अग्निपुराण – अध्याय 344
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय
अर्थालंकारों का निरूपण
अर्थालङ्कारनिरूपणं

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अर्थों का अलंकरण 1 अर्थालंकार’ कहा जाता है। उसके बिना शब्द-सौन्दर्य भी मन को आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकार से हीन सरस्वती विधवा के समान शोभाहीन है। अर्थालंकार के आठ भेद माने गये हैं — स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम। पदार्थों के स्वभाव को ‘स्वरूप’ कहते हैं। उसके दो भेद बतलाये गये हैं— ‘निज’ एवं ‘आगन्तुक’। सांसिद्धिक को ‘निज’ तथा नैमित्तिक को ‘आगन्तुक’ कहा जाता है। धर्म की समानता को ‘सादृश्य’ कहते हैं। वह भी उपमा, रूपक, सहोक्ति तथा अर्थान्तरन्यास के भेद से चार प्रकार का होता है। जिसमें भेद और सामान्यधर्म के साथ उपमान एवं उपमेय की सत्ता हो, उसको ‘उपमा 2  कहते हैं; क्योंकि यत्किचिद्विवक्षित सारूप्य का आश्रय लेकर ही लोकयात्रा प्रवर्तित होती है। प्रतियोगी (उपमान) के समस्त और असमस्त होने से उपमा दो प्रकार की मानी गयी है — ‘ससमासा’ एवं ‘असमासा’। ‘घन इव श्यामः’ इत्यादि पदों में समास के कारण वाचक शब्द के लुप्त होने से ‘ससमासा उपमा’ कही गयी है, इससे भिन्न प्रकार की उपमा असमासा’ है। ‘कहीं उपमाद्योतक ‘इवादि’ पद, कहीं उपमेय और कहीं दोनों के विरह से ‘ससमासा’ उपमा के तीन भेद होते हैं। इसी प्रकार ‘असमासा’ उपमा के भी तीन भेद हैं। विशेषण से युक्त होने पर उपमा के अठारह भेद होते हैं। जिसमें साधारण धर्म का कथन या ज्ञान होता है — उपमा के उस भेदविशेष को धर्म या वस्तु की प्रधानता के कारण ‘धर्मोपमा’ 3  एवं ‘वस्तूपमा’ 4  कहा जाता है। जिसमें उपमान और उपमेय की प्रसिद्धि के अनुसार परस्पर तुल्य उपमा दी जाती है, वह ‘परस्परोपमा’ 5  होती है। प्रसिद्धि के विपरीत उपमान और उपमेय की विषमता में जब उपमा दी जाती है, तब वह ‘विपरीतोपमा’ 6 कहलाती है। उपमा — जहाँ एक वस्तु से ही उपमा देकर अन्य उपमानों का व्यावर्तन—निराकरण किया जाता है, वहाँ ‘नियमोपमा’ 7  होती है। यदि उपमेय के गुणादि धर्म की अन्य उपमानों में भी अनुवृत्ति हो तो उसे ‘अनियमोपमा’ 8  कहते हैं ॥ १-१२ ॥

एक से भिन्न धर्मों के बाहुल्य का कीर्तन होने से ‘समुच्चयोपमा’ 9  होती है। जहाँ अनेक धर्मों की समानता होने पर भी उपमान से उपमेय की विलक्षणता विवक्षित हो और इसके कारण जो अतिरिक्तत्व का कथन होता है, उसे ‘व्यतिरेकोपमा’ 10  कहते हैं। जहाँ बहुसंख्यक सदृश उपमानों द्वारा उपमा दी जाय, उसे ‘बहूपमा’ 11  माना गया है। यदि उनमें से प्रत्येक उपमान भिन्न-भिन्न साधारण धर्मों से युक्त हो तो उसे ‘मालोपमा’ 12  कहा जाता है। उपमेय को उपमान का विकार बताकर तुलना की जाय तो ‘विक्रियोपमा’ 13  होती है। यदि कवि उपमान में किसी ऐसे वैशिष्ट्य का, जो तीनों लोकों में असम्भव हो, आरोप करके उसके द्वारा उपमा देता है, तो वह ‘अद्भुतोपमा’ 14  कही जाती है। उपमान को आरोपित करके उससे अभिन्नरूप में जो उपमेय का कीर्तन होता है और उससे जो भ्रम होने का वर्णन किया जाता है, उसे ‘मोहोपमा’ 15 कहा जाता है। दो धर्मियों में से किसी एक का यथार्थ निश्चय न होने से ‘संशयोपमा’ 16  तथा पहले संशय होकर फिर निश्चय होने से ‘निश्चयोपमा’ 17  होती है। जहाँ वाक्यार्थ को उपमान बनाकर उससे ही वाक्यार्थ की उपमा दी जाय, उसको ‘वाक्यार्थोपमा’ 18  कहते हैं। यह उपमा अपने उपमान की दृष्टि से दो प्रकार की होती है— ‘साधारणी’ और ‘अतिशायिनी’। जो एक का उपमेय है, वही दूसरे का उपमान हो, अर्थात् दोनों एक-दूसरे के उपमान उपमेय कहे गये हों तो उसे ‘अन्योन्योपमा’ 19  कहते हैं। इस प्रकार यदि उत्तरोत्तर क्रम चलता जाय तो उसको ‘गमनोपमा’ 20 कहा जाता है। इसके सिवा उपमा के और भी पाँच भेद होते हैं — ‘प्रशस्त 21  ‘निन्दा’ 22  ‘कल्पिता 23  ‘सदृशी 24  एवं ‘किंचित्सदृशी 25 । गुणों की समानता देखकर उपमेय का जो तत्त्व उपमान से रूपित अभेदेन प्रतिपादित होता है, उसे ‘रूपक 26  मानते हैं। अथवा भेद के तिरोहित होने पर उपमा ही ‘रूपक’ हो जाती है। तुल्यधर्म से युक्त दो पदार्थों का एक साथ रहने का वर्णन ‘सहोक्ति’ 27  कहा जाता है ॥ १३-२३ ॥

पूर्ववर्णित वस्तु के समर्थन के लिये साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से जो अर्थान्तर का उपन्यास किया जाता है, उसे ‘अर्थान्तरन्यास’ 28  कहते हैं। जिसमें चेतन या अचेतन पदार्थ की अन्यथास्थित परिस्थिति को दूसरी तरह से माना जाता है, उसको ‘उत्प्रेक्षा’ 29  कहते हैं। लोकसीमातीत वस्तु-धर्म का कीर्तन ‘अतिशयालंकार’ 30  कहलाता है। यह ‘सम्भव’ और ‘असम्भव ‘के भेद से दो प्रकार का माना जाता है। जिसमें विशेष्यदर्शन के लिये गुण, जाति एवं क्रियादि की विकलता का प्रदर्शन— अनपेक्षता का प्रकाशन हो, उसको ‘विशेषोक्ति’ 31  कहा जाता है। जिसमें प्रसिद्ध हेतुकी व्यावृत्तिपूर्वक (अर्थात् उसका अभाव दिखाते हुए) अन्य किसी कारण को उद्भावना की जाय अथवा स्वाभाविकता स्वीकार की जाय अर्थात् बिना किसी कारण के ही स्वाभाविक रूप से कार्य की उत्पत्ति मानी जाय, उसे विभावना 32  कहते हैं। परस्पर असंगत पदार्थों का जहाँ युक्ति के द्वारा विरोधपूर्वक संगतिकरण किया जाय, वह ‘विरोधालंकार’ 33  होता है। जिसकी सिद्धि अभिलषित हो, ऐसे अर्थका साधक ‘हेतु’ 34  अलंकार कहलाता है। उस ‘हेतु’ अलंकार के भी ‘कारक’ एवं ‘ज्ञापक’— ये दो भेद हो जाते हैं। इनमें कारक हेतु कार्य-जन्मके पूर्वमें और पश्चात् भी रहनेवाला है, जो ‘पूर्वशेष’ कहा जाता है और उन्हीं भेदों में कार्य-कारणभाव से अथवा किसी नियामक स्वभाव से या अविनाभाव के दर्शन से जो अविनाभाव का नियम होता है, वह ज्ञापक हेतु का भेद है। ‘नदीपूर’ आदि का दर्शन ज्ञापक का उदाहरण है 35  ॥ २४-३२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अर्थालंकार का वर्णन’ नामक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥

1. ‘अलंकार’ शब्द की व्युत्पत्ति तीन प्रकार से उपलब्ध होती है — (१) ‘अलंकरणमलंकारः । ‘ (२) ‘अलंक्रियते अनेन इति वा अलंकार:।’ (३) ‘अलंकरोति इति अलंकार:’ । प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘अलंकार’ शब्द भावघञन्त है। दूसरी के अनुसार करणदञन्त तथा तीसरी के अनुसार कर्त्रर्थप्रधान ‘अण्’ — प्रत्ययान्त है । ‘अलंकरणमर्थानामर्थालंकार इष्यते ।’— यों कहकर अग्निपुराण में भावघञन्त ‘अलंकार’ शब्द की ही व्युत्पत्ति प्रदर्शित की गयी है । दण्डी ने काव्य- शोभाकारी धर्मों को ‘अलंकार’ कहा है ( काव्यादर्श २ । १) । वामन के मत में सौन्दर्य और अलंकार पर्यायवाची शब्द हैं [ सौन्दर्यमलंकारः १ । २ ] । इन दोनों ने क्रमशः करणदञन्त और भावघञन्त व्युत्पत्ति स्वीकार की है। किसी भी व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थों का अलंकरण ही ‘अर्थालंकार’ है, इस मान्यता में कोई बाधा नहीं आती । अतः दण्डी और वामन पर भी अग्निपुराण का ही प्रभाव मानना चाहिये। भामह ने ‘अलंकार’ शब्द की कोई सुस्पष्ट व्युत्पत्ति नहीं दी है। अतः उपर्युक्त व्युत्पत्तियों पर अग्निपुराणोक्त व्युत्पत्ति का ही प्रभाव परिलक्षित होता है । मम्मट ने ‘उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित् । ‘ — ऐसा लिखकर ‘अलंकार’ शब्द की तीसरी व्युत्पत्ति स्वीकार की है। जैसे हार आदि शरीर के अलंकरण द्वारा शरीरी को अलंकृत करते हैं, उसी प्रकार उपमा आदि अलंकार काव्य के अलंकरण द्वारा काव्यात्मा रस का अलंकरण बनते हैं। अतः वे रस के उपकारी हैं। विश्वनाथ का भी ऐसा ही मत है । भोजराज ने — ‘अलमर्थमलंकर्तुं यद्व्युत्पत्त्यादिवर्त्मना’ इत्यादि लिखकर अग्निपुराणोक्त मत का ही अनुकरण किया है।

अलंकारों की संख्या के विषय में अनेक मत उपलब्ध होते हैं। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में उपमा, दीपक, रूपक तथा यमक — केवल इन चार अलंकारों का ही उल्लेख है — ‘उपमा दीपकं चैव रूपकं यमकं तथा । काव्यस्यैते ह्यलंकाराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥ ‘ ( ना० शा० १६ । ४३ ) यद्यपि भूषण, अक्षरसंघात, शोभा और उदाहरण आदि छत्तीस अलंकार ‘नाट्यशास्त्र’ में लक्षणसहित लिखे गये हैं तथापि वे विशेषतः नाट्योपयोगी हैं। उनका काव्यबन्धों में भी यथासम्भव प्रयोग करने की प्रेरणा दी गयी है, तथापि काव्य-सम्बन्धी अलंकार चार ही भरतमुनि को पूर्वपरम्परा से प्राप्त रहे हैं, जिनका उन्होंने ‘परिकीर्त्तिताः ‘ — कहकर स्पष्टीकरण किया है । वामन ने अलंकारों के तैंतीस भेद दिखलाये हैं । दण्डी ने पैंतीस, भामह ने उनतालीस और उद्भट ने चालीस प्रकार के अलंकारों का वर्णन किया है। रुद्रट ने अपने ‘काव्यालंकार ‘में बावन तथा मम्मट ने सड़सठ अलंकारभेद दिखलाये हैं। जयदेव के ‘चन्द्रालोक’ में अलंकारों की संख्या सौ हो गयी है और अप्पय्य दीक्षित के ‘कुवलयानन्द’ में वह संख्या बढ़कर एक सौ चौबीस तक पहुँच गयी है। सरस्वतीकण्ठाभरणकार ने शब्दालंकार, अर्थालंकार और शब्दार्थोभयालंकार — इन तीन भेदों में अलंकारों का विभाजन करके तीनों की ही पृथक्-पृथक् चौबीस चौबीस संख्याएँ स्वीकार की हैं। इस प्रकार उन्होंने बहत्तर अलंकारों के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । साहित्यदर्पणकार ने सतहत्तर अर्थालंकारों का उल्लेख करके उन सबके सोदाहरण लक्षण दिये हैं । इन सभी अलंकारों के अवान्तरभेद और सांकर्यभेद से इन सबकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। अग्निपुराण में अर्थालंकार के मूलतः आठ भेद माने हैं — स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम । फिर स्वरूप के दो भेद, सादृश्य के चार भेद, अतिशय के दो भेद और विभावना के साथ विशेषोक्ति को जोड़कर दो भेद किये हैं । सादृश्य के चार भेद — उपमा, रूपक, सहोक्ति और अर्थान्तरन्यास बताकर उपमा के लगभग उनतीस भेदों का उल्लेख किया है। इन भेदों में ही अन्य बहुत-से अलंकार समाविष्ट हो गये हैं, जो दूसरे दूसरे नामों से व्यवहृत होते हैं। उन्होंने उपमा के जो अन्तिम पाँच भेद लिखे हैं, उनके नाम हैं — प्रशंसा, निन्दा, कल्पिता, सदृशी और किंचित्सदृशी । ये भेद भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में भी वर्णित हैं और वहाँ उनके लक्षण तथा उदाहरण भी दिये गये हैं। अग्निपुराण में उनके नाममात्र का संकलन वहीं से किया गया है, ऐसा जान पड़ता है ।
2. उपमा का अग्निपुराणोक्त लक्षण बहुत ही सीधा-सादा और स्पष्ट है । भरतमुनि ने सादृश्यमूलक सभी अलंकारों का ‘उपमा’ नाम दिया है — ‘ यत्किंचित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते । उपमा नाम सा ज्ञेया । ‘ ( १६ । ४१) व्यासजी ने अपने लक्षण में उपमान, उपमेय, सामान्य धर्म और भेद का उल्लेख किया है। भामह ने भी इसीको आधार बनाकर ‘यथेवशब्दौ सादृश्यमाहतुर्व्यतिरेकिणोः ‘ — ऐसा लक्षण किया है। इसमें वाचक शब्द, सामान्य धर्म तथा भेद — तीन का उल्लेख किया है । उपमानोपमेय का होना तो स्वतः सिद्ध है । वामन ने ‘उपमानोपमेयस्य गुणलेशतः साम्यमुपमा । ‘ — इस सूत्र के द्वारा उक्त अभिप्राय का ही पोषण किया है। दण्डी ने जहाँ किसी तरह भी सादृश्य की स्पष्ट प्रतीति होती हो, उसे ‘उपमा’ कहा है । मम्मट ने ‘ साधर्म्यमुपमा भेदे’, विश्वनाथ ने ‘साम्यं वाच्यमवैधर्म्यं वाक्यैक्यं उपमा द्वयोः ।’ तथा भोजराज ने ‘प्रसिद्धेरनुरोधेन यः परस्परमर्थयोः । भूयोऽवयवसामान्ययोगः सेहोपमा मता ॥ ‘ — ऐसा लक्षण किया है । इन सबने पूर्ववर्ती आचार्यों के ही मतों का उपपादन किया है।
3. दण्डी ने अपने ‘काव्यादर्श’ में अग्निपुराण – कथित उपमा के इन भेदों को ग्रहण किया है और इनके सोदाहरण लक्षण भी दिये हैं । जहाँ मुख्यतया तुल्यधर्म का प्रदर्शन किया गया, वहाँ ‘धर्मोपमा’ होती है । जैसे ‘तुम्हारी हथेली कमल के समान लाल है ‘ — इसमें लालिमारूपी धर्म का स्पष्ट कथन होने से यहाँ ‘ धर्मोपमा’ है ।
4. जिसमें शब्द से अनुपात्त – प्रतीयमान साधारण धर्म हो, केवल उपमान वस्तु का प्रतिपादन होने से वहाँ ‘वस्तूपमा’ होती है । जैसे – ‘तुम्हारा मुख कमल के समान है।’
5. ‘परस्परोपमा’ का दूसरा नाम ‘अन्योन्योपमा’ है । दण्डी ने इसी नाम से इसका उल्लेख किया है । जहाँ उपमान और उपमेय – दोनों एक-दूसरे के उपमेय तथा उपमान बनते है, वहाँ ‘परस्परोपमा’ होती है । जैसे – ‘तुम्हारे मुख के समान कमल है और कमल के समान तुम्हारा मुख है । ‘
6. दण्डी ने अपने ‘काव्यादर्श’ में विपरीतोपमा का ‘विपर्यासोपमा ‘के नाम से उल्लेख किया है। जहाँ प्रसिद्धि के विपरीत उपमानोपमेयभाव गृहीत होता है, वहाँ ‘विपरीतोपमा’ होती है। जैसे – ‘खिला हुआ कमल तुम्हारे मुख के समान प्रतीत होता था ‘ – इत्यादि ।
7. दण्डी ने इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है – ‘तुम्हारा मुख कमल के ही समान है, दूसरी किसी वस्तु के समान नहीं । ‘
8. इसका उदाहरण दण्डी के ‘काव्यादर्श’ में इस प्रकार दिया गया है – ‘ कमल तो तुम्हारे मुख का अनुकरण करता ही है, यदि दूसरी वस्तुएँ (चन्द्र आदि) भी तुम्हारे मुख के समान हैं तो रहें । ‘
9. ‘समुच्चयोपमा’ का उदाहरण दण्डी ने इस प्रकार किया है – ‘सुन्दरि ! तुम्हारा मुख केवल कान्ति से ही नहीं, आह्लादनकर्म से भी इन्दु का अनुसरण करता है।’ यहाँ कान्तिगुण और आह्लादनकर्म – दोनों का समुच्चय होने के कारण ‘समुच्चयोपमा’ कही गयी है ।
