July 3, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 223 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तेईसवाँ अध्याय राष्ट्र की रक्षा तथा प्रजा से कर लेने आदि के विषय में विचार राजधर्माः पुष्कर कहते हैं — (राज्य का प्रबन्ध इस प्रकार करना चाहिये) राजा को प्रत्येक गाँव का एक-एक अधिपति नियुक्त करना चाहिये। फिर दस-दस गाँवों का तथा सौ-सौ गाँवों का अध्यक्ष नियुक्त करे। सबके ऊपर एक ऐसे पुरुष को नियुक्त करे, जो समूचे राष्ट्र का शासन कर सके। उन सबके कार्यों के अनुसार उनके लिये पृथक्-पृथक् भोग (भरण-पोषण के लिये वेतन आदि ) – का विभाजन करना चाहिये तथा प्रतिदिन गुप्तचरों के द्वारा उनके कार्यों की देख-भाल एवं परीक्षण करते रहना चाहिये। यदि गाँव में कोई दोष उत्पन्न हो कोई मामला खड़ा हो तो ग्रामाधिपति को उसे शान्त करना चाहिये। यदि वह उस दोष को दूर करने में असमर्थ हो जाय तो दस गाँवों के अधिपति के पास जाकर उनसे सब बातें बतावे । पूरी रिपोर्ट सुनकर वह दस गाँव का स्वामी उस दोष को मिटाने का उपाय करे ॥ १-३१/२ ॥ ‘ जब राष्ट्र भलीभाँति सुरक्षित होता है, तभी राजा को उससे धन आदि की प्राप्ति होती है। धनवान् धर्म का उपार्जन करता है, धनवान् ही कामसुख का उपभोग करता है। जैसे गर्मी में नदी का पानी सूख जाता है, उसी प्रकार धन के बिना सब कार्य चौपट हो जाते हैं। संसार में पतित और निर्धन मनुष्यों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। लोग पतित मनुष्य के हाथ से कोई वस्तु नहीं लेते और दरिद्र अपने अभाव के कारण स्वयं ही नहीं दे पाता। धनहीन की स्त्री भी उसकी आज्ञा के अधीन नहीं रहती; अतः राष्ट्र को पीड़ा पहुँचाने वाला — उसे कंगाल बनाने वाला राजा अधिक काल तक नरक में निवास करता है। जैसे गर्भवती पत्नी अपने सुख का खयाल छोड़कर गर्भ के बच्चे को सुख पहुँचाने की चेष्टा करती है, उसी प्रकार राजा को भी सदा प्रजा की रक्षा का ध्यान रखना चाहिये। जिसकी प्रजा सुरक्षित नहीं है, उस राजा के यज्ञ और तप से क्या लाभ? जिसने प्रजा की भलीभाँति रक्षा की है, उसके लिये स्वर्गलोक अपने घर के समान हो जाता है। जिसकी प्रजा अरक्षित अवस्था में कष्ट उठाती है, उस राजा का निवासस्थान है — नरक। राजा अपनी प्रजा के पुण्य और पाप में से भी छठा भाग ग्रहण करता है। रक्षा करने से उसको प्रजा के धर्म का अंश प्राप्त होता है और रक्षा न करने से वह लोगों के पाप का भागी होता है। जैसे परस्त्रीलम्पट दुराचारी पुरुषों से डरी हुई पतिव्रता स्त्री की रक्षा करना धर्म है, उसी प्रकार राजा के प्रिय व्यक्तियों, चोरों और विशेषतः राजकीय कर्मचारियों के द्वारा चूसी जाती हुई प्रजा की रक्षा करनी चाहिये । उनके भय से रक्षित होनेपर प्रजा राजा के काम आती है। यदि उसकी रक्षा नहीं की गयी तो वह पूर्वोक्त मनुष्यों का ही ग्रास बन जाती है। इसलिये राजा दुष्टों का दमन करे और शास्त्र में बताये अनुसार प्रजा से कर ले। राज्य की आधी आय सदा खजाने में रख दिया करे और आधा ब्राह्मण को दे दे। श्रेष्ठ ब्राह्मण उस निधि को पाकर सब-का-सब अपने हाथ में ले ले और उसमें से चौथा, आठवाँ तथा सोलहवाँ भाग निकालकर क्रमश: क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को दे। धन को धर्म के अनुसार सुपात्र के हाथ में ही देना चाहिये। झूठ बोलने वाले मनुष्य को दण्ड देना उचित है। राजा उसके धन का आठवाँ भाग दण्ड के रूप में ले ले। जिस धन का स्वामी लापता हो, उसे राजा तीन वर्षों तक अपने अधिकार में रखे। तीन वर्ष के पहले यदि धन का स्वामी आ जाय तो वह उसे ले सकता है। उससे अधिक समय बीत जाने पर राजा स्वयं ही उस धन को ले ले। जो मनुष्य ( नियत समय के भीतर आकर ) ‘यह मेरा धन है’ ऐसा कहकर उसका अपने से सम्बन्ध बतलाता है, वह विधिपूर्वक (राजा के सामने जाकर ) उस धन का रूप और उसकी संख्या बतलावे। इस प्रकार अपने को स्वामी सिद्ध कर देने पर वह उस धन को पाने का अधिकारी होता है जो धन छोटे बालक के हिस्से का हो, उसकी राजा तब तक रक्षा करता रहे, जब तक कि उसका समावर्तन संस्कार न हो जाय, अथवा जबतक उसकी बाल्यावस्था न निवृत्त हो जाय। इसी प्रकार जिनके कुल में कोई न हो और उनके बच्चे छोटे हों, ऐसी स्त्रियों की भी रक्षा आवश्यक है ॥ ४-१९ ॥ पतिव्रता स्त्रियाँ भी यदि विधवा तथा रोगिणी हों तो उनकी रक्षा भी इसी प्रकार करनी चाहिये। यदि उनके जीते जी कोई बन्धु बान्धव उनके धन का अपहरण करें तो धर्मात्मा राजा को उचित है कि उन बान्धवों को चोर का दण्ड दे। यदि साधारण चोरों ने प्रजा का धन चुराया हो तो राजा स्वयं उतना धन प्रजा को दे तथा जिन्हें चोरों से रक्षा करने का काम सौंपा गया हो, उनसे चुराया हुआ धन राजा वसूल करे। जो मनुष्य चोरी न होनेपर भी अपने धन को चुराया हुआ बताता हो, वह दण्डनीय है; उसे राज्य से बाहर निकाल देना चाहिये। यदि घर का धन घरवालों ने ही चुराया हो तो राजा अपने पास से उसको न दे। अपने राज्य के भीतर जितनी दूकानें हों, उनसे उनकी आय का बीसवाँ हिस्सा राजा को टैक्स के रूप में लेना चाहिये। परदेश से माल मँगाने में जो खर्च और नुकसान बैठता हो, उसका ब्यौरा बताने वाला बीजक देखकर तथा माल पर दिये जाने वाले टैक्स का विचार करके प्रत्येक व्यापारी पर कर लगाना चाहिये, जिससे उसको लाभ होता रहे — वह घाटे में न पड़े। आय का बीसवाँ भाग ही राजा को लेना चाहिये। यदि कोई राजकर्मचारी इससे अधिक वसूल करता हो तो उसे दण्ड देना उचित है। स्त्रियों और साधु-संन्यासियों से नाव की उतराई (सेवा) नहीं लेनी चाहिये। यदि मल्लाहों की गलती से नाव पर कोई चीज नुकसान हो जाय तो वह मल्लाहों से ही दिलानी चाहिये। राजा शूकधान्य का 1 छठा भाग और शिम्बिधान्य का 2 आठवाँ भाग कर के रूप में ग्रहण करे। इसी प्रकार जंगली फल- मूल आदि में से देश-काल के अनुरूप उचित कर लेना चाहिये। पशुओं का पाँचवाँ और सुवर्ण का छठा भाग राजा के लिये ग्राह्य है। गन्ध, ओषधि, रस, फूल, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, बाँस, वेणु, चर्म, बाँस को चीरकर बनाये हुए टोकरे तथा पत्थर के बर्तनों पर और मधु, मांस एवं घी पर भी आमदनी का छठा भाग ही कर लेना उचित है ॥ २०-२९ ॥ ब्राह्मणों से कोई प्रिय वस्तु अथवा कर नहीं लेना चाहिये। जिस राजा के राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूख से कष्ट पाता है, उसका राज्य बीमारी, अकाल और लुटेरों से पीड़ित होता रहता है। अतः ब्राह्मण की विद्या और आचरण को जानकर उसके लिये अनुकूल जीविका का प्रबन्ध करे तथा जैसे पिता अपने औरस पुत्र का पालन करता है, उसी प्रकार राजा विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण की सर्वथा रक्षा करे जो राजा से सुरक्षित होकर प्रतिदिन धर्म का अनुष्ठान करता है, उस ब्राह्मण के धर्म से राजा की आयु बढ़ती है तथा उसके राष्ट्र एवं खजाने की भी उन्नति होती है। शिल्पकारों को चाहिये कि महीने में एक दिन बिना पारिश्रमिक लिये केवल भोजन स्वीकार करके राजा का काम करें। इसी प्रकार दूसरे लोगों को भी, जो राज्य में रहकर अपने शरीर के परिश्रम से जीविका चलाते हैं, महीने में एक दिन राजा का काम करना चाहिये ॥ ३०-३४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘राजधर्म का कथन’ नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२३ ॥ 1. ‘शूकधान्य’ वह अन्न है, जिसके दाने वालों या सीकों से लगते हैं — जैसे गेहूं, जौ आदि। 2. . वह अन्न, जिसके पौधे में फली (छीमी) लगती हो जैसे चना, मटर आदि। Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe