June 26, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 173 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय अनेकविध प्रायश्चित्तों का वर्णन प्रायश्चित्तानि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ब्रह्मा के द्वारा वर्णित पापों का नाश करने वाले प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। जिससे प्राणों का शरीर से वियोग हो जाय, उस कार्य को ‘हनन’ कहते हैं। जो राग, द्वेष अथवा प्रमादवश दूसरे के द्वारा या स्वयं ब्राह्मण का वध करता है, वह ‘ब्रह्मघाती’ होता है। यदि एक कार्य में तत्पर बहुत से शस्त्रधारी मनुष्यों में कोई एक ब्राह्मण का वध करता है, तो वे सब-के-सब ‘घातक’ माने जाते हैं। ब्राह्मण किसी के द्वारा निन्दित होनेपर, मारा जाने पर या बन्धन से पीड़ित होनेपर जिसके उद्देश्य से प्राणों का परित्याग कर देता है, उसे ‘ब्रह्महत्यारा’ माना गया है। औषधोपचार आदि उपकार करने पर किसी की मृत्यु हो जाय तो उसे पाप नहीं होता। पुत्र, शिष्य अथवा पत्नी को दण्ड देने पर उनकी मृत्यु हो जाय, उस दशा में भी दोष नहीं होता। जिन पापों से मुक्त होने का उपाय नहीं बतलाया गया है, देश, काल, अवस्था, शक्ति और पाप का विचार करके यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त की व्यवस्था देनी चाहिये। गाँ अथवा ब्राह्मण के लिये तत्काल अपने प्राणों का परित्याग कर दे, अथवा अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे डाले तो मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। ब्रह्महत्यारा मृतक के सिर का कपाल और ध्वज लेकर भिक्षान्न का भोजन करता हुआ ‘मैंने ब्राह्मण का वध किया है’- इस प्रकार अपने पापकर्म को प्रकाशित करे। वह बारह वर्ष तक नियमित भोजन करके शुद्ध होता है अथवा शुद्धि के लिये प्रयत्न करनेवाला ब्रह्मघाती मनुष्य छः वर्षों में ही पवित्र हो जाता है। अज्ञानवश पापकर्म करनेवालों की अपेक्षा जान-बूझकर पाप करनेवाले के लिये दुगुना प्रायश्चित्त विहित है। ब्राह्मण के वध में प्रवृत्त होने पर तीन वर्षतक प्रायश्चित्त करे। ब्रह्मघाती क्षत्रिय को दुगुना तथा वैश्य एवं शूद्र को छः गुना प्रायश्चित्त करना चाहिये । अन्य पापों का ब्राह्मण को सम्पूर्ण, क्षत्रिय को तीन चरण, वैश्य को आधा और शूद्र, वृद्ध, स्त्री, बालक एवं रोगी को एक चरण प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ १-११ ॥’ क्षत्रिय का वध करने पर ब्रह्महत्या का एकपाद, वैश्य का वध करने पर अष्टमांश और सदाचार परायण शूद्र का वध करने पर षोडशांश प्रायश्चित्त माना गया है। सदाचारिणी स्त्री की हत्या करके शूद्र हत्या का प्रायश्चित्त करे। गोहत्यारा संयतचित्त होकर एक मासतक गोशाला में शयन करे, गौओं का अनुगमन करे और पञ्चगव्य पीकर रहे। फिर गोदान करने से वह शुद्ध हो जाता है। ‘कृच्छ्र’ अथवा ‘अतिकृच्छ्र’ कोई भी व्रत हो, क्षत्रियों को उसके तीन चरणों का अनुष्ठान करना चाहिये। अत्यन्त बूढ़ी, अत्यन्त कृश, बहुत छोटी उम्रवाली अथवा रोगिणी स्त्री की हत्या करके