अग्निपुराण – अध्याय 378
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
निदिध्यासनरूप ज्ञान
ब्रह्मज्ञानम्

अग्निदेव कहते हैं — ब्रहान् ! मैं पृथ्वी, जल और अग्नि से रहित स्वप्रकाशमय परब्रह्म हूँ। मैं वायु और आकाश से विलक्षण ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं कारण और कार्य से भिन्न ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं विराट्स्वरूप (स्थूल ब्रह्माण्ड) से पृथक् ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं जाग्रत्-अवस्था से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं ‘विश्व’ रूप से विलक्षण ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं आकार अक्षर से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं वाक्, पाणि और चरण से हीन ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं पायु (गुदा) और उपस्थ (लिङ्ग या योनि) से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं कान, त्वचा और नेत्र से हीन ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं रस और रूप से शून्य ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं सब प्रकार की गन्धों से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं जिह्वा और नासिका से शून्य ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ । मैं स्पर्श और शब्द से हीन ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं मन और बुद्धि से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं चित्त और अहंकार से वर्जित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं प्राण और अपान से पृथक् ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं व्यान और उदान से विलग ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं समान नामक वायु से भिन्न ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं जरा और मृत्यु से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं शोक और मोह की पहुँच से दूर ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं क्षुधा और पिपासा से शून्य ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। ‘मैं शब्दोत्पत्ति आदि से वर्जित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं हिरण्यगर्भ से विलक्षण ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं स्वप्नावस्था से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। में तैजस आदि से पृथक् ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं अपकार आदि से हीन ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं समाज्ञान से शून्य ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं अध्याहार से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं सत्त्वादि गुणों से विलक्षण ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं सदसद्भाव से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं सब अवयवों से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं भेदाभेद से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं सुषुप्तावस्था से शून्य ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं प्राज्ञ-भाव से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं मकारादि से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं मान और मेय से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं मिति (माप) और माता (माप करनेवाले) से भिन्न ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं साक्षित्व आदि से रहित ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं कार्य कारण से भिन्न ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। मैं देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकाररहित तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि से मुक्त तुरीय ब्रह्म हूँ। मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्द और अद्वैतरूप ब्रह्म हूँ। मैं विज्ञानयुक्त ब्रह्म हूँ। मैं सर्वथा मुक्त और प्रणवरूप हूँ। मैं ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ और मोक्ष देने वाला समाधिरूप परमात्मा भी मैं ही हूँ ॥ १-२२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘ब्रह्मज्ञाननिरूपण’ नामक तीन सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७८ ॥

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