July 18, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 323 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तेईसवाँ अध्याय गङ्गा-मन्त्र, शिवमन्त्रराज, चण्डकपालिनी-मन्त्र, क्षेत्रपाल-बीजमन्त्र, सिद्धविद्या, महामृत्युंजय, मृतसंजीवनी, ईशानादि मन्त्र तथा इनके छः अङ्ग एवं अघोरास्त्र का कथन षडङ्गान्यघोरास्त्राणि महादेवजी कहते हैं — स्कन्द ! ‘ॐ ह्रूं हं सः‘ इस मन्त्र से मृत्युरोग आदि शान्त हो जाते हैं। इस मन्त्र द्वारा दूर्वा की एक लाख आहुतियाँ दी जायें तो उससे साधक शान्ति तथा पुष्टि का भी साधन कर सकता है। षडानन ! अथवा केवल प्रणव (ॐ) अथवा माया (ह्रीं) के जप से ही दिव्य, अन्तरिक्षगत तथा भूमिगत उत्पातों की शान्ति होती है। उत्पातवृक्ष के शमन का भी यही उपाय है ॥ १-२ ॥ ‘ (गङ्गा-सम्बन्धी वशीकरणमन्त्र) ‘ॐ नमो भगवति गङ्गे कालि कालि महाकालि महाकालि मांसशोणितभोजने रक्तकृष्णमुखि वशमानय मानुषान् स्वाहा।’ — इस मन्त्र का एक लाख जप करके दशांश आहुति देकर मनुष्य सम्पूर्ण कर्मों में सिद्धि पा सकता है। इन्द्र आदि देवताओं को भी वश में ला सकता है, फिर इन साधारण मनुष्यों को वश में लाना कौन बड़ी बात है? यह विद्या अन्तर्धानकरी, मोहनी, जृम्भनी, शत्रुओं को वश में लाने वाली तथा शत्रु की बुद्धि को मोह में डाल देने वाली है। यह कामधेनु-विद्या सात प्रकार की कही गयी है ॥ ३-५१/२ ॥ अब मैं ‘मन्त्रराज’ का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं तथा चोर आदि को मोह लेने वाला है। यह साक्षात् शिव (मेरे) द्वारा पूजित है। इसका सभी महान् भय के अवसरों पर स्मरण करना चाहिये। एक लाख जप करके तिलों द्वारा हवन करने से यह मन्त्र सिद्ध होता है। अब इसका उद्धार सुनो ॥ ६-७ ॥ ‘ॐ हले शूले एहि ब्रहासत्येन विष्णुसत्येन रुद्रसत्येन रक्ष मां वाचेश्वराय स्वाहा’ ॥ ८ ॥ भगवती शिवा दुर्गम संकट से तारती-उद्धार करती है, इसलिये ‘दुर्गा’ मानी गयी है ॥ ९ ॥ ‘ॐ ह्रीं चण्डकपालिनि दन्तान् किट किट क्षिट क्षिट गुह्ये फट् हीम् ॥ १० ॥ — इस मन्त्रराज के जपपूर्वक चावल धोकर उसको इस मन्त्र के तीस बार जप द्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर वह चावल चोरों में बँटवा दे। उस चावल को दाँतों से चबाने पर उनके श्वेत दन्त गिर जाते हैं तथा वे मनुष्य चोरी के पाप से मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं ॥ ११-१२ ॥ (क्षेत्रपालबलि-मन्त्र) ‘ॐ ज्वलल्लोचन कपिलजटाभारभास्वर विद्रावण त्रैलोक्यडामर डामर दर दर भ्रम भ्रम आकट्ट आकट्ट तोटय तोटय मोटय मोटय दह दह पच पच एवं सिद्धिरुद्रो ज्ञापयति यदि ग्रहोऽपगतः स्वर्गलोकं देवलोकं वाऽऽरामविहाराचलं तथापि तमावर्तयिष्यामि बलिं गृह्ण गृह्ण ददामि ते स्वाहा । इति ॥ १३ ॥ — इस मन्त्र से क्षेत्रपाल को बलि देकर न्यास करने से अनिष्ट ग्रह रोता हुआ चला जाता है। साधक के शत्रु नष्ट हो जाते हैं तथा रणभूमि में शत्रु समुदाय का विनाश हो जाता है ॥ १४ ॥ ‘हंस’ बीज का न्यास करके साधक तीन प्रकार के विष अथवा विघ्न का निवारण कर देता है। अगुरु, चन्दन, कुष्ठ (कूट), कुङ्कुम, नागकेसर, नख तथा देवदारु — इन सबको सममात्रा में कूट- पीसकर धूप बना ले। फिर इसमें मधुमक्खी के शहद का योग कर दे। उसकी सुगन्ध से शरीर तथा वस्त्र आदि को धूपित या वासित करने से मनुष्य विवाद, स्त्रीमोहन, श्रृंगार तथा कलह आदि के अवसर पर शुभ फल का भागी होता है। कन्यावरण तथा भाग्योदय सम्बन्धी कार्य में भी उसे सफलता प्राप्त होती है। मायामन्त्र (ह्रीं)- से मन्त्रित हो, रोचना, नागकेसर, कुकुम तथा मैनसिल का तिलक ललाट में लगाकर मनुष्य जिसकी ओर देखता है, वही उसके वश में हो जाता है। शतावरी के चूर्ण को दूध के साथ पीया जाय तो वह पुत्र की उत्पत्ति कराने वाला होता है। नागकेसर के चूर्ण को घी में पकाकर खाया जाय तो वह भी पुत्रकारक होता है। पलाश के बीज को पीसकर पीने से भी पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १५-२० ॥ (वशीकरणके लिये सिद्ध-विद्या) ॐ उत्तिष्ठ चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय (अमुकं) वशमानय स्वाहा’ ।॥ २१ ॥ — यह छब्बीस अक्षरों वाली ‘सिद्ध-विद्या’ है। (यदि किसी स्त्री को वश में करना हो तो) नदी के तीर की मिट्टी से लक्ष्मीजी की मूर्ति बनाकर धतूर के रस से मदार के पत्ते पर उस अभीष्ट स्त्री का नाम लिखे। इसके बाद मूत्रोत्सर्ग करने के पश्चात् शुद्ध हो उक्त मन्त्र का जप करे। यह प्रयोग अभीष्ट स्त्री को अवश्य वश में ला सकता है ॥ २२-२३ ॥ (महामृत्युंजय) ‘ॐ जूं सः वषट्’ ।॥ २४ ॥ — यह ‘महामृत्युंजय मन्त्र’ है, जो जप तथा होम से पुष्टिकारक होता है ॥ २५ ॥ (मृतसंजीवनी) ‘ॐ हं सः हूं हूं सः, हः सौः ॥ २६ ॥ — यह आठ अक्षरवाली ‘मृतसंजीवनी-विद्या’ है, जो रणभूमि में विजय दिलाने वाली है। ‘ईशान’ आदि मन्त्र भी धर्म-काम आदि को देने वाले हैं॥ २७ ॥ (ईशान आदि मन्त्र) (ॐ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥ २८ ॥ 1 (ॐ) तत्पुरुषाय विद्यहे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ २९ ॥ 2 (ॐ) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वतः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ३० ॥ 3 (ॐ) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३१ ॥ 4 (ॐ) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमो भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ३२ ॥ 5 अब मैं ‘पञ्चब्रह्म’ के छः अङ्गों का वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है ॥ ३३ ॥ (ॐ) नमः परमात्मने पराय कामदाय परमेश्वराय योगाय योगसम्भवाय सर्वकराय कुरु कुरु सद्य सद्य भव भव भवोद्भव वामदेव सर्वकार्यकर पापप्रशमन सदाशिव प्रसन्न नमोऽस्तु ते (स्वाहा) ॥ ३४ ॥ — यह सतहत्तर अक्षरोंका हृदय मन्त्र है, जो सम्पूर्ण मनोरथों को देने वाला है। [कोष्ठक में दिये गये अक्षरों को छोड़कर गिनने पर सतहत्तर अक्षर होते हैं।] ॥ ३५ ॥ (इस मन्त्र को पढ़कर ‘हृदयाय नमः’ बोलकर हृदय का स्पर्श करना चाहिये।) ‘ॐ शिव शिवाय नमः।’ — यह शिरोमन्त्र है, अर्थात् इसे पढ़कर ‘शिरसे स्वाहा’ बोलकर दाहिने हाथ से सिर का स्पर्श करना चाहिये। ‘ॐ शिवहृदये ज्वालिनी स्वाहा, शिखायै वषट्’ बोलकर शिखाका स्पर्श करे। ‘ॐ शिवात्मक महातेजः सर्वज्ञ प्रभो संवर्तय महाघोरकवच पिङ्गल आयाहि पिङ्गल नमो महाकवच शिवाज्ञया हृदयं बन्ध बन्ध घूर्णय घूर्णय चूर्णय चूर्णय सूक्ष्मासूक्ष्म वज्रधर वज्रपाशधनुर्वज्राशनिवज्रशरीर मच्छरीरमनुप्रविश्य सर्वदुष्टान् स्तम्भय स्तम्भय हुम् ह्रूम् ॥ ३६ ॥ — यह एक सौ पाँच अक्षरों का कवच-मन्त्र है। अर्थात् इसे पढ़कर ‘कवचाय हुम्’ बोलते हुए दोनों हाथों से एक साथ दोनों भुजाओं का स्पर्श करे ॥ ३७ ॥ ‘ॐ ओजसे नेत्रत्रयाय वौषट्’ ऐसा बोलकर दोनों नेत्रों का स्पर्श करे। इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अस्त्रन्यास करे — ‘ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट्।’ यह (प्रणवसहित बावन अक्षरों का) ‘अघोरास्त्र मन्त्र’ है ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अनेकविध मन्त्रों के साथ ईशान आदि मन्त्र तथा छः अङ्गों सहित अघोरास्त्र का कथन’ नामक तीन सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२३ ॥ ईशान आदि मन्त्रों के अर्थ — 1. जो सम्पूर्ण विद्याओं के ईश्वर, समस्त भूतों के अधीश्वर, ब्रह्म वेद के अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्य के प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय नित्य कल्याणस्वरूप शिव मेरे बने रहें ॥ २८ ॥ 2. तत्पदार्थ – परमेश्वररूप अन्तर्यामी पुरुष को हम जानें, उन महादेव का चिन्तन करें; वे भगवान् रुद्र हमें सद्धर्म के लिये प्रेरित करते रहें ॥ २९ ॥ 3. जो अघोर हैं, घोर हैं, घोर से भी घोरतर हैं, उन सर्वव्यापी, सर्वसंहारी रुद्ररूपों के लिये जो आपके ही स्वरूप हैं, – साक्षात् आपके लिये मेरा नमस्कार हो ॥ ३० ॥ 4. प्रभो! आप ही वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदमन तथा मनोन्मन आदि नामों से प्रतिपादित होते हैं; इन सभी नाम-रूपों में आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है ॥ ३१ ॥ 5. मैं सद्योजात शिव की शरण लेता हूँ। सद्योजात को मेरा नमस्कार है। किसी जन्म या जगत् में मेरा अतिभव – पराभव न करें। आप भवोद्भव को मेरा नमस्कार है ॥ ३२ ॥ Content is available only for registered users. 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