June 25, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 164 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौंसठवाँ अध्याय नवग्रह हवन का वर्णन नवग्रहहोमः पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! लक्ष्मी, शान्ति पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुष को ग्रहों की भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु — इन नवग्रहों की क्रमशः स्थापना करनी चाहिये। सूर्य की प्रतिमा ताँबे से, चन्द्रमा की रजत (या स्फटिक से), मङ्गल की लाल चन्दन से, बुध की सुवर्ण से, गुरु की सुवर्ण से, शुक्र की रजत से, शनि की लोहे से तथा राहु-केतु की सीसे से बनाये; इससे शुभ की प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्र पर उन-उनके रंग के अनुसार वर्णक से उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन-कुङ्कुम आदि) से ग्रहों की आकृति बना ले। ग्रहों के रंग के अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सब के लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रह के लिये (अग्निस्थापनपूर्वक) समन्त्रक चरु का होम करना चाहिये। ‘आकृष्णेन रजसा०’ (यजु० ३३ । ४३) इत्यादि सूर्य देवता के, ‘इमं देवाः०’ (यजु० ९ । ४०; १० । १८) इत्यादि चन्द्रमा के, ‘अग्निमूर्धा दिवः ककुत्०’ (यजु० १३ । १४) इत्यादि मङ्गल के, उद्बुध्यस्व० (यजु० १५ । ५४; १८ । ६१) इत्यादि बुध के, ‘बृहस्पते अदित यदिर्यः०’ (यजु० २६ । ३) इत्यादि बृहस्पति के, ‘अन्नात्परिश्रुतो०’ (यजु० १९ । ७५) इत्यादि शुक्र के, ‘शं नो देवीः०’ (यजु० ३६ । १२) इत्यादि शनैश्चर के, ‘काण्डात् काण्डात्०’ (यजु० १३ । २०) इत्यादि राहु के और ‘केतुं कृण्वन्नकेतवे०’ (यजु० २९ । ३७) इत्यादि केतु के मन्त्र हैं। ‘आक, पलास, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा-ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहों की समिधाएँ हैं। सूर्य आदि ग्रहों में से प्रत्येक के लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीर की आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठी के चावल का भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्रित भात, माष (उड़द) मिलाया हुआ भात और खिचड़ी- इनका ग्रह के क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मण के लिये भोजन दे। अपनी शक्ति के अनुसार यथा प्राप्त वस्तुओं से ब्राह्मण का विधिपूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा ये वस्तुएँ दक्षिणा में दे। ये ग्रहों की दक्षिणाएँ बतायी गयी हैं। जिस-जिस पुरुष के लिये जो ग्रह अष्टम आदि दुष्ट स्थानों में स्थित हों, वह पुरुष उस ग्रह की उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजी ने इन ग्रहों को वर दिया है कि जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओं के धन और जाति का उत्कर्ष तथा जगत्की जन्म-मृत्यु भी ग्रहों के ही अधीन है; अतः ग्रह सभी के लिये पूजनीय हैं ॥ १-१४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नवग्रह-सम्बन्धी हवन का वर्णन’ नामक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe