June 26, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 166 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छाछठवाँ अध्याय वर्णाश्रम धर्म आदि का वर्णन वर्णधर्मादिकथनं पुष्कर कहते हैं — अब मैं श्रौत और स्मार्त-धर्म का वर्णन करता हूँ। वह पाँच प्रकार का माना गया है। वर्णमात्र का आश्रय लेकर जो अधिकार प्रवृत्त होता है, उसे ‘वर्ण धर्म’ जानना चाहिये। जैसे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों के लिये उपनयन संस्कार आवश्यक है। यह ‘वर्ण-धर्म’ कहलाता है। आश्रम का अवलम्बन लेकर जिस पदार्थ का संविधान होता है, वह ‘आश्रम- धर्म’ कहा गया है। जैसे भिन्न-पिण्डादिक का विधान होता है। जो विधि दोनों के निमित्त से प्रवर्तित होती है, उसको ‘नैमित्तिक’ मानना चाहिये। जैसे प्रायश्चित्त का विधान होता है ॥ १-३१/२ ॥’ राजन् ! ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी — इनसे सम्बन्धित धर्म आश्रम- धर्म’ माना गया है। दूसरे प्रकार से भी धर्म के पाँच भेद होते हैं। षाड्गुण्य (संधि – विग्रह आदि ) – के अभिधान में जिसकी प्रवृत्ति होती है, वह ‘दृष्टार्थ’ बतलाया गया है। उसके तीन भेद होते हैं। मन्त्र-यश-प्रभृति ‘अदृष्टार्थ’ हैं, ऐसा मनु आदि कहते हैं। इसके सिवा ‘उभयार्थक व्यवहार’, ‘दण्डधारण’ और ‘तुल्यार्थ – विकल्प’ — ये भी यज्ञमूलक धर्म के अङ्ग कहे गये हैं। वेद में धर्म का जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है, स्मृति में भी वैसे ही है। कार्य के लिये स्मृति वेदोक्त धर्म का अनुवाद करती है — ऐसा मनु आदि का मत है। इसलिये स्मृतियों में उक्त धर्म वेदोक्त धर्म का गुणार्थ, परिसंख्या, विशेषतः अनुवाद, विशेष दृष्टार्थ अथवा फलार्थ है, यह राजर्षि मनु का सिद्धान्त है ॥ ४-८१/२ ॥ निम्नलिखित अड़तालीस संस्कारों से सम्पन्न मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है — (१) गर्भाधान,(२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) अन्नप्राशन, (७) चूडाकर्म, (८) उपनयन संस्कार, (९-१२) चार वेदव्रत (वेदाध्ययन), (१३) स्नान (समावर्तन), (१४) सहधर्मिणी- संयोग (विवाह), (१५-१९ ) पञ्चयज्ञ – देवयज्ञ, पितृयज्ञ मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ, (२०-२६) सात पाक-यज्ञ- संस्था, (२७-३४) अष्टका अष्टकासहित तीन पार्वण श्राद्ध, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री और आश्वयुजी (३५ -४१) सात हविर्यज्ञ-संस्था – अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श- पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रहायणेष्टि, निरूढपशुबन्ध एवं सौत्रामणि, (४२ – ४८) सात सोम संस्था अग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम आठ आत्मगुण हैं — दया, क्षमा, अनसूया, अनायास, माङ्गल्य, अकार्पण्य, अस्पृहा तथा शौच जो इन गुणों से युक्त होता है, वह परमधाम (स्वर्ग) को प्राप्त करता है ॥ ९–१६ ॥ मार्गगमन, मैथुन, मल-मूत्रोत्सर्ग, दन्तधावन, स्नान और भोजन — इन छः कार्यों को करते समय मौन धारण करना चाहिये। दान की हुई वस्तु का पुनः दान, पृथक्पाक, घृत के साथ जल पीना, दूध के साथ जल पीना, रात्रि में जल पीना, दाँत से नख आदि काटना एवं बहुत गरम जल पीना — इन सात बातों का परित्याग कर देना चाहिये । स्नान के पश्चात् पुष्प चयन न करे; क्योंकि वे पुष्प देवता के चढ़ाने योग्य नहीं माने गये हैं। यदि कोई अन्यगोत्रीय असम्बन्धी पुरुष किसी मृतक का अग्नि संस्कार करता है तो उसे दस दिनतक पिण्ड तथा उदकदान का कार्य भी पूर्ण करना चाहिये। जल, तृण, भस्म, द्वार एवं मार्ग — इनको बीच में रखकर जाने से पङ्किदोष नहीं माना जाता। भोजन के पूर्व अनामिका और अङ्गुष्ठ के संयोग से पञ्चप्राणों को आहुतियाँ देनी चाहिये ॥ १७-२२ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वर्णाश्रमधर्म आदि का वर्णन’ नामक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe