भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय १०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय १०
कृष्णचैतन्य, वाल्मीकि और शङ्कराचार्य समुत्पत्ति का वर्णन

बृहस्पति जी बोले — पहले कोई विष्णुशर्मा नामक ब्राह्मण था, जो वेद का मर्मज्ञ तथा प्रसन्नचित्त होकर नित्य सर्वदेवमय विष्णु की आराधना करता था । भगवान् की उपासना करने के कारण समस्त देवों के पूज्य होने पर भी वह ब्राह्मण भिक्षा याचन द्वारा ही अपनी जीविका निर्वाह करता था । घर में केवल पत्नी ही थी पुत्र आदि अन्य कोई नहीं । एक बार उस ब्राह्मण के घर एक कोई संन्यासी आया । उसने उस ब्राह्मण-पत्नी को भक्ति, विनम्र एवं अत्यन्त दरिद्र-पीड़ित देखकर कहा — यह पारस पत्थर अत्यन्त पुण्यात्मा एवं अत्यन्त दयालु है, क्योंकि इसके स्पर्शमात्र से लोहा भी सुवर्ण हो जाता है । om, ॐअतः साध्वी ! इसे तुम तीन दिन तक अपने पास रखकर मन इच्छित सुवर्ण बना लो । तब तक मैं सरयू-स्नान करके आ जाऊँगा । इतना कहकर वह ब्राह्मण स्नानार्थ चला गया और वह ब्राह्मणी मनोनुरूप मात्रा में सुवर्ण बनाकर लक्ष्मी की भली-भाँति प्राप्ति की । उसी समय विष्णुशर्मा भी भिक्षा लेकर घर आये । उन्होंने अत्यन्त सुवर्णयुक्त अपनी पत्नी को देखकर कहा — मतवाली कामिनि ! तुम अब किसी रसिक प्रेमी के यहाँ जाकर रहो, क्योंकि मैं विष्णु का उपासक, दीन एवं चोरों आदि से भयभीत होने वाला ब्राह्मण हूँ, तुम सौन्दर्यपूर्ण मदोन्मत्त हो रही हो इसलिए मैं तुम्हारा ग्रहण कैसे कर सकता हूँ । इस दारुण वचन को सुनकर पति से भयभीत होकर उस पतिव्रता ने समस्त सुवर्ण समेत उस पारस को पति के समक्ष रख दिया और उनकी सेवा करने लगी । तब विष्णुशर्मा ने सुवर्ण और पारस को ले जाकर घाघरा नदी में डाल दिया । तीन दिन के पश्चात् उस संन्यासी ने वहाँ आकर उस दीन ब्राह्मणी से कहा — क्या तुमने उस पारस से सुवर्ण नहीं बनाया । उसने कहा — मेरे पतिदेव अत्यत विशुद्धात्मा हैं, उन्होंने सुवर्ण समेत पारस को घाघरा नदी में डाल दिया । क्योंकि जब तक पारस घर में था मुझे भोजन बनाने की वे आज्ञा नहीं दे रहे थे । गुरो ! इस समय हम लोगों के पास वह पारस नहीं है । इस सुनकर उस संन्यासी को महान् आश्चर्य हुआ। पश्चात् उस व्राह्मण के आने पर उसे भर्सित करने लगा — आप दैवमोहित होकर ही दरिद्र एवं भिक्षुक बने हुए हैं । यदि आपको उसकी आवश्यकता नहीं है, तो मुझे मेरा पारस लौटाने की कृपा कीजिये अन्यथा मैं प्राण परित्याग कर रहा हूँ। ऐसा कहने पर उस यति से विष्णुशर्मा ने कहा — घाघरा के तट पर चले जाओ तुम्हारा पारस उसी स्थान रखा हुआ है । इतना कहकर उस यति के साथ वहाँ जाकर अनेक कटंकों को लेकर पारस की भाँति उसे ही दिखा दिया । उस समय उस यति ने नमस्कार