10. ‘व्यतिरेकोपमा’ को ही अर्वाचीन आलंकारिकों ने ‘व्यतिरेक’ नामक अलंकार माना है । दण्डी ने इसका उल्लेख नहीं किया है । परंतु रुय्यक और मम्मट ने इसका उदाहरण यों दिया है — ‘चन्द्रमा बारंबार क्षीण हो-होकर भी पुनः बढ़ जाता है; परंतु यौवन यदि चला गया तो फिर लौटता नहीं।’ इसमें उपमानभूत चन्द्रमा की अपेक्षा उपमेय यौवन की अस्थिरता अधिक बतायी गयी है । अतः यहाँ ‘व्यतिरेक’ है।
11. ‘तुम्हारा स्पर्श चन्दन, जल, चन्द्रकिरण तथा चन्द्रकान्तमणि आदि के समान शीतल है’ । यहाँ शीतलता में सादृश्य रखने वाले बहुत-से उपमानों द्वारा उपमा दी गयी है, अत: ‘बहूपमा’ अलंकार है । दण्डी ने अपने ‘काव्यादर्श’ में यही उदाहरण प्रस्तुत किया है । अर्वाचीन आचार्य लोग इसे ‘मालोपमा’ ही मानते हैं। उनकी ‘मालोपमा’ का लक्षण इस प्रकार है — ‘मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु दृश्यते । ‘
12. काव्यादर्शकार दण्डी ने अग्निपुराण के ही पथ का अनुसरण करते हुए ‘बहूपमा’ और ‘मालोपमा’ को अलग-अलग माना है। ‘बहूपमा’ के उदाहरण में बहुत से उपमानों की गणनामात्र करा दी गयी है, परंतु ‘मालोपमा’ में प्रत्येक उपमान के साथ साधर्म्य का अन्वय होता है। यही इन दोनों में भेद है । ‘मालोपमा का उदाहरण दण्डी ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है – ‘राजन् ! जैसे प्रकाश सूर्य में शोभा का आधान करता है, जैसे सूर्य दिन में लक्ष्मी का आधान करते हैं तथा जैसे दिन आकाश में प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार तुम्हारा बल, पराक्रम तुममें लक्ष्मी को प्रतिष्ठित करता है।’ यहाँ प्रत्येक उपमान के साथ पृथक्-पृथक् साधर्म्य का अन्वय होने से ‘मालोपमा’ मानी गयी है ।
13. ‘काव्यादर्श’ में ‘विक्रियोपमा’ का उदाहरण इस प्रकार उपलब्ध होता है — ‘ सुन्दरि ! तुम्हारा मुख चन्द्रमण्डल से उत्कीर्ण (खोदकर निकाला हुआ) -सा तथा कमल के गर्भ से उद्धृत किया हुआ-सा जान पड़ता है।’ यहाँ चन्द्रमण्डल तथा कमलगर्भ — ये प्रकृति हैं और मुख इनका विकार है । अतः यहाँ ‘विक्रियोपमा’ हुई ।
14. इसका उदाहरण दण्डी ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है — ‘सुन्दरि ! यदि कोई कमल चञ्चल लोचनों से युक्त हो जाय तो वह तुम्हारे मुख की शोभा को धारण कर सकता है।’
15. ” सुन्दरि ! मैं तुम्हारे मुख को ‘यह चन्द्रमा है ‘ —यों समझ लेता हूँ और तुम्हारे मुख के दर्शन की आशा से बारंबार चन्द्रमा की ओर दौड़ पड़ता हूँ ।’ यह वर्णन अग्निपुराणोक्त लक्षण को सामने रखकर किया गया है। अर्वाचीन आलंकारिक ‘मोहोपमा’ को ‘भ्रान्तिमान् ‘ अलंकार की संज्ञा देते हैं ।
16. दण्डी ने ‘संशयोपमा का जो उदाहरण दिया है, उसका भावार्थ इस प्रकार है — जिसके भीतर भ्रमर मँडरा रहा हो, वह कमल है या कि चञ्चल लोचनों से युक्त तुम्हारा मुख है, इस संशय से मेरा चित्त दोलायमान हो रहा है।’ आधुनिक आलंकारिक इसी को ‘संदेहालंकार’ कहते हैं ।
17. दण्डी ने इसे ‘निर्णयोपमा’ नाम दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण इस प्रकार है — ‘ जिस कमल को चन्द्रमा ने अभिभूत कर दिया था, उसकी कान्ति स्वयं चन्द्रमा को ही लज्जित कर दे, ऐसा नहीं हो सकता । अतः यह तुम्हारा मुख ही है ( कमल नहीं है) । ‘ अर्वाचीन आचार्यगण इसे ‘निश्चयान्त संदेहालंकार’ ही मानते हैं ।
