July 17, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 318 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अठारहवाँ अध्याय अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिव स्वरूप मन्त्र का वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्र का उद्धार; ‘विघ्न मर्द’ नामक मण्डल तथा गणपति-पूजन की विधि गणपूजाः भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द ! जिसके ऊपर तेज (र्) हो, ऐसे विश्वरूप (ह्) को उद्धृत करके फिर नरसिंह (क्ष्) के नीचे कृतान्त (म्) रखे। उसके अन्त में ‘प्रणव’ लगा दे। ऐसा कर ‘र्ह्क्ष्मों’ बना। इसके बाद ऊहक (ऊ), अंशुमान् ( . ) तथा विश्व (ह) को संयुक्त करे। इससे ‘हूं’ बनेगा। ये दोनों क्रमशः अन्तःस्थ और कण्ठोष्ठ कहे गये हैं। (र्) अन्तःस्थ वर्ण आदि में होने से उस पूरे मन्त्र की ‘अन्तःस्थ’ संज्ञा हुई है। दूसरे मन्त्र में ह्, कण्ठ स्थानीय है और ऊकार ओष्ठस्थानीय; अतः उसे ‘कण्ठोष्ठ’ नाम दिया गया है। इनके अन्त में ‘नमः’ जोड़ देने से ये दोनों मन्त्र चार अक्षर वाले हो जाते हैं। यथा — ॐ र्ह्क्ष्मों नमः। ॐ हूं नमः।’ विश्वरूप (हकार) कारण माना गया है। उसे बारह मात्राओं से गुणित करे। इन बारह में से पाँच ह्रस्व-बीजों द्वारा पूर्ववत् ‘ईशान’ आदि पाँच ब्रह्ममूर्तियों की पूजा करे और दीर्घात्मक छः बीजों द्वारा पहले की ही भाँति यहाँ अङ्गन्यास का कार्य सम्पन्न करे ॥ १-३ ॥ ‘ [ अब अघोरास्त्र-मन्त्र 1 का उद्धार करते हैं —] ‘ह्रीं’ लिखकर दो बार ‘स्फुर-स्फुर’ लिखे। इसके बाद इन दोनों के आदि में ‘प्र’ जोड़कर पुनरुल्लेख करे — ‘प्रस्फुर प्रस्फुर।’ तत्पश्चात् ‘कह’, ‘वम’ और ‘बन्ध’ इन तीनों पदों को दो-दो बार लिखे। फिर दो बार ‘घातय’ लिखकर अन्त में ‘हुं फट् ‘ का उच्चारण करे। (सब जोड़ने पर ऐसा बनता है — “ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बंध बंध घातय घातय हुं फट् ॥” इक्यावन अक्षरों का मन्त्र है।) इस प्रकार ‘ अघोरास्त्र मन्त्र ‘ होता है। (इसके विनियोग और न्यास आदि की विधि ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’ के ३०वें श्वास में द्रष्टव्य है।) अब ‘शिव-गायत्री’ बतायी जाती है। ‘महेशाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्।’ — यह ‘शिव-गायत्री’ (ही पूर्वाध्याय में कथित प्रासाद-मन्त्र का आठवाँ भेद ‘शिव-रूप’ है।) सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को सिद्ध करने वाली है ॥ ४-७ ॥ यात्रा में तथा विजय आदि के कार्य में पहले गण की पूजा करनी चाहिये; इससे ‘श्री’ की प्राप्ति होती है। पहले चौकोर क्षेत्र को सब ओर से बारह बारह कोष्ठों में विभाजित करे। [ऐसा करने से एक सौ चौवालीस पदों का चतुष्कोण क्षेत्र बनेगा। मध्यवर्ती चार पदों में त्रिकोण की रचना करके उसके बीच में तीन दलों से युक्त कमल लिखे। उसके पृष्ठभाग में पदिका और वीथी के भाग में तीन दल वाला अश्वयुक्त कमल बनावे। तदनन्तर