अग्निपुराण – अध्याय 375
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
धारणा
धारणा

अग्निदेव कहते हैं — मुने ! ध्येय वस्तु में जो मन की स्थिति होती है, उसे ‘धारणा’ कहते हैं। ध्यान की ही भाँति उसके भी दो भेद हैं — ‘साकार’ और ‘निराकार’। भगवान्‌ के ध्यान में जो मन को लगाया जाता है, उसे क्रमशः ‘मूर्त और ‘अमूर्त’ धारणा कहते हैं। इस धारणा से भगवान्‌ की प्राप्ति होती है। जो बाहर का लक्ष्य है, उससे मन जबतक विचलित नहीं होता, तबतक किसी भी प्रदेश में मन की स्थिति को ‘धारणा’ कहते हैं। देह के भीतर नियत समय तक जो मन को रोक रखा जाता है और वह अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता, यही अवस्था ‘धारणा’ कहलाती है। बारह आयाम की ‘धारणा’ होती है, बारह ‘धारणा’ का ‘ध्यान’ होता है तथा बारह ध्यानपर्यन्त जो मन की एकाग्रता है, उसे ‘समाधि’ कहते हैं। जिसका मन धारणा के अभ्यास में लगा हुआ है, उसी अवस्था में यदि उसके प्राणों का परित्याग हो जाय तो वह पुरुष अपने इक्कीस पीढ़ी का उद्धार कर के अत्यन्त उत्कृष्ट स्वर्गपद को प्राप्त होता है । योगियों के जिस-जिस अङ्ग में व्याधि की सम्भावना हो, उस-उस अङ्ग को बुद्धि से व्याप्त करके तत्त्वों की धारणा करनी चाहिये। द्विजोत्तम ! आग्नेयी, वारुणी, ऐशानी और अमृतात्मिका — ये विष्णु की चार प्रकार की धारणा करनी चाहिये। उस समय अग्नियुक्त शिखामन्त्र का, जिसके अन्त में ‘फट्’ शब्द का प्रयोग होता है, जप करना उचित है। नाड़ियों के द्वारा विकट, दिव्य एवं शुभ शूलाग्र का वेधन करे। पैर के अँगूठे से लेकर कपोल तक किरणों का समूह व्याप्त है और वह बड़ी तेजी के साथ ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर फैल रहा है, ऐसी भावना करे। महामुने ! श्रेष्ठ साधक को तबतक रश्मि-मण्डल का चिन्तन करते रहना चाहिये, जबतक कि वह अपने सम्पूर्ण शरीर को उसके भीतर भस्म होता न देखे। तदनन्तर उस धारणा का उपसंहार करे। इसके द्वारा द्विजगण शीत और श्लेष्मा आदि रोग तथा अपने पापों का विनाश करते हैं (यह ‘आग्नेयी धारणा’ है) ॥ १-१० ॥’

तत्पश्चात् धीरभाव से विचार करते हुए मस्तक और कण्ठ के अधोमुख होने का चिन्तन करे। उस समय साधक का चित्त नष्ट नहीं होता। वह पुनः अपने अन्तःकरण द्वारा ध्यान में लग जाय और ऐसी धारणा करे कि जल के अनन्त कण प्रकट होकर एक-दूसरे से मिलकर हिमराशि को उत्पन्न करते हैं और उससे इस पृथ्वी पर जल की धाराएँ प्रवाहित होकर सम्पूर्ण विश्व को आप्लावित कर रही हैं। इस प्रकार उस हिमस्पर्श से शीतल अमृतस्वरूप जल के द्वारा क्षोभवश ब्रह्मरन्ध्र से लेकर मूलाधारपर्यन्त सम्पूर्ण चक्र मण्डल को आप्लावित करके सुषुम्णा नाड़ी के भीतर होकर पूर्ण चन्द्रमण्डल का चिन्तन करे। भूख-प्यास आदि के क्रम से प्राप्त होने वाले क्लेशों से अत्यन्त पीड़ित होकर अपनी तुष्टि के लिये इस ‘वारुणी धारणा’ का चिन्तन करना चाहिये तथा उस समय आलस्य छोड़कर विष्णु-मन्त्र का जप करना भी उचित है। यह ‘वारुणी धारणा’ बतलायी गयी, अब ‘ऐशानी धारणा ‘ का वर्णन सुनिये ॥ ११-१५ ॥

प्राण और अपान का क्षय होने पर हृदयाकाश में ब्रह्ममय कमल के ऊपर विराजमान भगवान् विष्णु के प्रसाद (अनुग्रह) का तबतक चिन्तन करता रहे, जबतक कि सारी चिन्ता का नाश न हो जाय। तत्पश्चात् व्यापक ईश्वररूप से स्थित होकर परम शान्त, निरञ्जन, निराभास एवं अर्द्धचन्द्रस्वरूप सम्पूर्ण महाभाव का जप और चिन्तन करे। जबतक गुरु के मुख से जीवात्मा को ब्रह्म का ही अंश (या साक्षात् ब्रह्मरूप) नहीं जान लिया जाता, तबतक यह सम्पूर्ण चराचर जगत् असत्य होने पर भी सत्यवत् प्रतीत होता है। उस परम तत्त्व का साक्षात्कार हो जाने पर ब्रह्मा से लेकर यह सारा चराचर जगत्, प्रमाता, मान और मेय (ध्याता, ध्यान और ध्येय) — सब कुछ ध्यानगत हृदय कमल में लीन हो जाता है। जप, होम और पूजन आदि को माता की दी हुई मिठाई की भाँति मधुर एवं लाभकर जानकर विष्णुमन्त्र के द्वारा उसका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करे। अब मैं ‘अमृतमयी धारणा’ बतला रहा हूँ — मस्तक की नाड़ी के केन्द्रस्थान में पूर्ण चन्द्रमा के समान आकार वाले कमल का ध्यान करे तथा प्रयत्नपूर्वक यह भावना करे कि ‘आकाश में दस हजार चन्द्रमा के समान प्रकाशमान एक पूर्ण चन्द्रमण्डल उदित हुआ है, जो कल्याणमय कालोलों से परिपूर्ण है।’ ऐसा ही ध्यान अपने हृदय- कमल में भी करे और उसके मध्यभाग में अपने शरीर को स्थित देखे। धारणा आदि के द्वारा साधक के सभी क्लेश दूर हो जाते हैं ॥ १६-२२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘धारणानिरूपण’ नामक तीन सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७५ ॥

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