February 27, 2025 | aspundir | Leave a comment ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 43 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय शिव का सती के शव को लेकर शोकवश समस्त लोकों में भ्रमण, भगवान् विष्णु का उन्हें समझाना और प्रकृति की स्तुति के लिये कहना, शिव द्वारा की हुई स्तुति से संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सती का शिव को दर्शन एवं सान्त्वना देना श्रीनारायण कहते हैं — नारद! तदनन्तर महादेवजी ने गङ्गाजी के तट पर सोयी हुई दुर्गास्वरूपा सती की मनोहर मूर्ति देखी, जिसके मुखारविन्द की कान्ति अभी मलिन नहीं हुई थी। वह शरीर पर श्वेत वस्त्र धारण किये और हाथ में अक्षमाला लिये दिव्य तेज से प्रकाशित हो रही थी। उसके अङ्गों से तपाये हुए सुवर्णकी – सी कमनीय कान्ति फैल रही थी । सती के उस प्राणहीन शरीर को देखकर भगवान् शिव विरह की आग से जलने लगे। वे मूर्तिमान् तत्त्व-राशि होने पर भी सती के वियोग में कभी मूर्च्छित, कभी चेतन होते हुए भाँति-भाँति से विलाप करने लगे । तदनन्तर उनके स्वर्णप्रतिम मृत देह को वक्ष पर धारण करके सप्तद्वीप, लोकालोक पर्वत तथा सप्तसिन्धु में भ्रमण करते हुए भारत में शतशृङ्ग-गिरि के पास जम्बूद्वी पमें निर्जन प्रदेशस्थ अक्षयवट के नीचे नदीतीर पर पहुँचे। वहाँ से महायोगी शंकर विरहाकुल-चित्त होकर पूरे एक वर्ष तक पृथ्वी पर परिभ्रमण करते रहे। सती देवी के उस मृत देह के अङ्ग-प्रत्यङ्ग जिस-जिस स्थान पर गिरे, वे स्थान कामनाप्रद सिद्धपीठ हो गये । तदनन्तर शंकर ने सती के अवशिष्ट अङ्गों का संस्कार किया । अस्थियों की माला गूँथकर उसे अपना कण्ठभूषण बना लिया और प्रतिदिन सती का शरीर भस्म अपने शरीर पर लगाने लगे। इसके बाद वे निश्चेष्ट से होकर एक वटमूल में पड़ गये। तब लक्ष्मीपूजित भगवान् नारायण अपने पार्षदों, देवताओं और ऋषि- मुनियों के साथ वहाँ पधारकर श्रीशंकर को गोद में लेकर उन्हें समझाने लगे । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीभगवान् ने कहा — स्वात्माराम शिव ! मेरी बात सुनो और उस पर ध्यान दो। वह हितकारक, अध्यात्म ज्ञान का सार, दुःख-शोक का नाश करने वाली तथा सम्पूर्ण अध्यात्म ज्ञान का विद्यमान बीज है । यद्यपि तुम स्वयं ज्ञान की निधि, विधि, सर्वज्ञ तथा स्रष्टाओं के भी स्रष्टा हो, तथापि मैं तुम्हें ज्ञान का उपदेश दे रहा हूँ । प्राण-संकट के समय विद्वान् पुरुष विद्वान् को भी समझा सकता है। लोक में यह व्यवहार है कि सब लोग सबको परस्पर समझाते-बुझाते हैं। शम्भो ! महेश्वर ! दुर्दिन में दुःख, शोक और भय की प्राप्ति होती है । जब दुर्दिन बीत जाता और सुदिन आ जाता है, तब उनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? उस समय तो हर्ष और ऐश्वर्य विषयक दर्प की ही निरन्तर वृद्धि होती है; परंतु विद्वान् पुरुष इन सबको स्वप्न की भाँति मिथ्या समझते हैं । महादेव ! तुम ज्ञान की उत्पत्ति के कारण तथा सनातन हो । ज्ञान प्राप्त करो – अपने स्वरूप का स्मरण करो । तुम्हारा कल्याण हो, तुम सचेत होओ — होश में आओ । निश्चय ही तुम्हें सती की प्राप्ति होगी । जैसे शीतलता जल को, दाहिका शक्ति अग्नि को, तेज सूर्य को तथा गन्ध पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ती है; उसी तरह सती तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रह सकती है । सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप ज्ञाननिधे शंकर! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। तुम परात्पर परमेश्वर हो, परंतु शोकवश अपने-आपको भूल गये हो । प्रत्येक जगत् में तथा जन्म-जन्म में सुदिन और दुर्दिन का चक्र निरन्तर चला करता है । वे सुदिन और दुर्दिन ही समस्त प्राकृत प्राणियों के लिये सुख-दुःख की प्राप्ति के मुख्य कारण होते हैं । सुख से हर्ष, दर्प, शौर्य, प्रमाद, राग, ऐश्वर्य की अभिलाषा और विद्वेष निरन्तर प्रकट होते रहते हैं । दुःख, शोक और उद्वेग से सदा भय की प्राप्ति होती है। महेश्वर ! यदि इनके बीज नष्ट हो जायँ तो ये सब स्वतः नष्ट हो जाते हैं । चञ्चल मन ही पुण्य और पाप का बीज । शम्भो ! सम्पूर्ण इन्द्रियों सहित मन मेरा अंश है। सबका जनक जो अहंकार है, उसके अधिष्ठाता चेतन तुम हो और ये ब्रह्मा बुद्धि के अधिष्ठाता हैं । परब्रह्म परमात्मा एक हैं। गुण-भे दसे ही सदा उसके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। वह ब्रह्मतत्त्व एक होने पर भी अनेक प्रकार का है। शिव ! वह सगुण भी है और निर्गुण भी । जो मायारूप उपाधि का आश्रय लेता है, वह सगुण और जो मायातीत है, वह निर्गुण कहलाता है । भगवान् स्वेच्छामय हैं। वे अपनी इच्छा से ही विविध रूपों में प्रकट होते हैं। उनकी इच्छाशक्ति का ही नाम प्रकृति है । वह नित्यस्वरूपा और सदा सबकी जननी है कुछ लोग ज्योतिःस्वरूप सनातन ब्रह्म को एक ही बताते हैं तथा कुछ दूसरे विद्वान् उसे प्रकृति से युक्त होने के कारण द्विविध कहते हैं। जो एक बताते हैं, उनका मत सुनो। ब्रह्म माया तथा जीवात्मा दोनों से परे है। उस ब्रह्म से ही वे दोनों (माया और जीवात्मा) प्रकट होते हैं; अतः ब्रह्म ही सबका कारण है । वह परब्रह्म एक होकर भी स्वेच्छा से दो हो जाता है। उसकी इच्छाशक्ति प्रकृति है, जो सदा सम्पूर्ण शक्तियों की जननी होती है। उससे संयुक्त होने के कारण वे परमात्मा ‘सगुण’ कहे जाते हैं । वे ही सबके आधार, सनातन, सर्वेश्वर, सर्वसाक्षी तथा सर्वत्र फलदाता होते हैं । शम्भो ! शरीर भी दो प्रकार का होता है – एक नित्य और दूसरा प्राकृत । नित्य शरीर का विनाश नहीं होता; परंतु प्राकृत शरीर सदा नश्वर होता है। भगवन् ! हम दोनों के शरीर नित्य हैं। हमारे अंशभूत जो अन्य जीव हैं, उनके शरीर त्रिगुणात्मिका प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण प्राकृत कहलाते हैं । प्राकृत शरीर सदा ही विनाशशील हैं। रुद्र आदि तुम्हारे अंश हैं और विष्णुरूपधारी मेरे अंश । मेरे भी दो रूप हैं – द्विभुज और चतुर्भुज । चतुर्भुज मैं हूँ और वैकुण्ठधाम में लक्ष्मी तथा पार्षदों के साथ रहता हूँ । द्विभुजरूप से मैं श्रीकृष्ण कहलाता हूँ और गोलोक में गोपियों तथा राधा के साथ निवास करता हूँ। जो ब्रह्म को द्विविध बताते हैं, उनके मत में दो प्रधान तत्त्व हैं — नित्य पुरुष तथा नित्या प्रकृति ईश्वरी । शिव ! वे दोनों सदा परस्पर संयुक्त रहते हैं। वे ही सबके माता-पिता हैं । वे दोनों अपनी इच्छा के अनुसार कभी साकार और कभी निराकार होते हैं। दोनों ही सर्वस्वरूप हैं । जैसे पुरुष की नित्य प्रधानता है, उसी तरह प्रकृति की भी है। शम्भो ! यदि तुम सती को पाना चाहते हो तो प्रकृति का स्तवन करो। तुमने पूर्वकाल में दुर्वासा को प्रसन्नतापूर्वक जिस स्तोत्र का उपदेश दिया था, वह दिव्य है और उसका कण्वशाखा में वर्णन किया गया है। तुम उसी के द्वारा जगदम्बा की आराधना करो। शिव ! मेरे आशीर्वाद से तुम्हारे शोक का नाश हो। तुम्हें कल्याण की प्राप्ति हो और तुम्हारे लिये विप्लव का कारण बना हुआ पत्नी के वियोग का यह रोग दूर हो जाय । गिरिराज ! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चुप हो गये । तदनन्तर महेश्वर ने प्रकृति के स्तवन का कार्य आरम्भ किया। उन्होंने स्नान करके श्रीकृष्ण और ब्रह्मा को भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ नमस्कार किया। उस समय उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा था । ॥ शिव कृत प्रकृति स्तोत्र ॥ ॥ महेश्वर उवाच ॥ ॥ ॐ नमः प्रकृत्यै ॥ ब्राह्मि ब्रह्मस्वरूपे त्वं मां प्रसीद सनातनि । परमात्मस्वरूपे च परमानन्दरूपिणि ॥ भद्रे भद्रप्रदे दुर्गे दुर्गघ्ने दुर्गनाशिनि । पोतस्वरूपे जीर्णे त्वं मां प्रसीद भवार्णवे ॥ ७५ ॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशि सर्वबीजस्वरूपिणि । सर्वाधारे सर्वविद्ये मां प्रसीद जयप्रदे ॥ ७६ ॥ सर्वमङ्गलरूपे च सर्वमङ्गलदायिनि । समस्तमङ्गलाधारे प्रसीद सर्वमङ्गले ॥ ७७ ॥ निद्रे तन्द्रे क्षमे श्रद्धे तुष्टिपुष्टिस्वरूपिणि । लज्जे मेधे बुद्धिरूपे प्रसीद भक्तवत्सले ॥ ७८ ॥ वेदस्वरूपे वेदानां कारणे वेददायिनि । सर्ववेदाङ्गरूपे च वेदमातः प्रसीद मे ॥ ७९ ॥ दये जये महामाये प्रसीद जगदम्बिके । क्षान्ते शान्ते च सर्वान्ते क्षुत्पिपासास्वरूपिणि ॥ ८० ॥ लक्ष्मीर्नारायणक्रोडे स्रष्टुर्वक्षसि भारति । मम क्रोडे महामाये विष्णुमाये प्रसीद मे ॥ ८१ ॥ कलाकाष्ठास्वरूपे च दिवारात्रिस्वरूपिणि । परिणामप्रदे देवि प्रसीद दीनवत्सले ॥ ८२ ॥ कारणे सर्वशक्तीनां कृष्णस्योरसि राधिके । कृष्णप्राणाधिके भद्रे प्रसीद कृष्णपूजिते ॥ ८३ ॥ यशःस्वरूपे यशसां कारणे च यशःप्रदे । सर्वदेवीस्वरूपे च नारीरूपविधायिनि ॥ ८४ ॥ समस्तकामिनीरूपे कलांशेन प्रसीद मे । सर्वसंपत्स्वरूपे च सर्वसंपत्प्रदे शुभे ॥ ८५ ॥ प्रसीद परमानन्दे कारणे सर्वसंपदाम् । यशस्विनां पूजिते च प्रसीद यशसां निधे ॥ ८६ ॥ आधारे सर्वजगतां रत्नाधारे वसुन्धरे । चराचरस्वरूपे च प्रसीद मम मा चिरम् । ८७ ॥ योगस्वरूपे योगीशे योगदे योगकारणे । योगाधिष्ठात्रि देवीशे प्रसीद सिद्धयोगिनि ॥ ८८ ॥ सर्वसिद्धिस्वरूपे च सर्वसिद्धिप्रदायिनि । कारणे सर्व सिद्धीनां सिद्धेश्वरि प्रसीद मे ॥ ८९ ॥ व्याख्यानं सर्वशास्त्राणां मतभेदे महेश्वरि । ज्ञाने यदुक्तं तत्सर्वं क्षमस्व परमेश्वरि ॥ ९० ॥ केचिद्वदन्ति प्रकृतेः प्राधान्यं पुरुषस्य च । केचित्तत्र मतद्वैधे व्याख्याभेदं विदुर्बुधाः ॥ ९१ ॥ महाविष्णोर्नाभिदेशे स्थितं तं कमलोद्भवम् । मधुकैटभौ महादैत्यौ लीलया हंतुमुद्यतौ ॥ ९२ ॥ दृष्ट्वा स्तुतिं प्रकुर्वन्तं ब्रह्माणं रक्षितुं पुरा । बोधयामास गोविन्दं विनाशहेतवे तयोः ॥ ९३ ॥ नारायणस्त्वद्भक्त्या च जघान तौ महासुरौ । सर्वेश्वरस्त्वया सार्द्धमनीशोऽयं त्वया विना ॥ ९४ ॥ पुरा त्रिपुरसंग्रामे गगनात्पतिते मयि । त्वया च विष्णुना सार्द्धं रक्षितोऽहं सुरेश्वरि ॥ ९५ ॥ अधुना रक्ष मामीशे प्रदग्धं विरहाग्निना । स्वात्मदर्शनपुण्येन क्रीणीहि परमेश्वरि ॥ ९६ ॥ महेश्वर बोले — ‘ॐ नमः प्रकृत्यै’ ॐ (सच्चिदानन्दमयी) प्रकृतिदेवी को नमस्कार है । ब्राह्मि ! तुम ब्रह्मस्वरूपिणी हो । सनातनि ! परमात्मस्वरूपे ! परमानन्दरूपिणि! तुम मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। भद्रे ! तुम भद्र अर्थात् कल्याण प्रदान करनेवाली हो। दुर्गे ! तुम दुर्गम संकट का निवारण तथा दुर्गति का नाश करने वाली हो । भवसागर से पार उतारने के लिये नूतन एवं सुदृढ़ नौकास्वरूपिणी देवि! मुझ पर कृपा करो । सर्वस्वरूपे ! सर्वेश्वर ! सर्वबीजस्वरूपिणि! सर्वाधारे ! सर्वविद्ये ! विजयप्रदे! मुझ पर प्रसन्न होओ। सर्वमङ्गले! तुम सर्वमङ्गलरूपा, सभी मङ्गलों को देनेवाली तथा सम्पूर्ण मङ्गलों की आधारभूता हो; मेरे ऊपर कृपा करो। भक्तवत्सले! तुम निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, श्रद्धा, तुष्टि, पुष्टि, लज्जा, मेधा और बुद्धिरूपा हो; मुझ पर प्रसन्न होओ। वेदमातः ! तुम वेदस्वरूपा, वेदों का कारण, वेदों का ज्ञान देनेवाली और सम्पूर्ण वेदाङ्ग-स्वरूपिणी हो; मेरे ऊपर कृपा करो । जगदम्बिके! तुम दया, जया, महामाया, क्षमाशील, शान्त, सबका अन्त करने वाली तथा क्षुधा- पिपासारूपिणी हो; मुझ पर प्रसन्न होओ। विष्णुमाये ! तुम नारायण की गोद में लक्ष्मी, ब्रह्मा के वक्षः- स्थल में सरस्वती और मेरी गोद में महामाया हो; मेरे ऊपर कृपा करो। दीनवत्सले ! तुम कला, दिशा, दिन तथा रात्रिस्वरूपा एवं कर्मों के परिणाम (फल) – को देने वाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। राधिके ! तुम सभी शक्तियों का कारण, श्रीकृष्ण के हृदयमन्दिर में निवास करने वाली, श्रीकृष्ण की प्राणों से भी अधिक प्रिया तथा श्रीकृष्ण से पूजित हो । मेरे ऊपर कृपा करो। देवि! तुम यशः स्वरूपा, सभी यश की कारणभूता, यश देने वाली, सम्पूर्ण देवीस्वरूपा और अखिल नारीरूप की सृष्टि करनेवाली हो । शुभे ! तुम अपनी कला के अंशमात्र से सम्पूर्ण कामिनियों का रूप धारण करने वाली, सर्व-सम्पत्स्वरूपा तथा समस्त सम्पत्ति-को देने वाली हो; मुझ पर प्रसन्न होओ। देवि! तुम परमानन्दस्वरूपा, सम्पूर्ण सम्पत्तियों का कारण, यशस्वियों से पूजित और यश की निधि हो; मेरे ऊपर कृपा करो । देवि! तुम समस्त जगत् एवं रत्नों की आधारभूता वसुन्धरा हो, चर और अचरस्वरूपा हो; मुझ पर शीघ्र ही प्रसन्न होओ। सिद्धयोगिनि ! तुम योगस्वरूपा, योगियों की स्वामिनी, योग को देनेवाली, योग की कारणभूता, योग की अधिष्ठात्री देवी और देवियों की ईश्वरी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। सिद्धेश्वरि ! तुम सम्पूर्ण सिद्धिस्वरूपा, समस्त सिद्धियों को देने वाली तथा सभी सिद्धियों का कारण हो; मुझ पर प्रसन्न होओ। महेश्वरि ! विभिन्न मतों के अनुसार जो समस्त शास्त्रों का व्याख्यान है, उसका तात्पर्य तुम्हीं हो। ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरि ! मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, वह सब तुम क्षमा करो। कुछ विद्वान् प्रकृति की प्रधानता बतलाते हैं और कुछ पुरुष की । कुछ विद्वान् इन दो प्रकार के मतों में व्याख्या-भेद को ही कारण मानते हैं। पहले प्रलयका लमें एकार्ण वके जल में शयन करने वाले महाविष्णु के नाभिदेश से प्रकट हुए कमल पर, उसी से उत्पन्न हुए जो ब्रह्माजी बैठे थे, उन्हें महादैत्य मधु और कैटभ खेल-खेल में ही मारने को उद्यत हो गये। तब ब्रह्माजी अपनी रक्षा के लिये तुम्हारी स्तुति करने लगे। उन्हें स्तुति करते देख तुमने उन दोनों महादैत्यों के विनाश के लिये जलशायी महाविष्णु को जगा दिया। तब नारायण ने तुम शक्ति की सहायता से उन दोनों महादैत्यों को मार डाला। ये भगवान् तुम्हारा सहयोग पाकर ही सब कुछ करने में समर्थ हैं। तुम्हारे बिना शक्तिहीन होने के कारण ये कुछ भी नहीं कर सकते। सुरेश्वरि ! पूर्वकाल में त्रिपुरों से संग्राम करते समय जब मैं आकाश से नीचे गिर पड़ा, तब तुमने ही विष्णु के साथ आकर मेरी रक्षा की थी । ईश्वर ! इस समय मैं विरहाग्नि से जल रहा हूँ; तुम मेरी रक्षा करो। परमेश्वरि ! अपने दर्शन के पुण्य से मुझे क्रीत दास बना लो । यह कहकर शम्भु मौन हो गये। तब उन्होंने आकाश में विराजमान उस देवी प्रकृति को प्रसन्नता-पूर्वक देखा, जो रत्नसार निर्मित रथ पर बैठी थीं । उनके सौ भुजाएँ थीं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए स्वर्ण के समान देदीप्यमान थी । वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित थीं और उनके प्रसन्न-मुख पर मन्द हास की छटा छा रही थी। उन जगन्माता सती को देखकर विरहासक्त शंकर ने पुनः शीघ्र ही उनकी स्तुति की और रोते हुए अपने विरहजनित दुःख को निवेदन किया । तदनन्तर उन्होंने सती की अस्थियों से बनी हुई अपनी माला उन्हें दिखायी और उनके शरीरजनित भस्म को, जो शिव ने अपने अङ्गों का भूषण बना रखा था; उसकी ओर भी उनकी दृष्टि आकर्षित की। फिर अनेक प्रकार से मनुहार करके उन्होंने सुन्दरी सती को संतुष्ट किया। उस समय नारायण, ब्रह्मा, धर्म, शेषनाग, देवता और ऋषियों ने भी ‘हे ईश्वरि ! शिवकी रक्षा करो’ ऐसा कहकर उन देवी का स्तवन किया। उन सबके स्तवन से वे देवी तत्काल प्रसन्न हो गयीं तथा शिव की उन प्राणवल्लभा ने प्राणेश्वर शम्भु से कृपापूर्वक कहा । प्रकृति बोलीं — महादेव ! आप धैर्य धारण करें । प्रभो! आप मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। योगीश्वर ! आप ही आत्मा तथा जन्म-जन्म में मेरे स्वामी हैं। महेश्वर ! मैं पर्वतराज हिमालय की भार्या मेनका के गर्भ से जन्म लेकर आपकी पत्नी बनूँगी; अतः आप इस विरह-ज्वर को त्याग दीजिये । यों कह तथा शिव को आश्वासन दे वे अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी उन्हें सान्त्वना देकर चले गये। उस समय लज्जा से भगवान् शिव का मस्तक झुका हुआ था। उनका चित्त हर्ष से उत्फुल्ल हो रहा था । वे कैलास पर्वत पर चले गये और शीघ्र ही विरह-ज्वर को त्यागकर अपने गणों के साथ प्रसन्नता से नाचने लगे । जो मनुष्य शिव द्वारा किये गये इस प्रकृति स्तोत्र का पाठ करता है, उसका प्रत्येक जन्म में अपनी पत्नी से कभी वियोग नहीं होता । इहलोक में सुख भोगकर वह शिवलोक में चला जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है । (अध्याय ४३ ) ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे शंकरशोकापनो दनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ Content is available only for registered users. 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