वसुदेव-पुत्रों (वासुदेव, संकर्षण और गद) – से, जो तीन दल वाले कमलों से सुशोभित हैं, पादपट्टिका का निर्माण करे। उसके ऊपर भागमात्र के प्रमाण से एक वेदी की रचना करे। पूर्वादि दिशाओं में द्वार तथा कोणभागों में उपद्वार की रचना करे। इस प्रकार द्वारों तथा उपद्वारों से रचित मण्डल विघ्ननाशक है। मध्य में जो कमल है, वह आरक्त वर्ण का हो। उसके बाहर के कमल भी वैसे ही हों। वीथी श्वेतवर्ण की होनी चाहिये। द्वारों का रंग अपने इच्छानुसार रख सकते हैं। कर्णिका पीले रंग से रंगी जायगी तथा केसर भी पीले ही होंगे। यह ‘विघ्नमर्द’ नामक मण्डल है। इसके मध्यभाग में गणपति का पूजन करे। नाम का आदि अक्षर अनुस्वारसहित बोलकर आदि में ‘ॐ’ और अन्त में ‘नमः’ जोड़ दे। (यथा —– ॐ गं गणपतये नमः।’) ह्रस्वान्त बीजों से युक्त ईशान-तत्पुरुषादि मन्त्रों से ब्रह्ममूर्तियों का पूजन तथा दीर्घान्त बीजों से हृदय, सिर आदि अङ्गों में न्यास करे। उपर्युक्त मण्डल की पूर्वदिशागत पङ्क्ति में गज, गजशीर्ष (गजानन), गाङ्गेय, गणनायक, गगनग तथा गोपति — इन नामों का उल्लेख करे। इनमें से अन्तिम दो नामों की तीन आवृत्तियाँ होंगी। (इस प्रकार ये दस नाम दस कोष्ठों में लिखे जायेंगे और किनारे के एक-एक कोष्ठ खाली रहेंगे, जो दक्षिण-उत्तर की नामावली से भरेंगे।) ॥ ८-१५ ॥ विचित्रांश, महाकाय, लम्बोष्ठ, लम्बकर्ण, लम्बोदर, महाभाग, विकृत (विकट), पार्वती-प्रिय, भयावह, भद्र, भगण और भयसूदन — ये बारह नाम दक्षिण दिशा की पङ्क्ति में लिखे। पश्चिम में देवत्रास, महानाद, भासुर, विघ्नराज, गणाधिप, उद्भटस्वन, उद्भटशुण्ड, महाशुण्ड, भीम, मन्मथ, मधुसूदन तथा सुन्दर और भावपुष्ट — ये नाम लिखे। फिर उत्तर दिशा में ब्रह्मेश्वर, ब्राह्म- मनोवृत्ति, संलय, लय, नृत्यप्रिय, लोल, विकर्ण, वत्सल, कृतान्त, कालदण्ड तथा कुम्भ — का पूर्ववत् उल्लेख करके इन सबका यजन करे ॥ १६-२० ॥ पूर्वोक्त मन्त्र का दस हजार जप और उसके दशांश से होम करे। शेष नाम मन्त्रों का दस-दस बार जप करके उनके लिये एक-एक बार आहुति दे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर अभिषेक करे। इससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। साधक भूमि, गौ, अश्व, हाथी तथा वस्त्र आदि देकर गुरुदेव की पूजा करे ॥ २१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गणपति पूजन के विधान का कथन’ नामक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१८ ॥ See Also:- अघोरास्त्र मन्त्र प्रयोगः 1. अग्निपुराण की उपलब्ध पुस्तकें लिखावट या छपाई के दोष से ‘अघोरास्त्र-मन्त्र’ पूरा व्यक्त नहीं कर पाती हैं।’ श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ के अनुसार किंचिन्मात्र संशोधन से मन्त्र स्पष्ट हो जाता है; अतः यहाँ शुद्ध पाठ दिया गया है। Content is available only for registered users. Please login or registerContent is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe