July 2, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 213 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तेरहवाँ अध्याय पृथ्वीदान तथा गोदान की महिमा पृथ्वीदानानि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं ‘पृथ्वीदान’ के विषय में कहता हूँ। ‘पृथ्वी’ तीन प्रकार की मानी गयी है। सौ करोड़ योजन विस्तार वाली सप्तद्वीपवती समुद्रों सहित जम्बूद्वीप पर्यन्त पृथ्वी उत्तम मानी गयी है। उत्तम पृथ्वी की पाँच भार सुवर्ण से रचना करे। उसके आधे में कूर्म एवं कमल बनवाये। यह ‘उत्तम पृथ्वी’ बतलायी गयी है। इसके आधे में ‘मध्यम पृथ्वी’ मानी जाती है। इसके तीसरे भाग में निर्मित पृथ्वी ‘कनिष्ठ’ मानी गयी है। इसके साथ पृथ्वी के तीसरे भाग में कूर्म और कमल का निर्माण करना चाहिये ॥ १-३१/२ ॥’ एक हजार पल सुवर्ण से मूल, दण्ड, पत्ते, फल, पुष्प और पाँच स्कन्धों से युक्त कल्पवृक्ष की कल्पना करे। विद्वान् ब्राह्मण यजमान के द्वारा संकल्प कराके पाँच ब्राह्मणों को इसका दान करावे। इसका दान करनेवाला ब्रह्मलोक में पितृगणों के साथ चिरकाल तक आनन्द का उपभोग करता है। पाँच सौ पल सुवर्ण से कामधेनु का निर्माण कराके विष्णु के सम्मुख दान करे। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि समस्त देवता गौ में प्रतिष्ठित हैं। धेनुदान करने से अपने-आप समस्त दान हो जाते हैं। यह सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओं को सिद्ध करनेवाला एवं ब्रह्मलोक की प्राप्ति करानेवाला है। श्रीविष्णु के सम्मुख कपिला गौ का दान करनेवाला अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर देता है। कन्या को अलंकृत करके दान करने से अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। जिसमें सभी प्रकार के सस्य (अनाजों के पौधे) उपज सकें, ऐसी भूमि का दान देकर मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है। ग्राम, नगर अथवा खेटक (छोटे गाँव) का दान देनेवाला सुखी होता है। कार्तिक की पूर्णिमा आदि में वृषोत्सर्ग करनेवाला अपने कुल का उद्धार कर देता है ॥ ४-१० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पृथ्वीदान का वर्णन’ नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe