July 13, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 280 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अस्सीवाँ अध्याय सर्वरोगहर औषधों का वर्णन सर्वरोगहराण्यौषधानि भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं — सुश्रुत ! शारीर, मानस, आगन्तुक और सहज — ये चार प्रकार की व्याधियाँ हैं। ज्वर और कुष्ठ आदि ‘शारीर’ रोग हैं, क्रोध आदि ‘मानस’ रोग हैं, चोट आदि से उत्पन्न रोग ‘आगन्तुक’ कहे जाते हैं तथा भूख, बुढ़ापा आदि ‘सहज’ (स्वाभाविक) रोग हैं। ‘शारीर’ तथा ‘आगन्तुक’ व्याधि के नाश के लिये रविवार को ब्राह्मण की पूजा करके उसे घृत, गुड़ नमक और सुवर्ण का दान करे। जो सोमवार को ब्राह्मण के लिये उबटन देता है, वह सब रोगों से छूट जाता है। शनिवार को तैल का दान करे। आश्विन के महीने में गोरस — गाय का घी, दूध और दही तथा अन्न देने वाला सब रोगों से छुटकारा पा जाता है। घृत तथा दूध से शिवलिङ्ग को स्नान कराने से मनुष्य रोगहीन हो जाता है। त्रिमधुर (शर्करा, गुड़, मधु) में डुबायी हुई दूर्वा का गायत्री मन्त्र से हवन करने पर मनुष्य सब रोगों से छूट जाता है। जिस नक्षत्र में रोग पैदा हो, उसी शुभ नक्षत्र में स्नान करे तथा बलि दे। भगवान् विष्णु का स्तोत्र ‘मानस-रोग’ आदि को हर लेने वाला है। अब वात, पित्त एवं कफ —इन दोषों का तथा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि धातुओं का वर्णन सुनो ॥ १-६ ॥’ सुश्रुत ! खाया हुआ अन्न पक्वाशय से दो भागों में विभक्त हो जाता है। एक अंश से वह किट्ट होता है और दूसरे अंश से रस। किट्टभाग मल है, जो विष्ठा, मूत्र तथा स्वेदरूप में परिणत होता है। वही नेत्रमल, नासामल, कर्णमल तथा देहमल कहलाता है। रस अपने समस्त भाग से रुधिररूप में परिणत हो जाता है। रुधिर से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र, शुक्र से राग (रंग या वर्ण) तथा ओजस् उत्पन्न होता है। चिकित्सक को चाहिये कि देश, काल, पीड़ा, बल, शक्ति, प्रकृति तथा भेषज के बल को समझकर तदनुकूल चिकित्सा करे। औषध प्रारम्भ करने में रिक्ता (४, ९, १४) तिथि, भौमवार एवं मन्द, दारुण तथा उग्र नक्षत्र को त्याग देवे। विष्णु, गौ, ब्राहाण, चन्द्रमा, सूर्य आदि देवों की पूजा करके रोगी के उद्देश्य से निम्नाङ्कित मन्त्र का उच्चारण करते हुए औषध प्रारम्भ करे —॥ ७-१२ ॥ ब्रह्मदक्षाश्चिरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः । ऋषयश्चौषधीग्रामा भूतसंघाश्च पान्तु ते ॥ रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा । सुधैवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ॥ ‘ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्रमा, सूर्य, अनिल, अनल, ऋषि, ओषधिसमूह तथा भूतसमुदाय — ये तुम्हारी रक्षा करें। जैसे ऋषियों के लिये रसायन, देवताओं के लिये अमृत तथा श्रेष्ठ नागों के लिये सुधा ही उत्तम एवं गुणकारी है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिये आरोग्यकारक एवं प्राणरक्षक हो’ ॥ १३-१४ ॥ देश — बहुत वृक्ष तथा अधिक जल वाला देश ‘अनूप’ कहलाता है। वह वात और कफ उत्पन्न करने वाला होता है । जांगल देश ‘अनूप’ देश के गुण-प्रभाव से रहित होता है। थोड़े वृक्ष तथा थोड़े जल वाला देश ‘साधारण’ कहा जाता है। जांगल देश अधिक पित्त उत्पन्न करने वाला तथा साधारण देश मध्यमपित्त का उत्पादक है ॥ १५-१६ ॥ वात, पित्त, कफ के लक्षण — वायु रूक्ष, शीत तथा चल है। पित्त उष्ण है तथा कटुत्रय (सोंठ, मिर्च, पीपली) पित्तकर हैं। कफ स्थिर, अम्ल,स्निग्ध तथा मधुर है। समान वस्तुओं के प्रयोग से इनकी वृद्धि तथा असमान वस्तुओं के प्रयोग से हानि होती है। मधुर, अम्ल एवं लवण रस कफकारक तथा वायुनाशक हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस वायु की वृद्धि करते हैं तथा कफनाशक हैं। इसी तरह कटु, अम्ल तथा लवण रस पित्त बढ़ाने वाले हैं। तिक्त, स्वादु (मधुर) तथा कषाय रस पित्तनाशक होते हैं। यह गुण या प्रभाव रस का नहीं, उसके विपाक का माना गया है। उष्णवीर्य कफनाशक तथा शीतवीर्य पित्तनाशक होते हैं। सुश्रुत। ये सब प्रभाव से ही वैसा कार्य करते हैं ॥ १७-२१ ॥ शिशिर, वसन्त तथा शरद् में क्रमशः कफ के चय, प्रकोप तथा प्रशमन बताये गये हैं। अर्थात् कफ का चय शिशिर ऋतु में, प्रकोप वसन्त- ऋतु में तथा प्रशमन ग्रीष्म ऋतु में होता है। सुश्रुत ! वायु का संचय ग्रीष्म में, प्रकोप वर्षा तथा रात्रि में और शमन शरद् में कहा गया है। इसी प्रकार पित्त का संचय वर्षा में, प्रकोप शरद् में तथा शमन हेमन्त में कहा गया है। वर्षा से हेमन्तपर्यन्त (वर्षा, शरद्, हेमन्त ये) तीन ऋतुएँ ‘विसर्ग-काल’ कही गयी हैं तथा शिशिर से ग्रीष्मपर्यन्त तीन ऋतुओं को (औषध लेने के निमित्त) ‘आदान (काल)’ कहा गया है। विसर्ग काल को ‘सौम्य’ और आदानकाल को ‘आग्नेय’ कहा गया है। वर्षा आदि तीन ऋतुओं में चलता हुआ चन्द्रमा ओषधियों में क्रमशः अम्ल, लवण तथा मधुर रसों को उत्पन्न करता है। शिशिर आदि तीन ऋतुओं में विचरता हुआ सूर्य क्रमशः तिक्त, कषाय तथा कटु रसों को बढ़ाता है। रातें ज्यों-ज्यों बढ़ती हैं, त्यों-त्यों ओषधियों का बल बढ़ता है ॥ २२-२८ ॥ जैसे-जैसे रातें घटती हैं, वैसे-वैसे मनुष्यों का बल क्रमशः घटता है। रात में, दिन में तथा भोजन के बाद, आयु के आदि, मध्य और अवसान काल में कफ, पित्त एवं वायु प्रकुपित होते हैं। प्रकोप के आदिकाल में इनका संचय होता है तथा प्रकोप के बाद इनका शमन कहा गया है। विप्रवर! अधिक भोजन और अधिक उपवास से तथा मल-मूत्र आदि के वेगों को रोकने से सभी रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये पेट के दो भागों को अन्न से तथा एक भाग को जल से पूरा करे। अवशिष्ट एक भाग को वायु आदि के संचरण के लिये रिक्त रखे। व्याधि का निदान तथा विपरीत औषध करना चाहिये, इन सबका सार यही है, जो मैंने बतलाया है ॥ २९-३३१/२ ॥ नाभि के ऊपर पित्त का स्थान है तथा नीचे श्रोणी एवं गुदा को वात का स्थान कहा गया है। तथापि ये सभी समस्त शरीर में घूमते हैं। उनमें भी वायु विशेषरूप से सम्पूर्ण शरीर में संचरण करती है। (इस विषय का सुस्पष्ट वर्णन सुश्रुत में इस प्रकार है — दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः। तत्र समासेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः, तदुपर्यधो नाभेः पक्वाशयः, पक्कामाशयमध्यं पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः । (सुश्रुत, सूत्र-स्थान अध्याय २१, सूत्र) ‘इसके बाद दोषों के स्थानों का वर्णन करूँगा — उनमें संक्षेप से (रहस्य यह है कि) वायु का स्थान श्रोणि एवं गुदा है, उसके ऊपर एवं नाभि (ग्रहणी) के नीचे पक्वाशय है, पक्वाशय एवं आमाशय के मध्य में पित्त का स्थान है। श्लेष्मा का स्थान आमाशय है’) ॥ ३४-३५ ॥ देह के मध्य में हृदय है, जो मन का स्थान है। जो स्वभावतः दुर्बल, थोड़े बाल वाला, चञ्चल, अधिक बोलने वाला तथा विषमानल है — जिसकी जठराग्नि कभी ठीक से पाचनक्रिया करती है, कभी नहीं करती तथा जो स्वप्न में आकाश में उड़ने वाला है, वह वात प्रकृति का मनुष्य है। समय (अवस्था)- से पूर्व ही जिसके बाल पकने-झरने लगे, जो क्रोधी हो, जिसे पसीना अधिक होता हो, जो मीठी वस्तुएँ खाना पसंद करता हो और स्वप्न में अग्नि को देखने वाला हो, वह पित्त प्रकृति का है। जो दृढ़ अङ्गोंवाला, स्थिरचित्त, सुन्दर, कान्तियुक्त, चिकने केश तथा स्वप्न में स्वच्छ जल को देखने वाला है, वह कफ प्रकृति वाला मनुष्य कहा जाता है। इसी प्रकार तामस, राजस तथा सात्त्विक तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं ॥ ३६-३९ ॥ मुनिश्रेष्ठ! सभी मनुष्य वात, पित्त और कफ वाले हैं। मैथुन से और भारी काम में लगे रहने से रक्तपित्त होता है। कदन्न के भोजन से तथा शोक से वायु कुपित होती है। द्विजोत्तम । जलन पैदा करने वाले पदार्थों तथा कटु, तिक्त, कषायरस से युक्त पदार्थों के सेवन से, मार्ग में चलने से तथा भय से पित्त प्रकुपित होता है। अधिक जल पीने वालों, भारी अन्न भोजन करने वालों, खाकर तुरंत सो जाने वालों तथा आलसियों का कफ प्रकुपित होता है। उत्पन्न हुए वातादि रोगों को लक्षणों से जानकर उनका शमन करे ॥ ४०-४३ ॥ अस्थिभङ्ग (हड्डियों का टूटना या व्यथित होना), मुख का कसैला स्वाद होना, मुँह सूखना, जँभाई आना तथा रोएँ खड़े हो जाना — ये वायुजनित रोग के लक्षण हैं। नाखून, आँखें एवं नस नाड़ियों का पीला हो जाना, मुख में कड़वापन प्रतीत होना, प्यास लगना तथा शरीर में दाह या गर्मी मालूम होना — ये पित्तव्याधि के लक्षण हैं। ॥ ४४-४५ ॥ आलस्य, प्रसेक (मुँह में पानी आना), भारीपन, मुँह का मीठा होना, उष्ण की अभिलाषा (धूप में या आग के पास बैठने की इच्छा होना या उष्णपदार्थों को ही खाने की कामना) — ये कफज व्याधि के लक्षण हैं। स्निग्ध और गरम गरम भोजन करने से, तेल की मालिश से तथा तैल-पान आदि से वातरोग का निवारण होता है। घी, दूध, मिश्री आदि एवं चन्द्रमा की किरण आदि पित्त को दूर करता है। शहद के साथ त्रिफला का तैल लेने तथा व्यायाम आदि से कफ का शमन होता है। सब रोगों की शान्ति के लिये भगवान् विष्णु का ध्यान एवं पूजन सर्वोत्तम औषध है ॥ ४६-४८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सर्वरोगहर औषधियों का वर्णन’ नामक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८० ॥ Content is available only for registered users. 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