भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ८४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ८४
विशोकद्वादशी-व्रत और गुड-धेनु आदि दस धेनुऑ के दान की विधि तथा उसकी महिमा

युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन् ! इस भूतल पर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्य के अभीष्ट वस्तुओं के वियोग से उत्पन्न शोकसमूह से उद्धार करने में समर्थ, धन-सम्पत्ति की वृद्धि करनेवाला और संसार-भय का नाशक है ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — महाराज ! आपने जिस व्रत के विषय में प्रश्न किया है, वह समस्त जगत् को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । om, ॐयद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते तथापि आप-जैसे भक्तिमान् के प्रति मैं अवश्य इसका वर्णन करूंगा । उस पुण्यप्रद व्रत का नाम विशोक-द्वादशी-व्रत है । विद्वान् व्रती को आश्विन मास में दशमी तिथि के दिन अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रत का आरम्भ करना चाहिये । पुनः एकादशी के दिन व्रती उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे, फिर (स्नान आदि से निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मी की विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और ‘दूसरे दिन भोजन करूंगा’ — ऐसा नियम लेकर रात्रि में शयन करे । प्रातःकाल उठकर सर्वौषधि और पञ्चगव्य मिले जल से स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पों की माला धारण करके भगवान् विष्णु की कमल-पुष्प द्वारा पूजा करे —
‘विशोकाय नमः से उनके चरण युगल, वरदाय नमः से जंघा, श्रीशाय नमः से घुटना, जलशायिने नमः से कटि, दामोदराय नमः से उदर, विपुलाय नमः से पार्श्व भाग, पद्मनाभाय नमः से नाभि, मन्मथाय नमः से हृदय, श्रीधराय नमः से वक्ष, और मधुभिदे नमः से कर, चक्रिणे नमः से वाम बाहु, गदिने नमः से दक्षिण बाहु, वैकुण्ठाय नमः से कण्ठ, यज्ञमुखाय नमः से मुख, अशोकनिधये नमः से नासा, वासुदेवाय नमः से दोनों नेत्र, वामनाय नमः से भाल, विश्वरूपाय नमः से किरीट, और सर्वात्मने नमः से गोविन्द के सिर की पूजा फल, माला, एवं विलेपन द्वारा सुसम्पन्न करके उनके सम्मुख एक मण्डल बनाकर मिट्टी से वेदी का निर्माण कराये । वह वेदी बीस अंगुल लम्बी-चौड़ी, चारों ओर से चौकोर, उत्तर की ओर ढालू, चिकनी और सुन्दर हो । तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूप में नदी की बालुका से लक्ष्मी की मूर्ति अङ्कित करे और उस सूप को वेदी पर रखकर लक्ष्मी की अर्चना करे —

“नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै ।
नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नमो दृष्ट्यै नमोनमः ॥
(उत्तरपर्व ८४ । १५)

और यों प्रार्थना करे —

“विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे ।
विशोका वास्तु सन्तत्यै विशोका सर्वसिद्धये ॥
(उत्तरपर्व ८४ । १६)

‘विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दुःखों का नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका मुझे संतति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें ।’

तदनन्तर श्वेत वस्त्रों से सूप को परिवेष्टित कर नाना प्रकार के फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलों से लक्ष्मी की पूजा करे । चतुर व्रती सभी रात्रियों में कुशोदक-पान करे और सारी रात नृत्य-गीत आदि का आयोजन कराये । तीन पहर रात व्यतीत होने पर व्रती मनुष्य स्वयं नींद ल्यागकर जग जाय और अपनी शक्ति के अनुसार शय्या पर सोते हुए तीन या एक द्विज-दम्पति के पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदि से ‘जलशायिने नमोऽस्तु’ जलशायी भगवान् को नमस्कार है’ — यों कहकर उनकी पूजा करे । इस प्रकार रात में गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रातःकाल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पति का पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्य के अनुकूल उन्हें भोजन कराये । फिर स्वयं भोजन करके पुराणों की कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे । प्रत्येक मास में इसी विधि से सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये ।

इस प्रकार व्रत की समाप्ति के अवसरपर गद्दा, चादर, तकिया आदि उपकरणों से युक्त एक सुन्दर शय्या गुड़-घेनु के साथ दान करके इस प्रकार प्रार्थना करे —

“यथा न लक्ष्मीदेवेश त्वां परित्यज्य गच्छति ।
तथा कुरु यथायोग्यमशोकं चास्तु मे सदा ॥
यथा देवेन रहिता न लक्ष्मीर्जायते क्वचित् ।
तथा विशोकता मेऽस्तु भक्तिरच्या च केशवे ॥”
(उत्तरपर्व ८४ । २४-२५)
‘देवेश ! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जातीं, उसी प्रकार सौन्दर्य, नीरोगता और निःशोकता सदा मुझे निरवच्छिन्नरूप से प्राप्त हों — मेरा परित्याग न करें और भगवान् केशव के प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो ।’

वैभव की अभिलाषा रखनेवाले व्रती को समन्त्र गुड-धेनु सहित शय्या और लक्ष्मी सहित सूप-दान करना चाहिये । इस व्रत में कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुसुम या अगस्त्य-वृक्ष का पुष्प), ताजा (विना कुम्हलाया हुआ) कुंकुम, केसर, सिंदुवार, मल्लिका, गन्धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और जाती — ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं ।

युधिष्ठिर ने पुनः पूछा —
जगत्पते ! अब आप मुझे (विशोका द्वादशी के प्रसङ्ग में निर्दिष्ट) गुड़-धेनु का विधान बतलाइये । साथ ही यह भी बतलाने की कृपा कीजिये कि गुड़-धेनु का रूप कैसा होता है और उसे किस मन्त्र का पाठ करके दान करना चाहिये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! इस लोक में गुड़-घेनु के विधान का जो रूप है और उसका दान करने से जो फल प्राप्त होता है, उसे मैं बतला रहा हैं । गुड़-धेनु का दान समस्त पापों का विनाशक है । गुड़-धेनु का दान करने के दिन गोबर से भूमि को लीप-पोतकर सब ओर से कुश बिछाकर उस पर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशा की ओर हो । तदनन्तर एक छोटे मृगचर्म में बछडे की कल्पना करके उसके निकट रख दें । फिर उसमें पूर्वमुख और उत्तर पैरवाली सवत्सा गौ की कल्पना करे । चार भार दो हजार पल अर्थात् तीन मन के वजन को ‘भार’ कहते हैं। गुड़ से बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है । उसका बछड़ा एक भार गुड़ का बनाना चाहिये । अपने गृह की सम्पत्ति के अनुसार इस (गौ) — का निर्माण कराना चाहिये । इस प्रकार गौ और बछड़े की कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्र से आच्छादित कर दें । फिर घी से उनके मुख की, सीप से कानों की, गन्ने से पैरों की, श्वेत मोती से नेत्रों की, श्वेत सूत से नाड़ियों की, श्वेत कम्बल से गल-कम्बल की, लाल रंग के चिह्न से पीठ की, श्वेत रंग के मृगपुच्छ के बालों से रोएँ की, मूँगे से दोनों भौहों की, मक्खन से दोनों स्तनों की, रेशम के धागे से पूँछ की, काँसा से दोहनी की, इन्द्रनीलमणि से आँखों की तारिकाओं की, सुवर्ण से सींग के आभूषणों की, चाँदी से खुरों की और नाना प्रकार के फलों से नासापुटों की रचना कर धूप, दीप आदि द्वारा उनकी अर्चना करने के पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे —

“या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवे व्यवस्थिता ।
धेनुरूपेण सा देवी मन पापं व्यपोहतु ॥
विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहायां च विभावसौ ।
चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये ॥
चतुर्मुखत्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मीर्धनदस्य च ।
या लक्ष्मीर्लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे ॥
स्वधा त्वं पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां पुनः ।
सर्वपापहरे धेनोतस्माद्भूत प्रयच्छ मे ॥”
(उत्तरपर्व ८४ । ३८-४१)

‘जो समस्त प्राणियों तथा देवताओं में निवास करनेवाली लक्ष्मी है, धेनुरूप से वहीं देवी मेरे पापों का विनाश करें । जो लक्ष्मी विष्णु के वक्षःस्थल पर विराजमान है, जो स्वाहारूप से अग्नि की पत्नी हैं तथा जो चन्द्र, सूर्य और इन्द्र की शक्तिरूपा हैं, वे ही धेनुरूप से मेरे लिये सम्पत्तिदायिनी हों । जो ब्रह्मा की, कुबेर की तथा लोकपालों की लक्ष्मी हैं, वे धेनुरूप से मेरे लिये वरदायिनी हो । जो लक्ष्मी प्रधान पितरों के लिये स्वधारूपा, यज्ञभोजी अग्नियों के लिये स्वाहारूपा तथा समस्त पापों को हरनेवाली धेनुरूपा हैं, वे मुझे ऐश्वर्य प्रदान करें ।’

इस प्रकार उस गुड़-धेनु को आमन्त्रित कर उसे ब्राह्मण को निवेदित कर दे । यहीं विधान घृत-तिल आदि सम्पूर्ण धेनुओं के दान के लिये कहा गया है ।

नरेश्वर ! अब जो दस पापविनाशिनी गौएँ बतलायी गयी हैं, उनका नाम और स्वरूप बतला रहा हूँ । पहली गुड-धेनु, दूसरी घृत-धेनु, तीसरी तिल-धेनु, चौथी मधु-धेनु, पाँचवीं जल-धेनु, छठी क्षीर-धेनु, सातवीं शर्करा-धेनु, आठवीं दधि-धेनु, नवीं रस-धेनु और दसवीं स्वरूपतः प्रत्यक्ष धेनु है । सदा पर्व-पर्व पर अपनी श्रद्धा के अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहन सहित इन गौओं का दान करना चाहिये, क्योंकि ये सभी भोग और मोक्षरूप फल को प्रदान करनेवाली हैं । ये सभी सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी और पापहारिणी हैं । चूँकि इस लोक में विशोकाद्वादशी-व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उसका अङ्ग होने के कारण गुड़-धेनु भी प्रशस्त मानी गयी है । उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन, पुण्यप्रद विषुव-योग, व्यतीपात-योग अथवा सूर्य-चन्द्र के ग्रहण आदि पर्वों पर इन गुड़-धेनु आदि गौओं का दान करना चाहिये । यह विशोकद्वादशी पुण्यदायिनी, पापहारिणी और मङ्गलकारिणी है । इसका व्रत करके मनुष्य विष्णु के परम पद को प्राप्त हो जाता है तथा इस लोक में सौभाग्य, नीरोगता और दीर्घायु प्राप्तकर अन्त्त में श्रीहरि का स्मरण करता हुआ विष्णुलोक प्राप्त करता है ।
(अध्याय ८४)

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