July 14, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 287 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय गज चिकित्सा का कथन गज चिकित्साः पालकाप्य ने कहा — लोमपाद ! मैं तुम्हारे सम्मुख हाथियों के लक्षण और चिकित्सा का वर्णन करता हूँ। लम्बी सूँड़वाले, दीर्घ श्वास लेनेवाले, आघात को सहन करने में समर्थ, बीस या अठारह नखों वाले एवं शीतकाल में मद की धारा बहाने वाले हाथी प्रशस्त माने गये हैं। जिनका दाहिना दाँत उठा हो, गर्जना मेघ के समान गम्भीर हो, जिनके कान विशाल हों तथा जो त्वचा पर सूक्ष्म-बिन्दुओं से चित्रित हों, ऐसे हाथियों का संग्रह करना चाहिये; किंतु जो ह्रस्वाकार और लक्षणहीन हों, ऐसे हाथियों का संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये। पार्श्वगर्भिणी हस्तिनी और मूढ़ उन्मत्त हाथियों को भी न रखे। वर्ण, सत्त्व, बल, रूप, कान्ति, शारीरिक संगठन एवं वेग — इस प्रकार के सात गुणों से युक्त गजराज सम्मुख युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। गजराज ही शिबिर और सेना की परम शोभा हैं। राजाओं की विजय हाथियों के अधीन है ॥ १-५ ॥’ हाथियों के सभी प्रकार के ज्वरों में अनुवासनऔषधीय तेलों का उपयोग करके एनीमा दिया जाता है।देना चाहिये। घृत और तैल के अभ्यङ्ग के साथ स्नान वात रोग को नष्ट करने वाला है। राजाओं को हाथियों के स्कन्धरोगों में पूर्ववत् अनुवासन देना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ ! पाण्डुरोग में गोमूत्र, हरिद्रा और घृत दे। बद्धकोष्ठ (कब्जियत) में तैल से पूरे शरीर का मर्दन करके स्नान कराना या क्षरण कराना प्रशस्त है। हाथी को पञ्चलवण (कालानमक, सेंधानमक, संचर नोन, समुद्रलवण और काचलवण) युक्त वारुणी मदिरा का पान करावे। मूर्च्छा रोग में हाथी को वायविडंग, त्रिफला, त्रिकटु और सैन्धव लवण के ग्रास बनाकर खिलाये तथा मधुयुक्त जल पिलाये। शिरश्शूल में अभ्यङ्ग और नस्य प्रशस्त है। हाथियों के पैर के रोगों में तैलयुक्त पोटली से मर्दनरूप चिकित्सा करे। तदनन्तर कल्क और कषाय से उनका शोधन करना चाहिये। जिस हाथी को कम्पन होता हो, उसको पीपल और मिर्च मिलाकर मोर, तीतर और बटेर के मांस के साथ भोजन करावे अतिसाररोग के शमन के लिये गजराज को नेत्रबाला, बेल का सूखा गूदा, लोध, धाय के फूल और मिश्री की पिंडी बनाकर खिलावे। करग्रह (सूँड के रोग) में लवणयुक्त घृत का नस्य देना चाहिये। उत्कर्णक रोग में पीपल, सोंठ, कालाजीरा और नागरमोथा से साधित यवागू आयुर्वेद में एक विशेष प्रकार का भोजन है जो जौ या चावल के मांड से बनाया जाता है। इसे सड़ाकर कुछ खट्टा किया जाता है, जिससे यह एक प्रकार की कांजी बन जाती है। यवागू को पाचन के लिए अच्छा माना जाता है और यह वात दोष को शांत करने में भी मदद करता है। एवं वाराहीकंद का रस दे। दशमूल, कुलथी, अम्लवेत और काकमाची से सिद्ध किया हुआ तैल मिर्च के साथ प्रयोग करने से गलग्रह- रोग का नाश होता है। मूत्रकृच्छ्र-रोग में अष्टलवणयुक्त सुरा एवं घृत का पान करावे अथवा खीरे के बीजों का क्वाथ दे। हाथी को चर्मदोष में नीम या अडूसे का क्वाथ पिलावे। कृमियुक्त कोष्ठ को शुद्धि के लिये गोमूत्र और वायविडंग प्रशस्त हैं। सोंठ, पीपल, मुनक्का और शर्करा से शृत जल का पान क्षतदोष का क्षय करने वाला है तथा मांस-रस भी लाभदायक है। अरुचिरोग में सोंठ, मिर्च एवं पिप्पलीयुक्त मूँग भात प्रशंसित है। निशोथ, त्रिकटु, चित्रक, दन्ती, आक, पीपल, दुग्ध और गजपीपल — इनसे सिद्ध किया हुआ स्नेह गुल्मरोग का अपहरण करता है। इसी प्रकार (गजचिकित्सक) भेदन, द्रावण, अभ्यङ्ग, स्नेहपान और अनुवासन के द्वारा सभी प्रकार के विद्रधिरोगों का विनाश करे ॥ ६-२१ ॥ हाथी के कटुरोगों में मूँग की दाल या मूंग के साथ मुलहठी मिलावे और नेत्रबाला एवं बेल की छाल का लेप करे। सभी प्रकार के शूलों का शमन करने के लिये दिन के पूर्वभाग में इन्द्रयव, हींग, धूपसरल, दोनों हल्दी और दारुहल्दी की पिंडी दे। हाथियों के उत्तम भोजन में साठी चावल, मध्यम भोजन में जौ और गेहूँ एवं अधम भोजन में अन्य भक्ष्य-पदार्थ माने गये हैं। जौ और ईख हाथियों का बल बढ़ाने वाले हैं तथा सूखा तृण उनके धातु को प्रकुपित करने वाला है। मदक्षीण हाथी को दुग्ध पिलाना प्रशस्त है तथा दीपनीय द्रव्यों से पकाया हुआ मांसरस भी लाभप्रद है। गुग्गुल, गठिवन, करकोल्यादिगण और चन्दन — इनका मधु के साथ प्रयोग करे। इससे पिण्डोद्रेक- रोग का नाश होता है। कुटकी, मत्स्य, वायविडंग, लवण, कोशातकी (झिमनी) का दूध और हल्दी — इनका धूप हाथियों के लिये विजयप्रद है। पीपल और चावल तथा तेल, माध्वीक (महुआ या अङ्गूर के रस से निर्मित सुरा) तथा मधु — इनका नेत्रों में परिषेक दीपनीय माना गया है। गौरैया चिड़िया और कबूतर की बीट, गूलर, सूखा गोबर एवं मदिरा — इनका मञ्जन हाथियों को अत्यन्त प्रिय है। हाथी के नेत्रों को इससे अञ्जित करने पर वह संग्रामभूमि में शत्रुओं को मसल डालता है। नीलकमल, नागरमोथा और तगर — इनको चावल के जल में पीस ले। यह हाथियों के नेत्रों को परम शान्ति प्रदान करता है। नख बढ़ने पर उनके नख काटने चाहिये और प्रतिमास तैल का सेक करना चाहिये। हाथियों का शयन-स्थान सूखे गोबर और धूल से युक्त होना चाहिये। शरद् और ग्रीष्म ऋऋतु में इनके लिये घृत का सेक उपयुक्त है ॥ २२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गज चिकित्सा का कथन’ नामक दो सौ सत्तासीषाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe