भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १५२ से १५६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १५२ से १५६
ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति एवं वर-प्राप्ति

सुमन्तु मुनि बोले — राजन् ! भगवान् सूर्य की भक्ति, पूजा और उनके लिये दान करना तथा हवन करना सबके वश की बात नहीं है तथा उनकी भक्ति और ज्ञान एवं उसका अभ्यास करना भी अत्यन्त दुर्लभ है । फिर भी उनके पूजन-स्मरण से इसे प्राप्त किया जा सकता है । सूर्य-मन्दिर में सूर्य की प्रदक्षिणा करने से वे सदा प्रसन्न रहते हैं । सूर्यचक्र बनाकर पूजन एवं सूर्यनारायण का स्तोत्र-पाठ करनेवाला व्यक्ति इच्छित फल एवं पुण्य तथा विषयों का परित्याग कर भगवान् सूर्य में अपने मन को लगा देनेवाला मनुष्य निर्भीक होकर उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त कर लेता है ।om, ॐराजा शतानीक ने पूछा — द्विजश्रेष्ठ ! मुझे भगवान् सूर्य की पूजन-विधि सुनने की बड़ी ही अभिलाषा है । मैं आपके ही मुख से सुनना चाहता हूँ । कृपाकर कहिये कि सूर्य की प्रतिमा स्थापित करने से कौन-सा पुण्य और फल प्राप्त होता है तथा मार्जन करने और गन्ध आदि के लेपन से किस पुण्य की प्राप्ति होती है । आरती, नृत्य, मङ्गल-गीत आदि कृत्यों के करने से कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है । अर्घ्यदान, जल एवं पञ्चामृत आदि से स्नान, कुश, रक्त पुष्प, सुवर्ण, रत्न, गन्ध, चन्दन, कपूर आदि के द्वारा पूजन, गन्धादि-विलेपन, पुराण-श्रवण एवं वाचन, अव्यङ्ग-दान और व्योमरूप में भगवान् सूर्य तथा अरुण की पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है, वह बतलाने की कृपा करें ।सुमन्तु मुनि बोले — राजन् ! प्रथम आप भगवान् सूर्य के महनीय तेज के विषय में सुनें । कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मादि देवगण अहंकार के वशीभूत हो गये । तमरूपी मोह ने उन्हें अपने वश में कर लिया । उसी समय उनके अहंकार को दूर करने के लिये एक महनीय तेज प्रकट हुआ, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त हो गया । अन्कार-नाशक तथा सौ योजन विस्तारयुक्त वह तेजःपुञ्ज आकाश में भ्रमण कर रहा था । उसका प्रकाश पृथ्वी पर कमल की कर्णिका की भाँति दिखलायी दे रहा था । यह देख ब्रह्मादि देवगण परस्पर इस प्रकार विचार करने लगे — हमलोगों का तथा संसार का कल्याण करने के लिये ही यह तेज प्रादुर्भूत हुआ है । यह तेज कहाँ से प्रादुर्भूत हुआ, इस विषय में वे कुछ न जान सके और इस तेज ने सभी देवगण को आश्चर्यचकित कर दिया । तेजाधिपति उन्हें दिखाया भी नहीं पड़े । ब्रह्मादि देवताओं ने उनसे पूछा — देव ! आप कौन हैं, कहाँ हैं, यह तेज की कैसी शक्ति है ? हम सभी लोग आपका दर्शन करना चाहते हैं । उनकी प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान् सूर्यनारायण अपने विराट्-रूप में प्रकट हो गये । उस महनीय तेजःस्वरुप भगवान् भास्कर की देवगण पृथक्-पृथक् वन्दना करने लगे ।

“नमस्ते देवदेवेश सहस्त्रकिरणोज्वल ।
नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ ॥
भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः ।
विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे ॥
नमस्ते पञ्चकालाय इन्द्राय वसुरेतसे ।
खगाय लोकनाथाय एकचक्ररथाय च ॥
जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे ।
तमोघ्नाय सुरूपाय तेजसां निधये नमः ॥
अर्थाय कामरूपाय धर्मायामिततेजसे ।
मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय नमो नमः ॥
क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतवे ।
शुभाय शुभरूपाय शुभदाय शुभात्मने ॥
शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु वै नमः।
नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्मणाय नमो नमः ।
ब्रह्मदेवाय ब्रह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने ।
ब्रह्मणे च प्रसादं वै कुरु देव जगत्पते ॥”
(ब्राह्मपर्व १५३ । ५०-५७)

‘देवदेवेश ! आप सहस्रों किरणों से प्रकाशमान हैं । कोणवल्लभ ! आप संसार के लिये दीपक हैं, आपको नमस्कार । अन्तरिक्ष में स्थित होकर सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करनेवाले भगवान् भास्कर, विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम, काल, इन्द्र, वसु, अग्नि, खग, लोकनाथ तथा एकचक्र वाले रथ से युक्त—ऐसे नामों वाले आपको नमस्कार है । आप अमित तेजस्वी एवं संसार के कल्याण तथा मङ्गलकारक हैं, आपका सुन्दर रूप अन्धकार को नष्ट करनेवाला है, आप तेज की निधि हैं, आपको नमस्कार है । आप धर्मादि चतुर्वर्गस्वरूप हैं तथा अमित तेजस्वी हैं, क्रोध-लोभ से रहित हैं. संसार की स्थिति में कारण हैं, आप शुभ एवं मङ्गलस्वरूप हैं तथा शुभ एवं मङ्गल के प्रदाता हैं, आप परम शान्तस्वरूप हैं तथा ब्राह्मण एवं ब्रह्मरूप हैं, ऐसे हे परब्रह्म परमात्मा जगत्पते ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, आपको नमस्कार है ।’
ब्रह्माजी के बाद शिवजी ने महातेजस्वी सूर्यनारायण को प्रणामकर उनकी स्तुति की —

“जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर ।
जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर ॥
जय लोकप्रदीपाय जय भानो जगत्पते ।
जय कालजयानन्त संवत्सर शुभानन ॥
जय देवादितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन ।
तमोघ्न जय सप्तेश जय सप्ताश्ववाहन ॥
ग्रहेश जय कान्तीश जय कालेश शङ्कर ।
अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद ॥
जय वेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै नमः ।
सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च ॥
क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय ।
कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे ॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्माय वै जय ।
जयोंकार वषट्कार स्वाहाकार स्वधामय ॥
जयाश्वमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च ।
संसारार्णवपीताय मोक्षद्वारप्रदाय च ॥
संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते ।
हस्तावलम्बनो देव भव त्वं गोपतेऽद्भुत ॥”
(ब्राह्मपर्व १५३ । ६०-६८)

‘विश्व की स्थिति के कारण-स्वरूप भगवान् सूर्यदेव ! आपकी जय हो । अजेय, हंस, दिवाकर, महाबाहु, भूधर, गोचर, भाव, खग, लोकप्रदीप, जगत्पति, भानु, काल, अनन्त, संवत्सर तथा शुभानन ! आपकी जय हो । कश्यप के आनन्दवर्धन, अदितिपुत्र, सप्ताश्ववाहन, सप्तेश, अन्धकारको दूर करनेवाले, ग्रहों के स्वामी, कान्तीश, कालेश, शंकर, धर्मादि चतुर्वर्ग के स्वामी ! आपकी जय हो । वेदाङ्गरूप, ग्रहरूप, सत्यरूप, सुरूप, क्रोधादि के विनाशक, कल्माष-पक्षिरूप तथा यतिरूप ! आपकी जय हो । प्रभो ! आप विश्वरूप, विश्वकर्मा, ओंकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा स्वधारूप हैं और आप ही अश्वमेधरूप, अग्नि एवं अर्यमारूप हैं, संसाररूपी सागर से मोक्ष दिलाने वाले हे जगत्पते ! मैं संसार-सागर में डूब रहा है, मुझे अपने हाथ का अवलम्बन दीजिये, आपकी जय हो ।’

भगवान् विष्णु ने सूर्यनारायण को श्रद्धा और भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी स्तुति की —

“नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् ।
दिवाकरं रविं भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥
इन्द्रं विष्णुं हरिं हंसमर्कं लोकगुरुं विभुम् ।
त्रिनेत्रं त्र्यक्षरं त्र्यङ्गं त्रिमूर्तिं त्रिगतिं शुभम् ॥
षण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः ।
चतुर्विंशतिपादाय नमो द्वादशपाणये ॥
नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः ।
देवानां पतये नित्यं वर्णानां पतये नमः ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः ।
त्वं सोमस्त्वं तथादित्यस्त्वमोंकारक एव हि ॥
बृहस्पतिर्बुधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः ।
यमस्त्वं वरुणस्त्वं हि नमस्ते कश्यपात्मज ॥
त्वया ततमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
त्वत्त एव समुत्पन्नं सदेवासुरमानुषम् ॥
ब्रह्मा चाहं च रुद्रश्च समुत्पन्नो जगत्पते ।
कल्पादौ तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ॥
नमस्ते वेदरूपाय अहोरूपाय वै नमः ।
नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः ॥
प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोज्ज्वल ।
संसारार्णवमग्नानां प्रसादं कुरु गोपते ।
वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥
(ब्राह्मपर्व १५३ । ७१-८०)

‘भूतभावन देवदेवेश ! आप दिवाकर, रवि, भानु, मार्तण्ड, भास्कर, भग, इन्द्र, विष्णु, हरि, हंस, अर्क — इन रूपों में प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है । लोकगुरो ! आप विभु, त्रिनेत्रधारी, त्र्क्षरात्मक, त्र्यङ्गात्मक, त्रिमूर्ति, त्रिगति हैं, आप छः मुख, चौबीस पाद तथा बारह हाथवाले हैं, आप समस्त लोकों तथा प्राणियों के अधिपति हैं, देवताओं तथा वर्णों के भी आप ही अधिपति हैं, आपको नमस्कार है । जगत्स्वामिन् ! आप ही ब्रह्मा, रुद्र, प्रजापति, सोम, आदित्य, ओंकार, बृहस्पति, बुध, शुक्र, अग्नि, भग, वरुण, कश्यपात्मज हैं । आपसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, देवता, असुर तथा मानव आदि सभी आपसे ही उत्पन्न हैं, अनघ ! कल्प के आरम्भ में संसार की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के लिये ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उत्पन्न हुए है, आपको नमस्कार है । प्रभो ! आप ही वेद-रूप, दिवसस्वरूप, यज्ञ एवं ज्ञानरूप हैं । किरणोज्ज्वल ! भूतेश ! गोपते ! संसार में निमग्न हुए हमपर आप प्रसन्न होइये, आप वेदान्त एवं यज्ञ-कलात्मक रूप हैं, आपकी जय हो, आपको नित्य नमस्कार हैं ।

ब्रह्मादि देवताओं की स्तुति से भगवान् सूर्य बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव को अपनी अखण्ड भक्ति तथा अपना अनुग्रह प्राप्त करने का वर प्रदान करते हुए कहा — हे विष्णो ! आप देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि सभी पर विजय प्राप्त कर अजेय रहेंगे । सम्पूर्ण संसार का पालन करते हुए आपकी मेरे ऊपर अचल भक्ति बनी रहेगी । ब्रह्मा भी इस जगत् की सृष्टि करने में समर्थ होंगे और मेरे प्रसाद से शंकर भी इस संसार का संहार कर सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है । मेरी पूजा के फलस्वरूप आपलोग ज्ञानियों में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर लेंगे ।

