July 4, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 229 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनतीसवाँ अध्याय अशुभ और शुभ स्वप्नों का विचार स्वप्नाध्यायः पुष्कर कहते हैं — अब मैं शुभाशुभ स्वप्नों का वर्णन करूँगा तथा दुःस्वप्न-नाश के उपाय भी बतलाऊँगा । नाभि के सिवा शरीर के अन्य अंगों में तृण और वृक्षों का उगना, काँस के बर्तनों का मस्तक पर रखकर फोड़ा जाना, माथा मुँड़ाना, नग्न होना, मैले कपड़े पहनना, तेल लगना, कीचड़ लपेटना, ऊँचे से गिरना, विवाह होना, गीत सुनना, वीणा आदि के बाजे सुनकर मन बहलाना, हिंडोले पर चढ़ना, पद्म और लोहों का उपार्जन, सर्पो को मारना, लाल फूल से भरे हुए वृक्षों तथा चाण्डाल को देखना, सूअर, कुत्ते, गदहे और ऊँटों पर चढ़ना, चिड़ियों के मांस का भक्षण करना, तेल पीना, खिचड़ी खाना, माता के गर्भ में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इन्द्र के उपलक्ष्य में खड़ी की हुई ध्वजा का टूट पड़ना, सूर्य और चन्द्रमा का गिरना, दिव्य, अन्तरिक्ष और भूलोक में होनेवाले उत्पातों का दिखायी देना, देवता, ब्राह्मण, राजा और गुरुओं का कोप होना, नाचना, हँसना, व्याह करना, गीत गाना, वीणा के सिवा अन्य प्रकार के बाजों का स्वयं बजाना, नदी में डूबकर नीचे जाना, गोबर, कीचड़ तथा स्याही मिलाये हुए जल से स्नान करना, कुमारी कन्याओं का आलिंगन, पुरुषों का एक-दूसरे के साथ मैथुन, अपने अंगों की हानि, वमन और विरेचन करना, दक्षिण दिशा की ओर जाना, रोग से पीड़ित होना, फलों की हानि, धातुओं का भेदन, घरों का गिरना, घरों में झाड़ देना, पिशाचों, राक्षसों, वानरों तथा चाण्डाले आदि के साथ खेलना, शत्रु से अपमानित होना, उसकी ओर से संकट का प्राप्त होना, गेरुआ वस्त्र धारण करना, गेरुए वस्त्रों से खेलना, तेल पीना या उसमें नहाना, लाल फूलों की माला पहनना और लाल ही चन्दन लगाना — ये सब बुरे स्वप्न हैं। इन्हें दूसरों पर प्रकट न करना अच्छा है। ऐसे स्वप्न देखकर फिर से सो जाना चाहिये। इसी प्रकार स्वप्नदोष की शान्ति के लिये स्नान, ब्राह्मणों का पूजन, तिलों का हवन, ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य के गणों की पूजा, स्तुति का पाठ तथा पुरुषसूक्त आदि का जप करना उचित है। रात के पहले प्रहर में देखे हुए स्वप्न एक वर्ष तक फल देने वाले होते हैं, दूसरे प्रहर के स्वप्न छः महीने में, तीसरे प्रहर के तीन महीने में, चौथे प्रहर के पंद्रह दिनों में और अरुणोदय की वेला में देखे हुए स्वप्न दस ही दिनों में अपना फल प्रकट करते हैं ॥ १-१७ ॥’ यदि एक ही रात में शुभ और अशुभ- दोनों ही प्रकार के स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जिसका पीछे दर्शन होता है, उसी का फल बतलाना चाहिये। अतः शुभ स्वप्न देखने के पश्चात् सोना अच्छा नहीं माना जाता है। स्वप्न में पर्वत, महल, हाथी, घोड़े और बैल पर चढ़ना हितकर होता है। परशुरामजी ! यदि पृथ्वी पर या आकाश में सफेद फूलों से भरे हुए वृक्षों का दर्शन हो, अपनी नाभि से वृक्ष अथवा तिनका उत्पन्न हो, अपनी भुजाएँ और मस्तक अधिक दिखायी दें, सिर के बाल पक जायँ तो उसका फल उत्तम होता है। सफेद फूलों की माला और श्वेत वस्त्र धारण करना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओं को पकड़ना, परिमार्जन करना, इन्द्र की ध्वजाका आलिंगन करना, ध्वजा को ऊँचे उठाना, पृथ्वी पर पड़ती हुई जल की धारा को अपने ऊपर रोकना, शत्रुओं की बुरी दशा देखना, वाद-विवाद, जूआ तथा संग्राम में अपनी विजय देखना, खीर खाना, रक्तका देखना, खून से नहाना, सुरा, मद्य अथवा दूध पीना, अस्त्रों से घायल होकर धरती पर छटपटाना, आकाश का स्वच्छ होना तथा गाय, भैंस, सिंहिनी, हथिनी और घोड़ी को मुँह से दुहना — ये सब उत्तम स्वप्न हैं। देवता, ब्राह्मण और गुरुओं की प्रसन्नता, गौओं के सींग अथवा चन्द्रमा से गिरे हुए जल के द्वारा अपना अभिषेक होना ये स्वप्न राज्य प्रदान करनेवाले हैं, ऐसा समझना चाहिये। परशुरामजी ! अपना राज्याभिषेक होना, अपने मस्तक का काटा जाना, मरना, आग में पड़ना, गृह आदि में लगी हुई आग के भीतर जलना, राजचिह्नों का प्राप्त होना, अपने हाथ से वीणा बजाना- ऐसे स्वप्न भी उत्तम एवं राज्य प्रदान करनेवाले हैं। जो स्वप्न के अन्तिम भाग में राजा, हाथी, घोड़ा, सुवर्ण, बैल तथा गाय को देखता है, उसका कुटुम्ब बढ़ता है। बैल, हाथी, महल की छत, पर्वत शिखर तथा वृक्ष पर चढ़ना, रोना, शरीर में घी और विष्ठा का लग जाना तथा अगम्या स्त्री के साथ समागम करना ये सब शुभ स्वप्न हैं ॥ १८-३१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘शुभाशुभ स्वप्न एवं दुःस्वप्न-निवारण’ दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe