February 22, 2025 | aspundir | Leave a comment ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 16 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ सोलहवाँ अध्याय वन में श्रीकृष्ण द्वारा बकासुर, प्रलम्बासुर और केशी का वध, उन सबका गोलोकधाम में गमन, उनके पूर्वजीवन का परिचय, पार्वती के त्रैमासिक व्रत का सविधि वर्णन तथा नन्द की आज्ञा के अनुसार समस्त व्रजवासियों का वृन्दावन में गमन भगवान् नारायण कहते हैं — मुने ! एक समय की बात है। माधव – श्रीकृष्ण अन्यान्य बालकों और हलधर के साथ खा-पीकर खेलने के लिये श्रीवन में गये। वहाँ मधुसूदन ने नाना प्रकार की बालोचित क्रीड़ाएँ कीं। वह क्रीड़ा समाप्त करके गोपबालकों के साथ उन्होंने गोधन को आगे बढ़ाया। वहाँ वन में स्वादिष्ट जल पीकर वे महाबली श्रीकृष्ण उस स्थान से गोधनसहित मधुवन में गये। उस वन में एक बलवान् और भयंकर दैत्य था, जिसकी आकृति और मुख बड़े विकराल थे। उसका रंग सफेद था । वह पर्वताकार दैत्य बगुले के आकार में दिखायी देता था। उसने देखा, गोष्ठ में गौओं का समुदाय है और ग्वालबालों के साथ केशव और बलराम भी विद्यमान हैं। फिर तो जैसे अगस्त्य ने वातापि को उदरस्थ कर लिया था, उसी प्रकार वह दैत्य वहाँ सबको लीलापूर्वक लील गया। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीहरि बकासुर ग्रास बन गये हैं, यह देख सब देवता भय से काँप उठे। वे संत्रस्त हो हाहाकार करने लगे और हाथों में शस्त्र लेकर दौड़े। इन्द्र ने दधीचिमुनि की हड्डियों का बना हुआ वज्र चलाया; किंतु उसके प्रहार से बकासुर मर न सका । केवल उसकी एक पाँख जल गयी । चन्द्रमा ने हिमपात किया; किंतु उससे उस दानव को केवल सर्दी के कष्ट का अनुभव हुआ । सूर्यपुत्र यम ने उस पर यमदण्ड मारा; उससे वह कुण्ठित हो गया – हिल-डुल न सका । वायु ने वायव्यास्त्र चलाया, उससे वह एक स्थान से उठकर दूसरे स्थान पर चला गया। वरुण ने शिलाओं की वर्षा की; उससे उसको बहुत पीड़ा हुई । अग्निदेव ने आग्नेयास्त्र चलाकर उसकी सभी पाँखें जला दीं। कुबेर के अर्धचन्द्र से उसके पैर कट गये। ईशान के शूल से वह असुर मूर्च्छित हो गया । यह देख ऋषि और मुनि भयभीत हो श्रीकृष्ण को आशीर्वाद देने लगे। इसी बीच में श्रीकृष्ण ब्रह्मतेज से प्रज्वलित हो उठे। उन परमेश्वर ने बाहर और भीतर से दैत्य के सारे अङ्गों में दाह उत्पन्न कर दिया। तब उन सबका वमन करके उस दानव ने प्राण त्याग दिये । इस प्रकार बकासुर का वध करके बलवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों और गौओं के साथ अत्यन्त मनोहर केलि-कदम्ब-कानन में जा पहुँचे। इसी समय वहाँ वृषरूपधारी प्रलम्ब नामक असुर आ पहुँचा, जो बड़ा बलवान्, महान् धूर्त तथा पर्वत के समान विशालकाय था । उसने दोनों सींगों से श्रीहरि को उठाकर वहाँ घुमाना आरम्भ किया। यह देख सब ग्वालबाल इधर-उधर भागने और रोने लगे। परंतु बलवान् बलराम जोर-जोर से हँसने लगे; क्योंकि वे जानते थे कि मेरा भाई साक्षात् परमेश्वर है। उन्होंने बालकों को समझाया और कहा — ‘भय किस बात का है ?’ इधर मधुसूदन ने स्वयं उसके दोनों सींग पकड़ लिये और उसे आकाश में घुमाकर भूतल पर दे मारा। दैत्यराज प्रलम्ब पृथ्वी पर गिरकर अपने प्राणों से हाथ धो बैठा। यह देख सब गोपबालक हँसने, नाचने और खुशी से गीत गाने लगे। प्रलम्बासुर का वध करके बलरामसहित परमेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही गोचारण के कार्य में जुट गये। वे गौएँ चराते हुए भाण्डीरवन के पास जा पहुँचे। उस समय माधव को जाते देख बलवान् दैत्यराज केशी ने अपनी टाप से धरती को खोदते हुए शीघ्र ही इन्हें घेर लिया। उसने श्रीहरि को मस्तक पर चढ़ाकर संतुष्ट हो आकाश में सौ योजन तक उन्हें उछाल-उछालकर घुमाया और अन्त में पृथ्वी पर गिर पड़ा। उस पापी ने श्रीहरि के हाथ को दाँत से पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक चबाना आरम्भ किया । परंतु श्रीहरि के अङ्ग वज्र के समान कठोर थे। उनके अङ्ग का चर्वण करते ही दैत्य के सारे दाँत टूट गये । श्रीकृष्ण के तेज से दग्ध होकर उसने भूतल पर प्राणों का परित्याग कर दिया। स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं और वहाँ फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी। इसी बीच में दिव्यरूपधारी पार्षद विमान पर बैठे हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके दो भुजाएँ थीं । वे पीताम्बरधारी, किरीट और कुण्डल से अलंकृत तथा वनमाला से विभूषित थे। उन्होंने विनोद के लिये हाथ में मुरली ले रखी थी। उनके पैरों में मञ्जीर की मधुर ध्वनि हो रही थी। उन पार्षदों के सभी अङ्ग चन्दन से चर्चित थे। वे गोपवेष धारण किये बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उनके प्रसन्नमुख पर मन्द हास्य की छटा छा रही थी। वे श्रीकृष्णभक्तों पर अनुग्रह करने के लिये कातर जान पड़ते थे। रत्नों के सार-तत्त्व से निर्मित दीप्तिशाली दिव्य रथ पर आरूढ़ हो वे भाण्डीरवन में उस स्थान पर आये, जहाँ श्रीहरि विराजमान थे। उसी समय दिव्य वस्त्र पहने तथा रत्नमय अलंकारों से विभूषित हुए तीन पुरुष आये, जो श्रीहरि को प्रणाम करके उनकी स्तुति करते हुए उसी विमान से उत्तम गोलोक को चले गये। वे तीनों पहले के वैष्णव पुरुष थे, जो देह त्यागकर दानवी योनि को प्राप्त हुए थे । वे ही इस समय श्रीकृष्ण के हाथों मारे जाकर उनके पार्षद हो गये । नारदजी ने पूछा — महाभाग ! वे दिव्य वैष्णव पुरुष कौन थे, जो दैत्यरूप हो गये थे ? इस बात को बताइये। यह कैसी परम अद्भुत बात सुनने को मिली है ? भगवान् नारायण बोले — ब्रह्मन् ! सुनो। मैं इसका प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ। मैंने पुष्करतीर्थ में सूर्यग्रहण के अवसर पर साक्षात् महेश्वर के मुख से इस विषय को सुना था । श्रीहरि के गुण-कीर्तन के प्रसङ्ग में भगवान् शंकर ने यह कथा कही थी । गन्धमादन पर्वत पर गन्धर्वराज गन्धवाह रहा करते थे। वे श्रीहरि की सेवामें तत्पर रहने वाले महान् तपस्वी और श्रेष्ठ संत थे । मुने ! उनके चार पुत्र हुए, जो गन्धर्वों में श्रेष्ठ समझे जाते थे । वे सोते और जागते समय दिन-रात श्रीकृष्ण के चरणकमलों का ही चिन्तन करते रहते थे । वे सभी दुर्वासा के शिष्य थे और श्रीकृष्ण की आराधना में लगे रहते थे । प्रतिदिन कमल चढ़ाकर श्रीहरि की पूजा करने के पश्चात् ही जल पीते थे । उन चारों के नाम इस प्रकार हैं — वसुदेव, सुहोत्र, सुदर्शन और सुपार्श्व । वे चारों श्रेष्ठ वैष्णव थे और पुष्कर में तपस्या करते थे । चिरकाल तक तपस्या करने के पश्चात् उन्होंने मन्त्र को सिद्ध कर लिया था । उन चारों में जो ज्येष्ठ वसुदेव था, वह दुर्वासा से योग्य शिक्षा पाकर योगियों में श्रेष्ठ और सिद्ध हो गया । उसने विवाह नहीं किया । वह ब्रह्मतेज से प्रज्वलित हो तत्काल देह त्याग कर श्रीकृष्ण का पार्षद हो तट पर गया। एक दिन वे तीनों भाई चित्रसरोवर के गये। वे सूर्योदयकाल में श्रीहरि की पूजा के लिये कमल लेना चाहते थे। मुने! कमलों का संग्रह करके जाते हुए उन वैष्णवों को जब भगवान् शंकर के सेवकों ने देखा, तब वे सब उन्हें बाँधकर अपने साथ ले गये। शंकर के सेवक शरीर से बलिष्ठ थे; अतः उन दुर्बल वैष्णवों को पकड़कर उन्हें शंकरजी के पास ले गये । भगवान् शंकर को देखकर उन सब वैष्णवों ने भूतल पर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया। शिवजी उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे शीघ्र ही उनसे वार्तालाप के लिये उद्यत हुए । उस समय उनके प्रसन्नमुख पर मुस्कराहट खेल रही थी और वे उन भक्तजनों पर अनुग्रह करने के लिये कातर हो चुके थे । भगवान् शिव ने पूछा — पार्वती के सरोवर में प्रवेश करके कमल लेने वाले तुम लोग कौन हो ? पार्वती के व्रत की पूर्ति के लिये एक लाख यक्ष उस सरोवर की रक्षा करते हैं। पार्वती