॥ पाशुपतास्त्र प्रयोगः ॥

भगवान शिव का पशुपति प्रयोग ग्रह बाधा, क्षुद्र रोग, पशुता (जड़ता) का नाश करने वाला प्रज्ञा एवं बुद्धि प्रदाता तथा पालनकर्ता एवं प्रबल संहारक मंत्र है ।
अति आवश्यकता में ही शत्रुसंहार हेतु प्रयोग किया जाता है ।
मन्त्रोद्धार – तारो (ॐ) वान्तो (श) धरा (ल) संस्थो, वामनेत्रन्दु भूषितः (ईकार विन्दु) पार्श्वो (प) वकः (श) कर्णयुक्त (उकार) वर्म. (हूं) अस्त्रान्तः (फट्) ।
शारदा तिलक में वान्तो की जगह टीका में व्यक्त (शकार) लिखा है अतः

षडक्षर मंत्र –
“ॐ श्लीं पशु हुं फट् ।”

विनियोगः- ॐ अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, पशुपतास्त्ररूप पशुपति देवता, सर्वत्र यशोविजय लाभार्थे जपे विनियोगः ।
षडङ्गन्यासः – शारदा तिलक में कहा है ‘षडभिर्वणैः षडङ्गानि हुंकडन्तैः सजातिभिः । अत: मंत्र के अक्षरों के विभागों के अंत में हुं फट् लगाकर न्यास करे यथा – ॐ हुं फट् हृदयाय नमः । श्लीं हुं फट् शिरसे स्वाहा । पं हुं फट् शिखायै वषट् । शुं हुं फट् कवचाय हुं । हुं हुं फट् नेत्रत्रयाय वौषट् । फट् हुं फट् अस्त्राय फट् ।
मंत्रकोष की एक टीका में इन अङ्गन्यासो के पहिले ॐ लगाने का उल्लेख किया है ।
ध्यानम्
मध्याह्नार्कसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलम्
त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रु-स्फुरन्मूर्द्धजम् ।
हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्तिदधानं विभुम्
दंष्ट्रभीम चतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्ररूपं स्मरेत् ॥

जो मध्याह्नकालीन सूर्य के समान कान्ति से युक्त हैं, चन्द्रमा को धारण किये हुये, जिनका भयङ्कर, अट्टहास अत्यन्त उज्ज्वल है, जिनके तीन नेत्र हैं तथा जिनके शरीर में सर्पों का आभूषण सुशोभित हो रहा है जिनके ललाटस्थ अग्नि की शिखा से श्मश्रु तथा केश देदीप्यमान हो रहे हैं जो अपने कर कमलों में त्रिशूल, मुद्गर, तलवार, तथा शक्ति धारण किये हुये हैं ऐसे दंष्ट्रा से भयानक चार मुख वाले दिव्य स्वरूपधारी सर्वव्यापक पशुपति का स्मरण करना चाहिए ॥

॥ मेरुतंत्रोक्त ॥-

षडक्षर मंत्र –
‘ॐ श्रीं पशु हुं फट्।

इस मंत्र के वामदेव ऋषि, छंद पंक्ति एवं देवता पशुपति है । आर्थिक विघ्नों के निवारण हेतु विशेष है ।
पञ्चवक्त्रं दशभुजं प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनं
अग्निज्वालानिभ श्मश्रुमूर्धजं भीमदंष्ट्रकम् ।
खड्गं बाणानक्षसूत्रं शक्तिं परशुमेव च
दधानं दक्षिणैर्हस्तैरूर्ध्वादि क्रमतः परै ।
खेट चापौ कुण्डिकां च त्रिशुल बह्म दण्डकं
नानाभरण सन्दीप्तं बालचन्द्रैरलंकृतम् ॥

अष्टाक्षर मंत्रः-
“ॐ श्रीं पशुपतिः हुं फट् ।”

इसके ऋष्यादि मेरुतंत्र के पूर्वोक्त ही है, ध्यान भी वही है । बीज श्रीं व शक्ति हुं है ।
न्यास हेतु षट् विभाग इस तरह से है –
(१) ॐ ॐ हृदयाय नमः (२) ॐ पं (३) ॐ शुं (४) ॐ पं (५) ॐ तिं (६) ॐ हुं फट् अस्त्राय फट् ।

श्रीविद्यार्णव तन्त्र (३०वाँ श्वास) में मन्त्र शारदा तिलकोक्त (पटल २०) तथा ध्यान मन्त्र मेरुतन्त्रोक्त है ।

यंत्रार्चनम् –
यंत्र के मध्य में प्रधान देव का ध्यान मंत्र के ‘सशक्ति’ आवाहन करे । षट्कोण मे हृदयादि न्यास मंत्रो से अंग शक्तियों का आवाहन करें । अष्टदल में ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इन्द्राणी, महालक्ष्मी, वाराही एवं चामुण्डा का पूजन करें ।
भूपूर (परिधि जो चार द्वार युक्त होती है।) में इन्द्रादि दश दिक्पालों व उनके अस्त्रों का पूजन करें ।