पूर्वक विनम्र होकर उस ब्राह्मण से कहा — मैंने बारह वर्ष तक शिव की आराधना करके उस शुभ-रल पारस की प्राप्ति की थी किन्तु आपके दर्शन मात्र से ही यहाँ मुझ लोभी को अनेक पारस की प्राप्ति हो गई । इतना कहकर उस यति ने शुभ ज्ञान प्राप्तिपूर्वक मोक्ष की प्राप्ति की और विष्णुशर्मा ने इस पृथ्वी तल पर एक सहस्र वर्ष रहकर सूर्य की विविध आराधना द्वारा विष्णु में मोक्ष प्राप्त किया । वह विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर प्रत्येक फाल्गुन मास में तीनों लोकों को प्रकाशित किया जिससे देवकार्य की सिद्धि हुई ।

सूत जी बोले — इतना कहकर भगवान् बृहस्पति ने पुनः शचीपति इन्द्र से कहा — फाल्गुन मास के उस सूर्य की आराधना करके सुख का अनुभव करो । गुरु बृहस्पति के ऐसा कहने पर इन्द्र ने सर्व देवमय विष्णु के ध्यानपूर्वक उन देवाधिदेव की अनेक भाँति अर्चना की । उस समय प्रसन्न होकर भगवान् ने सूर्य मण्डल से प्रकट होकर चार भुजाएँ एवं रक्तवर्ण यज्ञेश की भाँति प्रकट होकर सभी देवों के समक्ष शक्र (इन्द्र) के शरीर में प्रवेश किया । उस समय इन्द्र ने अपनी पूर्व शरीर को अपने में ही विलीनकर अयोनिज ब्राह्मण का वेश धारण किया और उसी भाँति उनकी पत्नी इन्द्राणी भी पृथ्वी पर ब्राह्मणी के रुप में अवतीर्ण हुईं । पश्चात् उन दोनों ने गंगातट के महारण्य में एक वर्ष तक रमण किया । ब्राह्मणी रूप धारिणी इन्द्राणी ने उस गर्भ को धारण किया। भाद्रपद मास की शुक्ल द्वादशी बृहस्पति के दिन उस ब्रह्म मण्डल समय में स्वयं विष्णु भगवान् ‘उस गर्भ द्वारा अवतरित हुए, जो सम्पूर्ण कलाओं को धारण किये, चार भुजाओं वाले, रक्तवर्ण, और कुम्भराशि स्थित (फाल्गुन मास के) सूर्य के समान प्रभापूर्ण थे । उस समय रुद्रगण, वसुगण, विश्वदेव, मरुद्गण, साध्य, भास्कर एवं सिद्धगण वहाँ उपस्थित होकर उन सनातन देव की स्तुति करने लगे ।

देवों ने कहा — नाथ ! शिव समेत आपको हम लोग प्रणाम कर रहे हैं, वज्र, ध्वजा, पद्म, गदा एवं अंकुश लक्षणों से विभूषित चरण ही आपका आभूषण है । आप, मुनियों के साथ रमण करने वाले एवं संसार भय का नाश करने वाले हैं । आप दर (शंख) चक्र, गदा और कमल धारण करने वाले, देव-शत्रुओं के कठोर शरीर के नाशक, तथा चर-अचर रूप ब्रह्माण्ड लोक के पोषक हैं, एवं आपकी चपलता शत्रु के विनाशपूर्वक देव-कार्य को सिद्ध करती है । मैं शची नन्दन को नमस्कार करता हूँ, जो आनन्द प्रदाता, और महान् पाप, सन्ताप एवं कठोर भाषण के अपहर्ता हैं । आप देव-शत्रुओं को शीघ्र विनष्ट कर लोक की शान्ति स्थापना पूर्वक लोक के सेवक और कोटि पापियों के उद्धारक हैं । आपने हंसरूप धारणकर सत्य के पालन-पूर्वक यज्ञरूप धारणकर वेद की रक्षा की है । उसी यज्ञरूप से लोक-पालक आप इन्द्र द्वारा इस समय शची नन्दन (पुत्र) होकर अवतरित हुए हैं । हम लोगों की हृदयरूपी गुफाओं में शचीनन्दन की स्फूर्ति सदैव होती रहे, जो प्राणी द्वारा अनर्पित करुणावश अवतरित, समुन्नत एवं पूर्ण प्रकाशित इस महिमण्डल में कलि के समय अपनी भक्ति प्रदान करते हुए शंकर की असुन्दर प्रभा पटल से विभूषित है । महाप्रभो, कृष्णचैतन्य एवं शची सुत ! आप ही इस भूमण्डल में मनुष्यों को उत्पन्नकर करुणावश उनका पालन-पोषण करते हैं, तथा सर्वोत्तम अपने उस परमपद को उन्हें प्रदान करने के लिए अवतरित भी हुए हैं ।, इसलिए इस घोर कलि के समय दिति-पुत्र (दैत्यों) से पीड़ित हम देवों की रक्षा कीजिये । हमारे कुलदेव भगवान् चैतन्य-कृष्ण की सदैव विजय होती रहे, जो सुगंधित सुन्दर पदार्थों की सुरभि से सुरभित अंग, सुवर्ण कमल के वन, तथा प्रेम के इस प्रकार के हिमालय हैं, जो करुणामृत के झरनों से विभूषित और भक्त रूपी मेघों को धारण करने वाली विजयिनी एवं निष्कम्प सप्तावली देवी से युक्त है । हम लोग सुरेश वन्दित एवं (समस्त) व्यापक (उस देव) को नमस्कार कर रहे हैं, जो इस घोर कलि के समय अधार्मिक देवशत्रुओं से पीड़ित पृथिवी को पल्लवित करने के लिए अपने शरीर को संकुचित कर बीज रूप में पुनः अवतरित हैं, और जिसके नाम ही सुनकर सुरारिगण पददलित होकर पाताल पहुँच जाते हैं एवं अधर्मपरायण म्लेच्छगण सदैव पीड़ित होते हैं ।

सूत जी बोले — इस प्रकार उस शचीपति यज्ञेश पुरुप की आराधना करने के उपरान्त देवों ने बृहस्पति के पास जाकर उनसे कहा — महाभाग ! हम लोग रुद्रगण, वसुगण और अश्विनी कुमार भूतल में जाकर किन-किन अंशों द्वारा जन्म ग्रहण करें । देव ! कृपाकर हमें यह सब बतायें ।

बृहस्पति बोले — देवसत्तमवृन्द ! मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो, पहले समय में मृगों का शिकार करने वाला मृगव्याध नामक एक अधम ब्राह्मण था । वह सदैव धनुषबाण लिए मार्ग में आने-जाने वाले ब्राह्मण यात्रियों की हिंसा करता था । उस महामूर्ख ब्राह्मण ने ब्राह्मणों का वध करके कौतुकवश उनके यज्ञोपवीत का भी संचय किया । इस प्रकार वह दुष्ट अत्यन्त निन्दनीय कर्म करता था और यह भी जानता था कि ब्राह्मण के द्रव्य उत्तम अमृत, क्षत्रिय के द्रव्य मधुर, वैश्य के द्रव्य अन्न एवं शूद्र के (द्रव्य) रुधिर के समान है, इसीलिए उस अधम ने तीनों वर्णों तथा विशेषकर अधिक ब्राह्मणों की ही हिंसा की थी । उस खल द्वारा ब्राह्मणों के नाश होने पर भयभीत होकर देवों ने ब्रह्मा के पास पहुँचकर समस्त कारणों को सुनाया, जिसे सुनकर ब्रह्मा को अत्यन्त दुःख हुआ । उन्होंने लोकगामी सातों ऋषियों से कहा — द्विजोत्तम ! आप लोग उसी. के उद्देश्य से वहाँ जाकर उसका उद्धार करें । इसे सुनकर वशिष्ठादि ऋषियों समेत मरीचि वहाँ जाकर उसी मृगव्याध के वन में उसके मार्ग पर खड़े हो गये । उन्हें वहाँ उपस्थित देखकर धनुषबाणधारी उस बलवान् मृगव्याध ने कड़ककर कहा — आज मैं तुम लोगों का वध करूंगा । मरीचि आदि ऋषियों ने हँसते हुए उससे कहा — महाबल ! हम लोगों के वध करने का यह प्रयत्न तुम अपने व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा कुटुम्ब के लिए कर रहे हो । इतना कहने पर उस ब्राह्मण ने कहा — अपने और कुटुम्ब के लिए भी मैं तुम लोगों का वध अवश्य करूँगा, इसलिए कि विशेषकर मैं धनी ब्राह्मणों का ही वध करता हूँ । उसे सुनकर महर्षियों ने कहा — धनुर्धर ! आवो, हम लोग तैयार हैं, किन्तु एक बात यह बताओं कि इस ब्रह्महत्या का पापभागी कौन होगा ! यह सुनकर वह भीषणमूर्ति ब्राह्मण, जो उन लोगों की दृष्टि से निर्मल हो रहा था, घर जाकर अपने परिवारों से कहने लगा कि मैंने अत्यन्त पापकर्म किया है । अतः आप लोग धन की भाँति इसके भी भाग (हिस्से) ग्रहण कीजिये । उसे सुनकर घर वालों ने कहा — हमलोग पाप के भागी नहीं होंगे । यह अचला भूमि और देवश्रेष्ठ सूर्य इसके साक्षी हैं । यह सुनकर उस मृगव्याध ने हाथ जोड़कर उन महर्षियों से कहा — मेरे पापों को नष्ट करने के लिए आप लोग कोई उपाय बताने की कृपा करें । इस प्रकार नम्रतापूर्वक उसके कहने पर महर्षियों ने कहा — मैं तुम्हें एक उत्तम मंत्र बता रहा हूँ, सुनो ! सम्पूर्ण पापों के विनाशक एवं परमोतम इस ‘रामनाम’ का जप तब तक तुम करो, जब तक हमलोग तुम्हारे पास पुनः लौटकर न आयें। ऐसा कहकर उन ऋषियों ने एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ की यात्रा करना आरम्भ किया और इधर उस मृगव्याध ने ‘मरा, मरा, मरा’ मंत्र का जो तीसरे शब्द के उच्चारण में शुद्ध राम रूप हो जाता है, एक सहस्र वर्ष तक जप किया । उस मंत्र-जप के प्रभाव से वहाँ उत्पल (कमल) वृन्द का एक वन उत्पन्न हुआ, जिससे वह स्थान इस भूतल में ‘उत्पलारण्य’ के नाम से प्रख्यात हुआ । तदनन्तर सातों ऋषियों ने जप करने वाले उस ब्राह्मण को वहाँ आकर वल्मीक से पृथक् कर उन्हें शुद्ध रूप में देखकर कहा — विप्र, त्रिकालज्ञ एवं महामते ! वल्मीक से निकलने के नाते ‘वाल्मीकि’ इस उत्तम नाम से तुम्हारी प्रख्याति होगी । इतना कहकर उन ऋषियों ने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया । उस वाल्मीकि मुनि ने अष्टादश कल्पयुक्त एवं शतकोटि के विस्तृत रामायण की रचना की, जो निर्मल पद्यरूप में निर्मित होकर समस्त पापों का विनाशक है । अनन्तर शिव होकर उस मुनि ने वहाँ निवास किया और वह मृगव्याध एवं सनातन स्वामी आज भी वहाँ स्थित है । देववृन्द ! शिवप्रिय उनके चरित्र को मैं बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो !

सत्ययुग के प्रारम्भ में जबकि वैवस्वत मन्वन्तर वर्तमान रहे हैं, ब्रह्मा ने उस उत्पलारण्य’ में जाकर एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान किया । उस समय सरस्वती ने वहाँ नदी रूप में पदार्पण किया, जिन्हें देखकर ब्रह्मा ने अपने मुख द्वारा ब्राह्मण, भुजाओं द्वारा क्षत्रिय, उरु द्वारा वैश्य और अपने चरण द्वारा शुभाचार के अनुगामी शूद्रों को उत्पन्न किया । उस पराक्रमी (ब्रह्मा) ने ब्राह्मण नाम से द्विजराज सोम को उत्पन्न किया, जिन्हें द्विजश्रेष्ठ चन्द्रमा कहा जाता है, क्षत्रिय नाम से सूर्य को उत्पन्न किया, जो सभी के लिए आतप रूप होकर लोक में कश्य-वीर्य (पराक्रम) की रक्षा करते हैं । इसलिए उन्हें कश्यप भी कहा जाता है और उसके अनन्तर मरीचि भी । रत्नों के आकार (निधि) होने के नाते उसे (समुद्र को) रत्नाकर कहा गया है और द्रव्यों द्वारा लोकों के पोषण करने से धर्म तथा अगाध एवं असाधारण कोश होने के नाते सरित्पति भी । अपने कार्यों द्वारा जो लोक को कार्यकुशल बनाये उसे दक्ष प्रजापति कहा जाता है । ब्रह्मा के अंगों द्वारा उत्पन्न होने के नाते ये सभी ब्रह्म कहे गये हैं । जो वर्णधर्म के अनुसार क्रमशः वर्णों को अपनाये हुए हैं । पश्चात् दक्ष प्रजापति के मन द्वारा पाँच सौ कन्यायें उत्पन्न हुईं जो भगवान् विष्णु की माया से प्रभावित होकर इस भूतल में कलामूर्ति होकर स्थित हैं । उस समय भगवान् ब्रह्मा ने लोक की वृद्धि के लिये सोम (चन्द्रमा) को अश्विनी आदि नक्षत्र मण्डल रूप में सत्ताईस, कश्यप (ऋषि) को तेरह अदिति आदि कन्याएँ और धर्म को कीर्ति आदि कन्याएँ प्रदान किया । उस महामुनि के इस प्रकार वितरण करने पर उस वैवस्वत मन्वन्तर के समय लोकों में अनेक भाँति की सृष्टियाँ हुईं । पश्चात् ब्रह्मा की आज्ञा से लोक-समृद्ध इस भूतल के अध्यक्ष दक्षप्रजापति ही निश्चित किये गये, जिससे वहाँ निवास करते हुए दक्ष ने एक विशाल यज्ञानुष्ठान का आयोजन किया । उनके उस यज्ञ महोत्सव में सभी देवगण पहुँचकर उन्हें नमस्कार पूर्वक यथेच्छ विचरण कर रहे थे, किन्तु भूतनाथ महादेव ने उन्हें किसी भाँति नमस्कार नहीं किया जिससे अत्यन्त क्रुद्ध होकर दक्ष ने उन्हें शिव-भाग देना अस्वीकार कर दिया । उस समय मृगव्याध शिव ने उस अपमान को सहन न कर वीरभद्र का रूप धारण किया — तीन नेत्र, तीन शिर और तीन चरण-धारण कर उनके आगमन करने से देव, मुनि एवं पितृगण अत्यन्त पीड़ित होने लगे और यज्ञपुरुष के भयभीत होकर मृगरूप धारणकर चारों ओर भागने पर शिव ने व्याधरूप धारण किया । अनन्तर उस व्याधरूपी रुद्र द्वारा मृगरूपधारी यज्ञपुरुष का अंग छिन्न-भिन्न हो गया । उसी समय भगवान् ब्रह्मा ने मधुरवाणी द्वारा उनकी रतुति की, जिससे प्रसन्न होकर उस मृगव्याध ने उनके यज्ञ को पूर्ण तथा सुसम्पन्न किया । तदुपरांत ब्रह्मा ने तुलाराशि पर सूर्य के स्थित होने पर सत्ताईस नक्षत्रों के अधिपति उस चन्द्रमा के मण्डल में स्वयं रुद्र को प्रतिष्ठितकर अपने लोक को प्रस्थान किया और चन्द्र रूप में रुद्र ने सातों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया । इसे सुनकर वीरभद्र ने अत्यन्त हर्षमग्न होकर अपनी देह से अपने अंश को निकालकर उस भैरवदत्त नामक ब्राह्मण के घर भेज दिया, जो उनके यहाँ उनके पुत्र रूप में अवतरित होकर उस घोर कलि के समय शंकराचार्य के नाम से भूतल में प्रख्यात हुआ । उस गुणी, वेत्ता एवं ब्रह्मचारी बालक ने शांकरभाष्य की रचनाकर उस शैवमार्ग का प्रदर्शन किया, जो त्रिपुण्ड्र चन्दन, रुद्राक्षमाला एवं पंचाक्षर (ॐ शिवाय नमः) मंत्र के रूप में शैवों के लिए अत्यन्त मांगलिक है ।
(अध्याय १०)

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.