July 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 304 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चारवाँ अध्याय पञ्चाक्षर-दीक्षा-विधान; पूजा के मन्त्र पञ्चाक्षरादिपूजामन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — मेष (न) सर्गि विष — विसर्ग युक्त मकार (मः) य से पहले का अक्षर श और उसके साथ अक्षि — इकार (शि) दीर्घोदक (वा) मरुत् (य) — यह पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय) 1 शिवस्वरूप तथा शिवप्रदाता है। इसके आदि में ॐ लगा देने पर यह षडक्षर मन्त्र हो जाता है। इसका अर्चन (भजन) करके मनुष्य देवत्व आदि उत्तम फलों को प्राप्त कर लेता है ॥ ११/२ ॥’ ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परम बुद्धिरूप है। वही सबके हृदय में शिवरूप से विराजमान है। वह शक्तिभूत सर्वेश्वर ही ब्रह्मा आदि मूर्तियों के भेद से भिन्न-सा प्रतीत होता है। मन्त्र के अक्षर पाँच हैं, भूतगण भी पाँच हैं तथा उनके मन्त्र और विषय भी पाँच हैं। प्राण आदि वायु पाँच हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच-पाँच हैं। ये सब-की-सब वस्तुएँ पञ्चाक्षर-ब्रह्मरूप हैं। इसी प्रकार यह सब कुछ अष्टाक्षर मन्त्ररूप भी है ॥ २-४ ॥ दीक्षा-स्थान का मन्त्रोच्चारण पूर्वक पञ्चगव्य से प्रोक्षण करे। फिर वहाँ समस्त आवश्यक सामग्री का संग्रह करके विधि पूर्वक शिव की पूजा करे। तत्पश्चात् मूलमन्त्र, इष्ट मूर्तिसम्बन्धी मन्त्र तथा अङ्गसम्बन्धी मन्त्रों द्वारा अक्षत छींटते हुए भूतापसारण पूर्वक रक्षात्मक क्रिया सम्पादित करे। फिर दूध में चरु पकाकर उसके तीन भाग करे। उनमें से एक भाग तो इष्टदेवता को निवेदित कर दे, दूसरे भाग की आहुति दे और तीसरा शिष्य सहित स्वयं ग्रहण करे। फिर आचमन एवं सकलीकरण करके आचार्य शिष्य को हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित एक दन्तधावन दे, जो दूधवाले वृक्ष आदि का काष्ठ हो। उससे दाँतों का शोधन करके, उसे चीरकर उस के द्वारा जीभ साफ करने के बाद धोकर पृथ्वी पर फेंक दे ॥ ५-८ ॥ यदि पूर्व दिशा से फेंकने पर वह दन्तकाष्ठ उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर जाकर गिरे तो शुभ होता है, अन्यथा अशुभ होता है। पुनः अपने सम्मुख आते हुए शिष्य को शिखाबन्ध 2 के द्वारा रक्षित करके ज्ञानी गुरु वेदी पर उसके साथ कुश के बिस्तर पर सो जाय। शिष्य सोते समय रात में जो स्वप्न देखे, उसे प्रातःकाल अपने गुरु को सुनावे ॥ ९-१० ॥ यदि स्वप्न शुभ एवं सिद्धिसूचक हुए तो उनसे मन्त्र तथा इष्टदेव के प्रति भक्ति बढ़ती है। तत्पश्चात् पुनः मण्डलार्चन करना चाहिये। ‘सर्वतोभद्र’ आदि मण्डल पहले बताये गये हैं। उन्हीं में से किसी एक का पूजन करना चाहिये। पूजित हुआ मण्डल सम्पूर्ण सिद्धियों का दाता है ॥ ११ ॥ पहले स्नान और आचमन करके मन्त्रोच्चारण पूर्वक देह में मिट्टी लगाये। फिर पूर्ववत् कल्पित शिव तीर्थ में साधक अघमर्षण-मन्त्र 3 के जप पूर्वक स्नान करे। फिर विद्वान् पुरुष हस्ताभिषेक 4 (हाथों की शुद्धि) करके पूजागृह में प्रवेश करे। मूलमन्त्र से योगपीठ पर कमलासन का न्यास (चिन्तन) करे। मूल से ही पूरक, कुम्भक तथा रेचक प्राणायाम करे ॥ १२-१३ ॥ (सुषुम्णा नाड़ीके मार्ग से) जीवात्मा को ऊपर ब्रहारन्ध्रस्थित सहस्रारचक्र में ले जाकर परमात्मा में योजित (स्थापित) कर दे। सिर से लेकर शिखापर्यन्त जो बारह अङ्गुल विस्तृत स्थान है, वही ‘ब्रह्मरन्ध्र’ है। उसी में स्थित परमात्मा के भीतर जीव को (‘हंसः सोऽहम्’— इस मन्त्र द्वारा) संयोजित करने के पश्चात् (यह चिन्तन करे कि सम्पूर्ण भूतों के तत्त्व बीजरूप से अपने-अपने कारण में संहारक्रम से विलीन हो गये हैं। इस प्रकार प्रकृतिपर्यन्त समस्त तत्त्वों का परमात्मा में लय हो गया है। तदनन्तर) वायुबीज (यकार) के द्वारा वायु को प्रकट करके उसके द्वारा अपने शरीर को सुखा दे। इसके बाद अग्निबीज (रकार) — से अग्नि प्रकट करके उसके द्वारा उस समस्त शुष्क शरीर को जलाकर भस्म कर दे। (उसमें से दग्ध हुए पापपुरुष के भस्म को विलगाकर) अपने शरीर के भस्म को अमृतबीज (वकार) से प्रकट अमृत की धारा से आप्लावित कर दे ॥ १४ ॥ (इसके बाद विलीन हुए प्रत्येक तत्त्व के बीज को अपने-अपने स्थान पर पहुंचाकर दिव्य शरीर का निर्माण करे।) दिव्य स्वरूप का ध्यान करके जीवात्मा को पुनः ले आकर हृदयकमल में स्थापित कर दे। ऐसा करने से आत्मशुद्धि सम्पादित होती है। तदनन्तर न्यास करके पूजन आरम्भ करे ॥ १५ ॥ पञ्चाक्षर-मन्त्र के न, म आदि पाँच वर्ण क्रमशः कृष्ण, श्वेत, श्याम, रक्त और पीत कान्ति वाले हैं। नकारादि अक्षरों से क्रमशः अङ्गन्यास करे। उन्हीं अङ्गों में तत्पुरुष आदि पाँच मूर्तियों का भी न्यास करना चाहिये 5 ॥ १६ ॥ तदनन्तर अङ्गुष्ठ से कनिष्ठापर्यन्त पाँच अँगुलियों में क्रमशः अङ्गमन्त्रों का सर्वतोभावेन न्यास 6 करके पाद, गुह्य, हृदय, मुख तथा मूर्धा में मन्त्राक्षरों का न्यास 7 करे। इसके बाद मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद — इन अङ्गों में व्यापक-न्यास 8 करके मूलमन्त्र के अक्षरों का तथा अङ्गमन्त्रों का भी वहीं न्यास करें।9 फिर अग्नि आदि कोणों में प्रकट पीठ के धर्म आदि पादों का, जो क्रमशः रक्त, पीत, श्याम और श्वेत वर्ण के हैं, चिन्तन करके उनमें साध्यमन्त्र के अक्षरों का न्यास 10 करे तथा पूर्वादि दिशाओं में स्थित अधर्म आदि का चिन्तन करके उनमें अङ्गमन्त्रों का न्यास’ करे। इस प्रकार योगपीठ का चिन्तन करके उसके ऊपर अष्टदल कमल का और सूर्य मण्डल, सोम मण्डल तथा अग्निमण्डल — इन तीन मण्डलों का एवं सत्त्वादि गुणों का चिन्तन करे ॥ १७-१९ ॥ इसके बाद अष्टदल कमल के पूर्वादि दलों पर वामा आदि आठ शक्तियों का तथा कर्णिका के ऊपर नवीं (मनोन्मनी) शक्ति का न्यास या चिन्तन करे। इन शक्तियों के नाम इस प्रकार हैं — वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकारिणी, बलविकारिणी, बलप्रमधनी, सर्वभूतदमनी तथा नवीं मनोन्मनी। ये शक्तियाँ ज्वालास्वरूपा हैं और इनकी कान्ति क्रमशः श्वेत, रक्त, सित, पीत, श्याम, अग्नि-सदृश, असित, कृष्ण तथा अरुण वर्ण की है। इस प्रकार इनका चिन्तन करे ॥ २०-२२ ॥ तदनन्तर ‘अनन्तयोगपीठाय नमः ‘ से योग पीठ की पूजा करके हृदयकमल में शिव का आवाहन करे। यथा — स्फटिकाभं चतुर्बाहुं फालशूलधरं शिवम् । साभयं वरदं पञ्चवदनं च त्रिलोचनम् ॥ ‘जिनकी कान्ति स्फटिकमणि के समान श्वेत है, जो चार भुजाओं से सुशोभित हैं और उन हाथों में फाल, शूल तथा अभय एवं वरद मुद्राएँ धारण करते हैं, जिनके पाँच मुख और प्रत्येक मुख के साथ तीन-तीन नेत्र हैं, उन भगवान् शिव का मैं ध्यान एवं आवाहन करता हूँ।’ इसके बाद कमलदलों में तत्पुरुषादि पञ्चमूर्तियों की स्थापना करे। यथा — नं तत्पुरुषाय नमः (पूर्वे)। मं अघोराय नमः (दक्षिणे)। शिं सद्योजाताय नमः (पश्चिमे)। वां वामदेवाय नमः (उत्तरे)। यं ईशानाय नमः (ईशाने)। तत्पुरुष चतुर्भुज हैं। उनका वर्ण श्वेत है। उनका स्थान कमल के पूर्ववर्ती दल में है। अघोर के आठ भुजाएँ हैं और उनकी अङ्गकान्ति असित (श्याम) है। इनका स्थान दक्षिणदल में है। सद्योजात के चार मुख और चार ही भुजाएँ हैं। उनका पीत वर्ण है और स्थान पश्चिमदल में है। वामदेवविग्रह स्त्री (देवी पार्वती) के साथ विलसित होता है। उनके भी मुख तथा भुजाएँ चार-चार ही हैं। कान्ति अरुण है। इनका स्थान उत्तरवर्ती कमलदल में है। ईशान के पाँच मुख हैं। वे ईशान- दल में स्थित हैं। उनका वर्ण गौर है तथा वे सब कुछ देने वाले हैं ॥ २३-२६ ॥ तत्पश्चात् इष्टदेव के अङ्गों का यथोचित पूजन करे 11 । फिर अनन्त, सूक्ष्म, सिद्धेश्वर (अथवा शिवोत्तम) और एकनेत्र का पूर्वादि दिशाओं में (नाममन्त्र से) पूजन करे। एकरुद्र, त्रिनेत्र, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी का ईशान आदि कोणों में पूजन करे। ये सब के सब विद्येश्वर हैं और कमल इनका आसन है। इनकी अङ्गकान्ति क्रमशः श्वेत, पोत, सित, रक्त, धूम्र, रक्त, अरुण और नील है। ये सभी चतुर्भुज हैं और चार हाथों में शूल, वज्र, बाण और धनुष लिये रहते हैं। इनके मुख भी चार-चार ही हैं। इसके बाद तृतीय अष्टदल- कमल में उत्तरादि दलो में प्रदक्षिण-क्रम से उमा, चण्डेश, नन्दीश्वर, महाकाल, गणेश्वर, वृषभ, भृङ्गिरिटि तथा स्कन्द का पूजन करे ॥ २७-३० ॥ तत्पश्चात् पूर्वादि दिशाओं में चतुरस्र रेखा पर इन्द्रादि दिक्पालों तथा उनके अस्त्र-वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, शूल, चक्र और पद्म का पूजन करे।12 इस प्रकार छः आवरणों सहित इष्टदेवता की पूजा करके गुरु अधिवासित शिष्य को पञ्चगव्यपान कराये। फिर आचमन कर लेने पर उसका प्रोक्षण करे। इसके बाद नेत्रान्त अर्थात् नूतन शुक्ल वस्त्र की पट्टी से नेत्र-मन्त्र (वौषट्) का उच्चारण करते हुए गुरु शिष्य के नेत्रों को बाँध दे। फिर उस शिष्य को मण्डप के दक्षिण द्वार में प्रवेश कराये। वहाँ आसन आदि या कुश पर बैठे हुए शिष्य का गुरु शोधन करे। पूर्वोक्त रीति से शरीर आदि पाञ्चभौतिक तत्त्वों का क्रमशः संहार करके शिष्य का परमात्मा में लय किया जाय; फिर सृष्टिमार्ग से देशिक शिष्य का पुनरुत्पादन करे। इसके बाद उस शिष्य के दिव्य शरीर में न्यास करके उसे प्रदक्षिणक्रम से पश्चिम द्वार पर लाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलि का क्षेपण कराये। जिस देवता के ऊपर वे फूल गिरें, उसके नाम को आदि में रखते हुए शिष्य के नाम का निर्देश करे। तत्पश्चात् (नेत्र का बन्धन खोलकर) यज्ञभूमि के पार्श्वभाग में सुन्दर नाभि और मेखला से युक्त खुदे हुए कुण्ड में शिवाग्नि को प्रकट कराकर, स्वयं उसका पूजन करके, फिर शिष्य से भी उसकी अर्चना कराये। फिर ध्यान द्वारा आत्मसदृश शिष्य को संहारक्रम से अपने में लीन करके पुनः उसका सृष्टिक्रम से उत्पादन करे। तदनन्तर उसके हाथ में अभिमन्त्रित कुश दे और हृदयादि मन्त्रों द्वारा पृथिवी आदि तत्त्वों के लिये आहुति प्रदान करे ॥ ३१-३८ ॥ पृथ्वी, जल, तेज और वायु — इनमें से प्रत्येक के लिये इनके नाम मन्त्र से सौ-सौ आहुतियाँ देकर आकाशतत्त्व के लिये मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)— से सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार हवन करके उसकी पूर्णाहुति करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्) — का उच्चारण कर के आठ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् विशेष शुद्धि के लिये प्रायश्चित्त (होम या गोदान) करे। अभिमन्त्रित कलश का पूजन कर पीठस्थित शिष्य का अभिषेक करे। फिर गुरु शिष्य को समयाचार सिखावे। शिष्य स्वर्ण मुद्रा आदि के द्वारा अपने गुरु का पूजन करे। इस प्रकार यहाँ ‘शिवपञ्चाक्षर’ मन्त्र की दीक्षा बतायी गयी। इसी तरह विष्णु आदि देवताओं के मन्त्रों की भी दीक्षा दी जाती है ॥ ३९-४१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पञ्चाक्षरमन्त्र की दीक्षा के विधान का वर्णन’ नामक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०४ ॥ See Also – शिव पञ्चाक्षरी मन्त्र प्रयोगः 1. ‘शारदातिलक’ तथा ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ के अनुसार पञ्चाक्षर मन्त्र का विनियोग इस प्रकार है —- ‘अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्य (षडक्षरमन्त्रस्य वा) वामदेव ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः सदाशिवो देवता चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धये जपे विनियोगः।’ इसका न्यास इस प्रकार होगा — ‘वामदेवाय ऋषये नमः शिरसि । पङ्क्तिश्छन्दसे नमः मुखे। श्रीसदाशिवदेवतायै नमः हृदि।’ 2. मूलमन्त्र से सजातीय शिखामन्त्र, यथा — ‘शिं शिखायै वषट्’ द्वारा अथवा अघोरादि मन्त्रों द्वारा गुरु शिष्य की शिखा बाँध दे। यही ‘शिखाबन्धाभिरक्षण’ अथवा शिष्य को शिखाबन्ध के द्वारा रक्षित करना है। (‘शारदातिलक’ की व्याख्या) 3. अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोग:। मन्त्र- ॐ ऋतश्च सत्यं चाभीध्दात्तपसोऽध्यजायत । ततो अत्र्यजायत। तत: समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विद्धव्दिश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता मथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥ 4. करशुद्धि का एक प्रकार यह भी है — अङ्गुष्ठ आदि सभी अँगुलियों में, दोनों हाथों के अन्तर्भाग में, बाह्यभाग में तथा दोनों हाथों के पार्श्वभाग में अस्त्रमन्त्र (फट्) का व्यापकन्यास किया जाय। 5. इसका प्रयोग इस प्रकार है। पहले निम्नाङ्कित रूप से मूर्तिसहित करन्यास करे — ‘नं तत्पुरुषाय नमः तर्जन्योः । मं अघोराय नमः मध्यमयोः । शिं सद्योजाताय नमः कनिष्ठिकयोः। वां वामदेवाय नमः अनामिकयोः। यं ईशानाय नमः अङ्गुष्ठयोः ।’ तत्पश्चात् अङ्गन्याससहित मूर्तिन्यास करे। यथा — ‘नं तत्पुरुषाय हृदयाय नमः। मं अघोराय शिरसे स्वाहा। शिं सद्योजातय शिखायै वषट्। वां वामदेवाय कवचाय हुम्। यं ईशानाय अस्त्राय फट्।’ करन्यास में यहाँ मध्यमा के बाद कनिष्ठा, फिर अनामिका, तत्पश्चात् अङ्गुष्ठ का क्रम ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ के तीसवें श्वास तथा ‘शारदातिलक’ के अठारहवें पटल के अनुसार है। 6. प्रयोग इस प्रकार है — नं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। मं तर्जनीभ्यां स्वाहा। शिं मध्यमाभ्यां वषट्। वां अनामिकाभ्यां हुम्। यं कनिष्ठिकाभ्यां फट् । 7. नं पादयोः न्यस्यामि। मं गुह्ये न्यस्यामि। शिं हृदये न्यस्यामि। वां मुखे न्यस्यामि। यं मूर्धनि न्यस्यामि। 8. व्यापकन्यास ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ (श्वास ३०) तथा ‘शारदातिलक’ (पटल १८) में इस प्रकार कहा गया है — नमोऽस्तु स्थाणुभूताय ज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने। चतुर्मूर्तिवपुश्छायाभासिताङ्गाय शम्भवे ॥ इति मन्त्रेण मूर्धादिपादपर्यन्तं व्यापकं न्यसेत् । 9. नं मूर्ध्ने नमः। मं वक्त्राय स्वाहा। शिं हृदयाय वषट्। वां गुह्याय हुम्। यं पादाभ्यां फट् । 10. नं धर्माय नमः (अग्निकोणपादे)। मं ज्ञानाय नमः (नैर्ऋत्यपादे)। शिं वैराग्याय नमः (वायव्यपादे)। वां यं ऐश्वर्याय नमः (ऐशानपादे)। अधर्माय नमः (पूर्वे)। अज्ञानाय स्वाहा (दक्षिणे)। अवैराग्याय वषट् (पश्चिमे)। अनैश्वर्याय हुं फट् (उत्तरे)। 11. उनके षडङ्ग-पूजन का क्रम यों है — द्वितीय अष्टदलकमल के केसरों में — ॐ हृदयाय नमः (देवस्य रक्षाग्रकेसरे) । नं शिरसे स्वाहा (वामाग्रकेसरे ईशाने)। मं शिखायै वषट् (पृष्ठदक्षिणे)। शिं कवचाय हुम् (पृष्ठवामे)। वां नेत्रत्रयाय वौषट् (अग्रे)। यं अस्त्राय फट् (अग्रादिचतुर्दिक्षु) । (श्रीविद्यार्णवतन्त्र) 12. ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में पूजन के मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं — ‘देवाग्रभागमारभ्य लं इन्द्राय सुराधिपतये पीतवर्णाय वज्रहस्ताय ऐरावतवाहनाय नमः। इं अग्नये तेजोऽधिपतये रक्तवर्णाय शक्तिहस्ताय मेषवाहनाय नमः। हं यमाय प्रेताधिपतये कृष्णवर्णाय दण्डहस्ताय महिषवाहनाय नमः । क्षं नेत्रत्रये रक्षोऽधिपतये धूम्रवर्णाय खड्गहस्ताय प्रेतवाहनाय नमः। वं वरुणाय यादसाम्पतये शुक्लवर्णाय पाशहस्ताय मकरवाहनाय नमः। यं वायवे प्राणाधिपतये धूम्रवर्णाय अङ्कुशहस्ताय मृगवाहनाय नमः। हों ईशानाय विद्याधिपतये स्फटिकवर्णाय शूलहस्ताय वृषभवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य इन्द्रेशानयोर्मध्ये — आं ब्रह्मणे लोकाधिपतये रक्तवर्णाय पद्महस्ताय हंसवाहनाय नमः । निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये — ह्रीं अनन्ताय नागाधिपतये गौरवर्णाय चक्रहस्ताय गरुडवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य द्वितीयवीथ्याम् — वज्राय नमः । शक्तये नमः । दण्डाय नमः । खङ्गाय नमः । पाशाय नमः । अङ्कुशाय नमः । गदायै नमः । त्रिशूलाय नमः । पद्माय नमः । चक्राय नमः । इस प्रकार इन-इन आयुधों का उन-उन दिक्पालों के निकटवर्ती स्थान में पूजन करना चाहिये।’ Content is available only for registered users. 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