प्रयोग विधान –
इस मंत्र के छः लाख जप करे, अष्टाक्षर मंत्र आठ लाख जप कर दशांश होम करें ।
अपामार्ग,ढाक, निर्गुण्डी एवं आरग्वध की समिधाओं को धृत व पंचगव्य से संप्रोक्षित कर होम करे तो प्रेतादि व बालग्रहादि विघ्न दूर होते है ।
इसके मंत्र से अभिमंत्रित जल को पीड़ित व्यक्ति को पिलाया जाये तो ग्रह रुदन करता हुआ उसके शरीर का त्याग कर देता है ।
गज शांति व अश्वशांति हेतु प्रयोग गजशाला व अश्वशाला में बैठकर होम करे ।

‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में महापाशुपतास्त्र-मन्त्र इस प्रकार उद्धृत किया गया है — ‘ॐ श्लीं इसकलहीं पशुहसकलहीं हूं सकल ह्रीं फट् ।’

॥ पाशुपतास्त्र स्तोत्रम् ॥

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपञ्चनयनाय नानारूपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वाङ्गरक्ताय भिन्नाञ्जनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन-रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिनेऽसंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभञ्जनाय सूर्यसोमानिनेत्राय विष्णुकवचाय खङ्गवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रुद्रशूलाय ज्वलज्जिह्वाय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय-कारिणे ।
ॐ कृष्णपिङ्गलाय फट् । हूंकारास्त्राय फट् । वज्र-हस्ताय फट् । शक्तये फट् । दण्डाय फट् । यमाय फट् । खड़गाय फट् । नैर्ऋताय फट् । वसगाय फट् । वज्राय फट् । पाशाय फट् । ध्वजाय फट् । अङ्कुशाय फट् । गदायै फट् । कुबेराय फट् । त्रिशूलाय फट् । मुद्गराय फट् । चक्राय फट् । पद्माय फट् । नागास्त्राय फट् । ईशानाय फट् । खेटकास्त्राय फट् । मुण्डाय फट् । मुण्डास्त्राय फट् । कङ्कालास्त्राय फट् । पिच्छिकास्त्राय फट् । क्षुरिकास्त्राय फट् । ब्रह्मास्त्राय फट् । शक्त्यस्त्राय फट् । गणास्त्राय फट् । सिद्धास्त्राय फट् । पिलिपिच्छास्त्राय फट् । गन्धर्वास्त्राय फट् । पूर्वास्त्राय फट् । दक्षिणास्त्राय फट् । वामास्त्राय फट् । पश्चिमास्त्राय फट् । मंत्रास्त्राय फट् । शाकिन्यास्त्राय फट् । योगिन्यस्त्राय फट् । दण्डास्त्राय फट् । महादण्डास्त्राय फट् । नमोऽस्त्राय फट् । शिवास्त्राय फट् । ईशानास्त्राय फट् । पुरुषास्त्राय फट् । अघोरास्त्राय फट् । सद्योजातास्त्राय फट् । हृदयास्त्राय फट् । महास्त्राय फट् । गरुडास्त्राय फट् । राक्षसास्त्राय फट् । दानवास्त्राय फट् । क्षौ नरसिंहास्त्राय फट् । त्वष्ट्रस्त्राय फट् । सर्वास्त्राय फट् । नः फट् । वः फट् । पः फट् । फः फट् । मः फट् । श्रीः फट् । पेः फट् । भूः फट् । भुवः फट् । स्वः फट् । महः फट् । जनः फट् । तपः फट् । सत्यं फट् । सर्वलोक फट् । सर्वपाताल फट् । सर्वतत्व फट् । सर्वप्राण फट् । सर्वनाडी फट् । सर्वकारण फट् । सर्वदेव फट् । ह्रीं फट् । श्रीं फट् । डूं फट् । स्रुं फट् । स्वां फट् । लां फट् । वैराग्याय फट् । मायास्त्राय फट् । कामास्त्राय फट् । क्षेत्रपालास्त्राय फट् । हुंकरास्त्राय फट् । भास्करास्त्राय फट् । चन्द्रास्त्राय फट् । विघ्नेश्वरास्त्राय फट् । गौः गां फट् । स्त्रों स्त्रौं फट् । हौं हों फट् । भ्रामय भ्रामय फट् । संतापय संतापय फट् । छादय छादय फट् । उन्मूलय उन्मूलय फट् । त्रासय त्रासय फट् । संजीवय संजीवय फट् । विद्रावय विद्रावय फट् । सर्वदुरितं नाशय नाशय फट् ।

इस पाशुपत-मंत्र की एक बार आवृति करने से ही यह मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नों का नाश कर सकता है, सौ आवृतियों से समस्त उत्पातो को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय पा सकता है ।
इस मंत्र द्वारा घी और गुग्गुल के होम से मनुष्य असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर सकता है । इस पाशुपतास्त्र-मंत्र के पाठमात्र से समस्त क्लेशो की शांति हो जाती है ।

॥ आग्नेय महापुराणे- तीन सौ बाईसवाँ अध्याय ॥

 

 

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2 comments on “पाशुपतास्त्र प्रयोगः

  • क्या षडाक्षर एवम अष्टाक्षर मंत्र के लिए न्यास के षटभाग समान रहेंगे????
    क्योंकि षडाक्षर मंत्र में ‘पं’ और ‘तिं’ नहीं हैं

    • न्यास हेतु षट् विभाग इस तरह से है – (१) ॐ ॐ हृदयाय नमः (२) ॐ पं (३) ॐ शुं (४) ॐ पं (५) ॐ तिं (६) ॐ हुं फट् अस्त्राय फट् ।

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