अग्निपुराण – अध्याय 380
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ असीवाँ अध्याय
जडभरत और सौवीर नरेश का संवाद अद्वैत ब्रह्मविज्ञान का वर्णन
अद्वैत ब्रह्म विज्ञानम्

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं उस ‘अद्वैत ब्रह्मविज्ञान’ का वर्णन करूँगा, जिसे भरत ने (सौवीरराज को) बतलाया था। प्राचीनकाल की बात है, राजा भरत शालग्रामक्षेत्र में रहकर भगवान् वासुदेव की पूजा आदि करते हुए तपस्या कर रहे थे। उनकी एक मृग के प्रति आसक्ति हो गयी थी, इसलिये अन्तकाल में उसी का स्मरण करते हुए प्राण त्यागने के कारण उन्हें मृग होना पड़ा। मृगयोनि में भी वे ‘जातिस्मर’ हुए उन्हें पूर्वजन्म की बातों का स्मरण रहा। अतः उस मृगशरीर का परित्याग करके वे स्वयं ही योगबल से एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्हें अद्वैत ब्रह्म का पूर्ण बोध था। वे साक्षात् ब्रह्मस्वरूप थे, तो भी लोक में जडवत् (ज्ञानशून्य मूक की भाँति) व्यवहार करते थे। उन्हें हृष्ट-पुष्ट देखकर सौवीर-नरेश के सेवक ने बेगार में लगाने के योग्य समझा (और राजा की पालकी ढोने में नियुक्त कर दिया)। सेवक के कहने से वे सौवीरराज की पालकी ढोने लगे। यद्यपि वे ज्ञानी थे, तथापि बेगार में पकड़ जाने पर अपने प्रारब्धभोग का क्षय करने के लिये राजा का भार वहन करने लगे; परंतु उनकी गति मन्द थी। वे पालकी में पीछे की ओर लगे थे तथा उनके सिवा दूसरे जितने कहार थे, वे सब के सब तेज चल रहे थे। राजा ने देखा, ‘अन्य कहार शीघ्रगामी हैं तथा तीव्रगति से चल रहे हैं। यह जो नया आया है, इसकी गति बहुत मन्द है।’ तब वे बोले ॥ १-५ ॥’

राजा ने कहा — अरे! क्या तू थक गया? अभी तो तूने थोड़ी ही दूर तक मेरी पालकी ढोयी है। क्या परिश्रम नहीं सहा जाता? क्या तू मोटा-ताजा नहीं है? देखने में तो खूब मुस्टंड जान पड़ता है ॥ ६ ॥

ब्राह्मण ने कहा — राजन् ! न मैं मोटा हूँ, न मैंने तुम्हारी पालकी ढोयी है, न मुझे थकावट आयी है, न परिश्रम करना पड़ा है और न मुझपर तुम्हारा कुछ भार ही है। पृथ्वी पर दोनों पैर हैं, पैरों पर जङ्घाएँ हैं, जङ्घाओं के ऊपर ऊरु और ऊरुओं के ऊपर उदर (पेट) है। उदर के ऊपर वक्षःस्थल, भुजाएँ और कंधे हैं तथा कंधों के ऊपर यह पालकी रखी गयी है। फिर मेरे ऊपर यहाँ कौन-सा भार है? इस पालकी पर तुम्हारा कहा जाने वाला यह शरीर रखा हुआ है। वास्तव में तुम वहाँ (पालकी में) हो और मैं यहाँ (पृथ्वी) पर हूँ ऐसा जो कहा जाता है, वह सब मिथ्या है। सौवीरनरेश! मैं, तुम तथा अन्य जितने भी जीव हैं, सबका भार पञ्चभूतों के द्वारा ही ढोया जा रहा है। ये पञ्चभूत भी गुणों के प्रवाह में पड़कर चल रहे हैं। पृथ्वीनाथ! सत्त्व आदि गुण कर्मों के अधीन हैं तथा कर्म अविद्या के द्वारा संचित हैं, जो सम्पूर्ण जीवों में वर्तमान हैं। आत्मा तो शुद्ध, अक्षर (अविनाशी), शान्त निर्गुण और प्रकृति से परे है। सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा है। उसकी न तो कभी वृद्धि होती है और न ह्रास ही होता है। राजन् । जब उसकी वृद्धि नहीं होती और ह्रास भी नहीं होता तो तुमने किस युक्ति से व्यङ्ग्यपूर्वक यह प्रश्न किया है कि ‘क्या तू मोटा-ताजा नहीं है?’ यदि पृथ्वी, पैर, जङ्घा, ऊरु, कटि और उदर आदि आधारों एवं कंधों पर रखी हुई यह पालकी मेरे लिये भारस्वरूप हो सकती है तो यह आपत्ति तुम्हारे लिये भी समान ही है, अर्थात् तुम्हारे लिये भी यह भाररूप कही जा सकती है तथा इस युक्ति से अन्य सभी जन्तुओं ने भी केवल पालकी ही नहीं उठा रखी है, पर्वत, पेड़, घर और पृथ्वी आदि का भार भी अपने ऊपर ले रखा है। नरेश! सोचो तो सही, जब प्रकृतिजन्य साधनों से पुरुष सर्वथा भिन्न है तो कौन-सा महान् भार मुझे सहन करना पड़ता है? जिस द्रव्य से यह पालकी बनी है, उसी से मेरे, तुम्हारे तथा इन सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों का निर्माण हुआ है; इन सबकी समान द्रव्यों से पुष्टि हुई है ॥ ७-१८ ॥

यह सुनकर राजा पालकी से उतर पड़े और ब्राह्मण के चरण पकड़कर क्षमा माँगते हुए बोले ‘भगवन् । अब पालकी छोड़कर मुझपर कृपा कीजिये। मैं आपके मुख से कुछ सुनना चाहता हूँ, मुझे उपदेश दीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि आप कौन हैं? और किस निमित्त अथवा किस कारण से यहाँ आपका आगमन हुआ है ?’ ॥ १९ ॥

ब्राह्मण ने कहा — राजन् ! सुनो ‘मैं अमुक हूँ’   यह बात नहीं कही जा सकती। (तथा तुमने जो आने का कारण पूछा है, उसके सम्बन्ध में मुझे इतना ही कहना है कि) कहीं भी आने जाने को क्रिया कर्मफल का उपयोग करने के लिये ही होती है। सुख-दुःख के उपभोग ही भिन्न- भिन्न देश (अथवा शरीर) आदि की प्राप्ति कराने वाले हैं तथा धर्माधर्मजनित सुख-दुःखों को भोगने के लिये ही जीव नाना प्रकार के देश (अथवा शरीर) आदि को प्राप्त होता है ॥ २०-२१ ॥

राजा ने कहा — ब्रह्मन् ! ‘जो है’ (अर्थात् जो आत्मा सत्स्वरूप से विराजमान है तथा कर्ता- भोक्तारूप में प्रतीत हो रहा है) उसे ‘मैं हूँ’ यों कहकर क्यों नहीं बताया जा सकता ? द्विजवर ! आत्मा के लिये ‘अहम्’ शब्द का प्रयोग तो दोषावह नहीं जान पड़ता ॥ २२ ॥

ब्राह्मण ने कहा — राजन् ! आत्मा के लिये ‘अहम्’ शब्द का प्रयोग दोषावह नहीं है, तुम्हारा यह कथन बिलकुल ठीक है; परंतु अनात्मा में आत्मत्व का बोध कराने वाला ‘अहम्’ शब्द तो दोषावह है ही। अथवा जहाँ कोई भी शब्द भ्रमपूर्ण अर्थ को लक्षित कराता हो, वहाँ उसका प्रयोग दोषयुक्त ही है। जब सम्पूर्ण शरीर में एक ही आत्मा की स्थिति है, तो ‘कौन तुम और कौन मैं हूँ’ ये सब बातें व्यर्थ हैं। राजन् ! ‘तुम राजा हो, यह पालकी है, हम लोग इसे ढोने वाले कहार हैं, ये आगे चलने वाले सिपाही हैं तथा यह लोक तुम्हारे अधिकार में है’ यह जो कहा जाता है, यह सत्य नहीं है। वृक्ष से लकड़ी होती है और लकड़ी से यह पालकी बनी है, जिसके ऊपर तुम बैठे हुए हो। सौवीरनरेश! बोलो तो, इसका ‘वृक्ष’ और ‘लकड़ी’ नाम क्या हो गया? कोई भी चेतन मनुष्य यह नहीं कहता कि ‘महाराज’ वृक्ष अथवा लकड़ी पर चढ़े हुए हैं।’ सब तुम्हें पालकी पर ही सवार बतलाते हैं। (किंतु पालकी क्या है?) नृपश्रेष्ठ! रचनाकला के द्वारा एक विशेष आकार में परिणत हुई लकड़ियों का समूह ही तो पालकी है। यदि तुम इसे कोई भिन्न वस्तु मानते हो तो इसमें से लकड़ियों को अलग करके ‘पालकी’ नाम की कोई चीज ढूँढ़ो तो सही। ‘यह पुरुष, यह स्त्री, यह गौ, यह घोड़ा, यह हाथी, यह पक्षी और यह वृक्ष है’ इस प्रकार कर्मजनित भिन्न-भित्र शरीरों में लोगों ने नाना प्रकार के नामों का आरोप कर लिया है। इन संज्ञाओं को लोककल्पित ही समझना चाहिये। जिह्वा ‘अहम्’ (मैं) का उच्चारण करती है, दाँत, होठ, तालु और कण्ठ आदि भी उसका उच्चारण करते हैं, किंतु ये ‘अहम्’ (मैं) पद के वाच्यार्थ नहीं है। क्योंकि ये सब-के-सब शब्दोच्चारण के साधनमात्र हैं। किन कारणों या उक्तियों से जिह्वा कहती है कि “वाणी ही ‘अहम्’ (मैं) हूँ।” यद्यपि जिह्वा यह कहती है, तथापि ‘यदि मैं वाणी नहीं हूँ’ ऐसा कहा जाय तो यह कदापि मिथ्या नहीं है। राजन् ! मस्तक और गुदा आदि के रूप में जो शरीर है, वह पुरुष (आत्मा) से सर्वथा भिन्न है, ऐसी दशा में मैं किस अवयव के लिये ‘अहम्’ संज्ञा का प्रयोग करूँ ? भूपालशिरोमणे। यदि मुझ (आत्मा) से भिन्न कोई भी अपनी पृथक् सत्ता रखता हो तो ‘यह मैं हूँ’, ‘यह दूसरा है’ ऐसी बात भी कही जा सकती है। वास्तव में पर्वत, पशु तथा वृक्ष आदि का भेद सत्य नहीं है। शरीरदृष्टि से ये जितने भी भेद प्रतीत हो रहे हैं, सब-के-सब कर्मजन्य हैं। संसार में जिसे ‘राजा’ या ‘राजसेवक’ कहते हैं, वह तथा और भी इस तरह की जितनी संज्ञाएँ हैं, वे कोई भी निर्विकार सत्य नहीं हैं। भूपाल! तुम सम्पूर्ण लोक के राजा हो, अपने पिता के पुत्र हो, शत्रु के लिये शत्रु हो, धर्मपत्नी के पति हो और पुत्र के पिता हो इतने नामों के होते हुए मैं तुम्हें क्या कहकर पुकारूँ? पृथ्वीनाथ! क्या यह मस्तक तुम हो ? किंतु जैसे मस्तक तुम्हारा है, वैसे ही उदर भी तो है? (फिर उदर क्यों नहीं हो?) तो क्या इन पैर आदि अङ्गों में से तुम कोई हो? नहीं, तो ये सब तुम्हारे क्या हैं? महाराज ! इन समस्त अवयवों से तुम पृथक् हो, अतः इनसे अलग होकर ही अच्छी तरह विचार करो कि ‘वास्तव में मैं कौन हूँ’ ॥ २३-३७१/२

यह सुनकर राजा ने उन भगवत्स्वरूप अवधूत ब्राह्मण से कहा ॥ ३८ ॥

राजा बोले — ब्रह्मन् ! मैं आत्मकल्याण के लिये उद्यत होकर महर्षि कपिल के पास कुछ पूछने के लिये जा रहा था। आप भी मेरे लिये इस पृथ्वी पर महर्षि कपिल के ही अंश हैं, अतः आप ही मुझे ज्ञान दें। जिससे ज्ञानरूपी महासागर की प्राप्ति होकर परम कल्याण की सिद्धि हो, वह उपाय मुझे बताइये ॥ ३९-४० ॥

ब्राह्मण ने कहा — राजन् ! तुम फिर कल्याण का ही उपाय पूछने लगे। ‘परमार्थ क्या है?’ यह नहीं पूछते। ‘परमार्थ’ ही सब प्रकार के कल्याणों का स्वरूप है। मनुष्य देवताओं की आराधना करके धन-सम्पत्ति की इच्छा करता है, पुत्र और राज्य पाना चाहता है; किंतु सौवीरनरेश। तुम्हीं बताओ, क्या यही उसका श्रेय है? (इसी से उसका कल्याण होगा?) विवेकी पुरुष की दृष्टि में तो परमात्मा की प्राप्ति ही श्रेय है; यज्ञादि की क्रिया तथा द्रव्य की सिद्धि को वह श्रेय नहीं मानता। परमात्मा और आत्मा का संयोग उनके एकत्व का बोध ही ‘परमार्थ’ माना गया है। परमात्मा एक अर्थात् अद्वितीय है। वह सर्वत्र समानरूप से व्यापक, शुद्ध, निर्गुण, प्रकृति से परे, जन्म-वृद्धि आदि से रहित, सर्वगत, अविनाशी, उत्कृष्ट, ज्ञानस्वरूप, गुण-जाति आदि के संसर्ग से रहित एवं विभु है।

अब मैं तुम्हें निदाघ और ऋतु (ऋभु) का संवाद सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो ऋतु ब्रह्माजी के पुत्र और ज्ञानी थे। पुलस्त्यनन्दन निदाघ ने उनकी शिष्यता ग्रहण की। ऋतु से विद्या पढ़ लेने के पश्चात् निदाघ देविका नदी के तट पर एक नगर में जाकर रहने लगे। ऋतु ने अपने शिष्य के निवासस्थान का पता लगा लिया था। हजार दिव्य वर्ष बीतने के पश्चात् एक दिन ऋतु निदाघ को देखने के लिये गये। उस समय निदाघ बलिवैश्वदेव के अनन्तर अन्न-भोजन करके अपने शिष्य से कह रहे थे   ‘भोजन के बाद मुझे तृप्ति हुई है; क्योंकि भोजन ही अक्षय तृप्ति प्रदान करने वाला है।’ (यह कहकर वे तत्काल आये हुए अतिथि से भी तृप्ति के विषय में पूछने लगे) ॥ ४१-४८ ॥

तब ऋतु ने कहा — ब्राह्मण ! जिसको भूख लगी होती है, उसी को भोजन के पश्चात् तृप्ति होती है। मुझे तो कभी भूख ही नहीं लगी, फिर मेरी तृप्ति के विषय में क्यों पूछते हो? भूख और प्यास देह के धर्म हैं। मुझ आत्मा का ये कभी स्पर्श नहीं करते। तुमने पूछा है, इसलिये कहता हूँ। मुझे सदा ही तृप्ति बनी रहती है। पुरुष (आत्मा) आकाश की भाँति सर्वत्र व्याप्त है और मैं वह प्रत्यगात्मा ही हूँ; अतः तुमने जो मुझसे यह पूछा कि ‘आप कहाँ से आते हैं?’ यह प्रश्न कैसे सार्थक हो सकता है? मैं न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ और न किसी एक स्थान में रहता हूँ। न तुम मुझसे भिन्न हो, न में तुमसे अलग हूँ। जैसे मिट्टी का घर मिट्टी से लीपने पर सुदृढ़ होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव देह ही पार्थिव अन्न के परमाणुओं से पुष्ट होता है। ब्रह्मन् ! मैं तुम्हारा आचार्य ऋतु हूँ और तुम्हें ज्ञान देने के लिये यहाँ आया हूँ; अब जाऊँगा। तुम्हें परमार्थतत्त्व का उपदेश कर दिया। इस प्रकार तुम इस सम्पूर्ण जगत्‌ को एकमात्र वासुदेवसंज्ञक परमात्मा का ही स्वरूप समझो; इसमें भेद का सर्वथा अभाव है ॥ ४९-५५ ॥

