अग्निपुराण — अध्याय 367
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय
सामान्य नाम—लिङ्ग
सामान्यनामलिङ्गानि

अग्निदेव कहते हैं — मुनिवर ! अब मैं सामान्यतः नामलिङ्गों का वर्णन करूँगा ( इस प्रकरण में आये हुए शब्द प्रायः ऐसे होंगे, जो अपने विशेष्य के अनुसार तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त हो सकते हैं), आप उन्हें ध्यान देकर सुनें । सुकृति, पुण्यवान् और धन्य — ये शब्द पुण्यात्मा और सौभाग्यशाली पुरुष के लिये आते हैं । जिनकी अभिलाषा, आशय या अभिप्राय महान् हो, उन्हें महेच्छ और महाशय कहते हैं । (जिनके हृदय शुद्ध, सरल, कोमल, दयालु एवं भावुक हों, वे हृदयालु, सहृदय और सुहृदय कहलाते हैं ।) प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, विज्ञ, निष्णात और शिक्षित — सुयोग्य एवं कुशल के अर्थ में आते हैं । वदान्य, स्थूललक्ष, दानशौण्ड और बहुप्रद — ये अधिक दान करने वाले के वाचक हैं। कृती, कृतज्ञ और कुशल — ये भी प्रवीण, चतुर एवं दक्ष के ही अर्थ में आते हैं। आसक्त, उद्युक्त और उत्सुक — ये उद्योगी एवं कार्यपरायण पुरुष के लिये प्रयुक्त होते हैं। अधिक धनवान्‌ को इभ्य और आढ्य कहते हैं । परिवृढ, अधिभू, नायक और अधिप — ये स्वामी के वाचक हैं । लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील — ये शोभा और श्री से सम्पन्न पुरुष के अर्थ में आते हैं । स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थ के बोधक हैं । ‘खलपू और बहुकर — खलिहान या मैदान साफ करने वाले पुरुष के अर्थ में आते हैं । दीर्घसूत्र और चिरक्रिय— ये आलसी तथा बहुत विलम्ब से काम पूरा करने वाले पुरुष के बोधक हैं। बिना विचारे काम करने वाले को जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं। जो कार्य करने में ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है । कर्मशूर और कर्मठ — ये उत्साहपूर्वक कर्म करने वाले के वाचक हैं । खाने वाले को भक्षक, घस्मर और अर कहते हैं । लोलुप, गर्धन और गृध्नु — ये लोभी के पर्याय हैं । विनीत और प्रश्रित — ये विनययुक्त पुरुष का बोध कराने वाले हैं । धृष्णु और वियात — ये धृष्ट के लिये प्रयुक्त होते हैं । प्रतिभाशाली पुरुष के अर्थ में निभृत और प्रगल्भ शब्द का प्रयोग होता है । भीरुक और भीरु — डरपोक के, बन्दारु और अभिवादक प्रणाम करने वाले के, भूष्णु, भविष्णु और भविता होने वाले के तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक — ये जानकार के वाचक हैं । मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीब — ये मतवाले के अर्थ में आते हैं (क्षीब शब्द नान्त भी होता है, इसके क्षीबा, क्षीबाणौ, क्षीबाणः इत्यादि रूप होते हैं) । चण्ड और अत्यन्त कोपन— ये अधिक क्रोध करने वाले पुरुष के बोधक हैं। देवताओं का अनुसरण करने वाले को देवद्र्यङ् और सब ओर जाने वाले को विष्वग्द्र्यङ् कहते हैं। इसी प्रकार साथ चलने वाला सध्यङ् और तिरछा चलने वाला तिर्यङ् कहलाता है। वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक — ये कुशल वक्ता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । बहुत अनाप-शनाप बकने वाले को जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं । अपध्वस्त और धिक्कृत — ये धिक्कारे हुए पुरुष के वाचक हैं । कीलित और संयत शब्द बद्ध ( बँधे हुए) — का बोध करानेवाले हैं ॥ १-१० ॥

रवण और शब्दन — ये आवाज करने वाले के अर्थ में आते हैं । ( नाटक आदि के आरम्भ में जो मङ्गल के लिये आशीर्वादयुक्त स्तुति का पाठ किया जाता है, उसका नाम नान्दी है ।) नान्दीपाठ करने वाले को नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं । व्यसनार्त और उपरक्त — ये पीड़ित के अर्थ में आते हैं। विहस्त और व्याकुल— ये शोकाकुल पुरुष का बोध कराने वाले हैं । नृशंस, क्रूर, घातक और पाप — ये दूसरों से द्रोह करने वाले निर्दय मनुष्य के वाचक हैं। ठग को धूर्त और वञ्चक कहते हैं । वैदेह (वैधेय) और वालिश — ये मूर्ख के वाचक हैं । कृपण और क्षुद्र — ये कदर्य (कंजूस) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। मार्गण, याचक और अर्थी — ये याचना करने वाले के अर्थ में आते हैं। अहंकारी को अहंकारवान् और अहंयु तथा शुभ के भागी को शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं । कान्त, मनोरम और रुच्य — ये सुन्दर अर्थ के वाचक हैं । हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित — ये प्रिय के समानार्थक शब्द हैं । असार, फल्गु तथा शून्य — ये निस्सार अर्थ का बोध कराने वाले हैं। मुख्य, वर्य, वरेण्यक, श्रेयान् श्रेष्ठ और पुष्कल —ये श्रेष्ठ के वाचक हैं । प्राग्र्य, अग्रय, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थ में आते हैं। वडू, उरु और विपुल — ये विशाल अर्थ के बोधक हैं । पीन, पीवन्, स्थूल और पीवर — ये स्थूल या मोटे अर्थ का बोध कराने वाले हैं। स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, तनु, मात्रा, त्रुटि, लव और कण — ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थ के वाचक हैं । भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु — ये अधिक अर्थ के बोधक हैं। अखण्ड, पूर्ण और सकल — ये समग्र के वाचक हैं । उपकण्ठ, अन्तिक, अभितः, संनिधि और अभ्याश — ये समीप के अर्थ में आते हैं । अत्यन्त निकट को नेदिष्ठ कहते हैं। बहुत दूर के अर्थ में दविष्ठ शब्द का प्रयोग होता है । वृत्त, निस्तल और वर्तुल — ये गोलाकार के वाचक हैं । उच्च, प्रांशु, उन्नत और उदग्र — ये ऊँचा के अर्थ में आते हैं । ध्रुव, नित्य और सनातन — ये नित्य अर्थ के बोधक हैं । आविद्ध, कुटिल, भुग्न, वेल्लित और वक्र — ये टेढ़े का बोध कराने वाले हैं । चञ्चल और तरल — ये चपल के अर्थ में आते हैं । कठोर, जरठ और दृढ़ — ये समानार्थक शब्द हैं । प्रत्यग्र, अभिनव, नव्य, नवीन, नूतन और नव — ये नये के अर्थ में आते हैं। एकतान और अनन्यवृत्ति — ये एकाग्रचित्तवाले पुरुष के बोधक हैं। उच्चण्ड और अविलम्बित — ये फुर्ती के वाचक हैं। उच्चावच और नैकभेद — ये अनेक प्रकार के अर्थ में आते हैं । सम्बाध और कलित— ये संकीर्ण एवं गहन के बोधक हैं । तिमित, स्तिमित और क्लिन्न — ये आर्द्र या भीगे हुए के अर्थ में आते हैं। अभियोग और अभिग्रह — ये दूसरे पर किये हुए दोषारोपण के नाम हैं । स्फाति शब्द वृद्धि के और प्रथा शब्द ख्याति के अर्थ में आता है। समाहार और समुच्चय— ये समूह के वाचक हैं। अपहार और अपचय — ये ह्रास का बोध कराने वाले हैं । विहार और परिक्रम — ये घूमने के अर्थ में आते हैं। प्रत्याहार और उपादान — ये इन्द्रियों को विषयों से हटाने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । निर्हार तथा अभ्यवकर्षण — ये शरीर में धँसे हुए शस्त्रादि को युक्तिपूर्वक निकालने के अर्थ में आते हैं। विघ्न, अन्तराय और प्रत्यूह — ये विघ्न का बोध कराने वाले हैं। आस्या, आसना और स्थिति — ये बैठने की क्रिया के बोधक हैं। संनिधि और संनिकर्ष — ये समीप रहने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । किले में प्रवेश करने की क्रिया को संक्रम और दुर्गसंचर कहते हैं । उपलम्भ और अनुभव — ये अनुभूति के नाम हैं । प्रत्यादेश और निराकृति — ये दूसरे के मत का खण्डन करने के अर्थ में आते हैं। परिरम्भ, परिष्वङ्ग, संश्लेष और उपगूहन — ये आलिङ्गन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । पक्ष 1  और हेतु आदि के द्वारा निश्चित होने वाले ज्ञान का नाम अनुमा या अनुमान है। बिना हथियार की लड़ाई तथा भयभीत होने पर किये हुए शब्द का नाम डिम्ब, भ्रमर ( या डमर ) तथा विप्लव है । शब्द के द्वारा जो परोक्ष अर्थ का ज्ञान होता है, उसे शाब्दज्ञान कहते हैं । समानता देखकर जो उसके तुल्यवस्तु का बोध होता है, उसका नाम उपमान है । जहाँ कोई कार्य देखकर कारण का निश्चय किया जाय, अर्थात् अमुक कारण के बिना यह कार्य नहीं हो सकता — इस प्रकार विचार करके जो दूसरी वस्तु अर्थात् कारण का ज्ञान प्राप्त किया जाय, उसे अर्थापत्ति कहते हैं । प्रतियोगी का ग्रहण न होने पर जो ऐसा कहा जाता है कि ‘अमुक वस्तु पृथ्वी पर नहीं है, उसका नाम अभाव है। इस प्रकार मनुष्यों का ज्ञान बढ़ाने के लिये मैंने नाम और लिङ्ग – स्वरूप श्रीहरि का वर्णन किया है ॥ ११-२८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशगत सामान्य नामलिङ्गों का कथन’ नामक तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६७ ॥

1. जहाँ साध्य का संदेह हो अर्थात् जहाँ किसी वस्तु को सिद्ध करने की चेष्टा की जा रही हो — उसको ‘पक्ष’ कहते हैं तथा साध्य को सिद्ध करने के लिये जो युक्ति दी जाती है, उसे ‘हेतु’ कहते हैं। जैसे ‘पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वात् ‘ ( पर्वत पर आग है; क्योंकि वहाँ धुँआ उठता है)। यहाँ वह्नि साध्य, पर्वत पक्ष और धूम हेतु है ।

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