भगवान् सूर्य के इन वचनों को सुनकर महादेव जी बोले — भगवन् ! हमलोग आपकी आराधना किस प्रकार करें, उसे आप बतायें । हमें आपकी परम पूजनीय मूर्ति तो दिखायी नहीं दे रही है, केवल प्रकाशक आकृति और मात्र तेज ही दिखायी पड़ रहा है, यह तेज आकार-विहीन होने के कारण हृदय में स्थान नहीं पा रहा है । जबतक मन किसी विषय-वस्तु में नहीं लगता, तबतक किसी भी व्यक्ति की भक्ति या इच्छा उस विषय-वस्तु को प्राप्त करने की नहीं होती । जबतक भक्ति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक पूजन आदि करने में कोई भी समर्थ नहीं होगा । इसलिये आप साकार-रूप में प्रकट हों, जिससे कि हमलोग उस साकार रूप का पूजन-अर्चन कर सिद्धि प्राप्त करने में समर्थ हो जायँ ।

भगवान् सूर्य ने कहा — महादेवजी ! आपने बड़ी अच्छी बात पूछी है — आप दत्तचित्त होकर सुनें । इस जगत् में मेरी चार प्रकार की मूर्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण संसार को व्यवस्थित करती हुई सृजन, पालन, पोषण तथा संहार आदि में प्रत्येक समय संलग्न रहती हैं । मेरी प्रथम मूर्ति राजसी मूर्ति है, जो ब्राह्मी शक्ति के नाम से प्रसिद्ध है, वह कल्प के आदि में संसार की सृष्टि करती है । द्वितीय सात्त्विकी मूर्ति विष्णुस्वरूपिणी है, जो संसार का पालन और दुष्टों का विनाश करती है । तृतीय मूर्ति तामसी है, जो भगवान् शंकर के नाम से विख्यात है, वह हाथ में त्रिशूल धारण किये कल्प के अन्त में विश्व-सृष्टि का संहार करती है । मेरी चतुर्थ मूर्ति सत्त्वादि गुणों से अतीत तथा उत्तम है, वह स्थित रहते हुए भी दिखायी नहीं पड़ती । उस अदृश्य शक्ति के द्वारा यह समस्त संसार विस्तार को प्राप्त हुआ है । ओंकार ही मेरा स्वरूप है । यह सकल तथा निष्कल और साकार एवं निराकार दोनों रूपों में है । यह सम्पूर्ण संसार में व्याप्त रहते हुए भी सांसारिक कर्म-फलों से लिप्त नहीं रहती, जल में पद्मपत्र की भाँति अलिप्त रहती है । यह प्रकाश आपलोगों के अज्ञान को दूर करने तथा संसार में प्रकाश करने के लिये उत्पन्न हुआ है । आपलोग मेरे इस अस्पृष्ट (निर्लिप्त) रूप की आराधना करे ।

कल्प के अन्त में मेरे आकाशरूप में सभी देवताओं का लय हो जाता है । उस समय केवल आकाशरूप ही रहता है( अन्य पुराणों तथा सांख्य, वेदान्त आदि दर्शनों के अनुसार आकाश का मनस्तत्त्व में मन का अहंतत्त्व में और अहं का महत्तत्त्व में, महत्तत्त्व का अव्यक्त-तत्त्व में और अव्यक्त का सत्-तत्त्व में लय होता है, जो संकल्प-विकल्प में शून्य होता है और पुनः सृष्टि के समय सत्-तत्त्व में कलना के साथ अव्यक्त, महत्, मन, अहंकार के बाद आकाश की उत्पत्ति होती है । । पुनः मुझसे ही ब्रह्मादि देवगण तथा चराचर उत्पन्न होते हैं । हे त्रिलोचन ! मैं सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हूँ । इसलिये मेरे व्योमरूप की आराधना आपसहित ब्रह्मा, विष्णु भी करें । त्रिलोचन ! आप गन्धमादन पर दिव्य सहस्र वर्षों तक तपस्या करके परम शुभ षडङ्ग-सिद्धि को प्राप्त करें । जनार्दन ! आप मेरे व्योमरूप  योगवसिष्ठ में सबको व्योम के ही अन्तर्गत स्थित मानकर हृद-व्योम-उपासना (दहर-उपासना)-का निर्देश है और ‘आकाशस्तल्लिङ्गात्’ इस सूत्र में आकाश शब्द का अर्थ परमात्मा माना गया है। की श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना कलापग्राम में निवास कर करें । जगत्पति ब्रह्मा भी अन्तरिक्ष में जाकर लोकपावन पुष्कतीर्थ में मेरी आराधना करें । इस प्रकार आराधना करने के पश्चात् कदम्ब के समान गोलाकार, रश्मिमाला से युक्त मेरी मूर्ति का आपलोग दर्शन करेंगे ।