18. दण्डी ने भी ‘वाक्यार्थोपमा’ का ऐसा ही लक्षण किया है । वे भी इसके दो ही भेद मानते हैं । परंतु उनके दोनों भेदों के नाम अग्निपुराण में दिये गये नामों से भिन्न हैं । अग्निपुराण में ‘साधारणी’ और ‘अतिशायिनी’ — ये दो भेद माने हैं, परंतु दण्डी ने ‘एकेवशब्दा’ और ‘ अनेकेवशब्दा’ – इस प्रकार दो भेदों का उल्लेख किया है। इनके उदाहरण ‘काव्यादर्श’ (२ ।४४-४५) में द्रष्टव्य हैं।
19. काव्यादर्श में इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है — ‘तुम्हारे मुख के समान कमल है और कमल के समान तुम्हारा मुख है।’ इसे ही ‘उपमेयोपमा’ भी कहते हैं ।
20. काव्यादर्शकार ने ‘गमनोपमा’ का उल्लेख नहीं किया है। अग्निपुराण में दिये गये लक्षण के अनुसार हम ‘गमनोपमा’ को ‘अन्योन्योपमा ‘की माला कह सकते हैं। उदाहरण के लिये निम्नाङ्कित श्लोक द्रष्टव्य है—
कौमुदी भवती विभाति मे कातराक्षि भवतीव कौमुदी । अम्बुजेन तुलितं विलोचनं लोचनेन च तवाम्बुजं समम् ॥
21.22.23.24.25. इससे पहले उपमा के अठारह भेद कहे गये हैं । इन्हीं भेदों का विस्तार करके दण्डी ने बत्तीस प्रकार की उपमाएँ प्रदर्शित की हैं । उक्त भेदों के अतिरिक्त जो उपमा के ‘प्रशंसा’ आदि पाँच भेद और कहे गये हैं, उनका आधार है — भरत का ‘नाट्यशास्त्र’ (द्रष्टव्य १६ । ४६) । भरतमुनि ने प्रशंसा आदि पाँचों भेदों के जो उदाहरण दिये हैं, वे भी सोलहवें अध्याय के श्लोक सैंतालीस से इक्यावन तक द्रष्टव्य हैं।
26. अग्निपुराणोक्त ‘रूपक’ का लक्षण नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण का संक्षिप्त रूप है। अग्निपुराण के ही भाव को लेकर दण्डी ने ‘उपमैव तिरोभूतभेदा रूपकमुच्यते ‘ — ऐसा लक्षण किया है । अर्वाचीन आलंकारिकों ने ‘रूपक’ के बहुत-से भेदों और उपभेदों की चर्चा की है। ‘रूपक’ का उदाहरण ‘नाट्यशास्त्र’ १६ । ५८ में द्रष्टव्य है ।
27. दण्डी ने गुण और क्रिया का सहभाव से कथन ‘सहोक्ति’ माना है और ‘सह दीर्घा मम श्वासैरिमाः सम्प्रति रात्रयः । ‘ ( इस समय मेरी लम्बी साँसों के साथ ये रातें भी बहुत बड़ी हो गयी हैं) ऐसा उदाहरण दिया है।
28. अर्थान्तरन्यास का जो लक्षण अग्निपुराण में दिया गया है, लगभग इसी की छाया को लेकर भामह ने इस प्रकार अपने ग्रन्थ में उक्त अलंकारका लक्षण लिखा है —
उपन्यसनमन्यस्य यदर्थस्योदितादृते । ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्यासः पूर्वार्थानुगतो यथा ॥ (का० २ । ७१)
वामन ने इसमें सादृश्य, असादृश्य (साधर्म्य, वैधर्म्य) — की चर्चा नहीं की है, परंतु ‘पूर्वार्धानुगतः ‘ — यह विशेषण देकर उसी अर्थ को व्यक्त किया है। अर्थात् जिस अर्थान्तर का उपन्यास किया जाय, वह पूर्वोदित अर्थ का अनुगामी होना चाहिये । यह अनुगमन सादृश्य अथवा वैसादृश्य से ही सम्भव है । वामन ने अग्निपुराण तथा भामह के भावों को अपने सूत्र में और भी अधिक स्पष्ट किया है।
यथा —
उक्तसिद्ध्यै वस्तुनोऽर्थान्तरस्यैव न्यसनमर्थान्तरन्यासः ॥ (का०सू० ४ । ३ । २१) काव्यादर्शकार दण्डी ने इसके लक्षण को और भी स्वच्छरूप से प्रस्तुत किया है । यथा —
ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्यासो वस्तु प्रस्तुत्य किंचन । तत्साधनसमर्थस्य न्यासो योऽन्यस्य वस्तुनः ॥ ( २ । १६९)
आचार्य मम्मट तक पहुँचते-पहुँचते इसका लक्षण पूर्णतः निखर उठा है । वे लिखते हैं —
सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते । यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण या ॥ (का०प्र० १० । १०९)
अर्थात् – सामान्य अथवा विशेष का उससे भिन्न विशेष और सामान्य से जो समर्थन किया जाता है, वह ‘अर्थान्तरन्यास’ है । यह समर्थन साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर किया जाता है। इस प्रकार अर्थान्तरन्यास के चार भेद होते हैं। इनके उदाहरण काव्यप्रकाश में द्रष्टव्य हैं ।
29. इसी लक्षण को कुछ और विशद करते हुए भामह ने इस प्रकार कहा है —
अविवक्षितसामान्या किंचिच्चोपमया सह । अतद्गुणक्रियायोगादुत्प्रेक्षातिशयान्विता ॥ (का० २।९१)
वामन ने अग्निदेव तथा भामह — दोनों के भावों को अपने सूत्र में इस प्रकार संकलित किया है —
अतद्रूपस्यान्यथाध्यवसानमतिशयार्थमुत्प्रेक्षा ॥ (का० सू० ४ । ३ । ९)
दण्डी का लक्षण इस प्रकार है—
अन्यथैव स्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा । अन्यथोत्प्रेक्ष्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां विदुर्यथा ॥ (२।२२१)
यही लक्षण अग्निपुराण में भी है । दण्डी ने उसे ज्यों-का-त्यों ले लिया है । अन्तर केवल इतना ही है कि अग्निपुराण में ‘मन्यते’ क्रिया का प्रयोग है और काव्यादर्श में ‘उत्प्रेक्ष्यते’ क्रिया का ।
आचार्य मम्मट ने थोड़े-से शब्दों में ही उत्प्रेक्षा का सर्वसम्मत रूप रख दिया है । यथा—
‘सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् । ‘ (का० प्र० १० । ९२)
अर्थात् – “प्रकृत (वर्ण्य उपमेय) – की सम ( उपमान) – के साथ सम्भावना ‘उत्प्रेक्षा’ कहलाती है । ‘
30. यह अतिशय ही आगे चलकर ‘अतिशयोक्ति’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। अग्निपुराण के इस सूक्ष्म लक्षण को आचार्य भामह ने विशद करते हुए कहा है कि — किसी ” कारणवश लोकोत्तर अर्थ का बोधक जो वचन है, उसे ‘अतिशयोक्ति’ अलंकार मानते हैं वामन ने इसके असम्भव – पक्ष को नहीं लिया है। वे सम्भाव्य धर्म तथा उसके उत्कर्ष की कल्पना को ही ‘ अतिशयोक्ति’ मानते हैं (४ । ३ । १० ) । लोकसीमातीत होने पर ही वस्तुधर्म में उत्कर्ष सिद्ध होता है। आचार्य दण्डी ने अग्निपुराणोक्त लक्षण के केवल भाव की ही नहीं, शब्द की भी छाया ली है । यथा —
विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्त्तिनी । असावतिशयोक्तिः स्यादलंकारोत्तमा यथा ॥ (काव्यादर्श २ । २१४) आचार्य मम्मट के द्वारा ‘अतिशयोक्ति’ का विकसित स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है । उपमान के द्वारा उपमेय का निगरण करके जो कल्पित अभेद – कथनरूप अध्यवसान करना है, वह एक प्रकार की ‘ अतिशयोक्ति’ है । प्रस्तुत अर्थ का अन्यरूप से वर्णन द्वितीय प्रकार की, ‘यदि’ के समानार्थक शब्द को लगाकर की गयी कल्पना तृतीय प्रकार की और कार्य-कारण के पौर्वापर्य का विपर्यय चतुर्थ प्रकार की ‘अतिशयोक्ति’ है । (का० प्र० १० । १००-१०१ )
31. दण्डी के ‘काव्यादर्श’ में अग्निपुराण की ही शब्दावली में ‘विशेषोक्ति’ लक्षित करायी गयी है । भामह ने भी अग्निपुराण के ही भाव तथा शब्द की छाया ली है। यथा—
एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्थितिः । विशेषप्रथनायासौ विशेषोक्तिर्मता यथा ॥ (३ । २३)
