July 13, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 278 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरुवंश का वर्णन पुरुवंशवर्णनम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! पूरु से जनमेजय हुए, जनमेजय से प्राचीवान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्राचीवान् से मनस्यु और मनस्यु से राजा वीतमय का जन्म हुआ। वीतमय से शुन्धु हुआ, शुन्धु से बहुविध नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। बहुविध से संयाति और संयाति का पुत्र रहोवादी हुआ। रहोवादी के पुत्र का नाम भद्राश्व था। भद्राश्व के दस पुत्र हुए — ऋचेयु, कृषेयु, संनतेयु, मृतेयु, चितेयु, स्थण्डिलेयु, धर्मेयु, संनतेयु (दूसरा), कृतेयु और मतिनार। मतिनार के तंसुरोध, प्रतिरथ और पुरस्त — ये तीन पुत्र हुए। प्रतिरथ से कण्व और कण्व से मेधातिथि का जन्म हुआ। तंसुरोध से चार पुत्र उत्पन्न हुए — दुष्यन्त, प्रवीरक, सुमन्त और वीरवर अनय। दुष्यन्त से भरत का जन्म हुआ। भरत शकुन्तला के महाबली पुत्र थे। राजा भरत के नाम पर उनके वंशज क्षत्रिय ‘भारत’ कहलाते हैं।’ भरत के पुत्र अपनी माताओं के क्रोध से नष्ट हो गये, तब राजा के यज्ञ करने पर मरुद्गणों ने बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज को ले आकर उन्हें पुत्ररूप से अर्पण किया। (भरतवंश ‘वितथ’ हो रहा था, ऐसे समय में भरद्वाज आये, अतः) वे ‘वितथ’ नाम से प्रसिद्ध हुए। वितथ ने पाँच पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम ये हैं — सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्भ तथा कपिल। इनके सिवा उनसे महात्मा और सुकेतु — ये दो पुत्र और उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने कौशिक और गृत्सपति को भी जन्म दिया। गृत्सपति के अनेक पुत्र हुए, उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य — सभी थे । काश और दीर्घतमा भी उन्हीं के पुत्र थे। दीर्घतमा के धन्वन्तरि हुए और धन्वन्तरि का पुत्र केतुमान् हुआ। केतुमान् से हिमरथ का जन्म हुआ, जो दिवोदास ‘ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। दिवोदास से प्रतर्दन तथा प्रतर्दन से भर्ग और वत्स नामक दो पुत्र हुए। वत्स से अनर्क और अनर्क से क्षेमक की उत्पत्ति हुई। क्षेमक के वर्षकेतु और वर्षकेतु के पुत्र विभु बतलाये गये हैं। विभु से आनर्त और सुकुमार नामक पुत्र उत्पन्न हुए। सुकुमार से सत्यकेतु का जन्म हुआ। राजा वत्स से वत्सभूमि नामक पुत्र की भी उत्पत्ति हुई थी। वितथकुमार सुहोत्र से बृहत् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बृहत् के तीन पुत्र हुए — अजमीढ, द्विमीढ और पराक्रमी पुरुमीढ। अजमीढ की केशिनी नाम वाली पत्नी के गर्भ से प्रतापी जह्नु का जन्म हुआ। जह्नु से अजकाश्व की उत्पत्ति हुई और अजकाश्व का पुत्र बलाकाश्च हुआ। बलाकाश्व के पुत्र का नाम कुशिक हुआ। कुशिक से गाधि उत्पन्न हुए, जिन्होंने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। गाधि से सत्यवती नाम की कन्या और विश्वामित्र नामक पुत्र का जन्म हुआ। देवरात और कतिमुख आदि विश्वामित्र के पुत्र हुए। अजमीढ से शुनःशेप और अष्टक नाम वाले अन्य पुत्रों की भी उत्पत्ति हुई। उनकी नीलिनी नाम वाली पत्नी के गर्भ से एक और पुत्र हुआ, जिसका नाम शान्ति था। शान्ति से पुरुजाति, पुरुजाति से बाह्याश्च और बाह्याश्व से पाँच राजा उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं — मुकुल, सृञ्जय, राजा बृहदिषु, यवीनर और कृमिल। ये ‘पाञ्चाल’ नाम से विख्यात हुए। मुकुल के वंशज ‘मौकुल्य’ कहलाये। वे क्षात्रधर्म से युक्त ब्राह्मण हुए। मुकुल से चञ्चाश्व का जन्म हुआ और चञ्चाश्व से एक पुत्र और एक जुड़वीं संतान पैदा हुई। पुत्र का नाम दिवोदास था और कन्या का अहल्या। अहल्या के गर्भ से शरद्वत (गौतम) द्वारा शतानन्द की उत्पत्ति हुई। शतानन्द से सत्यधृक् हुए। सत्यधृक् से भी दो जुड़वीं सन्तानें पैदा हुईं। उनमें पुत्र का नाम कृप और कन्या का नाम कृपी था। दिवोदास से मैत्रेय और मैत्रेय से सोमक हुए। सृञ्जय से पञ्चधनुष की उत्पत्ति हुई। उनके पुत्र का नाम सोमदत्त था। सोमदत्त से सहदेव, सहदेव से सोमक और सोमक से जन्तु हुए। जन्तु के पुत्र का नाम पृषत् हुआ। पृषत् से द्रुपद का जन्म हुआ तथा दुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न था और धृष्टद्युम्न से धृष्टकेतु की उत्पत्ति हुई। महाराज अजमीढ की धूमिनी नाम वाली पत्नी से ऋक्ष नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १-२५ ॥ ऋक्ष से संवरण और संवरण से कुरु का जन्म हुआ, जिन्होंने प्रयाग से जाकर कुरुक्षेत्र तीर्थ की स्थापना की। कुरु से सुधन्वा, सुधनु, परीक्षित् और रिपुञ्जय — ये चार पुत्र हुए। सुधन्वा से सुहोत्र और सुहोत्र से च्यवन उत्पन्न हुए। च्यवन की पत्नी महारानी गिरिका के वसुश्रेष्ठ उपरिचर के अंश से सात पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम इस प्रकार हैं — बृहद्रथ, कुश, वीर, यदु, प्रत्यग्रह, बल और मत्स्यकाली। राजा बृहद्रथ से कुशाग्र का जन्म हुआ। कुशाग्र से वृषभ की उत्पत्ति हुई और वृषभ के पुत्र का नाम सत्यहित हुआ। सत्यहित से सुधन्वा, सुधन्वा से ऊर्ज, ऊर्ज से सम्भव और सम्भव से जरासंध उत्पन्न हुआ। जरासंध के पुत्र का नाम सहदेव था। सहदेव से उदापि और उदापि से श्रुतकर्मा की उत्पत्ति हुई। कुरुनन्दन परीक्षित् के पुत्र जनमेजय हुए। वे बड़े धार्मिक थे। जनमेजय से त्रसदस्यु का जन्म हुआ। राजा अजमीढ के जो जह्नु नाम वाले पुत्र थे, उनके सुरथ, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन — ये चार पुत्र उत्पन्न हुए। परीक्षित् कुमार जनमेजय के दो पुत्र और हुए — सुरथ तथा महिमान्। सुरथ से विदूरथ और विदूरथ से ऋक्ष हुए। इस वंश में ये ऋक्ष नाम से प्रसिद्ध द्वितीय राजा थे। इनके पुत्र का नाम भीमसेन हुआ। भीमसेन के पुत्र प्रतीप और प्रतीप के शंतनु हुए। शंतनु के देवापि, बाह्लिक और सोमदत्त — ये तीन पुत्र थे। बाह्लिक से सोमदत्त और सोमदत्त से भूरि, भूरिश्रवा तथा शल का जन्म हुआ। शंतनु से गङ्गाजी के गर्भ से भीष्म उत्पन्न हुए तथा उनकी काल्या (सत्यवती) नाम वाली पत्नी से विचित्रवीर्य की उत्पत्ति हुई। विचित्रवीर्य की पत्नी के गर्भ से श्रीकृष्णद्वैपायन ने धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर को जन्म दिया। पाण्डु की रानी कुन्ती के गर्भ से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन — ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए तथा उनकी माद्री नाम वाली पत्नी से नकुल और सहदेव का जन्म हुआ। पाण्डु के ये पाँच पुत्र देवताओं क अंश से प्रकट हुए थे। अर्जुन के पुत्र का नाम अभिमन्यु था। वे सुभद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। अभिमन्यु से राजा परीक्षित् का जन्म हुआ। द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पनी थी। उसके गर्भ से युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीमसेन से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, सहदेव से श्रुतशर्मा और नकुल से शतानीक की उत्पत्ति हुई। भीमसेन का एक दूसरा पुत्र भी था, जो हिडिम्बा के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। उसका नाम था घटोत्कच। ये भूतकाल के राजा हैं। भविष्य में भी बहुत से राजा होंगे, जिनकी कोई गणना नहीं हो सकती। सभी समयानुसार काल के गाल में चले जाते हैं। विप्रवर! काल भगवान् विष्णु का ही स्वरूप है, अतः उन्हीं का पूजन करना चाहिये। उन्हीं के उद्देश्य से अग्नि में हवन करो; क्योंकि वे भगवान् ही सब कुछ देनेवाले हैं ॥ २६-४१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कुरुवंश का वर्णन’ नामक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७८ ॥ Content is available only for registered users. 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