इस प्रकार सूर्यनारायण के वचन को सुनकर भगवान् विष्णु ने उन्हें प्रणाम कर कहा — देव ! हम सभी लोग उत्तम सिद्धि प्राप्त करने के लिये आपके परम तेजस्वी व्योमरूप का पूजन-अर्चन कर किस विधि से आराधना करें । परमपूजित ! कृपया आप उस विधि को बतलाकर मुझ सहित ब्रह्मा और शिव पर दया कीजिये, जिससे हमलोगों को परम सिद्धि प्राप्त होने में कोई विप्न-बाधा न पहुँच सके ।

भगवान् सूर्य बोले — देवताओं में श्रेष्ठ वासुदेव ! आप शान्त-चित्त होकर सुनिये । आपका प्रश्न उचित ही है । मेरे अनुपम व्योमरूप की आपलोग आराधना करें । मेरी पूजा मध्याह्नकाल में भक्तिपूर्वक सदैव करने से इच्छित भक्ति की प्राप्ति हो जाती है । भगवान् सूर्य के इस वाक्य को सुनकर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रणामकर कहा — देव ! आप धन्य हैं, हमलोगों को आपने अपने तेज से प्रकाशित किया है, हमलोग कृतकृत्य हो गये । आपके दर्शनमात्र से ही सभी लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ है तथा तम, मोह, तन्द्रा आदि सभी क्षणमात्र में ही दूर हो गये हैं । हमलोग आपके ही तेज़ प्रभाव से उत्पत्ति, पालन और संहार करते हैं । अब आप व्योम के पूजन-विधि को बताने की कृपा करें ।

भगवान् आदित्य ने कहा — आपलोग सत्य ही कह रहे हैं, जो मैं हूँ वही आपलोग भी हैं, अर्थात् आपलोगों के स्वरूप में मैं ही स्थित हूँ । अहंकारी, विमूढ, असत्य, कलह से युक्त लोगों के कल्याण के लिये तथा आपलोगों के अधिकार अर्थात् तम-मोहादि की निवृत्ति के लिये मैंने तेजोमय स्वरूप प्रकट किया, इसलिये अहंकार, मान, दर्प आदि का परित्याग कर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक निरन्तर आपलोग मेरी आराधना करें । इससे मेरे सकल-निष्कल उत्तम स्वरूप का दर्शन प्राप्त होगा और मेरे दर्शन से सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जायेंगी । इतना कहकर सहस्रकिरण भगवान् सूर्य देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये । भगवान् भास्कर के तेजस्वी रूप का दर्शनकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव सभी आश्चर्यचकित होकर परस्पर कहने लगे — ‘ये तो अदिति पुत्र सूर्यनारायण हैं । ये महातेजस्वी लोकों को प्रकाशित करनेवाले सूर्यनारायण हैं, इन्होंने हम सभी लोगों को महान् अन्धकाररूपी तम से निवृत्त किया है । हम अपने-अपने स्थान पर चलकर इनकी पूजा करें, जिससे इनके प्रसाद से हमें सिद्धि प्राप्त हो सके ।’

उस व्योमरूप की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन करने के लिये ब्रह्माजी पुष्करक्षेत्र में, भगवान् विष्णु शालग्राम में और वृषध्वज शंकर गन्धमादन पर्वत पर चले गये । वहाँ मान, दर्प तथा अहंकार का परित्याग कर ब्रह्माजी चार कोण से युक्त व्योम की, भगवान् विष्णु चक्र में अङ्कित व्योम की और शिव अग्निरूपी तेज से अभिभूत व्योमवृत्त की सदा भक्तिपूर्वक पूजा करने लगे । ब्रह्मादि देवता गन्ध, माला, नृत्य, गीत आदि से दिव्य सहस्र वर्षों तक सूर्यनारायण की पूजाकर उनकी अचल भक्ति और प्रसन्नता-प्राप्ति के लिये उत्तम तपस्या में तत्पर हो गये ।

सुमन्तु मुनि बोले — महाराज ! देवताओं के पूजन से प्रसन्न हो वे एक रूप से ब्रह्मा के पास, एक रूप से शंकर के पास तथा एक रूप से विष्णु के पास गये एवं अपने चतुर्थ रूप से रथारूढ़ हो आकाश में स्थित रहे । भगवान् सूर्य ने अपने योगबल से पृथक्-पृथक् उन्हें दर्शन दिया । दिव्य रथ पर आरूढ़ सूर्यदेव ने अपने अद्भुत योगबल से देखा कि चतुर्मुख ब्रह्माजी कमलमुख व्योम की पूजा में अत्यन्त श्रद्धा-भक्ति से नतमस्तक हैं । यह देखकर ब्रह्माजी से भगवान् सूर्यदेव ने कहा — ‘सुरश्रेष्ठ ! देखो, मैं वर देने के लिये उपस्थित हूँ । यह सुनकर ब्रह्माजी हर्ष से प्रफुल्लित हो उठे और हाथ जोड़कर उनके कमलमुख को देखकर अति विनम्र भाव से प्रणाम कर प्रार्थना करने लगे —
‘देवेश ! आप प्रसन्न हैं तो मेरे ऊपर कृपा कीजिये । देव ! आपके अतिरिक्त मेरे लिये अन्य कोई गति नहीं है ।’

भगवान् सूर्य बोले — जैसा आप कह रहे हैं, उसमें विचार करने की कोई बात नहीं है । आप कारण-रूप से मेरे प्रथम पुत्र के रूप में उत्पन्न हों । अब आप वर माँगिये, मैं वर देने के लिये ही आया हूँ ।

ब्रह्माजी ने कहा — भगवन् ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, तो मुझे उत्तम वर दें, जिससे मैं सृष्टि कर सकूँ ।

भगवान् आदित्य ने कहा — जगत्पति चतुर्मुख ब्रह्मन् ! आपको मेरे प्रसाद से सिद्धि प्राप्त हो जायगी और आप इस जगत् के सृष्टिकर्ता होंगे ।

ब्रह्माजी ने कहा — जगन्नाथ ! मेरा निवास किस स्थान पर होगा ।

भगवान् सूर्य बोले — जिस स्थान पर मेरा महद्-व्योमपृष्ठ शृंग से युक्त उतम रूप रहेगा, वहीं कदम्ब-रूप में आप नित्य स्थित रहेंगे । पूर्व दिशा में इन्द्र, अग्निकोण में शाण्डिलीसुत अग्नि, दक्षिण में यम, नैर्ऋत्यकोण में निर्ऋति, पश्चिम में वरुण और वायव्यकोण में वायु तथा उत्तर दिशा में कुबेर का निवास रहेगा । ईशानकोण में शंकर और आपका तथा मध्य में विष्णु का निवास रहेगा ।

