अग्निपुराण – अध्याय 239
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय
श्रीराम की राजनीति का वर्णन
राजधर्माः

श्रीराम कहते हैं — लक्ष्मण! स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), बल (सेना) और सुहृत् (मित्रादि) – ये राज्य के परस्पर उपकार करनेवाले सात अङ्ग कहे गये हैं। राज्य के अङ्गों में राजा और मन्त्री के बाद राष्ट्र प्रधान एवं अर्थ का साधन है, अतः उसका सदा पालन करना चाहिये। (इन अङ्गों में पूर्व-पूर्व अङ्ग पर की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। ) ॥ ११/२

कुलीनता, सत्त्व (व्यसन और अभ्युदय में भी निर्विकार रहना), युवावस्था, शील (अच्छा स्वभाव), दाक्षिण्य (सबके अनुकूल रहना या उदारता ), शीघ्रकारिता (दीर्घसूत्रता का अभाव), अविसंवादिता (वाक्छल का आश्रय लेकर परस्पर विरोधी बातें न करना), सत्य ( मिथ्याभाषण न करना), वृद्धसेवा (विद्यावृद्धों की सेवा में रहना और उनकी बातों को मानना ), कृतज्ञता (किसी के उपकार को न भुलाकर प्रत्युपकार के लिये उद्यत रहना), दैवसम्पन्नता (प्रबल पुरुषार्थ से दैव को भी अनुकूल बना लेना), बुद्धि (शुश्रूषा आदि आठ गुणों से युक्त प्रज्ञा), अक्षुद्रपरिवारता (दुष्ट परिजनों से युक्त न होना), शक्यसामन्तता (आसपास के माण्डलिक राजाओं को वश में किये रहना), दृढभक्तिता (सुदृढ़ अनुराग), दीर्घदर्शिता (दीर्घकाल में घटित होने वाली बातों का अनुमान कर लेना), उत्साह, शुद्धचित्तता, स्थूललक्षता (अत्यन्त मनस्वी होना), विनीतता (जितेन्द्रियता) और धार्मिकता — ये अच्छे अभिगामिक 1  गुण हैं ॥ २-४१/२ ॥’

जो सुप्रसिद्ध कुल में उत्पन्न, क्रूरतारहित, गुणवान् पुरुषों का संग्रह करने वाले तथा पवित्र (शुद्ध) हों, ऐसे लोगों को आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाला राजा अपना परिवार बनाये ॥ ५१/२

वाग्मी (उत्तम वक्ता- ललित, मधुर एवं अल्पाक्षरों द्वारा ही बहुत-से अर्थों का प्रतिपादन करने वाला), प्रगल्भ (सभा में सबको निगृहीत करके निर्भय बोलनेवाला), स्मृतिमान् 2  (स्वभावतः किसी बात को न भूलने वाला), उदग्र (ऊँचे कदवाला), बलवान् (शारीरिक बल से सम्पन्न एवं युद्ध आदि में समर्थ), वशी (जितेन्द्रिय), दण्डनेता (चतुरङ्गिणी सेना का समुचित रीति से संचालन करने में समर्थ), निपुण (व्यवहारकुशल), कृतविद्य (शास्त्रीयविद्या से सम्पन्न), स्ववग्रह (प्रमाद से अनुचित कर्म में प्रवृत्त होने पर वहाँ से सुखपूर्वक निवृत्त किये जाने योग्य), पराभियोगप्रसह (शत्रुओं द्वारा छेड़े गये युद्धादि के कष्ट को दृढ़तापूर्वक सहन करने में समर्थ – सहसा आत्मसमर्पण न करने वाला), सर्वदृष्टप्रतिक्रिय (सब प्रकार के संकटों के निवारण के अमोघ उपाय को तत्काल जान लेने वाला), परच्छिद्रान्ववेक्षी (गुप्तचर आदि के द्वारा शत्रुओं के छिद्रों के अन्वेषण में प्रयत्नशील ), संधिविग्रहतत्त्ववित् (अपनी तथा शत्रु की अवस्था के बलाबल-भेद को जानकर संधि-विग्रह आदि छहों गुणों के प्रयोग के ढंग और अवसर को ठीक-ठीक जाननेवाला), गूढमन्त्रप्रचार (मन्त्रणा और उसके प्रयोग को सर्वथा गुप्त रखने वाला), देशकालविभागवित् (किस प्रकार की सेना किस देश और किस काल में विजयिनी होगी — इत्यादि बातों को विभागपूर्वक जानने वाला), आदाता सम्यगर्थानाम् (प्रजा आदि से न्यायपूर्वक धन लेने वाला), विनियोक्ता (धन को उचित एवं उत्तम कार्य में लगाने वाला), पात्रवित् (सत्पात्र का ज्ञान रखने वाला), क्रोध, लोभ, भय, द्रोह, स्तम्भ (मान) और चपलता (बिना विचारे कार्य कर बैठना ) — इन दोषों से दूर रहने वाला, परोपताप (दूसरों को पीड़ा देना), पैशुन्य (चुगली करके मित्रों में परस्पर फूट डालना), मात्सर्य (डाह), ईर्ष्या (दूसरों के उत्कर्ष को न सह सकना) और अनृत 3  (असत्यभाषण) — इन दुर्गुणों को लाँघ जानेवाला, वृद्धजनों के उपदेश को मानकर चलने वाला, श्लक्ष्ण (मधुरभाषी), मधुरदर्शन ( आकृति से सुन्दर एवं सौम्य दिखायी देने वाला), गुणानुरागी (गुणवानों के गुणों पर रीझने वाला) तथा मितभाषी ( नपी-तुली बात कहने वाला) राजा श्रेष्ठ है। इस प्रकार यहाँ राजा के आत्मसम्पत्ति-सम्बन्धी गुण (उसके स्वरूप के उपपादक गुण) बताये गये हैं ॥ ६-१०१/२

उत्तम कुल में उत्पन्न, बाहर-भीतर से शुद्ध, शौर्य सम्पन्न, आन्वीक्षिकी आदि विद्याओं को जाननेवाले, स्वामिभक्त तथा दण्डनीति का समुचित प्रयोग जाननेवाले लोग राजा के सचिव (अमात्य 4 ) होने चाहिये ॥ १११/२

जिसे अन्याय से हटाना कठिन न हो, जिसका जन्म उसी जनपद में हुआ हो, जो कुलीन (ब्राह्मण आदि), सुशील, शारीरिक बल से सम्पन्न, उत्तम वक्ता, सभा में निर्भीक होकर बोलनेवाला, शास्त्ररूपी नेत्र से युक्त, उत्साहवान् (उत्साह सम्बन्धी त्रिविध5  गुण- शौर्य, अमर्ष एवं दक्षता से सम्पन्न), प्रतिपत्तिमान् ( प्रतिभाशाली, भय आदि के अवसरों पर उनका तत्काल प्रतिकार करनेवाला), स्तब्धता (मान) और चपलता से रहित, मैत्र (मित्रों के अर्जन एवं संग्रह में कुशल), शीत-उष्ण आदि क्लेशों को सहन करने में समर्थ, शुचि (उपधाद्वारा परीक्षा से प्रमाणित हुई शुद्धि से सम्पन्न), सत्य (झूठ न बोलना ), सत्त्व (व्यसन और अभ्युदय में भी निर्विकार रहना), धैर्य, स्थिरता, प्रभाव तथा आरोग्य आदि गुणों से सम्पन्न, कृतशिल्प (सम्पूर्ण कलाओं के अभ्यास से सम्पन्न), दक्ष (शीघ्रतापूर्वक कार्यसम्पादन में कुशल), प्रज्ञावान् (बुद्धिमान्), धारणान्वित (अविस्मरणशील), दृढभक्ति (स्वामी के प्रति अविचल अनुराग रखनेवाला) तथा किसी से वैर न रखनेवाला और दूसरों द्वारा किये गये विरोध को शान्त कर देनेवाला पुरुष राजा का बुद्धिसचिव एवं कर्मसचिव होना चाहिये ॥ १२-१४१/२

स्मृति ( अनेक वर्षों की बीती बातों को भी न भूलना), अर्थ तत्परता (दुर्गादि की रक्षा एवं संधि आदि में सदैव तत्पर रहना), वितर्क (विचार), ज्ञाननिश्चय (यह ऐसा ही है, अन्यथा नहीं है-इस प्रकार का निश्चय), दृढ़ता तथा मन्त्रगुप्ति (कार्यसिद्धि होने तक मन्त्रणा को अत्यन्त गुप्त रखना) ये ‘मन्त्रिसम्पत्’ के गुण कहे गये हैं ॥ १५१/२

पुरोहित को तीनों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) तथा दण्डनीति के ज्ञान में भी कुशल होना चाहिये; वह सदा अथर्ववेदोक्त विधि से राजा के लिये शान्तिकर्म एवं पुष्टिकर्म का सम्पादन करे 6  ॥ १६१/२

बुद्धिमान् राजा तत्तद् विद्या के विद्वानों द्वारा उन अमात्यों के शास्त्रज्ञान तथा शिल्पकर्म- इन दो गुणों की परीक्षा करे 7। यह परोक्ष या आगम प्रमाण द्वारा परीक्षण है ॥ १७१/२

कुलीनता, जन्मस्थान तथा अवग्रह (उसे नियन्त्रित रखनेवाले बन्धुजन) – इन तीन बातों की जानकारी उसके आत्मीयजनों के द्वारा प्राप्त करे। (यहाँ भी आगम या परोक्ष प्रमाण का ही आश्रय लिया गया है।) परिकर्म (दुर्गादि निर्माण) में दक्षता (आलस्य न करना), विज्ञान (बुद्धि से अपूर्व बात को जानकर बताना) और धारयिष्णुता (कौन कार्य हुआ और कौन-सा कर्म शेष रहा इत्यादि बातों को सदा स्मरण रखना) — इन तीन गुणों की भी परीक्षा करे प्रगल्भता (सभा आदि में निर्भीकता), प्रतिभा (प्रत्युत्पन्नमतिता), वाग्मिता (प्रवचनकौशल) तथा सत्यवादिता इन चार गुणों को बातचीत के प्रसङ्गों में स्वयं अपने अनुभव से जाने ॥ १८-१९१/२

उत्साह (शौर्यादि), प्रभाव, क्लेश सहन करने की क्षमता, धैर्य, स्वामिविषयक अनुराग और स्थिरता- इन गुणों की परीक्षा आपत्तिकाल में करे। राजा के प्रति दृढभक्ति, मैत्री तथा आचार-विचार की शुद्धि- इन गुणों को व्यवहार से जाने ॥ २०-२१ ॥

आसपास एवं पड़ोस के लोगों से बल, सत्त्व (सम्पत्ति और विपत्ति में भी निर्विकार रहने का स्वभाव), आरोग्य, शील, अस्तब्धता (मान और दर्प का अभाव) तथा अचापल्य (चपलता का अभाव एवं गम्भीरता) – इन गुणों को जाने। वैर न करने का स्वभाव, भद्रता (भलमनसाहत) तथा क्षुद्रता (नीचता) को प्रत्यक्ष देखकर जाने। जिनके गुण और बर्ताव प्रत्यक्ष नहीं हैं, उनके कार्यों से सर्वत्र उनके गुणों का अनुमान करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥

जहाँ खेती की उपज अधिक हो, विभिन्न वस्तुओं की खानें हों, जहाँ विक्रय के योग्य तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हों, जो गौओं के लिये हितकारिणी (घास आदि से युक्त) हो, जहाँ पानी की बहुतायत हो, जो पवित्र जनपदों से घिरी हुई हो, जो सुरम्य हो, जहाँ के जंगलों में हाथी रहते हों, जहाँ जलमार्ग (पुल आदि) तथा स्थलमार्ग (सड़कें हों, जहाँ की सिंचाई वर्षा पर निर्भर न हो अर्थात् जहाँ सिंचाई के लिये प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध हो, ऐसी भूमि ऐश्वर्य- वृद्धि के लिये प्रशस्त मानी गयी है ॥ २४-२५ ॥

(‘जो भूमि कँकरीली और पथरीली हो, जहाँ जंगल ही जंगल हों, जो सदा चोरों और लुटेरों के भय से आक्रान्त हो, जो रूक्ष (ऊसर) हो, जहाँ के जंगलों में काँटेदार वृक्ष हों तथा जो हिंसक जन्तुओं से भरी हो, वह भूमि नहीं के बराबर है। ) (जहाँ सुखपूर्वक आजीविका चल सके, जो पूर्वोक्त उत्तम भूमि के गुणों से सम्पन्न हो) जहाँ जल की अधिकता हो, जिसे किसी पर्वत का सहारा प्राप्त हो, जहाँ शूद्रों, कारीगरों और वैश्यों की बस्ती अधिक हो, जहाँ के किसान विशेष उद्योगशील एवं बड़े-बड़े कार्यों का आयोजन करनेवाले हों, जो राजा के प्रति अनुरक्त, उनके शत्रुओं से द्वेष रखनेवाला और पीड़ा तथा कर का भार सहन करने में समर्थ हो, हृष्ट-पुष्ट एवं सुविस्तृत हो, जहाँ अनेक देशों के लोग आकर रहते हों, जो धार्मिक, पशु सम्पत्ति से भरा-पूरा तथा धनी हो और जहाँ के नायक (गाँवों के मुखिया) मूर्ख और व्यसनग्रस्त हों, ऐसा जनपद राजा के लिये प्रशस्त कहा गया है। (मुखिया मूर्ख और व्यसनी हो तो वह राजा के विरुद्ध आन्दोलन नहीं कर सकता) ॥ २६-२७ ॥

जिसकी सीमा बहुत बड़ी एवं विस्तृत हो, जिसके चारों ओर विशाल खाइयाँ बनी हों, जिसके प्राकार (परकोटे) और गोपुर (फाटक) बहुत ऊँचे हों, जो पर्वत, नदी, मरुभूमि अथवा जंगल का आश्रय लेकर बना हो, ऐसे पुर (दुर्ग)-में राजा को निवास करना चाहिये। जहाँ जल, धान्य और धन प्रचुर मात्रा में विद्यमान हों, वह दुर्ग दीर्घकालतक शत्रु के आक्रमण का सामना करने में समर्थ होता है। जलमय, पर्वतमय, वृक्षमय, ऐरिण ( उजाड़ या वीरान स्थान पर बना हुआ ) तथा धान्वन (मरुभूमि या बालुकामय प्रदेश में स्थित) — ये पाँच प्रकार के दुर्ग हैं। (दुर्ग का विचार करनेवाले उत्तम बुद्धिमान् पुरुषों ने इन सभी दुर्गो को प्रशस्त बतलाया है ) ॥ २८-२९ ॥

[जिसमें आय अधिक हो और खर्च कम अर्थात् जिसमें जमा अधिक होता हो और जिसमें से धन को कम निकाला जाता हो, जिसकी ख्याति खूब हो तथा जिसमें धनसम्बन्धी देवता (लक्ष्मी, कुबेर आदि) – का सदा पूजन किया जाता हो, जो मनोवाञ्छित द्रव्यों से भरा-पूरा हो, मनोरम हो और] विश्वस्त जनों की देख-रेख में हो, जिसका अर्जन धर्म एवं न्यायपूर्वक किया गया हो तथा जो महान् व्यय को भी सह लेने में समर्थ हो- ऐसा कोष श्रेष्ठ माना गया है। कोष का उपयोग धर्मादि की वृद्धि तथा मूल्यों के भरण-पोषण आदि के लिये होना चाहिये ॥ ३० ॥

जो बाप-दादों के समय से ही सैनिक सेवा करते आ रहे हों, वश में रहते (अनुशासन मानते) हों, संगठित हों, जिनका वेतन चुका दिया जाता हो – बाकी न रहता हो, जिनके पुरुषार्थ की प्रसिद्धि हो, जो राजा के अपने ही जनपद में जन्मे हों, युद्धकुशल हों और कुशल सैनिकों के साथ रहते हों, नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न हों, जिन्हें नाना प्रकार के युद्धों में विशेष कुशलता प्राप्त हो तथा जिनके दल में बहुत से योद्धा भरे हों, जिन सैनिकों द्वारा अपनी सेना के घोड़े और हाथियों की आरती उतारी जाती हो, जो परदेश निवास, युद्धसम्बन्धी आयास तथा नाना प्रकार के क्लेश सहन करने के अभ्यासी हों तथा जिन्होंने युद्ध में बहुत श्रम किया हो, जिनके मन में दुविधा न हो तथा जिनमें अधिकांश क्षत्रिय जाति के लोग हों, ऐसी सेना या सैनिक दण्डनीतिवेत्ताओं के मत में श्रेष्ठ है ॥ ३१-३३ ॥

जो त्याग (अलोभ एवं दूसरों के लिये सब कुछ उत्सर्ग करने का स्वभाव), विज्ञान (सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीणता) तथा सत्त्व (विकारशून्यता) – इन गुणों से सम्पन्न, महापक्ष (महान् आश्रय एवं बहुसंख्यक बन्धु आदि के वर्ग से सम्पन्न), प्रियंवद (मधुर एवं हितकर वचन बोलनेवाला), आयतिक्षम (सुस्थिर स्वभाव होने के कारण भविष्यकाल में भी साथ देनेवाला), अद्वैध (दुविधा में न रहनेवाला) तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हो ऐसे पुरुष को अपना मित्र बनाये। मित्र के आने पर दूर से ही अगवानी में जाना, स्पष्ट एवं प्रिय वचन बोलना तथा सत्कारपूर्वक मनोवाञ्छित वस्तु देना – ये मित्रसंग्रह के तीन प्रकार हैं। धर्म, काम और अर्थ की प्राप्ति- ये मित्र से मिलनेवाले तीन प्रकार के फल हैं। चार प्रकार के मित्र जानने चाहिये – औरस (माता- पिता के सम्बन्ध से युक्त), मित्रता के सम्बन्ध से बँधा हुआ, कुलक्रमागत तथा संकट से बचाया हुआ सत्यता (झूठ न बोलना), अनुराग और दुःख-सुख में समानरूप से भाग लेना – ये मित्र के गुण हैं ॥ ३४-३७ ॥

अब मैं अनुजीवी (राजसेवक) जनों के बर्ताव का वर्णन करूँगा। सेवकोचित गुणों से सम्पन्न पुरुष राजा का सेवन करे। दक्षता (कौशल तथा शीघ्रकारिता), भद्रता (भलमनसाहत या लोकप्रियता), दृढ़ता (सुस्थिर स्नेह एवं कर्मों में दृढ़तापूर्वक लगे रहना), क्षमा ( निन्दा आदि को सहन करना), क्लेशसहिष्णुता (भूख-प्यास आदि के क्लेश को सहन करने की क्षमता), संतोष, शील और उत्साह — ये गुण अनुजीवी को अलंकृत करते हैं ॥ ३८१/२

सेवक यथासमय न्यायपूर्वक राजा की सेवा करे; दूसरे के स्थान पर जाना, क्रूरता, उद्दण्डता या असभ्यता और ईर्ष्या- इन दोषों को वह त्याग दे। जो पद या अधिकार में अपने से बड़ा हो, उसका विरोध करके या उसकी बात काटकर राजसभा में न बोले। राजा के गुप्त कर्मों तथा मन्त्रणा को कहीं प्रकाशित न करे। सेवक को चाहिये कि वह अपने प्रति स्नेह रखनेवाले स्वामी से ही जीविका प्राप्त करने की चेष्टा करे; जो राजा विरक्त हो – सेवक से घृणा करता हो, उसे सेवक त्याग दे ॥ ३९-४१ ॥

यदि राजा अनुचित कार्य में प्रवृत्त हो तो उसे मना करना और यदि न्याययुक्त कर्म में संलग्न हो तो उसमें उसका साथ देना- यह थोड़े में बन्धु मित्र और सेवकों का श्रेष्ठ आचार बताया गया है । राजा मेघ की भाँति समस्त प्राणियों को आजीविका प्रदान करनेवाला हो। उसके यहाँ आय के जितने द्वार (साधन) हों, उन सब पर वह विश्वस्त एवं जाँचे परखे हुए लोगों को नियुक्त करे (जैसे सूर्य अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी से जल लेता है, उसी प्रकार राजा उन आयुक्त पुरुषों द्वारा धन ग्रहण करे) ॥ ४२ ॥

(जिन्हें उन-उन कर्मो के करने का अभ्यास तथा यथार्थ ज्ञान हो, जो उपधा द्वारा शुद्ध प्रमाणित हुए हों तथा जिनके ऊपर जाने-समझे हुए गणक आदि करणवर्ग की नियुक्ति कर दी गयी हो तथा) जो उद्योग से सम्पन्न हों, ऐसे ही लोगों को सम्पूर्ण कर्मों में अध्यक्ष बनाये। खेती, व्यापारियों के उपयोग में आनेवाले स्थल और जल के मार्ग, पर्वत आदि दुर्ग, सेतुबन्ध (नहर एवं बाँध आदि), कुञ्जरबन्धन (हाथी आदि के पकड़ने के स्थान), सोने-चांदी आदि की खानें वन में उत्पन्न सार दारु आदि (साखू, शीशम आदि) की निकासी के स्थान तथा शून्य स्थानों को बसाना-आय के इन आठ द्वारों को ‘अष्टवर्ग’ कहते हैं। अच्छे आचार-व्यवहारवाला राजा इस अष्टवर्ग की निरन्तर रक्षा करे ॥ ४३-४४ ॥

आयुक्तक (रक्षाधिकारी राजकर्मचारी), चोर, शत्रु राजा के प्रिय सम्बन्धी तथा राजा के लोभ — इन पाँचों से प्रजाजनों को पाँच प्रकार का भय प्राप्त होता है। इस भय का निवारण करके राजा उचित समय पर प्रजा से कर ग्रहण करे। राज्य के दो भेद हैं- बाह्य और आभ्यन्तर । राजा का अपना शरीर ही ‘आभ्यन्तर राज्य’ है तथा राष्ट्र या जनपद को ‘बाह्य राज्य’ कहा गया है। राजा इन दोनों की रक्षा करे ॥ ४५-४६ ॥

जो पापी राजा के प्रिय होने पर भी राज्य को हानि पहुँचा रहे हों, वे दण्डनीय हैं। राजा उन सबको दण्ड दे तथा विष आदि से अपनी रक्षा करे। स्त्रियों पर पुत्रों पर तथा शत्रुओं पर कभी विश्वास न करे ॥ ४७ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘राजधर्मकथन’ नामक दो सौ उनतालीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २३९ ॥

1. इन गुणों से युक्त राजा सबके लिये अभिगम्य मिलने योग्य होता है।

2. स्मृति बुद्धि का गुण है, जिसकी गणना आभिगामिक गुणों में हो चुकी है। उसका पुनः यहाँ ग्रहण उसकी श्रेष्ठता और अनिवार्यता सूचित करने के लिये है।

3. अभिगामिक गुणों में ‘सत्य’ आ चुका है, यहाँ भी अनृत-त्याग कहकर जो पुनः उसका ग्रहण किया गया है, यह दोनों जगह उसकी अङ्गता प्रदर्शित करने के लिये है।

4. कौटिल्य ने भी ऐसा ही कहा है — अभिजनप्रहाशौचशौर्यानुरागयुक्तान् अमात्यान् कुर्वीत’ (कॉटि० अर्थ० १ । ८ । ४)

5. कौटिल्य ने भी ऐसा ही कहा है — ‘शौर्यममर्षो दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः ‘ (कौटि० अर्थ० ६ । ९ । ९६)

6. यही अभिप्राय लेकर कौटिल्य ने कहा है —
‘पुरोहितम् उदितोदितकुलशीलं साङ्गवेदे दैवे निमित्ते
दण्डनीत्यां च अभिविनीतमापदां दैवमानुषीणाम्
आथर्वभिरुपायैः प्रतिकर्तारं प्रकुर्वीत।’ (कौटि० अर्थ० १ । ९ । ५० )

7. राजाओं के लिये तीन प्रमाण हैं — प्रत्यक्ष परोक्ष और अनुमान जैसा कि कौटिल्य का कथन है — ‘प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः ।’ इनमें स्वयं देखा हुआ ‘प्रत्यक्ष‘, दूसरों के द्वारा कथित ‘परोक्ष’ तथा किये गये कर्म से अकृत कर्म का अवेक्षण अनुमान है ।

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