June 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 103 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तीनवाँ अध्याय शिवलिङ्ग आदि के जीर्णोद्धार की विधि जीर्णोद्धार विधि भगवान् शंकर कहते हैं — स्कन्द ! जीर्ण आदि लिङ्गों के विधिवत् उद्धार का प्रकार बता रहा हूँ। जिसका चिह्न मिट गया हो, जो टूट-फूट गया हो, मैल आदि स्थूल हो गया हो, वज्र से आहत हुआ हो, सम्पुटित (बंद) हो, फट गया हो, जिसका अङ्ग भङ्ग हो गया हो तथा जो इसी तरह के अन्य विकारों से ग्रस्त हो ऐसे दूषित लिङ्गों की पिण्डी तथा वृषभ का तत्काल त्याग कर देना चाहिये ॥ १-२ ॥ ‘ जो शिवलिङ्ग किसी के द्वारा चालित हो या स्वयं चलित हो, अत्यन्त नीचा हो गया हो, विषम स्थान में स्थित हो; जहाँ दिङ्मोह होता हो, जो किसी के द्वारा गिरा दिया गया हो अथवा जो मध्यस्थ होकर भी गिर गया हो— ऐसे लिङ्ग की पुनः ठीक से स्थापना कर देनी चाहिये। परंतु यदि वह व्रणरहित हो, तभी ऐसा किया जा सकता है। यदि वह नदी के जलप्रवाह द्वारा वहाँ से अन्यत्र हटा दिया जाता हो तो उस स्थान से अन्यत्र भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उसकी स्थापना की जा सकती है। जो शिवलिङ्ग अच्छी तरह स्थित हो, सुदृढ़ हो, उसे विचलित करना या चलाना नहीं चाहिये ॥ ३-५ ॥ जो अस्थिर या अदृढ हो, उस शिवलिङ्ग को यदि चालित करे तो उसकी शान्ति के लिये एक सहस्र आहुतियाँ दे तथा सौ आहुतियाँ देकर पुनः उसकी स्थापना करे। जीर्णता आदि दोषों से युक्त शिवलिङ्ग भी यदि नित्यपूजा-अर्चा आदि से युक्त हो तो उसे सुस्थित ही रहने दे; चालित न करे । जीर्णोद्धार के लिये दक्षिणदिशा में एक मण्डप बनावे। ईशानकोण में पश्चिम द्वार का एक फाटक लगा दे। द्वारपूजा आदि करके, वेदी पर शिवजी की पूजा करे। इसके बाद मन्त्रों का पूजन और तर्पण करके वास्तुदेवता की पूर्ववत् पूजा करे। तदनन्तर बाहर जा, दिशाओं में बलि दे, स्वयं आचमन करने के पश्चात् गुरु ब्राह्मणों को भोजन करावे । तत्पश्चात् भगवान् शंकर को इस प्रकार विज्ञप्ति दे — ॥ ६-८ ॥ शम्भो ! यह लिङ्ग दोषयुक्त हो गया है। इसके उद्धार करने से शान्ति होगी-ऐसा आपका वचन है। अतः विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान होने जा रहा है। शिव ! इसके लिये आप मेरे भीतर स्थित होइये और अधिष्ठाता बनकर इस कार्य का सम्पादन कीजिये।’ देवेश्वर शिव को इस प्रकार विज्ञप्ति देकर मधु और घृतमिश्रित खीर एवं दूर्वा द्वारा मूल मन्त्र से एक सौ आठ आहुतियाँ देकर शान्ति होम का कार्य सम्पन्न करे। तदनन्तर लिङ्ग को स्नान कराकर वेदी पर इसकी पूजा करे। पूजनकाल में ॐ व्यापकेश्वराय शिवाय नमः ।’ इस मन्त्र का उच्चारण करे। अङ्गपूजा और अङ्गन्यास के मन्त्र इस प्रकार हैं — ‘ॐ व्यापकेश्वराय हृदयाय नमः । ॐ व्यापकेश्वराय शिरसे स्वाहा । ॐ व्यापकेश्वराय शिखायै वषट् । ॐ व्यापकेश्वराय कवचाय हुम् । ॐ व्यापकेश्वराय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ व्यापकेश्वराय अस्त्राय फट् ।’ ॥ ९-१२ ॥ तत्पश्चात् उस शिवलिङ्ग के आश्रित रहनेवाले भूत को अस्त्र-मन्त्र के उच्चारणपूर्वक सुनावे — ‘यदि कोई भूत-प्राणी यहाँ इस लिङ्ग का आश्रय लेकर रहता है, वह भगवान् शिव की आज्ञा से इस लिङ्ग को त्यागकर, जहाँ इच्छा हो, वहाँ चला जाय अब यहाँ विद्या तथा विद्येश्वरों के साथ साक्षात् भगवान् शम्भु निवास करेंगे।’ इसके बाद पाशुपतमन्त्र से प्रत्येक भाग के लिये सहस्र आहुतियाँ देकर शान्तिजल से प्रोक्षण करे।फिर कुशों द्वारा स्पर्श करके उक्त मन्त्र को जपे ॥ १३-१५ ॥ तदनन्तर विलोम क्रम से अर्घ्य देकर लिङ्ग और पिण्डिका में स्थित तत्त्वों, तत्त्वाधिपतियों और अष्ट मूर्तीश्वरों का गुरु स्वर्णपाश से विसर्जन करके वृषभ के कंधे पर स्थित रज्जु द्वारा उसे बाँधकर ले जाय तथा जनसमुदाय के साथ शिव-नाम का कीर्तन करते हुए, उस वृषभ ( नन्दिकेश्वर ) – को जल में डाल दे। फिर मन्त्रज्ञ आचार्य पुष्टि के लिये सौ आहुतियाँ दे । दिक्पालों की तृप्ति तथा वास्तु- शुद्धि के लिये भी सौ-सौ आहुतियों का होम करे। तत्पश्चात् महापाशुपत मन्त्र से उस मन्दिर में रक्षा की व्यवस्था करके, गुरु वहाँ विधिपूर्वक दूसरे लिङ्ग की स्थापना करे। असुरों मुनियों, देवताओं तथा तत्त्ववेत्ताओं द्वारा स्थापित लिङ्ग जीर्ण या भग्न हो गया हो तो भी विधि के द्वारा भी उसे चालित न करे ॥ १६-२० ॥ जीर्ण- मन्दिर के उद्धार में भी यही विधि काम में लानी चाहिये। मन्त्रगणों का खङ्ग में न्यास करके दूसरा मन्दिर तैयार करावे। यदि पहले की अपेक्षा मन्दिर को संकुचित या छोटा कर दिया जाय तो कर्ता की मृत्यु होती है और विस्तार किया जाय तो धन का नाश होता है। अतः प्राचीन मन्दिर के द्रव्य को लेकर या और कोई श्रेष्ठ द्रव्य लेकर पहले के मन्दिर के बराबर ही उस स्थान पर नूतन मन्दिर का निर्माण करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘जीर्णोद्धार की विधि का वर्णन’ नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe