अग्निपुराण – अध्याय 275
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
यदुवंश का वर्णन
यदुवंशवर्णनम्

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ । यदु के पाँच पुत्र थे — नीलाञ्जिक, रघु, क्रोष्टु, शतजित् और सहस्रजित्। इनमें सहस्रजित् सबसे ज्येष्ठ थे। शतजित् के हैहय, रेणुहय और हय — ये तीन पुत्र हुए। हैहय के धर्मनेत्र और धर्मनेत्र के पुत्र संहत हुए। संहत के पुत्र महिमा तथा महिमा के भद्रसेन थे। भद्रसेन के दुर्गम और दुर्गम से कनक का जन्म हुआ। कनक से कृतवीर्य, कृताग्नि, करवीरक और चौथे कृतौजा नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। कृतवीर्य से अर्जुन हुए। अर्जुन ने तपस्या की, इससे प्रसन्न होकर भगवान् दत्तात्रेय ने उन्हें सातों द्वीपों की पृथ्वी का आधिपत्य, एक हजार भुजाएँ और संग्राम में अजेयता का वरदान दिया। साथ ही यह भी कहा ‘अधर्म में प्रवृत्त होने पर भगवान् विष्णु के (अवतार श्रीपरशुरामजी के) हाथ से तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।’ राजा अर्जुन ने दस हजार यज्ञों का अनुष्ठान किया। उनके स्मरणमात्र से राष्ट्र में किसी के धन का नाश नहीं होता था। यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्रज्ञान के द्वारा कोई भी राजा कृतवीर्यकुमार अर्जुन की गति को नहीं पा सकता। कार्तवीर्य अर्जुन के सौ पुत्र थे, उनमें पाँच प्रधान थे। उनके नाम हैं — शूरसेन, शूर, धृष्टोक्त, कृष्ण और जयध्वज। जयध्वज अवन्ती देश के महाराज थे। जयध्वज से तालजङ्घ का जन्म हुआ और तालजङ्घ से अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो तालजङ्घ के ही नाम से प्रसिद्ध थे। हैहयवंशी क्षत्रियों के पाँच कुल हैं — भोज, अवन्ति, वीतिहोत्र, स्वयंजात और शौण्डिकेय। वीतिहोत्र से अनन्त की उत्पत्ति हुई और अनन्त से दुर्जय नामक राजा का जन्म हुआ ॥ १-११ ॥’

अब क्रोष्टु के वंश का वर्णन करूँगा, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु ने अवतार धारण किया था। क्रोष्टु से वृजिनीवान् और वृजिनीवान् से स्वाहा का जन्म हुआ। स्वाहा के पुत्र रुषद्‌गु और उनके पुत्र चित्ररथ थे। चित्ररथ से शशविन्दु उत्पन्न हुए जो चक्रवर्ती राजा थे। वे सदा भगवान् विष्णु के भजन में ही लगे रहते थे। शशविन्दु के दस हजार पुत्र थे। वे सब के सब बुद्धिमान, सुन्दर, अधिक धनवान् और अत्यन्त तेजस्वी थे; उनमें पृथुश्रवा ज्येष्ठ थे। उनके पुत्र का नाम सुयज्ञ था। सुयज्ञ के पुत्र उशना और उशना के तितिक्षु हुए। तितिक्षु से मरुत्त और मरुत्त से कम्बलबर्हिष (जिनका दूसरा नाम रुक्मकवच था) हुए। रुक्मकवच से रुक्मेषु, पृथुरुक्मक, हवि, ज्यामघ और पापघ्न आदि पचास पुत्र उत्पन्न हुए। इनमें ज्यामध अपनी स्त्री के वशीभूत रहने वाला था। उससे उसकी पत्नी शैव्या के गर्भ से विदर्भ की उत्पत्ति हुई। विदर्भ के कौशिक, लोमपाद और क्रथ नामक पुत्र हुए। इनमें लोमपाद ज्येष्ठ थे। उनसे कृति का जन्म हुआ। कौशिक के पुत्र का नाम चिदि