द्विज पूर्वोक्त विधि के अनुसार ब्रह्महत्या का आधा प्रायश्चित्त करे। फिर ब्राह्मणों को भोजन कराये और यथाशक्ति तिल एवं सुवर्ण का दान करे। मुक्के या थप्पड़ के प्रहार से, सींग तोड़ने से और लाठी आदि से मारने पर यदि गौ मर जाय तो उसे ‘गोवध’ कहा जाता है। मारने, बाँधने, गाड़ी आदि में जोतने, रोकने अथवा रस्सी का फंदा लगाने से गौ की मृत्यु हो जाय तो तीन चरण प्रायश्चित्त करे। काठ से गोवध करनेवाला ‘सांतपनव्रत’, ढेलेसे मारनेवाला ‘प्राजापत्य’, पत्थर से हत्या करनेवाला ‘तप्तकृच्छ्र’ और शस्त्र से वध करनेवाला ‘अतिकृच्छ्र’ करे। बिल्ली, गोह, नेवला, मेढक, कुत्ता अथवा पक्षी की हत्या करके तीन दिन दूध पीकर रहे; अथवा ‘प्राजापत्य’ या ‘ चान्द्रायण’ व्रत करे ॥ १२–१९१/२ ॥ गुप्त पाप होने पर गुप्त और प्रकट पाप होने पर प्रकट प्रायश्चित्त करे। समस्त पापों के विनाश के लिये सौ प्राणायाम करे। कटहल, द्राक्षा, महुआ, खजूर, ताड़, ईख और मुनक्के का रस तथा टंकमाध्वीक, मैरेय और नारियल का रस- ये मादक होते हुए भी मद्य नहीं हैं। पैटी ही मुख्य सुरा मानी गयी है। ये सब मदिराएँ द्विजों के लिये निषिद्ध हैं। सुरापान करनेवाला खौलता हुआ जल पीकर शुद्ध होता है अथवा सुरापान के पाप से मुक्त होने के लिये एक वर्षतक जटा एवं ध्वजा धारण किये हुए वन में निवास करे। नित्य रात्रि के समय एक बार चावल के कण या तिल की खली का भोजन करे। अज्ञानवश मल-मूत्र अथवा मदिरा से छूये हुए पदार्थ का भक्षण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – तीनों वर्णों के लोग पुनः संस्कार के योग्य हो जाते हैं। सुरापात्र में रखा हुआ जल पीकर सात दिन व्रत करे। चाण्डाल का जल पीकर छः दिन उपवास रखे तथा चाण्डालों के कूएँ अथवा पात्र का पानी पीकर ‘सांतपन व्रत’ करे । अन्त्यज का जल पीकर द्विज तीन रात उपवास रखकर पञ्चगव्य का पान करे। नवीन जल या जल के साथ मत्स्य, कण्टक, शम्बूक, शङ्ख, सीप और कौड़ी पीने पर पञ्चगव्य का आचमन करने से शुद्धि होती है। शवयुक्त कूप का जल पीने पर मनुष्य ‘त्रिरात्रव्रत’ करने से शुद्ध होता है। चाण्डाल का अन्न खाकर चान्द्रायणव्रत’ करे। आपत्काल में शूद्र के घर भोजन करने पर पश्चात्ताप से शुद्धि हो जाती है। शूद्र के पात्र में भोजन करनेवाला ब्राह्मण उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होता है। कन्दुपक्व (भूजा), स्नेहपक्व (घी- तैल में पके पदार्थ), घी-तैल, दही, सत्तू, गुड़, दूध और रस आदि-ये वस्तुएँ शूद्र के घर से ली जाने पर भी निन्दित नहीं हैं। बिना स्नान किये भोजन करनेवाला एक दिन उपवास रखकर दिनभर जप करने से पवित्र होता है। मूत्र त्याग करके अशौचावस्था में भोजन करने पर ‘त्रिरात्रव्रत’ से शुद्धि होती है। केश एवं कीट से युक्त, जान-बूझकर पैर से छूआ हुआ, भ्रूणघाती का देखा हुआ, रजस्वला स्त्री का छूआ हुआ, कौए आदि पक्षियों का जूठा किया हुआ, कुत्ते का स्पर्श किया हुआ अथवा गौ का सूँघा हुआ अन्न खाकर तीन दिन उपवास करे। वीर्य, मल या मूत्र का भक्षण करने पर ‘प्राजापत्य व्रत’ करे। नवश्राद्ध में ‘चान्द्रायण’, मासिक श्राद्ध में ‘पराकव्रत’, त्रिपाक्षिक श्राद्ध में ‘अतिकृच्छ्र’, षाण्मासिक श्राद्ध में ‘प्राजापत्य’ और वार्षिक श्राद्ध में एकपाद प्राजापत्य- व्रत’ करे। पहले और दूसरे दोनों दिन वार्षिक श्राद्ध हो तो दूसरे वार्षिक श्राद्ध में एक दिन का उपवास करे। निषिद्ध वस्तु का भक्षण करने पर उपवास करके प्रायश्चित्त करे। भूतॄण (छत्राक), लहसुन और शिग्रुक् (श्वेत मरिच) खा लेने पर ‘एकपाद प्राजापत्य’ करे । अभोज्यान्न, शूद्र का अन्न, स्त्री एवं शूद्र का उच्छिष्ट या अभक्ष्य मांस का भक्षण करके सात दिन केवल दूध पीकर रहे। जो ब्रह्मचारी, संन्यासी अथवा व्रतस्थ द्विज मधु, मांस या जननाशौच एवं मरणाशौच का अन्न भोजन कर लेता है, वह ‘प्राजापत्य-कृच्छ्र’ करे ॥ २०-३९ ॥ अन्यायपूर्वक दूसरे का धन हड़प लेने को ‘चोरी’ कहते हैं। सुवर्ण की चोरी करनेवाला राजा के द्वारा मूसल से मारे जाने पर शुद्ध होता है। सुवर्ण की चोरी करनेवाला, सुरापान करनेवाला, ब्रह्मघाती और गुरुपत्नीगामी बारह वर्ष तक भूमि पर शयन और जटा धारण करे। वह एक समय केवल पत्ते और फल मूल का भोजन करने से शुद्ध होता है। चोरी अथवा सुरापान करके एक वर्ष तक ‘प्राजापत्य व्रत’ करे। मणि, मोती, मूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा और पत्थर की चोरी करनेवाला बारह दिन चावल के कण खाकर रहे। मनुष्य, स्त्री, क्षेत्र, गृह, बावली, कूप और तालाब का अपहरण करने पर ‘चान्द्रायण व्रत’ से शुद्धि मानी गयी है । भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ, सवारी, शय्या, आसन, पुष्प, मूल अथवा फल की चोरी करनेवाला पञ्चगव्य पीकर शुद्ध होता है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चर्म या मांस चुरानेवाला तीन दिन निराहार रहे। सौतेली माँ, बहन, गुरुपुत्री, गुरुपत्नी और अपनी पुत्री से समागम करनेवाला ‘गुरुपत्नीगामी ‘ माना गया है। गुरुपत्नीगमन करने पर अपने पाप की घोषणा करके जलते हुए लोहे की शय्या पर तप्त – लौहमयी स्त्री का आलिङ्गन करके प्राणत्याग करने से शुद्ध होता है। अथवा गुरुपत्नीगामी तीन मास तक ‘चान्द्रायण व्रत’ करे। पतित स्त्रियों के लिये भी इसी प्रायश्चित्त का विधान करे। पुरुष को परस्त्रीगमन करेने पर जो प्रायश्चित्त बतलाया गया है, वही उनसे करावे। कुमारी कन्या, चाण्डाली, पुत्री और अपने सपिण्ड तथा पुत्र की पत्नी में वीर्यसेचन करनेवाले को प्राणत्याग कर देना चाहिये । द्विज एक रात शूद्रा का सेवन करके जो पाप संचित करता है, वह तीन वर्षतक नित्य गायत्री-जप एवं भिक्षान्न का भोजन करने से नष्ट होता है। चाची, भाभी, चाण्डाली, पुक्कसी, पुत्रवधू, बहन, सखी, मौसी, बुआ, निक्षिप्ता ( धरोहर के रूप में रखी हुई), शरणागता, मामी, सगोत्रा बहिन, दूसरे को चाहनेवाली स्त्री, शिष्यपत्नी अथवा गुरुपत्नी से गमन करके, ‘चान्द्रायण व्रत’ करे ॥ ४०-५४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अनेकविध प्रायश्चित्तों का वर्णन’ नामक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe