अग्निपुराण – अध्याय 266
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ छाछठवाँ अध्याय
विनायक-स्नान विधि
विनायक स्नान कथनं

पुष्कर कहते हैं — परशुराम ! जो मनुष्य विघ्नराज विनायक द्वारा पीड़ित हैं, उनके लिये सर्व-मनोरथ साधक स्नान की विधि का वर्णन करता हूँ। कर्म में विघ्न और उसकी सिद्धि के लिये विष्णु, शिव और ब्रह्माजी ने विनायक को पुष्पदन्त आदि गणों के अधिपतिपद पर प्रतिष्ठित किया है। विघ्नराज विनायक के द्वारा जो ग्रस्त है, उस पुरुष के लक्षण सुनो। वह स्वप्न में बहुत अधिक स्नान करता है और वह भी गहरे जल में। (उस अवस्था में वह यह भी देखता है कि पानी का स्रोत मुझे बहाये लिये जाता है, अथवा मैं डूब रहा हूँ।) वह मुँड़ मुड़ाये (और गेरुआँ वस्त्र धारण करने वाले) मनुष्यों को भी देखता है। कच्चे मांस खाने वाले गीधों एवं व्याघ्र आदि पशुओं की पीठ पर चढ़ता है। (चाण्डालों, गदहों और ऊँटों के साथ एक स्थान पर बैठता है।) जाग्रत्-अवस्था में भी जब वह कहीं जाता है तो उसे यह अनुभव होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्य का आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण ही खिन्न रहता है। विघ्नराज की सतायी हुई कुमारी कन्या को जल्दी वर ही नहीं मिलता है और विवाहिता स्त्री भी संतान नहीं पाती। श्रोत्रिय को आचार्यपद नहीं मिलता । शिष्य अध्ययन नहीं कर पाता। वैश्य को व्यापार में और किसान को खेती में लाभ नहीं होता है। राजा का पुत्र भी राज्य को हस्तगत नहीं कर पाता है।’

ऐसे पुरुष को (किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्त में) विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। हस्त, पुष्य, अश्विनी, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र में किसी भद्रपीठ पर स्वस्तिवाचन- पूर्वक बिठाकर उसे स्नान कराने का विधान है। पीली सरसों पीसकर उसे घी से ढीला करके उबटन बनावे और उसको उस मनुष्य के सम्पूर्ण शरीर में मले। फिर उसके मस्तक पर सर्वौषधिसहित सब प्रकार के सुगन्धित द्रव्य का लेप करे। चार कलशों के जल से उनमें सर्वौषधि छोड़कर स्नान कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदी संगम तथा जलाशय से लायी गयी पाँच प्रकार की मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुङ्कुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल ये सब वस्तुएँ भी उन कलशों के जल में छोड़े। आचार्य पूर्व- दिशावर्ती कलश को लेकर निम्नाङ्कित मन्त्र से यजमान का अभिषेक करे —

सहस्त्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम् ॥
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते ।

‘जो सहस्रों नेत्रों (अनेक प्रकार को शक्तियों) से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियों ने पावन बनाया है, उस पवित्र जल से मैं (विनायकजनित उपद्रव से ग्रस्त) तुम्हारा (उक्त उपद्रव को शान्ति के लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे ॥ १-९१/२

(तदनन्तर दक्षिण दिशा में स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्र को पड़ते हुए अभिषेक करे —)

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः ।
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥

‘राजा वरुण, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा सप्तर्षिगण ने तुम्हें कल्याण प्रदान किया है ॥ १०१/२

(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे —)

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि ॥
ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु सर्वदा ।

‘तुम्हारे केशों में, सीमन्त में, मस्तक पर, ललाट में, कानों में और नेत्रों में भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, उसे जलदेवता सदा के लिये शान्त करें ॥ ११ ॥

(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे।) इस प्रकार स्नान करने वाले यजमान के मस्तक पर बायें हाथ में लिये हुए कुशों को रखकर आचार्य उसपर गूलर की स्रुवा से सरसों का तेल उठाकर डाले ॥ १२-१३ ॥ (उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े —)

‘ॐ मिताय स्वाहा । ॐ सम्मिताय स्वाहा ।
ॐ शालाय स्वाहा । ॐ कण्टकाय स्वाहा ।
ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा । ॐ राजपुत्राय स्वाहा ।’

इस प्रकार स्वाहासमन्वित इन मितादि नामों क द्वारा सरसों के तैल की मस्तक पर आहुति दें। मस्तक पर तैल डालना ही हवन है ॥ १४-१५ ॥

(मस्तक पर उक्त होम के पश्चात् लौकिक अग्नि में भी स्थालीपाक की विधि से चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रों से ही उसी अग्नि में हवन करे।) फिर होमशेष चरु द्वारा ‘नमः’ पदयुक्त इन्द्रादि नामों को बलि-मन्त्र बनाकर उनके उच्चारणपूर्वक उन्हें बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् सूप में सब ओर कुश बिछाकर, उसमें कच्चे-पके चावल, पीसे हुए तिल से मिश्रित भात तथा भाँति-भौति के पुष्प, तीन प्रकार की (गौड़ी, माधवी तथा पैष्टी) सुरा, मूली, पूरी, मालपूआ, पीठे की मालाएँ, दही- मिश्रित अन्न, खीर, मीठा, लड्डू और गुड़ — इन सबको एकत्र रखकर चौराहे पर रख दे और उसे देवता, सुपर्ण, सर्प, ग्रह, असुर, यातुधान, पिशाच, नागमाता, शाकिनी, यक्ष, वेताल, योगिनी और पूतना आदि को अर्पित करे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिका को दूर्वादल, सर्षप एवं पुष्पों से भरी हुई अर्घ्यरूप अञ्जलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्र से उनका उपस्थान करे —

रूपं देहि यशो देहि सौभाग्यं सुभगे मम ।
पुत्रं देहि धनं देहि सर्व्वान् कामांश्च देहि मे ॥

‘सौभाग्यवती अम्बिके ! मुझे रूप, यश, सौभाग्य, पुत्र एवं धन दीजिये। मेरी सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कीजिये।’ इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा आचार्य को दो वस्त्र दान करे। इस प्रकार विनायक और ग्रहों का पूजन करके मनुष्य धन और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है ॥ १६-२० ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘विनायक-खानकथन’ नामक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६६ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.