July 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 332 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय विषमवृत्त का वर्णन विषम कथनम् अग्निदेव कहते हैं — [छन्द या पद्य दो प्रकार के हैं — ‘जाति’ और ‘वृत्त’। यहाँ तक ‘जाति’ छन्दों का निरूपण किया गया, अब ‘वृत्त’ का वर्णन करते हैं] वृत्त के तीन भेद हैं — सम, अर्धसम तथा विषम। इन तीनों का प्रतिपादन करता हूँ। ‘समवृत्त ‘ की संख्या में उतनी ही संख्या से गुणा करे। इससे जो गुणनफल हो, उसे अर्धसमवृत्त की संख्या समझनी चाहिये। इसी प्रकार ‘अर्थसमवृत्त’ की संख्या में भी उसी संख्या से गुणा करने पर जो अङ्क उपलब्ध हो, वह ‘विषमवृत्त’ की संख्या है। विषमवृत्त और अर्धसमवृत्त की संख्या में से मूलराशि घटा देनी चाहिये। इससे शुद्ध विषम और शुद्ध अर्धसमवृत्त की संख्या का ज्ञान होगा। [केवल गुणन से जो संख्या ज्ञात होती है, वह मिश्रित होती है; उसमें अर्धसम के साथ सम और विषम के साथ अर्धसम की संख्या भी सम्मिलित रहती है 1 ।] जो अनुष्टुप् छन्द प्रत्येक चरण में गुरु और लघु अक्षरों द्वारा समाप्त होता है, अर्थात् जिसके प्रत्येक पाद में अन्तिम दो वर्ण क्रमशः गुरु-लघु होते हैं, उसे ‘समानी’ 2 नाम दिया गया है। जिसके चारों चरणों के अन्तिम वर्ण क्रमशः लघु और गुरु हों, उसकी ‘प्रमाणी’ 3 संज्ञा है। इन दोनों से भिन्न स्थिति वाला छन्द ‘वितान’ 4 कहलाता है ।’ [इसके अन्तिम दो वर्ण केवल लघु अथवा केवल गुरु भी हो सकते हैं।] यहाँ से तीन अध्यायों तक ‘पादस्य’ इस पद का अधिकार है तथा ‘पदचतुरूर्ध्व’ छन्द के पहले तक ‘अनुष्टुब्वक्त्रम् ‘ का अधिकार है। तात्पर्य यह कि आगे बताये जाने वाले कुछ अनुष्टुप् छन्द ‘वक्त्र’ संज्ञा धारण करते हैं। ‘वक्त्र’ जाति के छन्द में पाद के प्रथम अक्षर के पश्चात् सगण (।।ऽ) और नगण (।।।) नहीं प्रयुक्त होने चाहिये।5 इन दोनों के अतिरिक्त मगण आदि छः गणों में से किसी एक गण का प्रयोग हो सकता है। पाद के चौथे अक्षर के बाद भगण (ऽ।।) का प्रयोग करना उचित है।6 जिस ‘वक्त्र’ जाति के छन्द में द्वितीय और चतुर्थ पाद के चौथे अक्षर के बाद जगण (।ऽ।) का प्रयोग हो, उसे ‘पथ्या वक्त्र’ 7 कहते हैं। किसी-किसी के मत में इसके विपरीत न्यास करने से, अर्थात् प्रथम एवं तृतीय पाद के बाद जगण (।ऽ।) का प्रयोग करने से ‘पथ्या संज्ञा 8 होती है। जब विषम पादों के चतुर्थ अक्षर के बाद नगण (।।।) हों तथा सम पादों में चतुर्थ अक्षर के बाद यगण (।ऽऽ) की ही स्थिति हो तो उस ‘अनुष्टुब्वक्त्र ‘का नाम ‘चपला’ 9 होता है । जब सम पादों में सातवाँ अक्षर लघु हो, अर्थात् चौथे अक्षर के बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसका नाम ‘विपुला’ 10 होता है। [यहाँ सम पादों में तो सप्तम लघु होगा ही, विषम पादों में भी यगण को बाधितकर अन्य गण हो सकते हैं — यही ‘विपुला’ और ‘पथ्या’ का भेद है।] सैतव आचार्य के मत में विपुला के सम और विषम सभी पादों में सातवाँ अक्षर लघु होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादों में चतुर्थ अक्षर के बाद यगण को बाध कर विकल्प से भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) और तगण (3ऽ।) आदि हों तो ‘विपुला छन्द 11 होता है। इस प्रकार ‘विपुला’ अनेक प्रकार की होती है। यहाँ तक ‘वक्त्र’ जाति के छन्दों का वर्णन किया गया। अनुष्टुप् छन्द के प्रथम पाद के पश्चात् जब प्रत्येक चरण में क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जायें तो ‘पदचतुरूर्ध्व’ 12 नामक छन्द होता है। [तात्पर्य यह कि इसके प्रथम पाद में आठ अक्षर, द्वितीय पाद में बारह, तृतीय पाद में सोलह और चतुर्थ पाद में बीस अक्षर होते हैं। उक्त छन्द के चारों चरणों में अन्तिम दो अक्षर गुरु हों तो उसकी ‘आपीड़’ 13 संज्ञा होती है। [यहाँ अन्तिम अक्षरों को गुरु बतलाने का यह अभिप्राय जान पड़ता है कि शेष लघु ही होते हैं।] जब आदि के दो अक्षर गुरु और शेष सभी लघु हों तो उसका नाम ‘प्रत्यापीड’ 14 होता है। ‘पदचतुरूर्ध्व’ नामक छन्द के प्रथम पादका द्वितीय आदि पादों के साथ परिवर्तन होने पर क्रमशः ‘मञ्जरी 15 ‘लवली’ 16 तथा ‘अमृतधारा’ 17 नामक छन्द होते हैं। (अर्थात् जब प्रथम पाद के स्थान में द्वितीय पाद और द्वितीय पाद के स्थान में प्रथम पाद हों तो ‘मञ्जरी’ छन्द होता है। जब प्रथम पाद के स्थान में तृतीय पाद और तृतीय पाद के स्थान में प्रथम पाद हो तो ‘लवली’ छन्द होता है और जब प्रथम पाद के स्थान में चतुर्थ पाद और चतुर्थ पाद के स्थान में प्रथम पाद हो तो ‘अमृतधारा’ नामक छन्द होता है।) अब ‘उद्गता’ छन्द का प्रतिपादन किया जाता है। जहाँ प्रथम चरण में सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) और एक लघु — ये दस अक्षर हों, द्वितीय पाद में भी नगण (।।।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु — ये दस ही अक्षर हों, तृतीय पाद में भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु तथा एक गुरु — ये ग्यारह अक्षर हों तथा चतुर्थ चरण में सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु — ये तेरह अक्षर हों, वह ‘उद्गता’ 18 नाम वाला छन्द है। उद्गता के तृतीय चरण में जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) और एक गुरु —ये दस अक्षर हों तथा शेष तीन पाद पूर्ववत् ही रहें तो उसका नाम ‘सौरभ’ 19 होता है। उद्गता के तृतीय पाद में जब दो नगण और दो सगण हों और शेष चरण ज्यों-के-त्यों रहें तो उसकी ‘ललित’ 20 संज्ञा होती है। जिसके प्रथम चरण में यगण, सगण, जगण, भगण और दो गुरु (अठारह अक्षर) हों, द्वितीय चरण में सगण, नगण, जगण रगण और एक गुरु (तेरह अक्षर) हों, तृतीय चरण में दो नगण और एक सगण (नौ अक्षर) हों तथा चतुर्थ चरण में तीन नगण, एक जगण और एक भगण (पंद्रह अक्षर) हों, वह उपस्थित ‘प्रचुपित’ 21 नामक छन्द होता है। उक्त छन्द के तृतीय चरण में जब क्रमशः दो नगण, एक सगण फिर दो नगण और एक सगण (अठारह अक्षर) हों तो वह ‘वर्धमान’22 छन्द नाम धारण करता है। उसी छन्द में तृतीय चरण के स्थान में जब तगण, जगण और रगण (ये नौ अक्षर) हों तो वह ‘शुद्ध विराषभ 23 छन्द कहलाता है। अब अर्धसमवृत्त का वर्णन करूँगा ॥ १-१० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विषमवृत्त का वर्णन’ नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३२ ॥ 1. इन सब भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये । गायत्री छन्दमें कितने समवृत्त, कितने अर्धसमवृत्त और कितने विषमवृत्त होंगे, इसकी संख्या दी जाती है । गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंका है। इसके चार भाग करनेपर एक-एक पादमें छः-छः अक्षर हो सकते हैं। इसमें वर्णप्रस्तारके नियमानुसार प्रस्तार करनेपर सर्वगुरुसे लेकर सर्वलघुतक चौंसठ भेद हो सकते हैं। ये सभी समवृत्तके भेद हैं । उपर्युक्त नियमानुसार समवृत्तकी संख्या चौंसठमें चौंसठका गुणा करनेपर ४०९६ होती है । यह सममिश्रित अर्धसमवृत्तकी संख्या हुई । पुन: इसमें इतनी ही संख्यासे गुणा करनेपर १६७७७२१६ होता है। यह सम अर्धसम – मिश्रित विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसमें मूलराशि गुण्य अङ्क ४०९६ को घटा देनेपर १६७७३१२० होता है। यह शुद्ध विषमवृत्तकी संख्या हुई । इसी प्रकार ४०९६ में मूलराशि ६४ घटा देनेपर ४०३२ शेष रहा। यह ‘शुद्ध अर्धसमवृत्त’ की संख्या हुई । 2. समानी का उदाहरण — वासवोऽपि विक्रमेण यत्समानतां न याति । तस्य वल्लभेश्वरस्य केन तुल्यता क्रियेत ॥ ॐ नमो जनार्दनाय पापसंघमोचनाय । दुष्टदैत्यमर्दनाय पुण्डरीकलोचनाय ॥ 3. प्रमाणी का उदाहरण — सरोजयोनिरम्बरे रसातले तथाच्युतः । तव प्रयाणमीक्षितुं क्षमौ न तौ बभूवतुः ॥ 4. वितान का उदाहरण — तृष्णां त्यज धर्मं भज पापे हृदयं मा कुरु । इष्टा यदि लक्ष्मीस्तव शिष्टामनिशं संश्रय ॥ हृदयं यस्य विशालं गगनायोगसमानम् । लभतेऽसौ मणिचित्रं नृपतिर्मूर्धिन वितानम् ॥ 5. नवधाराम्बुसंसिक्तं वसुधागन्धिनिःश्वासम् । किंचिदुन्नतघोणाग्रं मही कामयते वक्त्रम् ॥ 6. दुर्भाषितेऽपि सौभाग्यं प्रायः प्रकुरुते प्रीतिः । मातुर्मनो हरन्त्येव दौर्लालित्योक्तिभिर्बालाः ॥ 7. उदाहरण — नित्यं नीतिनिषण्णस्य राज्ञो राष्ट्रं न सीदति । न हि पथ्याशिनः काये जायन्ते व्याधिवेदनाः ॥ 8. उदाहरण – भर्तुराज्ञानुवर्तिनी या स्त्री स्यात् सा स्थिरा लक्ष्मीः । स्वप्रभुत्वाभिमानिनी विपरीता परित्याज्या ॥ 9. उदाहरण – क्षीयमाणाग्रदशना वक्त्रनिर्मांसनासाग्रा । कन्यका वाक्यचपला लभते धूर्तसौभाग्यम् ॥ 10. उदाहरण – सैतवेन यथार्णवं तीर्णो दशरथात्मजः । रक्षःक्षयकरीं पुनः प्रतिज्ञां स्वेन बाहुना ॥ 11. यगण के द्वारा उदाहरण — इयं सखे चन्द्रमुखी स्मितज्योत्स्ना च मानिनी । इन्दीवराक्षी हृदयं दंदहीति तथापि मे ॥ इसी प्रकार अन्य भी बहुत से उदाहरण हो सकते हैं । ‘विपुला’ छन्दके पादों का चौथा अक्षर प्राय: गुरु ही होता है । 12. तस्याः कटाक्षविक्षेपैः कम्पिततनुकुटिलैरतिदीर्घः । तक्षकदष्ट इवेन्द्रियशून्यः क्षतचैतन्यः, पदचतुरूर्ध्वं न चलति पुरुषः पतति सहसैव ॥ – इसमें गुरु-लघु का विभाग नहीं होता । 13. कुसुमितसहकारे हतहिममहिमशुचिशशाङ्के । विकसितकमलसरसि मधुसमयेऽस्मिन् प्रवससि पथिकहतक यदि भवति तव विपत्तिः ॥ 14. चित्तं मम रमयति, कान्तं वनमिदमुपगिरिनदि । कूजन्मधुकरकलरवकृतजनधृति, पुंस्कोकिलमुखरितसुरभिकुसुमचिततरुवति ॥ 15. जनयति महतीं प्रीतिं हृदये, कामिनां चूतमञ्जरी । मिलदलिचक्रचञ्चुपरिचुम्बितकेसरा, कोमलमलयवातपरिनर्तिततरुशिखरस्थिता ॥ 16. विरहविधुरहूणकाङ्गनाकपोलोपमं परिणतिधरं पीतपाण्डुच्छवि । लवलीफलं निदाघे, भवति जगति हिमकरशीतलमतिस्वादूष्णहरम् ॥ 17. परिवाञ्छसि कर्णरसायनं सततममृतधाराभिर्यदि हृदि वा परमानन्दरसम् । चेतः शृणु धरणीधरवाणीममृतमयी तत्काव्यगुणभूषणम् ॥ 18. मृगलोचना शशिमुखी च, रुचिरदशना नितम्बिनी । हंसललितगमना ललना, परिणीयते यदि भवेत् कुलोद्गता ॥ 19. विनिवारितोऽपि नयनेन तदपि किमिहागतो भवान् । एतदेव तव सौरभकं यदुदीरितार्थमपि नावबुद्ध्यसे ॥ 20. सततं प्रियंवदमनूनममलहृदयं गुणोत्तरम् । सुललितमतिकमनीयतनुं पुरुषं त्यजन्ति न तु जातु योषितः ॥ 21. रामा कामकरेणुका मृगायतनेत्रा, हृदयं हरति पयोधरावनम्रा । इयमतिशयसुभगा, बहुविधनिधुवनकुशला ललिताङ्गी ॥ 22. बिम्बोष्ठि कठिनोन्नतस्तनावनताङ्गी, हरिणी शिशुनयना नितम्बगुर्वी । जनयति मम मनसि मुदं मदिराक्षी, मदकलकरिगमना परिणतशशिवदना ॥ 23. कन्येयं कनकोज्ज्वला मनोहरदीप्तिः शशिनिर्मलवदना विशालनेत्रा । पीनोरुनितम्बशालिनी सुखयति हृदयमतिशयं तरुणानाम् ॥ Content is available only for registered users. 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