तत्पश्चात् एक हजार वर्ष व्यतीत होने पर ऋतु पुनः उस नगर में गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा ‘निदाघ नगर के पास एकान्त स्थान में खड़े हैं।’ तब वे उनसे बोले ‘भैया! इस एकान्त स्थान में क्यों खड़े हो ?’ ॥ ५६ ॥

निदाघ ने कहा ब्रहान्। मार्ग में मनुष्यों की बहुत बड़ी भीड़ खड़ी है; क्योंकि ये नरेश इस समय इस रमणीय नगर में प्रवेश करना चाहते हैं, इसीलिये मैं यहाँ ठहर गया हूँ ॥ ५७ ॥

ऋतु ने पूछा द्विजश्रेष्ठ ! तुम यहाँ की सब बातें जानते हो; बताओ। इनमें कौन नरेश हैं और कौन दूसरे लोग हैं? ॥ ५८ ॥

निदाघ ने कहा ब्रह्मन् ! जो इस पर्वतशिखर के समान खड़े हुए मतवाले गजराज पर चढ़े हैं, वहाँ ये नरेश हैं तथा जो उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हैं, वे ही दूसरे लोग हैं। यह नीचे वाला जीव हाथी है और ऊपर बैठे हुए सज्जन महाराज हैं ॥ ५९ ॥

ऋतु ने कहा — ‘मुझे समझाकर बताओ, इनमें कौन राजा है और कौन हाथी ?’ निदाघ बोले — ‘अच्छा, बतलाता हूँ।’ यह कहकर निदाघ ऋतु के ऊपर चढ़ गये और बोले ‘अब दृष्टान्त देखकर तुम वाहन को समझ लो। मैं तुम्हारे ऊपर राजा के समान बैठा हूँ और तुम मेरे नीचे हाथी के समान खड़े हो।’ तब ऋतु ने निदाघ से कहा ‘मैं कौन हूँ और तुम्हें क्या कहूँ?’ इतना सुनते ही निदाघ उतरकर उनके चरणों में पड़ गये और बोले ‘निश्चय ही आप मेरे गुरुजी महाराज हैं; क्योंकि दूसरे किसी का हृदय ऐसा नहीं है, जो निरन्तर अद्वैत-संस्कार से सुसंस्कृत रहता हो।’ ऋतु ने निदाघ से कहा ‘मैं तुम्हें ब्रह्म का बोध कराने के लिये आया था और परमार्थ सारभूत अद्वैततत्त्व का दर्शन तुम्हें करा दिया’ ॥ ६०-६४ ॥

ब्राह्मण (जडभरत) कहते हैं राजन् ! निदाघ उस उपदेश के प्रभाव से अद्वैतपरायण हो गये। अब वे सम्पूर्ण प्राणियों को अपने से अभिन्न देखने लगे। उन्होंने ज्ञान से मोक्ष प्राप्त किया था, उसी प्रकार तुम भी प्राप्त करोगे। तुम, मैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् सब एकमात्र व्यापक विष्णु का ही स्वरूप है। जैसे एक ही आकाश नीले-पीले आदि भेदों से अनेक-सा दिखायी देता है, उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टि वाले पुरुषों को एक ही आत्मा भिन्न-भिन्न रूपों में दिखायी देता है ॥ ६५-६७ ॥

अग्निदेव कहते हैं वसिष्ठजी! इस सारभूत ज्ञान के प्रभाव से सौवीरनरेश भव-बन्धन से मुक्त हो गये। ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही इस अज्ञानमय संसारवृक्ष का शत्रु है, इसका निरन्तर चिन्तन करते रहिये ॥ ६८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अद्वैत ब्रह्म का निरूपण’ नामक तीन सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८० ॥

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