अग्निपुराण – अध्याय 237
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय
लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल
॥ श्रीस्तोत्र ॥

पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! पूर्वकाल में इन्द्र ने राज्यलक्ष्मी की स्थिरता के लिये जिस प्रकार भगवती लक्ष्मी की स्तुति की थी, उसी प्रकार राजा भी अपनी विजय के लिये उनका स्तवन करे ॥ १ ॥

इन्द्र बोले — जो सम्पूर्ण लोकों की जननी हैं, समुद्र से जिनका आविर्भाव हुआ है, जिनके नेत्र खिले हुए कमल के समान शोभायमान हैं तथा जो भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में विराजमान हैं, उन लक्ष्मीदेवी को मैं प्रणाम करता हूँ। जगत् को पवित्र करनेवाली देवि! तुम्ही सिद्धि हो और तुम्हीं स्वधा, स्वाहा, सुधा, संध्या, रात्रि, प्रभा, भूति, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती हो। शोभामयी देवि! तुम्हीं यज्ञविद्या, महाविद्या, गुह्यविद्या तथा मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली आत्मविद्या हो। आन्वीक्षिकी (दर्शनशास्त्र), त्रयी (ऋक्, साम, यजु), वार्ता (जीविका-प्रधान कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य कर्म) तथा दण्डनीति भी तुम्ही हो। देवि! तुम स्वयं सौम्यस्वरूपवाली (सुन्दरी) हो; अत: तुमसे व्याप्त होने के कारण इस जगत्का रूप भी सौम्य मनोहर दिखायी देता है। भगवति! तुम्हारे सिवा दूसरी कौन स्त्री है, जो कौमोदकी गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णु के अखिल यज्ञमय विग्रह को, जिसका योगी लोग चिन्तन करते हैं, अपना निवास स्थान बना सके। ‘देवि! तुम्हारे त्याग देने से समस्त त्रिलोकी नष्टप्राय हो गयी थी; किंतु इस समय पुन: तुम्हारा ही सहारा पाकर यह समृद्धिपूर्ण दिखायी देती है। महाभागे! तुम्हारी कृपादृष्टि से ही मनुष्यों को सदा स्त्री, पुत्र, गृह, मित्र और धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। देवि! जिन पुरुषों पर आपकी दयादृष्टि पड़ जाती है, उन्हें शरीर की नीरोगता, ऐश्वर्य, शत्रुपक्ष की हानि और सब प्रकार के सुख-कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं। मातः! तुम सम्पूर्ण भूतों की जननी और देवाधिदेव विष्णु सबके पिता हैं। तुमने और भगवान् विष्णु ने इस चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है। सबको पवित्र करनेवाली देवि! तुम मेरी मान-प्रतिष्ठा, खजाना, अन्न-भण्डार, गृह, साज-सामान, शरीर और स्त्री-किसी का भी त्याग न करो। भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में वास करनेवाली लक्ष्मी! मेरे पुत्र, मित्रवर्ग, पशु तथा आभूषणों को भी न त्यागो। विमलस्वरूपा देवि! जिन मनुष्यों को तुम त्याग देती हो, उन्हें सत्य, समता, शौच तथा शील आदि सद्गुण भी तत्काल ही छोड़ देते हैं। तुम्हारी कृपादृष्टि पड़ने पर गुणहीन मनुष्य भी तुरंत ही शील आदि सम्पूर्ण उत्तम गुणों तथा पीढ़ियों तक बने रहनेवाले ऐश्वर्य से युक्त हो जाते हैं। देवि! जिसको तुमने अपनी दयादृष्टि से एक बार देख लिया, वही श्लाघ्य (प्रशंसनीय), गुणवान्, धन्यवाद का पात्र, कुलीन, बुद्धिमान्, शूर और पराक्रमी हो जाता है। विष्णुप्रिये! तुम जगत्की माता हो। जिसकी ओर से तुम मुँह फेर लेती हो, उसके शील आदि सभी गुण तत्काल दुर्गुण के रूप में बदल जाते हैं। कमल के समान नेत्रोंवाली देवि! ब्रह्माजी की जिह्वा भी तुम्हारे गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं हो सकती। मुझ पर प्रसन्न हो जाओ तथा कभी भी मेरा परित्याग न करो ॥ २-१७ ॥

पुष्कर कहते हैं — इन्द्र के इस प्रकार स्तवन करने पर भगवती लक्ष्मी ने उन्हें राज्य की स्थिरता और संग्राम में विजय आदि का अभीष्ट वरदान दिया। साथ ही अपने स्तोत्र का पाठ या श्रवण करनेवाले पुरुषों के लिये भी उन्होंने भोग तथा मोक्ष मिलने के लिये वर प्रदान किया। अतः मनुष्य को चाहिये कि सदा ही लक्ष्मी के इस श्री स्तोत्र का पाठ और श्रवण करे ॥ १८-१९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘श्रीस्तोत्र का वर्णन ‘ नामक दो सौ सैंतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २३७ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.