अग्निपुराण – अध्याय 301
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ एकवाँ अध्याय
सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्य देव की आराधना
सूर्य्यार्च्चनम्

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! शार्ङ्गी (गकार), दण्डी (अनुस्वारयुक्त) हो, उसके साथ पद्येश — विष्णु (ईकार) और पावक (रकार) हो तो इन चार अक्षरों के मेल से पिण्डीभूत बीज (ग्रीं) प्रकट होता है। यह सर्वार्थसाधक माना गया है।1  उपर्युक्त बीज के आदि में क्रमशः दीर्घ स्वरों को जोड़कर उनके द्वारा अङ्गन्यास करे। यथा — ‘ग्रां हृदयाय नमः। ग्रीं शिरसे स्वाहा। ग्रूं शिखायै वषट् । ग्रैं कवचाय हुम्। ग्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ग्रः अस्त्राय फट्।’ (‘ग’ इस एकाक्षर बीज से भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। उसमें दीर्घ स्वर जोड़ने पर क्रमशः ‘गां गीं गूं गैं गौं गः’ ये छः बीज बनेंगे।) अन्त (विसर्ग), विष (म्) — इनसे युक्त खान्त (ग) – का उच्चारण किया जाय। ऐसा करने से ‘गं’, ‘गः’ — ये दो बीज प्रकट हुए। औकार और बिन्दु से युक्त ‘गौं’ तीसरा बीज है। बिन्दु और कला दोनों से युक्त ‘गः‘ यह चौथा बीज और केवल गकार पाँचवाँ बीज2  है। इस प्रकार विघ्नराज गणपति के — ये पाँच बीज हैं, जिनके पृथक् पृथक् फल देखे गये हैं ॥ १-३ ॥’

गणेश सम्बन्धी मन्त्रों के लिये सामान्य पञ्चाङ्गन्यास

‘गणंजयाय स्वाहा हृदयाय नमः। एकदंष्ट्राय हुं फट् शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने नमो नमः शिखायै वषट् । गजवक्त्राय नमो नमः कवचाय हुम्। महोदरहस्ताय 3  चण्डाय हुं फट्, अस्त्राय फट्।’ यह सर्वसामान्य पञ्चाङ्ग है। उक्त एकाक्षर बीज-मन्त्र के एक लाख जप से सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ४-५ ॥

अष्टदल कमल बनाकर उसके दिग्वर्ती दलों में गणेशजी के चार विग्रहों का पूजन करे। इसी प्रकार वहाँ क्रमशः पाँच अङ्गों की भी पूजा करनी चाहिये। विग्रहों के पूजन सम्बन्धी मन्त्र इस प्रकार हैं — १-गणाधिपतये नमः। २-गणेश्वराय नमः ३-गणनायकाय नमः। ४-गणक्रीडाय नमः। (हृदयादि चार अङ्गों की तो कोणवर्ती चार दलों में और अस्त्र की मध्य में पूजा करे।) ‘वक्रतुण्डाय नमः। एकदंष्ट्राय नमः। महोदराय नमः। गजवक्राय नमः। लम्बोदराय नमः। विकटाय नमः। विघ्नराजाय नमः। धूम्रवर्णाय नमः।’ — इन आठ मूर्तियों की कमलचक्र के दिग्वर्ती तथा कोणवर्ती दलों में पूजा करे। फिर इन्द्रादि लोकपालों तथा उनके अस्त्रों की अर्चना करे। मुद्रा-प्रदर्शन द्वारा पूजन अभीष्ट है। मध्यमा तथा तर्जनी के मध्य में अँगूठे को डालकर मुट्ठी बाँध लेना यह गणेशजी के लिये मुद्रा है। उनका ध्यान इस प्रकार करे— ‘भगवान् गणेश के चार भुजाएँ हैं। वे एक हाथ में मोदक लिये हुए हैं और शेष तीन हाथों में दण्ड, पाश एवं अंकुश से सुशोभित हैं। दाँतों में उन्होंने भक्ष्य- पदार्थ लड्डु को दबा रखा है और उनकी अङ्गकान्ति लाल है। वे कमल, पाश और अङ्कुश से घिरे हुए हैं ॥ ६-१० ॥

गणेशजी की नित्य पूजा करे, किंतु चतुर्थी को विशेषरूप से पूजा का आयोजन करे। सफेद आक की जड़ से उनकी प्रतिमा बनाकर पूजा करे। उनके लिये तिल की आहुति देने पर सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति होती है। यदि दही, मधु और घी से मिले हुए चावल से आहुति दी जाय तो सौभाग्य की सिद्धि एवं वशित्व की प्राप्ति होती है ॥ १११/२

घोष (ह), असृक् (र), प्राण (य), शान्ति (औं), अर्घी (उ) तथा दण्ड (अनुस्वार) — यह सब मिलकर सूर्यदेव का ‘ह्र्यौ ॐ’ ऐसा ‘मार्तण्डभैरव’ नामक बीज होता है। इसको बिम्ब-बीज 4  से सम्पुटित कर दिया जाय तो यह साधकों को धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने वाला होता है। पाँच ह्रस्व अक्षरों को आदि में बीज बनाकर उनके द्वारा पाँच मूर्तियों का न्यास करे। यथा — ‘अं सूर्याय नमः। इं भास्कराय नमः। उं भानवे नमः। एं रखये नमः। ओं दिवाकराय नमः। ‘ 5  दीर्घस्वरों के बीज से हृदयादि अङ्गन्यास करे। यथा — आं हृदयाय नमः।’ इत्यादि। इस प्रकार न्यास करके ध्यान करे — ‘ भगवान् सूर्य ईशान कोण में विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति सिन्दूर के सदृश अरुण है। उनके आधे वामाङ्ग में उनकी प्राणवल्लभा विराज रही हैं ॥ १२-१३१/२

(‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र में मार्तण्डभैरव बीज को ही दीर्घ स्वरों से युक्त करके उनके द्वारा हृदयादि न्यास का विधान किया गया है। यथा — ‘ह्र्यां हृदयाय नमः।’ ‘ह्र्यीं शिरसे स्वाहा।’ इत्यादि।) फिर ईशानकोण में कृतान्त के लिये निर्माल्य और चण्ड के लिये दीप्ततेज (दीपज्योति) अर्पित करे। रोचना, कुङ्कुम, जल, रक्त चन्दन, अक्षत, अङ्कुर, वेणुबीज, जौ, अगहनी, धान का चावल,सावाँ, तिल तथा राई और जपा के फूल — अर्घ्यपात्र में डाले। फिर उस अर्घ्यपात्र को सिर पर रखकर दोनों घुटने धरती पर टिका दे और सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करे। अपने मन्त्र से अभिमन्त्रित नौ कलशों द्वारा ग्रहों का पूजन करके ग्रहादि की शान्ति के लिये शान्ति कलश के जल से स्नान एवं सूर्यमन्त्र का जप करने से मनुष्य सब कुछ पा सकता है। (एक सौ अड़तालीसवें अध्याय में कथित) ‘संग्राम विजय- मन्त्र में बीज पोषक बिन्दुयुक्त अग्नि — रकार अर्थात् ‘र’ जोड़कर उस सम्पूर्ण मन्त्र का मूर्धा से लेकर चरणपर्यन्त व्यापकन्यास करके मूलमन्त्र का, अर्थात् उसके उच्चारणपूर्वक सूर्यदेव का ‘आवाहनी’ आदि मुद्राओं के प्रदर्शन पूर्वक पूजन करे। तदनन्तर यथोक्त अङ्गन्यास करके अपने-आपका रवि के रूप में चिन्तन करे। अर्थात् मेरी आत्मा सूर्य स्वरूप है, ऐसी भावना करे। मारण और स्तम्भनकर्म में सूर्यदेव के पीतवर्ण का, अप्यायन में श्वेतवर्ण का, शत्रुघात की क्रिया में कृष्णवर्ण का तथा मोहन कर्म में इन्द्रधनुष के समान वर्ण का चिन्तन करे। जो सूर्यदेव के अभिषेक, जप, ध्यान, पूजा और होमकर्म में सदा तत्पर रहता है, वह तेजस्वी, अजेय तथा श्रीसम्पन्न होता है और युद्ध में विजय पाता है। ताम्बूल आदि में उक्त मन्त्र का न्यास करके जप पूर्वक उसमें खस का इत्र डाले तथा अपने हाथ में भी ‘संग्राम विजय ‘ के बीजों का न्यास कर के उस हाथ से किसी को वह ताम्बूल अर्पण करे, अथवा उस हाथ से किसी का स्पर्श कर ले तो वह उसके वश में हो जाता है ॥ १४-२२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गणपति तथा सूर्य की अर्चा का कथन’ नामक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०१ ॥

1. ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में इस मन्त्र का उद्धार इस प्रकार मिलता है —
बिन्दुवामाक्ष्यग्नियुता स्मृतिर्माया सुमध्यगा ।
त्र्यक्षरः सिद्धिगणपः सर्वसिद्धिप्रदायकः ॥

‘स्मृतिर्गकारः । अग्नी रेफः । वामाक्षि ईकारः । बिन्दुरनुस्वारः । एतैः पिण्डितं बीजम् ‘ग्रीम्’ इति मायाबीजद्वयस्य मध्ये स्थापितं सत् त्र्यक्षरं भवेत्। ह्रीं ग्रीं ह्रीमिति।’
इसके अनुसार इस ‘ग्रीं’ बीज को आदि-अन्त में ‘ह्रीं’ बीज से सम्पुटित कर दिया जाय तो यह ‘त्र्यक्षर मन्त्र’ हो जाता है। अग्निपुराण में इसके एकाक्षररूप को ही लिया है। यह एकाक्षर या त्र्यक्षर बीजमन्त्र ‘सिद्धिगणपति ‘ के नाम से प्रसिद्ध है और साधकों को सब प्रकार की सिद्धि देने वाला है। कहीं-कहीं — शार्ङ्गी प्रीतियुतः प्रोक्तो गणेशस्यैकवर्णकः’ ऐसा पाठ देखा जाता है। इसके अनुसार शार्ङ्गी – गकार को प्रीति-अनुस्वार से युक्त कर दिया जाय तो ‘गं ‘ एक अक्षर का गणेश-बीज बनता है।
2. ‘नारायणीय तन्त्र’ में यही बात इस प्रकार कही गयी है —
खान्तं सान्तविषं सबिन्दुसकलं बिन्द्वौयुतं केवलं ।
पञ्चैतानि पृथक् फलं विदधते बीजानि विघ्नेशितुः ॥

3. ‘शारदातिलक’ और ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’ में ऐसा ही उल्लेख है। वहाँ ‘महोदरहस्ताय’ के स्थान में ‘महोदराय’ है।
4. ‘शारदातिलक’ में बिम्बबीज ‘ह्रिं’ बताया गया है। उसका उद्धार यों किया गया है — ‘टान्तं दहननेत्रेन्दुसहितं तदुदीरितम्’ (१४ । १७)
5. सूर्यादि पाँच मूर्तियों का उल्लेख ‘शारदातिलक’ में है।

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