July 18, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 328 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय छन्दों के गण और गुरु-लघु की व्यवस्था छन्दःसारः अग्नि कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वेद के मूलमन्त्रों के अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दों का क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण — ये आठ गण होते हैं। सभी गण तीन-तीन अक्षरों के हैं। इनमें मगण के सभी अक्षर गुरु (ऽऽऽ) और नगण के सब अक्षर लघु (।।।) होते हैं। आदि गुरु (ऽ।।) होने से ‘भगण’ तथा आदि लघु (।ऽऽ) होने से ‘यगण’ होता है। इसी प्रकार अन्त्य गुरु (।।ऽ) होने से ‘सगण’ तथा अन्त्य लघु होने से ‘तगण’ (ऽऽ।) होता है। पाद के अन्त में वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्प से गुरु माना जाता है। विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर (व्यञ्जन), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय से अव्यवहित पूर्व में स्थित होने पर ‘ह्रस्व’ भी ‘गुरु’ माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही । गुरु का संकेत ‘ग’ और लघु का संकेत ‘ल’ है। ये ‘ग’ और ‘ल’ गण नहीं हैं। ‘वसु’ शब्द आठ को और ‘वेद’ चार की संज्ञा हैं, इत्यादि बातें लोक के अनुसार जाननी चाहिये ॥ १-३ ॥ ‘ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘छन्दस्सार का कथन’ नामक तीन सी अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२८ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe