वस्त्र धारण तथा भविष्य
सामान्यतः वस्त्र सुन्दर एवं आकर्षक दिखने एवं अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली दिखाने हेतु धारण किए जाते हैं। रंग, आकृति एवं स्वरुप की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति की पसन्द भिन्न-भिन्न हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र मेम क्रमशः देव, मनुष्य एवं राक्षस गण होते हैं। इसके अतिरिक्त वास्तु शास्त्र में आठ दिशाओं तथा ब्रह्मस्थल का विशेष महत्त्व होता है। इसी प्रकार वस्त्र में उक्त आठ दिशाओं एवं ब्रह्मस्थल के आधार पर तीनों गणों का निवास होता है। इस तीनों गणों के निवास स्थान को निर्धारित करने हेतु सर्वप्रथम वस्त्र को नौ समान भागों में विभाजित किया जाना चाहिए। वस्त्र की चारों कोण-दिशाओं (ईशान, आग्नेय, नैऋत्य तथा वायव्य) में देवता का निवास मानें तथा पूर्व-पश्चिम एवं ब्रह्मस्थल में राक्षस का तथा उत्तर एवं दक्षिण दिशा में मनुष्य का निवास मानें।
उपर्युक्त आधार एवं अन्य सामान्य आधार पर वस्त्र धारण से सम्बन्धित शुभाशुभ फलों का वर्णन किया जाता है।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण किया जाए तथा उसके कुछ समय उपरान्त ही यदि स्याही, कीचड़, गोबर आदि से वस्त्र गन्दा हो जाए, तो ऐसे व्यक्ति को अनिष्ट की आशंका रहती है। जिस कार्य हेतु नवीन वस्त्र धारण किया गया हो, वह निष्फल हो जाता है।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण के उपरान्त गोदुग्ध, मधु, केसर, चणदन आदि का दाग लग जाए, तो इसे शुभ एवं अनुकूल माना गया है।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण के एक या दो दिन उपरान्त या कुछ घंटों उपरान्त किसी भी कारणवश फट जाए, तो वस्त्रधारक हेतु अशुभ संकेत समझना चाहिए।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण के उपरान्त वस्त्र राक्षस भागों पर से कट या फट जाए, तो वस्त्रधारक को रोगादि कारणों से मृत्युतुल्य कष्ट की आशंका रहती है।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण के उपरान्त मनुष्य भागों से कट या फट जाए, तो वस्त्रधारक को शीघ्र ही पुत्रसुख प्राप्त होता है तथा वैभवशाली पदार्थों की प्राप्ति होती है।
॰ यदि नवीन वस्त्र धारण के उपरान्त देवता-दिशाओं (ईशान, आग्नेय, नैऋत्य तथा वायव्य) में कट या फट जाए, तो वस्त्रधारक को धन, ऐश्वर्य, वैभव, सम्मान एवं भोगों की प्राप्ति होती है। किन्तु यदि फटने की आकृति मांसाहारी काग, कबूतर, उल्लू, मेंढक, गधा, ऊँट, सर्प आदि के समान हो तो वस्त्रधारक को मृत्युतुल्य कष्ट की आशंका रहती है तथा धननाश भी संभव है।
॰ यदि वस्त्र धारण के उपरान्त मनुष्य एवं राक्षस भाग से कट या फट जाए तथा उपर्युक्त वर्णित आकृतियों का निर्माण हो, तो वस्त्रधारक को अनेक प्रकार की व्याधियों से पीड़ा मिलती है तथा अपमान व तिरस्कार सहन करना पड़ता है।
॰ यदि वस्त्र धारण के उपरान्त तीनों भागों देवता, मनुष्य तथा राक्षस से फट जाए, तो वस्त्रधारक को अत्यधिक अनिष्ट का सामना करना पड़ता है।
॰ यदि वस्त्र धारण के उपरान्त राक्षस भाग से फट जाए तथा छत्र, ध्वज, स्वस्तिक, बिल्वफल, बेल, कलश, कमल या तोरण आदि आकृति बने तो वस्त्रधारक को लक्ष्मी प्राप्ति, पद वृद्धि, सम्मान और अन्य सभी प्रकार के अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं।
॰ यदि वस्त्र धारण करते समय वस्त्र का दाहिना भाग जल जाए या फट जाए, तो वस्त्रधारक को शारीरिक पीड़ाओं का अनुभव होता है।
॰ यदि वस्त्र धारण करते समय वस्त्र का बाएँ भाग से जल जाए या फट जाए, तो वस्त्रधारक को किसी आत्मीयजन को मृत्युतुल्य कष्ट की आशंका रहती है तथा अत्यधिक मानसिक कष्ट उठाना पड़ता है।
॰ यदि वस्त्र धारण करते समय वस्त्र मध्य भाग से जल जाए या फट जाए, तो वस्त्रधारक को शारीरिक कष्ट, धननाश तथा अपमान की आशंका रहती है।

नवीन वस्त्र धारण मुहूर्तः-
हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, अश्विनी, धनिष्ठा तथा रेवती नक्षत्र, गुरुवार, शुक्रवार तथा बुधवार ये दिन एवं वृष, मिथुन, कन्या और मीन लग्न स्त्रियों के लिए नवीन वस्त्रधारण करने के लिए शुभ हैं। पुरुषों को नवीन वस्त्र धारण हेतु उक्त नक्षत्रों के अतिरिक्त पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी तथा तीनों उत्तरा नक्षत्र भी शुभ माने गये हैं।

नक्षत्रानुसार वस्त्रधारण के फलः-
॰ यदि व्यक्ति अश्विनी, पुष्य, उत्तरा-फाल्गुनी, चित्रा, धनिष्ठा, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती नक्षत्रों में वस्त्र धारण करता है, तो ऐसे व्यक्तियों को शुभ एवं अनुजूल फलों की प्राप्ति होती है। धनार्जन हेतु उक्त नक्षत्रों में वस्त्र धारण करना शुभ एवं अनुकूल फलदायक होता है
॰ यदि व्यक्ति रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त नक्षत्र में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो उसे अपने कार्यक्षेत्र में सफलता एवं उन्नति प्राप्त होती है। किसी विशेष प्रयोजन हेतु यदि वस्त्र धारण किया गया हो, तो प्रयोजन अवश्य सिद्ध होता है।
॰ यदि व्यक्ति विशाखा एवं अनुराधा नक्षत्रों में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो उसको समाज एवं राज्य क्षेत्र में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त प्रेम प्रसंगों में प्रगाढ़ता आती है।
॰ यदि व्यक्ति उत्तराषाढ़ा एवं स्वाती नक्षत्र में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो ऐसे व्यक्तियों का समय आमोद-प्रमोद में व्यतीत होता है तथा मनोरंजक यात्राओं के अवसर प्राप्त होते हैं, जिनमें इनको उत्तम भोजन एवं मित्रों की प्राप्ति होती है।
॰ यदि व्यक्ति भरणी, कृत्तिका, ज्येष्ठा, आश्लेषा, मूल आदि में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो धारण किया गया वस्त्र आकस्मिक रुप से नष्ट हो जाता है।
॰ यदि व्यक्ति आर्द्रा, मघा एवं शतभिषा में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो जल, विष से भय रहता है और रोगादि कारणों से मृत्युतुल्य कष्ट पाता है।
॰ यदि व्यक्ति मृगशिरा, पूर्वाफल्गुनी एवं पूर्वाभाद्रपद में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो जल, विषैले एवं हिंसक जीवों से कष्ट मिलता है, राज्यपक्ष से दण्ड एवं हानि की आशंका रहती है।
॰ यदि व्यक्ति पूर्वाषाढ़ा या श्रवण में नवीन वस्त्र धारण करता है, तो शारीरिक रोगों से कष्ट होता है।