ब्रह्माजी ने कहा — देव ! आज मैं कृतकृत्य हो गया, जो कुछ भी मुझे चाहिये, वह सब प्राप्त हो गया ।

सुमन्तु मुनि बोले — राजन् ! इस प्रकार भगवान् आदित्य ब्रह्माजी को वर प्रदान कर उनके साथ गन्धमादन पर्वत पर गये, वहाँ उन्होंने देखा— भूत-भावन शिव तीव्र तपस्या में संलग्न हैं । वे तेज से युक्त व्योम का पूजन कर रहे हैं । इस प्रकार शिव द्वारा पूजन-अर्चन को देखकर भगवान् भास्कर प्रसन्न हो गये ।

सूर्यभगवान् ने कहा —
भीम ! मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ । वत्स ! वर माँगो ! मैं वर देने के लिये उपस्थित हूँ । इसपर महादेवञी ने साष्टाङ्ग प्रणाम कर स्तुति की और कहा — ‘देव ! आप मुझपर कृपा करें । आप जगत्पति हैं । संसार का उद्धार करनेवाले हैं । मैं आपके अंश से आपके पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ हूँ, आप वही करें जो एक पिता अपने पुत्र के लिये करता हैं ।’ यह वचन सुनकर भगवान सूर्य बोले — ‘शंकर ! जो तुम कह रहे हो, उसमें कोई भी संदेह नहीं हैं । मेरे ललाट से तुम पुत्र-रूप में उत्पन्न हुए हो । जो तुम्हारे मन में हो यह वर माँगो ।’

महादेवजी ने कहा — भगवन् ! यदि आप मेरे ऊपर संतुष्ट हैं तो मुझे अपनी अचल भक्ति प्रदान करें, जिससे यक्ष, गन्धर्व, देव, दानव आदि पर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ और युग के अन्त में प्रजा का संहार कर सकूँ । देव ! मुझे उत्तम स्थान प्रदान करें । भगवान् सूर्य ने ‘ऐसा ही होगा’ कहकर कहा कि इसी प्रकार तुम मेरे परम व्योमरूप की पूजा प्रतिदिन करते रहो और यही परम तेजस्वी व्योम तुम्हारा शस्त्र–त्रिशूल होगा ।

सुमन्तु मुनि बोले — महाराज ! तदनन्तर भगवान् सूर्य भगवान् विष्णु को वर देने शालग्राम (मुक्तिनाथ-क्षेत्र) गये । वहाँ उन्होंने देखा कि वे कृष्णाजिन धारणकर शान्त्तचित्त हो परम उत्कृष्ट तप कर रहे हैं और हृदय में भगवान् सूर्य का ध्यान कर रहे हैं । भगवान् भास्कर ने अति प्रसन्न होकर कहा — ‘विष्णो ! मैं आ गया हूँ, मुझे देखो । भगवान् विष्णु ने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा — ‘जगन्नाथ ! आप मेरी रक्षा करें । मेरे ऊपर दया करें । मैं आपका द्वितीय पुत्र हूँ । पिता अपने पुत्र पर जैसी कृपादृष्टि रखता है, उसी प्रकार आप भी मेरे ऊपर दया-दृष्टि बनाये रखें ।’

भगवान् सूर्य बोले — महाबाहो ! मैं तुम्हारी श्रद्धाभक्ति से संतुष्ट हो गया हूँ । जो कुछ भी इच्छा हो, माँग लो । मैं वर प्रदान करने के लिये ही आया हूँ ।

विष्णु भगवान् ने कहा — भगवन् ! मैं आज कृतकृत्य हो गया । मेरे समान कोई भी धन्य नहीं है, क्योंकि आप संतुष्ट होकर मुझे स्वयं वर देने आ गये । आप अपनी अचल भक्ति और शत्रु को पराजित करने की शक्ति मुझे प्रदान करें तथा जैसे मैं संसार का पालन कर सकूँ ऐसा वर प्रदान करें । मुझे इस प्रकार का स्थान दें जिससे कि मैं सभी लोकों में यशस्वी, बल, वीर्य, यश और सुख से सम्पन्न हो सकूँ ।

भगवान् सूर्य बोले — ‘तथास्तु’ महाबाहो ! तुम ब्रह्मा के छोटे और शिव के बड़े भ्राता हो, तुम्हें सभी देवता नमस्कार करेंगे । तुम मेरे परम भक्त और परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारी मुझमें अचल भक्ति रहेगी । जिस व्योमरूप का तुमने अर्चन किया है, यह व्योम ही तुम्हारे लिये चक्ररूप में अस्त्र-शस्त्र का कार्य करेगा । यह सभी आयुधों मे उत्तम एवं दुष्टों का विनाशक है । समस्त लोक इसे नमस्कार करते हैं ।

सुमन्तु मुनि बोले — राजन् ! इस प्रकार भगवान् भास्कर भगवान् विष्णु को वर प्रदानकर अपने लोक को चले गये और ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर ने भगवान् सूर्यनारायण की पूजाकर सृष्टि, पालन और संहार करने की शक्ति प्राप्त की । यह आख्यान अति पवित्र, पुण्य और सभी प्रकार के पापों का नाशक है । यह तीन देवों का उपाख्यान हैं और तीन देवता इस लोक में पूजित हैं । यह तीन स्तोत्रों से युक्त तथा धर्म, अर्थ और काम का साधन है । यह धर्म, स्वर्ग, आरोग्य, धन-धान्य को प्रदान करनेवाला है । जो व्यक्ति इस आख्यान को प्रतिदिन सुनता है अथवा जो इन तीन स्तोत्रों का पाठ करता है, वह आग्नेय विमान पर आरूढ़ होकर भगवान् सूर्य के परमपद को प्राप्त कर लेता है । पुत्रहीन पुत्र, निर्धन धन, विद्यार्थी विद्या प्राप्त कर तेज में सूर्य के समान, प्रभा में उनके किरणों के समान हो जाता है और अनन्तकाल तक सुख भोग कर ज्ञानियों में उत्तम स्थान को प्राप्त करता है ।
(अध्याय १५२-१५६)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

17. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २४ से २६

18. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २७

19. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २८

20. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २९ से ३०

21. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३१

22. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३२

23. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३३

24. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३४

25. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३५

26. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३६ से ३८

27. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३९

28. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४० से ४५

29. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४६

30. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४७

31. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४८

32. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४९

33. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५० से ५१

34. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५२ से ५३

35. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५४

36. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५५

37. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५६-५७

38. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५८

39. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५९ से ६०

40. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय  ६१ से ६३

41. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६४

42. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६५

43. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६६ से ६७

44. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६८

45. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६९

46. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७०

47. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७१

48. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७२ से ७३

49. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७४

50. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७५ से ७८

51. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७९

52. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८० से ८१

53. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८२

54. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८३ से ८५

55. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८६ से ८७

56. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८८ से ९०

57. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९१ से ९२

58. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९३

59. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९४ से ९५

60. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९६

61. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९७

62. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९८ से ९९

63. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०० से १०१

64. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०२

65. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०३

66. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०४

67. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०५ से १०६

68. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०७ से १०९

69. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११० से १११

70. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११२

71. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११३ से ११४

72. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११३ से ११४

73. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११६

74. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११७

75. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११८

76. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ११९

77. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १२०

78. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १२१ से १२४

79. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १२५ से १२६

80. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १२७ से १२८

81. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १२९

82. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३०

83. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३१

84. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३२ से १३३

85. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३४

86. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३५

87. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३६ से १३७

88. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३८

89. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १३९ से १४१

90. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४२

91 भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४३

92. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४४

93. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४५

94. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४६ से १४७

95. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४८

96. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४९
97. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १५०

98. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १५१

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