पति-विषयक सौभाग्य की वृद्धि के लिये जब त्रैमासिक व्रत आरम्भ करती हैं, तब वे लगातार तीन महीने तक श्रीहरि को भक्तिभाव से प्रतिदिन एक सहस्र कमल चढ़ाती हैं। भगवान् शिव का यह वचन सुनकर वे तीनों वैष्णव भयभीत हो भक्ति से मस्तक झुका हाथ जोड़कर बोले । गन्धर्वों ने कहा — प्रभो ! हमलोग गन्धर्वराज गन्धवाहके पुत्र गन्धर्वों में श्रेष्ठ हैं । महेश्वर ! हम लोग प्रतिदिन श्रीहरि को कमल चढ़ाकर ही जल पीते हैं । हे नाथ! हम यह नहीं जानते थे कि पार्वती के द्वारा इस सरोवर की रक्षा की जाती है । आप यह सारे कमल ले लीजिये और अपने व्रत को सफल बनाइये । महादेव ! हम आज कमल नहीं चढ़ायेंगे और जल भी नहीं पीयेंगे। हमने आपको ही वे कमल अर्पित कर दिये। जिनके चरण-कमल का प्रतिदिन चिन्तन करके हम कमल से पूजा करते हैं, आज साक्षात् उन्हीं को कमल अर्पण करके हम सब-के-सब पवित्र हो गये। प्रभो ! ब्रह्म एक ही है, दूसरा नहीं है । उनके कहाँ देह और कहाँ रूप ? भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही भगवान् शरीर धारण करते हैं । रूप-भेद माया से ही प्रतीत होता है । प्रभो! आप ये कमल ले लीजिये; क्योंकि आप ही हमारे प्रभु हैं । अच्युत ! हमारा हृदय जिसके ध्यान से परिपूर्ण है; आप अपने उसी रूप का हमें दर्शन कराइये । जिसकी दो भुजाएँ हैं; कमनीय किशोर अवस्था है; श्यामसुन्दर रूप है; हाथ में विनोद की साधनभूता मुरली है; जो पीताम्बरधारी है; जिसके एक मुख और दो नेत्र हैं, वे चन्दन और अगुरु से चर्चित हैं; जिसके प्रसन्नमुख पर मन्द मुस्कान की प्रभा फैल रही है; जो रत्नमय अलंकारों से विभूषित है । जिसका वक्षःस्थल मणिराज कौस्तुभ की कान्ति से अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देता है; जिसकी चूड़ा में मोर का पंख लगा है; जो मालती की माला से विभूषित है; पारिजात के फूलों के हारों से अलंकृत है; करोड़ों कन्दर्पो के लावण्य का मनोहर लीलाधाम है; समूह-की-समूह गोपियाँ मन्द मुस्कान और बाँकी चितवन से जिसकी ओर देखा करती हैं; जो नूतन यौवन से सम्पन्न तथा राधा के वक्षःस्थल पर विराजमान है; ब्रह्मा आदि जिसकी स्तुति करते हैं; जो सबके लिये वन्दनीय, चिन्तनीय और वाञ्छनीय है और जो स्वात्माराम, पूर्णकाम तथा भक्तों पर अनुग्रह के लिये कातर रहने वाला है, आपके उसी रूप का हम दर्शन करना चाहते हैं। ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ गन्धर्व भगवान् शंकर के सामने खड़े हो गये । श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन सुनकर भगवान् शंकर के श्रीअङ्गों में रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रों में आँसू भर आये। वे गन्धर्वों की उक्त बातें सुनकर उनसे इस प्रकार बोले — ‘मैंने यह जान लिया था कि तुम लोग श्रेष्ठ वैष्णव हो और अपने चरणकमलों की धूल से पृथ्वी को पवित्र करने के लिये भ्रमण कर रहे हो। मैं श्रीकृष्ण-भक्त के दर्शन की सदा ही इच्छा करता रहता हूँ; क्योंकि साधु-संत तीनों लोकों में दुर्लभ हैं । तुम लोग मुझे पार्वती और देवताओं से भी बढ़कर सदा प्रिय हो । मुझे वैष्णवजन अपने तथा अपने भक्तों से भी अधिक प्रिय हैं । परंतु मैंने पूर्वकाल में जो प्रतिज्ञा कर रखी है, वह भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये । महाभाग वैष्णवो ! सुनो। मैंने कह रखा है कि पार्वती के व्रत के समय जो लोग किसी अन्य व्रत के निमित्त इस सरोवर से कमल ले जायँगे वे शीघ्र ही आसुरी योनि को प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्ण के भक्तों का कहीं भी अशुभ नहीं होता है । तुम लोग पहले दानवी योनि में पड़कर फिर निश्चय ही गोलोक में पधारोगे । तुम्हारे मन में श्रीकृष्ण के रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये उत्कण्ठा है । अतः बच्चो ! तुम्हें भारतवर्ष के वृन्दावन में उस रूप का अवश्य दर्शन होगा। श्रीकृष्ण को देखकर उन्हीं के हाथ से मृत्यु को प्राप्त हो तुम वैष्णव-शिरोमणि बन जाओगे और दिव्य विमान पर आरूढ़ हो हरिधाम को पधारोगे । तुम लोग अभी यहाँ उस वाञ्छनीय रूप को देखने के लिये उत्सुक हो । अतः वह सब देखो ।’ ऐसा कहकर भगवान् शिव ने उन्हें उस रूप के दर्शन कराये। उस रूप के दर्शन करके उन वैष्णवों के नेत्रों में आँसू भर आये। वे सर्वरूपी श्रीहरि को प्रणाम करके दानवी योनि में चले गये । इसलिये वे दानवेश्वर हुए। वसुदेव तो पहले ही मुक्त हो चुका था । सुहोत्र बकासुर, सुदर्शन प्रलम्ब और स्वयं सुपार्श्व केशी हुआ था । भगवान् शंकर के वरदान से श्रीहरि के परम उत्तम रूप के दर्शन करके उन्हीं के हाथ से मृत्यु को प्राप्त हो वे उनके परम धाम में चले गये । विप्रवर! श्रीहरि का यह अद्भुत चरित्र कहा गया। बक, प्रलम्ब और केशी उद्धार का यह प्रसङ्ग वाचकों और श्रोताओं को मोक्ष प्रदान करने वाला है। नारदजी ने पूछा — महाभाग ! आपके कृपा-प्रसाद से यह सारी अद्भुत बात मैंने सुनी। अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पार्वती ने कौन-सा व्रत किया था ? उस व्रत के आराध्यदेव कौन हैं ? उसका फल क्या है और उसमें पालन करने योग्य नियम क्या है ? भगवन् ! उस व्रत के लिये उपयोगी द्रव्य कौन-कौन से हैं? कितने समय तक वह व्रत किया जाता है और उसकी प्रतिष्ठा में क्या-क्या करना आवश्यक होता है ? प्रभो ! भली-भाँति विचारकर बताइये । इसे सुनने के लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल है । श्रीनारायण बोले — मुने ! यह ‘ त्रैमासिक ‘ नामक व्रत है, जो नारी के पतिविषयक सौभाग्य को बढ़ाने वाला है। इस व्रत के आराध्य देवता हैं — राधिकासहित भगवान् श्रीकृष्ण । उत्तरायण के विषुव योग ज्योतिष के अनुसार विषुव, साल में दो बार होने वाली एक घटना है जब दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है:- विषुव के दौरान, सूर्य पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर होता है। विषुव दो प्रकार के होते हैं – वसंत और शरद । वसंत विषुव 20 या 21 मार्च को होता है, जबकि शरद विषुव 22 या 23 सितंबर को होता है । वसंत विषुव उत्तरी गोलार्द्ध में होता है, जबकि शरद विषुव दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है । में इसका आरम्भ होता है और दक्षिणायन आरम्भ होने तक इसकी समाप्ति हो जाती है। वैशाख की संक्रान्ति वैशाख महीने में होने वाली संक्रान्ति को मेष संक्रान्ति कहते हैं । इस दिन सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है ।से एक दिन पहले संयमपूर्वक रहकर निश्चय ही हविष्य का सेवन करे । फिर वैशाख की संक्रान्ति के दिन स्नान करके गङ्गातट पर व्रत का संकल्प ले। तदनन्तर व्रती पुरुष कलश पर, मणि में, शालग्राम शिला में अथवा जल में राधासहित श्रीकृष्ण का पूजन करे। पहले पाँच देवताओं की पूजा करके भक्तिभाव से राधावल्लभ श्रीकृष्ण का ध्यान करे। उनके सामवेदोक्त ध्यान का वर्णन करता हूँ, सुनो। नवीननीरदश्यामं पीतकौशेय वाससम् । शरत्पार्वणचन्द्रास्यमीषद्धास्यसमन्वितम् ॥ ८२ ॥ शरत्प्रफुल्लपद्माक्षं मञ्जुलाञ्छनरंजितम् । मानसं गोपिकानां च मोहयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ ८३ ॥ राधया दृश्यमानं च राधावक्षःस्थलस्थितम् । ब्रह्मानन्तेशधर्माद्यैः स्तूयमानमहं भजे ॥ ८४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण की अङ्गकान्ति सजल जलधर के समान श्याम है । वे रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं। उनका मुख शरत्काल की पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मनोहर है । उस पर मन्द हास की प्रभा फैल रही है। नेत्र शरद् ऋतु के प्रफुल्ल कमलों की शोभा को तिरस्कृत कर रहे हैं। उनमें सुन्दर अञ्जन लगा हुआ है । वे गोपियों के मन को बारंबार मोहते रहते हैं। राधा उनकी ओर देख रही हैं। वे राधा के वक्षःस्थल में विराजमान हैं। ब्रह्मा, अनन्त, शिव और धर्म आदि देवता उनकी स्तुति करते हैं । इस प्रकार श्रीकृष्ण का ध्यान करके व्रती पुरुष उस ध्यानके द्वारा ही उनका सानन्द आवाहन करे । इसके बाद वह राधा का ध्यान करे । वह ध्यान यजुर्वेद की माध्यन्दिनशाखा में वर्णित है। राधां रासेश्वरीं रम्यां रासोल्लासरसोत्सुकाम् । रासमण्डलमध्यस्थां रासाधिष्ठातृदेवताम् ॥ ८६ ॥ रासेश्वरोरःस्थलस्थां रसिकां रसिकप्रियाम् । रसिकप्रवरां रम्यां रमां च रमणोत्सुकाम् ॥ ८७ ॥ शरद्राजीवराजीनां प्रभामोचनलोचनाम् । वक्रभ्रूभङ्गसंयुक्तां मञ्जीरेणैव रञ्जिताम् ॥ ८८ ॥ शरत्पार्वणचन्द्रास्यामीषद्धास्यमनोहराम् । चारुचम्पकवर्णाभां चन्दनेन विभूषिताम् ॥ ८९ ॥ कस्तूरीबिन्दुना सार्धं सिंदूरबिंदुना युताम् । चारुपत्रावलीयुक्तां वह्निशुद्धांशुकोज्ज्वलाम् ॥ ९० ॥ सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च सुकपोलस्थलोज्ज्वलाम् । रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षःस्थलविराजिताम् ॥ ९१ ॥ रत्नकङ्कणकेयूरकिङ्किणीरत्नरञ्जिताम् । सद्रत्नसाररचितक्वणन्मञ्जीररञ्जिताम् ॥ ९२ ॥ ब्रह्मादिभिश्च सेव्येन श्रीकृष्णेनैव सेविताम् । सर्वेशेन स्तूयमानां सर्वबीजां भजाम्यहम् ॥ ९३ ॥ राधा रासेश्वरी हैं, रमणीया हैं और रासोल्लास-रस के लिये उत्सुक रहती हैं। रासमण्डल के मध्यभाग में उनका स्थान है । वे रास की अधिष्ठात्री देवी हैं। रासेश्वर के वक्षःस्थल में वास करती हैं। रास की रसिका हैं । रसिक-शेखर श्यामसुन्दर की प्रिया हैं । रसिकाओं में श्रेष्ठ हैं। सुरम्य रमारूपिणी हैं। प्रियतम के साथ रमण के लिये उत्सुक रहती हैं। उनके नेत्र शरत्काल के प्रफुल्ल कमलों की शोभा को तिरस्कृत करते हैं। वे बाँकी भौंहों से सुशोभित होती हैं । उनके नेत्रों में सुरमा शोभा पा रहा है । शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति सुन्दर मुख पर मन्द मुस्कान की प्रभा के कारण उनकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी है। मनोहर चम्पा के समान उनकी अङ्गकान्ति सुनहरी दिखायी देती है । चन्दन, कस्तूरी की बेंदी तथा सिन्दूर-बिन्दु से उनका शृङ्गार किया गया है। कपोलों पर मनोहर पत्रावली की रचना शोभा देती है। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र से उनकी उज्ज्वलता बढ़ गयी है । उत्तम रत्नों द्वारा निर्मित कुण्डलों की कान्ति से उनके सुन्दर कपोल प्रकाशित हो रहे हैं । रत्नेन्द्रसाररचित हार से वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा है। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा किङ्किणी रत्न से उनके अङ्गों की अपूर्व शोभा हो रही है । उत्तम रत्नों के सारतत्त्व से रचित मञ्जीरों की झनकार से उनके दोनों चरण सुशोभित होते । ब्रह्मा आदि के भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं । सर्वेश्वर के द्वारा उनकी स्तुति की जाती है तथा वे सबकी कारणस्वरूपा हैं । ऐसी श्रीराधा का मैं भजन करता हूँ । इस प्रकार ध्यान करके श्रीकृष्णके साथ उनका पूजन करे । प्रतिदिन भक्तिभाव से सोलह उपचार चढ़ाकर पूजा करे । व्रती पुरुष प्रत्येक उपचार को पृथक्-पृथक् करके सबको बारी-बारी से प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करे। मुने ! नित्यप्रति एक सौ आठ दिव्य सहस्रदल कमल लेकर उनकी एक सौ आठ आहुतियाँ दे । भक्तिभाव से ‘कृष्णाय स्वाहा’ इस मन्त्र का उच्चारण करके यत्नपूर्वक वे आहुतियाँ देनी चाहिये । आम और केले के कच्चे या पके फल को लेकर उसकी एक सौ आठ आहुतियाँ भक्तिभाव से दे । फल अखण्ड होने चाहिये । मुने ! प्रतिदिन सौ ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन करावे । व्रती को नित्य एक सौ आठ आहुतियों का हवन करना चाहिये। वे आहुतियाँ भक्तिपूर्वक राधिकासहित श्रीकृष्ण को देनी चाहिये । नारद! घृतमिश्रित तिल से भी हवन करे । नित्य बाजे बजावे और श्रीहरि का कीर्तन करावे । तीन मास तक इस नियम का पालन करके उसके बाद व्रत की प्रतिष्ठा करे। नारद! प्रतिष्ठा के दिन जो विधान आवश्यक है, उसे सुनो। विप्रवर! नब्बे हजार अक्षत कमल की आहुति दे और यत्नपूर्वक नौ हजार ब्राह्मणों को उत्तम, स्वादिष्ट एवं मीठे अन्न भोजन करावे । नौ हजार सात सौ बीस फल तथा नाना प्रकार के मनोहर द्रव्य का नैवेद्य अर्पण करे। इसके बाद संस्कारयुक्त अग्नि की स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे । घृतयुक्त तिल की नब्बे हजार आहुतियाँ देकर ब्राह्मणों को भक्तिभाव से वस्त्र, भोजन, यज्ञोपवीत और फलसहित अन्न और तिल के लड्डू दे । उन लड्डुओं को गन्ध – पुष्प से अर्चित करके देना चाहिये। साथ ही शीतल जल से भरे हुए नब्बे कलशों का भी दान करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करके ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिये । दक्षिणा का परिमाण वही है, जो वेदों में बताया गया है । एक हजार बैल हों और उनके सींगों में सोना मढ़ा गया हो। ब्रह्मन् ! इस प्रकार ‘ त्रैमासिक’ व्रत बताया गया। इस व्रत का अनुष्ठान कर लिया जाय तो यह विशिष्ट संतति देनेवाला और पतिसौभाग्य की वृद्धि करने वाला होता है। इस व्रत के प्रभाव से सौ जन्मों तक नारी का अखण्ड सौभाग्य बना रहता है और निश्चय ही वह सौ जन्मों तक सत्पुत्र की जननी होती है। उसका कभी पति और पुत्र से वियोग नहीं होता । पुत्र दास की भाँति उसकी आज्ञा का पालक होता है तथा पति भी उसकी बात को माननेवाला होता है। वह सती नारी प्रतिक्षण श्रीराधा-कृष्ण की भक्ति से सम्पन्न होती है। व्रत के प्रभाव से उसको ज्ञान तथा श्रीहरि की स्मृति प्राप्त होती है। इस सामवेदोक्त व्रत का पूर्वकाल में हम दोनों ने भी पालन किया था। ब्रह्मन्! दूसरी स्त्रियों द्वारा उस व्रत का अनुष्ठान होता देख पार्वतीदेवी ने प्रसन्नतापूर्वक दोनों हाथ जोड़ भक्तिभाव से सिर झुकाकर भगवान् शंकर से कहा । पार्वती बोलीं — जगन्नाथ ! आज्ञा कीजिये । मैं उत्तम व्रत का पालन करूँगी। हम दोनों के इष्टदेव श्रीहरि के व्रतों में यह श्रेष्ठ व्रत है। नाथ ! श्रीहरि की आराधना समस्त मङ्गलों की कारणरूपा है । यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तीर्थसेवन और पृथ्वी की परिक्रमा – ये सब श्रीहरि की आराधना की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं। जिसके बाहर और भीतर प्रतिक्षण श्रीहरि की स्मृति बनी रहती है, उस जीवन्मुक्त पुरुष के दर्शन से ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उसके चरणकमलों की धूल पड़ने से वसुधा उसी क्षण शुद्ध हो जाती है तथा उसके दर्शनमात्र से तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, धर्म, शेषनाग, आप महेश्वर और गणेश- ये सब लोग जिनके चरणकमलों का चिन्तन करते-करते उन्हीं के समान महातेजस्वी हो गये हैं। जो जिसका सदा ध्यान करता है, वह निश्चय ही उसे प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं — ध्याता पुरुष गुण, तेज, बुद्धि और ज्ञान की दृष्टि से अपने ध्येय के समान ही हो जाता है । श्रीकृष्ण के चिन्तन, तप, ध्यान और सेवासे मैंने आप-जैसा स्वामी और पुत्र भी प्राप्त किया है। मुझे अनायास ही सब कुछ मिल गया। मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। मुझे आप-जैसे स्वामी मिले। कार्तिकेय और गणेश – जैसे पुत्र प्राप्त हुए तथा श्रीकृष्ण के अंशस्वरूप हिमवान्-जैसे पिता मिले। प्रभो ! मेरे लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है ? पार्वती की यह बात सुनकर भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए । उनका शरीर पुलकित हो उठा और वे हँसकर मधुर वाणी में बोले । श्रीमहादेवजी ने कहा — ईश्वरि ! तुम महालक्ष्मीस्वरूपा हो। तुम्हारे लिये क्या असाध्य है ? तुम सर्वसम्पत्स्वरूपा और अनन्तशक्तिरूपिणी हो । देवि! तुम जिसके घर में हो, वह सम्पूर्ण ऐश्वर्य का भाजन है। शुभप्रदे! मैं, ब्रह्मा और विष्णु तुममें भक्ति रखकर तुम्हारे कृपाप्रसाद से ही संसार की सृष्टि, पालन और संहार में समर्थ हुए हैं। हिमालय कौन है ? मेरी क्या बिसात है और कार्तिकेय तथा गणेश क्या हैं ? तुम्हारे बिना हम सब लोग असमर्थ हैं और तुम्हारा सहयोग पाकर हम सभी सब कुछ करने में समर्थ हैं । जो पतिव्रता के योग्य है और जो प्राचीनकाल से श्रुति में सुनी गयी है, वह आज्ञा परमेश्वर की आज्ञा है । पतिव्रते ! उस ईश्वरीय आज्ञा को स्वीकार करके तुम व्रत का पालन करो। अब तक जिन स्त्रियों ने इस व्रत का पालन किया है, उन सबकी अपेक्षा विलक्षण ढंग से तुम इस त्रैमासिक व्रत का अनुष्ठान करो। इस व्रत में भगवान् सनत्कुमार तुम्हारे पुरोहित हों । सुन्दरि ! इसमें जितने कमलों, ब्राह्मणों और द्रव्यों की आवश्यकता हो, उन सबको देने के लिये मैं उद्यत हूँ । तुम कुबेर को द्रव्यकोश का संरक्षक नियत करो। इस व्रत में दानाध्यक्ष मैं रहूँगा और स्वयं भगवती लक्ष्मी धन देने वाली होंगी। अग्निदेव वेद का पाठ करेंगे, वरुण-देवता जल देंगे, यक्षलोग वस्तुओं को ढोकर लाने का काम करेंगे और स्कन्द उनके अध्यक्ष रहेंगे। इस व्रत में स्थान को झाड़-बुहारकर शुद्ध करने का काम स्वयं वायुदेव करेंगे । इन्द्र रसोई परोसेंगे। चन्द्रमा व्रत के अधिष्ठापक होंगे। प्रिये ! सूर्यदेव दान का निर्वचन करेंगे; योग्यायोग्य की यथोचित व्याख्या करेंगे। सुन्दरि ! व्रत के लिये जो उपयोगी और नियमित द्रव्य हो, उसे देकर उससे भी अधिक फल-फूल तुम श्रीहरि की सेवामें समर्पित करो। व्रत में जितने ब्राह्मणों को भोजन कराने का नियम है, उतनों को भोजन कराकर तुम उससे भी अधिक असंख्य ब्राह्मणों को भक्तिभाव से भोजन के लिये निमन्त्रित करो । समाप्ति के दिन सुवर्ण, रत्न, मोती और मूँगा आदि व्रतोक्त दक्षिणा देकर सारा धन ब्राह्मणों को बाँट दो । ऐसा कहकर भगवान् शंकर ने पार्वती से उस व्रत का अनुष्ठान करवाया । पार्वती ने सब स्त्रियों की अपेक्षा विलक्षण रूप से उस व्रत का सम्पादन किया । नारद! इस प्रकार पार्वतीजी ने जो व्रत किया था, वह सब मैंने कह सुनाया। पार्वती के व्रत में ब्राह्मणलोग रत्न ढोकर ले जाने में असमर्थ हो गये । नारद ! यह सारा इतिहास तो तुमने सुन लिया, अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह श्रीकृष्ण का बालचरित्र सुनो । यह श्रीकृष्ण की बाल-लीला पद-पद में नयी-नयी प्रतीत होगी। पूर्वोक्त दानवेन्द्रों का वध करके श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ गोकुल में अपने घर को गये, जो कुबेरभवन के समान समृद्धिशाली था । वहाँ बालकों ने प्रसन्नतापूर्वक सब लोगों से वन में घटित घटनाओं की बातें बतायीं। यह सुनकर सब लोग चकित रह गये, किंतु नन्दजी को बड़ा भय हुआ। उन्होंने वृद्ध गोपों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियों को घर पर बुलवाया और उन सबके साथ समयोचित कर्तव्य का विचार करके उक्त संकट से बचने के लिये युक्ति ढूँढ़ निकाली । युक्ति निश्चित करके गोपराज उस स्थान का त्याग कर देने को उद्यत हो गये। मुने ! उन्होंने उसी क्षण सबको वृन्दावन में चलने की आज्ञा दी । नन्दजी की आज्ञा सुनकर सब लोग वहाँ जाने को उद्यत हो गये । गोप, गोपियाँ, बालक, बालिकाएँ – सब इस नयी यात्रा के लिये तैयार हो गये। समस्त ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण और हलधर के साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। अनेक प्रकार की वेश-भूषा वाले वे बालक गीत गाते हुए जा रहे थे। कोई वंशी की तान छेड़ते थे तो कोई सींग बजाते थे। किन्हीं के हाथों में करताल थे । कुछ लोगों ने अपने हाथों में वीणा ले रखी थी। किन्हीं के हाथों में शरयन्त्र थे तो किन्हीं के सिंगे । कुछ गोपबालकों ने अपने कानों में नये पल्लव पहन रखे थे। कितनों ने अधखिले कमल और दूसरे- दूसरे फूल धारण कर रखे थे। किन्हीं के हाथों में फूलों के नये-नये गजरे थे। कुछ लोगों ने आजानुलम्बिनी वनमाला गले में डाल रखी थी । कुछ बालकों ने पल्लवों तथा फूलों से अपनी चोटियाँ सजा रखी थीं। विप्रवर! सब ग्वाल- बाल, तरुण अवस्था वाली गोपियों के यूथ और बड़ी-बूढ़ी गोपियों की अपार संख्या थी । मुने! श्रीराधा की जो सुशीला आदि सहेली गोपियाँ थीं, वे नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित हो बड़ी भव्य दिखायी देती थीं। दिव्य वस्त्र धारण कर हर्ष से मुस्कराती हुई वे सब की सब वृन्दावन की ओर चलीं। कोई शिबिका पर सवार थीं तो कोई रथ पर। राधिकादेवी रत्नमय अलंकारों से विभूषित हो सुवर्णमय उपकरणों से युक्त रथ पर बैठकर उन सब सहेलियों के साथ यात्रा कर रही थीं । यशोदा और रोहिणीजी भी रत्नमय अलंकारों से अलंकृत हो सुवर्णमय उपकरणों से सुसज्जित रथ पर चढ़कर जा रही थीं । नन्द, सुनन्द, श्रीदामा, गिरिभानु, विभाकर, वीरभानु और चन्द्रभानु – ये प्रमुख गोपगण हाथी पर बैठकर सानन्द यात्रा कर रहे थे। श्रीकृष्ण और बलदेव दोनों भाई रत्ननिर्मित आभूषणों से विभूषित हो सुवर्णमय रथ पर बैठकर बड़े हर्ष के साथ वृन्दावन की ओर जा रहे थे । कोटि-कोटि बूढ़े और जवान गोप उस यात्रा में सम्मिलित थे । कोई घोड़े पर सवार थे, कोई हाथियों पर बैठे थे और कितने ही रथ पर चढ़कर यात्रा करते थे । नन्द के सेवक उद्धत गोपगण बड़े हर्ष के साथ चल रहे थे। उनमें से कुछ लोग बैलों पर सवार थे। वे सब-के-सब संगीत की तान में तत्पर थे। राधिका की दूसरी-दूसरी दासियाँ बहुत बड़ी संख्या में यात्रा कर रही थीं, उनके मन में बड़ा उल्लास था । मुख पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही थी और वे सब-की-सब सोने के गहनों से सजी थीं। उनमें से कितनों के हाथ में सिन्दूर थे, कितनी ही काजल लेकर चल रही थीं । किन्हीं के हाथों में कन्दुक थे तो किन्हीं के पुतलियाँ। कुछ सुन्दरी दासियाँ अपने हाथों में भोग-द्रव्य और क्रीड़ा-द्रव्य लेकर चल रही थीं। किन्हीं के हाथों में वेषरचना की सामग्री थी तो किन्हीं के हाथों में फूलों की मालाएँ । कुछ गोपियाँ हाथों में वीणा आदि वाद्य लिये सानन्द यात्रा कर रही थीं। कुछ अपने साथ अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रों का भार लिये चल रही थीं। कितनी ही चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसर का द्रव ले जा रही थीं। कोई संगीत में मग्न थीं तो कोई विचित्र कथाएँ कह रही थीं। उस समय कोटि- कोटि शिबिकाएँ, रथ, घोड़े, गाड़ियाँ, बैल और लाखों हाथी आदि चल रहे थे । मुने! वृन्दावन में पहुँचकर सबने उसे गृहशून्य देखा । तब वे सभी लोग वृक्षों के नीचे यथास्थान ठहर गये । उस समय श्रीकृष्ण ने गोपों को अभीष्ट गृह और गौओं के ठहरने के स्थान बताते हुए कहा — ‘ आज इसी तरह ठहरो। कल सब व्यवस्था हो जायगी ।’ श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर गोपों ने पूछा — ‘कन्हैया ! यहाँ कहाँ घर हैं।’ उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण बोले — ‘इस स्थान पर बहुत-से स्वच्छ गृह हैं, जिन्हें देवताओं ने बनाया है; परंतु उन देवताओं को प्रसन्न किये बिना कोई भी गृह हमारी दृष्टि में नहीं आ सकते। अतः गोपगण! आज वनदेवताओं की पूजा करके बाहर ही ठहरो । प्रातः काल तुम्हें यहाँ निश्चय ही बहुत-से रमणीय गृह दिखायी देंगे। धूप, दीप, नैवेद्य, भेंट, पुष्प और चन्दन आदि के द्वारा वट के मूलभाग में स्थित चण्डिकादेवी की पूजा करो । ‘ श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर गोपों ने दिन में देवताओं की पूजा करके भोजन आदि किये और रात में वहीं प्रसन्नतापूर्वक शयन किया । (अध्याय १६) ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे बकप्रलम्बकेशिवधपूर्वकवृन्दावनगमनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ Content is available only for registered users. 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