अग्निपुराण – अध्याय 221
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय
अनुजीवियों का राजा के प्रति कर्तव्य का वर्णन
अनुजीविवृत्तं

पुष्कर कहते हैं — भृत्य को राजा की आज्ञा का उसी प्रकार पालन करना चाहिये, जैसे शिष्य गुरु की और साध्वी स्त्रियाँ अपने पति की आज्ञा का पालन करती हैं। राजा की बात पर कभी आक्षेप न करे, सदा ही उसके अनुकूल और प्रिय वचन बोले । यदि कोई हित की बात बतानी हो और वह सुनने में अप्रिय हो तो उसे एकान्त में राजा से कहना चाहिये। किसी आय के काम में नियुक्त होने पर राजकीय धन का अपहरण न करे; राजा के सम्मान की उपेक्षा न करे। उसकी वेश-भूषा और बोल-चाल की नकल करना उचित नहीं है। अन्तःपुर के सेवकों के अध्यक्ष का कर्त्तव्य है कि वह ऐसे पुरुषों के साथ न बैठे, जिनका राजा के साथ वैर हो तथा जो राजदरबार से अपमानपूर्वक निकाले गये हों । भृत्य को राजा की गुप्त बातों को दूसरों पर प्रकट नहीं करना चाहिये। अपनी कोई कुशलता दिखाकर राजा को विशेष सम्मानित एवं प्रसन्न करना चाहिये । यदि राजा कोई गुप्त बात सुनावें तो उसे लोगों में प्रकाशित न करे। यदि वे दूसरे को किसी काम के लिये आज्ञा दे रहे हों तो स्वयं ही उठकर कहे — ‘महाराज ! मुझे आदेश दिया जाय, कौन सा काम करना है, मैं उसे करूँगा।’राजा के दिये हुए वस्त्र आभूषण तथा रत्न आदि को सदा धारण किये रहे। बिना आज्ञा के दरवाजे पर अथवा और किसी अयोग्य स्थान पर, जहाँ राजा की दृष्टि पड़ती हो, न बैठे। जंभाई लेना, थूकना, खाँसना, क्रोध प्रकट करना, खाट पर बैठना, भौंहें टेढ़ी करना, अधोवायु छोड़ना तथा डकार लेना आदि कार्य राजा के निकट रहने पर न करे। उनके सामने अपना गुण प्रकट करने के लिये दूसरों को ही युक्तिपूर्वक नियुक्त करे। शठता, लोलुपता, चुगली, नास्तिकता, नोचता तथा चपलता — इन दोषों का राजसेवकों को सदा त्याग करना चाहिये। पहले स्वयं प्रयत्न करके अपने में वेदविद्या एवं शिल्पकला की योग्यता का सम्पादन करे। उसके बाद अपना धन बढ़ाने की चेष्टा करनेवाले पुरुष को अभ्युदय के लिये राजा की सेवा में प्रवृत्त होना चाहिये। उनके प्रिय पुत्र एवं मन्त्रियों को सदा नमस्कार करना उचित है । केवल मन्त्रियों के साथ रहने से राजा का अपने ऊपर विश्वास नहीं होता; अतः उनके हार्दिक अभिप्राय के अनुकूल सदा प्रिय कार्य करे । राजा के स्वभाव को समझने वाले पुरुष के लिये उचित है कि वह विरक्त राजा को त्याग दे और अनुरक्त राजा से ही आजीविका प्राप्त करने की चेष्टा करे । बिना पूछे राजा के सामने कोई बात न कहे; किंतु आपत्ति के समय ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है । राजा प्रसन्न हो तो वह सेवक के विनययुक्त वचन को मानता है, उसकी प्रार्थना को स्वीकार करता है । प्रेमी सेवक को किसी रहस्य- स्थान (अन्तःपुर) आदि में देख ले तो भी उस पर शङ्का-संदेह नहीं करता है। वह दरबार में आये तो राजा उसकी कुशल पूछता है, उसे बैठने के लिये आसन देता है। उसकी चर्चा सुनकर वह प्रसन्न होता है। वह कोई अप्रिय बात भी कह दे तो वह बुरा नहीं मानता, उलटे प्रसन्न होता है। उसकी दी हुई छोटी-मोटी वस्तु भी राजा बड़े आदर से ले लेता है और बातचीत में उसे याद रखता है । उक्त लक्षणों से राजा अनुरक्त है या विरक्त यह जानकर अनुरक्त राजा की सेवा करे। इसके विपरीत जो विरक्त है, उसका साथ छोड़ दे ॥ १-१४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अनुजीविवृत-कथन’ नामक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥

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