अग्निपुराण – अध्याय 352
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ बावनवाँ अध्याय
स्त्रीलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप
व्याकरणे स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूपं

भगवान् स्कन्द कहते हैं — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘रमा’ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं, — रमा (प्र० ए०), रमे (प्र०-द्वि०), रमाः (प्र० ब०), ‘रमाः शुभाः’ (रमाएँ शुभस्वरूपा है)। रमाम् (द्वि० ए०), रमे रमाः (द्वि० ब०)। रमया (तृ० ए०), रमाभ्याम् रमाभिः ‘रमाभिः कृतमव्ययम्।’ — (रमाओं ने अव्यय (अक्षय) पुण्य किया है)। रमायै , रमाभ्याम् (च०, पं० द्वि०), रमायाः (प०, ष० ए०), रमयोः (ष०, स०-द्वि०), ‘रमयोः शुभम्’ (दो रमाओं का शुभ)। रमाणाम् रमायाम् (स० ए०), रमासु (स॰ ब॰) । इसी प्रकार ‘कला’ आदि शब्दों के रूप होते हैं। आकारान्त ‘जरा’ शब्द के कुछ रूप भिन्न होते हैं — जरा (प्रथमा विभक्ति एक०) में जरसौ — जरे (प्र०, द्वि० द्वि०), जरसः— जराः (प्र०, द्वि०- बहु०), जरसम्- जराम् (द्वि० ए०), जरासु (स०- ब०)। अब ‘सर्वा’ शब्द के रूप कहते हैं — १- सर्वा, सर्वे, सर्वाः। २- सर्वाम् सर्वे सर्वाः। सर्वया (तृ० – ए० ), सर्वस्यै ( च० – ए०), ‘सर्वस्यै देहि ‘ ( सबको दो ) । सर्वस्याः ( प० – ए० ), सर्वस्याः ( ष० – ए० ), सर्वयोः (ष०, स० – द्वि०), शेष रूप ‘रमा’ शब्द के समान होते हैं । स्त्रीलिङ्ग नित्य द्विवचनान्त द्वि-शब्द के रूप ये हैं — द्वे (प्र० – द्वि०), द्वे (द्वि० – द्वि०), ‘त्रि’ शब्द के रूप ये हैं — १-२ – तिस्रः । तिसृणाम् ( ष० – ब० ) । ‘बुद्धि’ शब्द के रूप इस प्रकार हैं — बुद्धिः ( प्र० – ए० ), बुद्ध्या (तृ० – ए०), बुद्धये – बुद्धयै ( च० – ए०), बुद्धेः (प०, ष० – ए० ) । ‘मति’ शब्द के सम्बोधन के एकवचन में ‘हे मते’ – यह रूप होता है । ‘मुनीनाम्’ (यह ‘मुनि’ शब्द के षष्ठी – बहुवचन का रूप है) और शेष रूप ‘कवि’ शब्द के समान होते हैं । ‘नदी’ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं — नदी (प्र० – ए०), नद्यौ ( प्र० द्वि० – द्वि०), नदीम् ( द्वि०- ए० ), नदीः ( द्वि० – ब० ), नद्या ( तृ० – ए०), नदीभिः (तृ० – ब०), नद्यै ( च० – ए० ), नद्याम् (स० – ए० ), नदीषु (स० – ब० ), इसी प्रकार ‘कुमारी’ और ‘जृम्भणी’ शब्द के रूप होते हैं । ‘श्री’ शब्द के रूप भिन्न होते हैं — ‘श्रीः’ (प्र०— ए० ), श्रियौ (प्र० – द्वि० – द्वि०), श्रियः (प्र०, द्वि० – ब० ), श्रिया (तृ० – ए०), श्रियै – श्रिये ( च० – ए० ) । ‘स्त्री’ शब्द के रूप अधोलिखित हैं — स्त्रीम् – स्त्रियम् (द्वि० – ए० ), स्त्रीः – स्त्रियः ( द्वि० – ब० ), स्त्रिया (तृ० – ए० ), स्त्रियै ( च०- ए० ), स्त्रियाः ( प०, ष० – ए० ), स्त्रीणाम् (ष० ब०), स्त्रियाम् (स० – ए० ) । स्त्रीलिङ्ग ‘ग्रामणी’ शब्द का सप्तमी के एकवचन में ‘ग्रामण्याम्’ और ‘धेनु’ शब्द का चतुर्थी के एकवचन में ‘ धेन्वै, धेनवे’ रूप होते हैं ॥ १-७ ॥’

‘जम्बु’ शब्द के रूप ये हैं — जम्बूः (प्र० – ए०) जम्ब्वौ (प्र० – द्वि० – द्वि०), जम्बूः (द्वि०- ब० ), जम्बूनाम् ( ष० – ब० ) । ‘जम्बूनां फलं पिब ।’ (जामुन के फलों का रस पीयो ) । ‘वर्षाभू’ आदि शब्द के कतिपय रूप ये हैं — वर्षाभ्वौ (प्र०, द्वि० – द्वि० ) । वर्षाभ्वौ (प्र०, द्वि० – द्वि० ) । मातृः (मातृशब्द का द्वि० – ब० ) । गौः ( गो + प्र० – ए० ) । नौः (नौका) (प्र० – ए० ) । ‘वाच्’ शब्द के रूप ये हैं — वाक् – वाग् (प्र० – ए० ) (वाणी), वाचा ( तृ० – ए० ) वाग्भिः (तृ० – ब० ) । वाक्षु (स०-ब०)। पुष्पहारवाचक ‘स्रज्’ शब्द के रूप ये हैं — स्रग्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०-द्वि० ) । स्रजि (स० – ए० ) स्रजोः ( ष० स०- द्वि० ) । लतावाचक ‘वीरुध्’ शब्द के रूप ये हैं — वीरुद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं० – द्वि) वीरुत्सु (स० – ब० ) । स्त्रीलिङ्ग में प्रथमा के एकवचन में उकारानुबन्ध ‘भवत्’ शब्द का ‘भवती’ और ऋकारानुबन्ध ‘ भवत्’ शब्द का ‘भवन्ती’ रूप होता है । स्त्रीलिङ्ग ‘दीव्यत्’ शब्द का प्रथमा के एकवचन में ‘दीव्यन्ती’ रूप होता है । स्त्रीलिङ्ग में ‘भात्’ शब्द के भी प्रथमा के एकवचन में भाती- भान्ती — ये दो रूप होते हैं । स्त्रीलिङ्ग ‘तुदत्’ शब्द के भी प्रथमा एकवचन में तुदती – तुदन्ती- ये दो रूप होते हैं 1  । स्त्रीलिङ्ग में प्रथमा के एकवचन में ‘रुदत्’ शब्द का रुदती, ‘रुन्धत्’ शब्द का रुन्धती, ‘गृह्णत्’ शब्द का गृह्णती और ‘चोरयत्’ शब्द का चोरयन्ती रूप होता है । ‘दृषद्’ शब्द के रूप ये हैं — दृषद् (प्र० – ए० ), दृषद्भ्याम् (तृ० – च० एवं पं० – द्वि०), दृषदि (स०- ए० ) । विशेषविदुषी (प्र० – ए० ) । प्रथमा के एकवचन में ‘कृति’ शब्द का ‘कृतिः’ रूप होता है | ‘समिध्’ शब्द के रूप ये हैं — समित्-समिद् ( प्र० – ए० ), समिद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं० द्वि०), समिधि (स० – ए० ) । ‘सीमन् ‘ शब्द के रूप इस प्रकार हैं — सीमा (प्र० – ए० ), सीम्नि-सीमनि (स० – ए० ) । तृ०, च० एवं पं० के द्विवचन में ‘दामनी’ शब्द का दामनीभ्याम्, ‘ककुभ्’ शब्द का ककुब्भ्याम् रूप होता है । ‘का’ – ‘किम्’ शब्द (प्र० – ए०) इयम् – (इदम् शब्द प्र० – ए० ), आभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०- द्वि०), ‘इदम् ‘ शब्द के सप्तमी के बहुवचन में ‘ आसु’ रूप होता है ।, ‘गिर्’ शब्द के रूप ये हैं — गीर्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं० – द्वि०) गिरा (तृ०- ए० ), गीर्षु (स० – ब० ) । प्रथमा के एकवचन में ‘सुभूः’ और ‘सुपूः’ रूप सिद्ध होते हैं। ‘पुर्’ शब्द का तृतीया के एकवचन में ‘पुरा’ और सप्तमी के एकवचन में ‘पुरि’ रूप होता है। ‘दिव्’ शब्द के रूप ये हैं — द्यौः (प्र० – ए० ), द्युभ्याम् (तृ०, च० एवं पं० – द्वि०), दिवि (स० – ए० ), द्युषु (स० – ब० ) । तादृश्या (तृ० – ए० ), तादृशी प्र० – ए० ) — ये ‘ तादृशी’ शब्द के रूप हैं । ‘दिश्’ शब्द के रूप दिक् -दिग् दिशौ दिशः इत्यादि हैं । यादृश्याम् (स० – ए० ), यादृशी (प्र० – ए० ) – ये ‘यादृशी’ शब्द के रूप हैं। सुवचोभ्याम् (तृ०, च० एवं पं० – द्वि) सुवचस्सु (स० – ब० ) — ये ‘सुवचस्’ शब्द के रूप हैं । स्त्रीलिङ्ग में ‘अदस्’ शब्द के कतिपय रूप ये हैं — असौ (प्र० – ए० ), अमू (प्र० द्वि० – द्वि० ), अमूम् ( द्वि० – ए० ), अमूः (प्र०, द्वि० – ब० ), अमूभिः (तृ० – ब० ), अमुया ( तृ० –ए०), अमुयोः (ष०, स० – द्वि०) ॥ ८–१३ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘स्त्रीलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूपों का कथन’ नामक तीन सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५२ ॥

1. ‘भात्’ और ‘तुदत्’ दोनों के आगे स्त्रीत्वविवक्षा में ‘ड्रीप्’ प्रत्यय होने पर उसकी ‘नदी’ संज्ञा होने से ‘आच्छीनद्योर्नुम् ‘ (पा० सू० ७।१।८० ) – से वैकल्पिक ‘नुम्’ का आगम होता है; अंतः ‘भाती, भान्ती’ तथा ‘तुदती, तुदन्ती’ दो रूप होते हैं । यह पाणिनि-व्याकरण का नियम है । कुमार ने जो दो रूप माने हैं, उसकी पाणिनि के सूत्र द्वारा भी सिद्धि होती है ।

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