॰ वैधृति और सब योग जिनके पीछे `पात’ आता हो या तिथि 4, 9, 14 या फिर अमावस हो, तो उस दिन नया वस्त्र पहनना शुभ नहीं होगा। आमतौर पर नया वस्त्र शुक्रवार को पहनना अति शुभ होता है। इसके अलावा रविवार व बृहस्पतिवार को नए वस्त्र धारण करना शुभ होता है, सोमवार को मध्यम शुभ होता है किन्तु मंगल या शनिवार को नया वस्त्र पहनना अशुभता का सूचक है। यदि वस्त्र हैंडलूम का है और बुनकर या चरखे से बना है, तो इसे शुक्र, गुरु, सोम और रविवार को पहनना चाहिए। यदि अश्विनी, पुष्य, कृतिका, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा व ज्येष्ठा नक्षत्रों में यही दिन पड़ें तो और भी शुभ होगा। हैंडलूम का कपड़ा या वस्त्र यदि शादी आदि शुभ अवसरों पर पहनना हो, तो उसे एक बार धोकर ही पहनना शुभ होता है।
यदि आपके वस्त्रों का रंग सफेद है तो शुक्र, गुरु, बुधवार को निम्न नक्षत्र देख कर पहनें। हस्त, अश्विनी, पुष्य, रोहिणी, उत्तरा वाले सभी नक्षत्र, चित्रा, स्वाति, विशाखा, धनिष्ठा, पुनर्वसु व रेवती। स्त्री हो या पुरुष, इन नक्षत्रों में सफेद वस्त्र पहनकर अपने लिए प्रकृति से शुभता ग्रहण करते हैं।
लाल रंग का वस्त्र गुरु, शुक्र व मंगलवार को अश्विनी, धनिष्ठा, हस्त, चित्रा, विशाखा और अनुराधा नक्षत्र हो तो पहनना शुभ होता है। पीले रंग का वस्त्र रोहिणी, तीनों उत्तरा नाम के नक्षत्र, हस्त, अश्विनी, पुष्य, विशाखा, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा, चित्रा और पुष्य नक्षत्रों में बुध, गुरु या रविवार को पहनना शुभकारक होता है। यदि पीले व लाल रंग का मिश्रण हो, तो भी इन्हीं नक्षत्रों व वारों में पहना जा सकता है। नीले वस्त्र धारण करने के लिए शनि और रविवार का दिन उपयुक्त माना गया है। इन दिनों में नक्षत्र पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, धनिष्ठा, हस्त, चित्रा, स्वाति विशाखा, पुनर्वसु, भरणी हो, तो नीला वस्त्र धारण करना शुभ होगा।
ऊनी वस्त्र केवल रवि, शुक्र और शनिवारों को हस्त, चित्रा, स्वाती विशाखा, धनिष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वा व उत्तराषाढ़, पूर्वा व उत्तराभाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी और रेवती नक्षत्रों को पहनना श्रेयस्कर होता है। महिलाओं को खास तौर पर उपरोक्त शुभ अवसरों व नक्षत्रों के साथ-साथ, नए वस्त्र धारण करने के समय उदित लग्न का भी ध्यान रखना चाहिए जैसे मेष, कर्क, तुला, मकर, धनु, कन्या के मीन लग्न हों, तो नए वस्त्र पहनने से उनके तेज का विस्तार होगा और कांति में वृद्धि होगी।
अश्विनी नक्षत्र में नए वस्त्र धारण करने से और नए वस्त्रों की प्राप्ति होती है। रोहिणी में धन की प्राप्ति होती है। पुनर्वसु में पहना वस्त्र हर तरह से शुभ का प्रतीक होता है। पुष्य व उत्तराफाल्गुनी में धन लाभ होता है। हस्त नक्षत्रों में पहने वस्त्र आपके कार्य सिद्ध करता है। स्वाति में उत्तम भोजन की प्राप्ति होती है। विशाखा में नवीन वस्त्र पहनने से प्रियजनों को प्यार-दुलार प्राप्त होता है। अनुराधा में मित्रों से समागम का लाभ होता है। उत्तराषाढ़ में मिष्ठान्न व भोजन प्राप्त होता है। धनिष्ठा में पहना वस्त्र घर के अन्न की वृद्धि करता है, उत्तरा भाद्रपद में पुत्रलाभ होता है और रेवती नक्षत्र में नवीन वस्त्र पहनने से रत्नों की प्राप्ति होती है।

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