हुआ। चिदि के वंशज राजा ‘चैद्य ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए। विदर्भपुत्र क्रथ से कुन्ति और कुन्ति से धृष्टक का जन्म हुआ। धृष्टक के पुत्र धृति और धृति के विदूरथ हुए। ये ‘दशार्ह’ नाम से भी प्रसिद्ध थे। दशार्ह के पुत्र व्योम और व्योम के पुत्र जीमूत कहे जाते हैं। जीमूत के पुत्र का नाम विकल हुआ और उनके पुत्र भीमरथ नाम से प्रसिद्ध हुए। भीमरथ से नवरथ और नवरथ से दृढरथ  हुए। दृढरथ से शकुन्ति तथा शकुन्ति से करम्भ उत्पन्न हुए। करम्भ से देवरात का जन्म हुआ। देवरात के पुत्र देवक्षेत्र कहलाये। देवक्षेत्र से मधु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और मधु से द्रवरस ने जन्म ग्रहण किया। द्रवरस के पुरुहूत और पुरुहूत के पुत्र जन्तु थे। जन्तु के पुत्र का नाम सात्वत था। ये यदुवंशियों में गुणवान् राजा थे। सात्वत के भजमान, वृष्णि, अन्धक तथा देवावृध — ये चार पुत्र हुए। इन चारों के वंश विख्यात हैं। भजमान के बाह्य, वृष्टि, कृमि और निमि नामक पुत्र हुए। देवावृध से  बभ्रु का जन्म हुआ। उनके विषय में इस श्लोक का गान किया जाता ‘हम है – जैसा दूर से सुनते हैं, वैसा ही निकट से देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं और देवावृध देवताओं के समान हैं।’ बभ्रु के चार पुत्र हुए। वे सभी भगवान् वासुदेव के भक्त थे। उनके नाम हैं — कुकुर, भजमान, शिनि और कम्बलबर्हिष। कुकुर के धृष्णु नामक पुत्र हुए। धृष्णु से धृति नामवाले पुत्र की उत्पत्ति हुई। धृति से कपोतरोमा और उनके पुत्र तित्तिरि हुए। तित्तिरि के पुत्र नर और उनके पुत्र आनकदुन्दुभि नाम से विख्यात हुए। आनकदुन्दुभि की परम्परा में पुनर्वसु और उनके पुत्र आहुक हुए। ये आहुकी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। आहुक से देवक और उग्रसेन हुए। देवक से देववान्, उपदेव, सहदेव और देवरक्षित — ये चार पुत्र हुए। इनकी सात बहिनें थीं, जिनका देवक ने वसुदेव के साथ व्याह कर दिया। उन सातों के नाम हैं — देवकी, श्रुतदेवी, मित्रदेवी, यशोधरा, श्रीदेवी, सत्यदेवी और सातवीं सुरापी। उग्रसेन के नौ पुत्र हुए, जिनमें कंस ज्येष्ठ था। शेष आठ पुत्रों के नाम इस प्रकार हैं — न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, राजा शङ्क, सुतनु, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुमुष्टिक। भजमान के पुत्र विदूरथ हुए, जो रथियों में प्रधान थे। उनके पुत्र राजाधिदेव और शूर नाम से विख्यात हुए। राजाधिदेव के दो पुत्र हुए शोणाश्व और श्वेतवाहन। शोणाश्व के शमी और शत्रुजित् आदि पाँच पुत्र हुए । शमी के पुत्र प्रतिक्षेत्र, प्रतिक्षेत्र के भोज और भोज के हृदिक हुए। हृदिक के दस पुत्र थे, जिनमें कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और भीषण आदि प्रधान हैं। देवार्ह से कम्बलबर्हि और कम्बलबर्हि से असमौजा का जन्म हुआ। असमौजा के सुदंष्ट्र, सुवास और धृष्ट नामक पुत्र हुए। धृष्ट की दो पत्नियाँ थीं — गान्धारी और माद्री। इनमें गान्धारी से सुमित्र का जन्म हुआ और माद्री ने युधाजित्‌ को उत्पन्न किया। धृष्ट से अनमित्र और शिनि का भी जन्म हुआ। शिनि से देवमीढुष उत्पन्न हुए। अनमित्र के पुत्र निष्न और निघ्न के प्रसेन तथा सत्राजित् हुए। इनमें प्रसेन के भाई सत्राजित् ‌को सूर्य से स्यमन्तकमणि प्राप्त हुई थी, जिसे लेकर प्रसेन जंगल में मृगया के लिये विचर रहे थे। उन्हें एक सिंह ने मारकर वह मणि ले ली। तत्पश्चात् जाम्बवान् ने उस सिंह को मार डाला (और मणि को अपने अधिका रमें कर लिया)। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण ने जाम्बवान्‌ को युद्ध में परास्त किया और उनसे जाम्बवती तथा मणि को पाकर वे द्वारकापुरी को लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने वह मणि सत्राजित्‌ को दे दी, किंतु (मणि के लोभ से) शतधन्वा ने सत्राजित्‌ को मार डाला। श्रीकृष्ण ने शतधन्वा को मारकर वह मणि छीन ली और यश के भागी हुए। उन्होंने बलराम और मुख्य यदुवंशियों के सामने वह मणि अक्रूर को अर्पित कर दी। इससे श्रीकृष्ण के मिध्या कलङ्क का मार्जन हुआ। जो इस प्रसङ्ग का पाठ करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। सत्राजित् को भङ्गकार नाम से प्रसिद्ध पुत्र और सत्यभामा नाम की कन्या हुई, जो भगवान् श्री कृष्ण की प्यारी पटरानी हुई थी। अनमित्र से शिनि का जन्म हुआ। शिनि के पुत्र सत्यक हुए। सत्यक से सात्यकि की उत्पत्ति हुई। वे ‘युयुधान’ नाम से भी प्रसिद्ध थे। उनके धुनि नामक पुत्र हुआ। धुनि का पुत्र युगन्धर हुआ। युधाजित् से  स्वाह्य का जन्म हुआ। स्वाह्य से ऋषभ और क्षेत्रक की उत्पत्ति हुई। ऋषभ से श्वफल्क उत्पन्न हुए। श्वफल्क के पुत्र का नाम अक्रूर हुआ और अक्रूर से सुधन्वक का जन्म हुआ। शूर से वसुदेव आदि पुत्र तथा पृथा नाम वाली कन्या उत्पन्न हुई, जो महाराज पाण्डु की प्यारी पत्नी हुई। पाण्डु की पत्नी कुन्ती (पृथा) के गर्भ और धर्म के अंश से युधिष्ठिर हुए, वायु के अंश से भीमसेन और इन्द्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। (पाण्डु की दूसरी पत्नी) माद्री के पेट से (अश्विनीकुमारं के अंश से) नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। वसुदेव से रोहिणी के गर्भ से बलराम, सारण और दुर्गम ये तीन पुत्र हुए तथा देवकी के उदर से पहले सुषेण का जन्म हुआ, फिर कीर्तिमान्, भद्रसेन, जारुख्य, विष्णुदास और भद्रदेह उत्पन्न हुए। इन छहों बच्चों को कंस ने मार डाला। तत्पश्चात् बलराम और कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ तथा अन्त में कल्याणमय वचन बोलने वाली सुभद्रा का जन्म हुआ। भगवान् श्री कृष्ण से चारुदेष्ण और साम्ब आदि पुत्र उत्पन्न हुए। साम्ब आदि रानी जाम्बवती के पुत्र थे ॥ १२-५१ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘यदुवंश का वर्णन’ नामक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७५ ॥

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