वामनने भी ‘एकगुणहानिकल्पनायां साम्यदार्ध्यं विशेषोक्तिः । ‘ — इस सूत्र में ऐसा ही भाव व्यक्त किया है । अर्वाचीन आलंकारिकों ने ” कारण प्राप्त होने पर भी जो कार्य का न होना बताया जाय, उसे ‘विशेषोक्ति’ कहा है ।” जैसा कि आचार्य मम्मट का कथन है — ‘विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः ॥’ (१० । १०८)
32. काव्यादर्शकार दण्डी ने अग्निपुराण में दिये गये लक्षण की आनुपूर्वी को ही अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। भामह ने कारणभूत क्रिया का निषेध होने पर भी उसके फल की ‘उद्भावना’ को ‘विभावना’ माना है। इसी भाव को वामन ने भी अपने सूत्र में अभिव्यक्त किया है । यथा—
‘क्रियाप्रतिषेधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्तिर्विभावना ॥’ (काव्यालंकार, सू० ४ | ३ | १३)
आचार्य मम्मटने अपनी कारिकामें उक्त सूत्रका ही भाव ग्रहण किया है—
‘क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना ।’
‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ के रचयिता राजा भोज ने ‘विभावना ‘ के अपने लक्षण में अग्निपुराण की शब्दावली को ही अविकलरूप से ले लिया है।
33. भामह ने ‘विरोध’ का लक्षण इस प्रकार बताया है – “विशेषता बताने के लिये किसी गुण या क्रिया के विरुद्ध अन्य क्रिया का वर्णन हो, तो उसे विद्वान् ‘विरोध’ कहते हैं “—
गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियाभिधा । या विशेषाभिधानाय विरोधं तं विदुर्बुधाः ॥ (३ । २५) दण्डी ने “जहाँ प्रस्तुत वस्तु की विशेषता (उत्कर्ष) दिखाने के लिये परस्परविरुद्ध संसर्ग (एकत्र अवस्थान) प्रदर्शित किया जाय, वह ‘विरोध’ नामक अलंकार है” – ऐसा लक्षण किया है। वामन ने ‘विरुद्धाभासत्वं विरोधः ।’ (४।३।१२) – ऐसा कहा है। ‘काव्यप्रकाश’ में ‘विरुद्धः सोऽविरुद्धेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः ।’ – ऐसा विरोध का लक्षण देखा जाता है। इन सबकी शब्दावली में किंचित् भेद होते हुए भी, अभिप्राय सबका एक ही जान पड़ता है। विरोधपूर्वक संगतिकरण को कुछ लोग ‘असंगति’ अलंकार भी मानते हैं।
34. अग्निपुराण में वर्णित ‘हेतु’ अलंकार को भामह ने चमत्कार-शून्य बताकर अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने ‘सूक्ष्म’ और ‘लेश’ को भी अलंकार नहीं माना है। परंतु दण्डी ने ‘वाचामुत्तमभूषणम्’ – यों कहकर इन तीनों को उत्तम अलंकार की कोटि में रखा है। उन्होंने ‘हेतु’ का कोई स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया है, परंतु अग्निपुराणोक्त कारक और ज्ञापक दोनों हेतुओं का उल्लेख किया है। अतः अग्निपुराणोक्त लक्षण ही उन्हें अभिमत है। अग्नि धूम का कारक हेतु है और धूम अग्नि का ज्ञापक हेतु। इस प्रकार हेतु के दोनों भेद देखे जाते हैं। आचार्य दण्डी ‘हेतु’ में ही ‘काव्यलिङ्ग’, ‘अनुमान’ तथा कार्यकारणमूलक ‘अर्थान्तरन्यास’ का अन्तर्भाव मानते हैं। अतएव उन्होंने इन सबके पृथक् लक्षण आदि नहीं लिखे हैं। भोजराज ने ‘हेतु’ का ‘क्रियायाः कारणे हेतुः ‘- ऐसा लक्षण किया है।
35. जैसे नदी के जलप्रवाह के दर्शन से उसके उद्गम स्थान की सत्ता सिद्ध होती है तथा धूम के दर्शन से अग्नि की सत्ता सूचित होती है। इस तरह के वर्णनों में ज्ञापक हेतु समझना चाहिये।

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