजन् ! वे जगद्धात्री शक्तिरूपा सनातनी महामाया ही सबके मनको आकृष्टकर मोहमें डाल देती हैं ॥ ४७ ॥ हे प्रभो ! ब्रह्मा आदि समस्त देवता भी जिनकी मायासे मोहित होकर परमतत्त्वको नहीं जान पाते, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या ? ॥ ४८ ॥ वे त्रिगुणा परमेश्वरी सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न करती हैं, वे ही उसका पालन करती हैं और वे ही फिर समय प्राप्त होनेपर उसका विनाश भी करती हैं ॥ ४९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! वरदायिनी एवं कामरूपिणी वे देवी जिसके ऊपर प्रसन्न होती हैं, वही मोहका अतिक्रमण करता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ५० ॥

राजा बोला – वे देवी महामाया कौन हैं, जो सभीको मोहित कर देती हैं, वे देवी किस प्रकार उत्पन्न हुईं ? हे मुने! कृपाकर मुझसे कहिये ॥ ५१ ॥

ऋषि बोले- जगत् के एकार्णव हो जानेपर जब योगिराज विष्णु योगनिद्राका आश्रय लेकर शेषशय्यापर सो रहे थे, उस समय विष्णुके कानोंके मलसे दो दैत्य उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ नामसे भूतलपर प्रसिद्ध हुए। वे प्रलयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी, भयानक, विशाल शरीरवाले, बड़ी ठोढ़ीवाले और दाढ़ोंके कारण विकराल मुखवाले थे, ऐसा प्रतीत होता था कि वे सभी लोकोंका भक्षण कर जायँगे ॥ ५२–५४ ॥ उस समय भगवान्‌के नाभिकमलपर ब्रह्माजीको स्थित देखकर वे दोनों दैत्य उन्हें मारनेको उद्यत हुए और कहने लगे- ‘तुम कौन हो ? ‘ ॥ ५५ ॥ उस समय उन दोनों दैत्योंको देखकर तथा विष्णुको क्षीरसागरमें शयन करते हुए जानकर ब्रह्माजी परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥

ब्रह्मोवाच ।
रक्षरक्ष महामाये शरणागतवत्सले ।
एताभ्यां घोररूपाभ्यां दैत्याभ्यां जगदम्बिके ॥ ५७ ॥
प्रणमामि महामायां योगनिद्रामुमां सतीम् ।
कालरात्रिं महारात्रिं मोहरात्रिं परात्पराम् ॥ ५८ ॥
त्रिदेवजननीं नित्यां भक्ताभीष्टफलप्रदाम् ।
पालिनीं सर्वदेवानां करुणावरुणालयम् ॥ ५९ ॥
त्वत्प्रभावादहं ब्रह्मा माधवो गिरिजापतिः ।
सृजत्यवति संसारं काले संहरतीति च ॥ ६० ॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्विमला मता ।
तुष्टिः पुष्टिस्त्वमेवाम्ब शान्तिः क्षान्तिः क्षुधा दया ॥ ६१ ॥
विष्णु माया त्वमेवाम्ब त्वमेव चेतना मता ।
त्वं शक्तिः परमा प्रोक्ता लज्जा तृष्णा त्वमेव च ॥ ६२ ॥
भ्रान्तिस्त्वं स्मृतिरूपा त्वं मातृरूपेण संस्थिता ।
त्वं लक्ष्मीर्भवने पुंसां पुण्याक्षरप्रवर्तिनाम् ॥ ६३ ॥
त्वं जातिस्त्वं मता वृत्तिर्व्याप्तिरूपा त्वमेव हि ।
त्वमेव चित्तिरूपेण व्याप्य कृत्स्नं प्रतिष्ठिता ॥ ६४ ॥
सा त्वमेतौ दुराधर्षावसुरौ मोहयाम्बिके ।
प्रबोधय जगद्योने नारायणमजं विभुम् ॥ ६५ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे महामाये ! हे शरणागतवत्सले ! हे जगदम्बे ! घोर रूपवाले इन दोनों दैत्योंसे रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ ५७ ॥ मैं महामाया, योगनिद्रा, उमा, सती, कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि, परात्परा, तीनों देवताओंकी जननी, नित्या, भक्तोंको अभीष्ट फल देनेवाली, समस्त देवोंका पालन करनेवाली तथा करुणासागररूपिणी देवीको प्रणाम करता हूँ ॥ ५८-५९ ॥ [हे देवि !] आपके प्रभावसे मैं ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव इस जगत्का सृजन, पालन तथा समय प्राप्त होनेपर संहार करते हैं ॥ ६० ॥ हे अम्ब! आप ही स्वाहा, स्वधा, लज्जा तथा निर्मल बुद्धि कही गयी हैं, आप ही तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, क्षान्ति, क्षुधा और दया हैं ॥ ६१ ॥ हे अम्ब! आप ही विष्णुमाया और चेतना कही गयी हैं। आप ही परमाशक्ति, लज्जा एवं तृष्णा कही गयी हैं ॥ ६२ ॥

आप भ्रान्ति तथा स्मृति हैं एवं मातृरूपसे स्थित हैं । आप ही पुण्य आचारमें संलग्न मनुष्योंके घरमें लक्ष्मीरूपसे स्थित हैं ॥ ६३ ॥ आप ही जाति तथा वृत्ति कही गयी हैं । आप ही व्याप्तिरूपा हैं । आप ही चित्तिरूपसे सारे संसारमें व्याप्त होकर स्थित हैं ॥ ६४ ॥ हे अम्बिके! हे जगद्योने ! आप इन दोनों अजेय दैत्योंको मोहित कीजिये और अजन्मा तथा सर्वव्यापी नारायणको जगाइये ॥ ६५ ॥

ऋषि बोले- हे नृप ! ब्रह्माजीके द्वारा प्रार्थित वे महाविद्या, जगद्धात्री, समस्त विद्याओंकी अधिदेवता भगवती मधु-कैटभका नाश करनेहेतु फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को प्रकट हुईं, वे तीनों लोकोंको मोहित करनेवाली शक्ति महाकाली – इस नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥ ६६-६७ ॥ तब आकाशवाणी हुई- ‘ हे ब्रह्मदेव ! तुम भयभीत मत होओ, मैं युद्धमें मधु-कैटभका वधकर आज तुम्हारा दुःख दूर करूँगी ‘ – ऐसा कहकर वे महामाया विष्णुके नेत्र एवं मुख आदिसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके समक्ष स्थित हो गयीं ॥ ६८-६९ ॥ उसके बाद देवदेव जनार्दन हृषीकेश [निद्रासे] उठे और उन्होंने अपने सामने मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्योंको देखा ॥ ७० ॥

तब उन दोनोंके साथ महातेजस्वी विष्णुका युद्ध आरम्भ हो गया, पाँच हजार वर्षपर्यन्त बाहुयुद्ध हुआ । उसके अनन्तर महामायाके प्रभावसे मोहित हुए दोनों दैत्य श्रेष्ठ विष्णुसे बोले – आप मनोवांछित वर ग्रहण कीजिये ॥ ७१-७२ ॥

नारायण बोले— यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि मैं स्वयं तुम दोनोंका वध कर सकूँ, मैं तुम दोनोंसे अन्य वर नहीं माँगता हूँ ॥ ७३ ॥

ऋषि बोले- तब सभी ओरसे जलमग्न पृथ्वीकी ओर देखकर उन दोनोंने विष्णुसे यह वचन कहा— जहाँ पृथ्वीपर जल न हो, उस स्थानपर आप हम दोनोंका वध कीजिये ॥ ७४ ॥  ‘ ऐसा ही होगा’ – यह कहकर भगवान् ने अपना अत्यन्त देदीप्यमान चक्र उठाकर उन दोनों दैत्योंको अपनी जंघापर रखकर उनके सिर काट दिये ॥ ७५ ॥ हे राजन् ! हे महामते ! इस प्रकार मैंने आपसे कालिकाकी उत्पत्ति कह दी, अब महालक्ष्मीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनिये ॥ ७६ ॥ निर्विकार तथा निराकार होनेपर भी वे भगवती उमा देवगणोंका दुःख दूर करनेके लिये युग-युगमें शरीर धारणकर प्रकट होती हैं ॥ ७७ ॥ अपनी इच्छाके अनुसार देह धारण करना उन भगवतीका इच्छावैभव कहा गया है और वे भी लीलासे इसलिये शरीर धारण करती हैं कि भक्त उनके गुणोंका गान करते रहें ॥ ७८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत पाँचवीं उमासंहितामें महाकालिकावतारवर्णन नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥

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