June 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 096 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ छियानबेवाँ अध्याय प्रतिष्ठा में अधिवास की विधि अधिवासनविधिः भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द ! पुरोहित को चाहिये कि वह स्नान करके प्रातः काल और मध्याह्नकाल, दोनों समय का नित्यकर्म सम्पन्न करके मूर्तिरक्षक सहायक ब्राह्मणों के साथ यज्ञमण्डप को पधारे।(मूर्तिभिर्जापिभिर्विप्रैः – इस पाठान्तर के अनुसार मूर्तियों और जपकर्ता ब्राह्मणों के साथ यज्ञमण्डप में जाय ऐसा अर्थ समझना चाहिये।) फिर वहाँ शान्ति आदि द्वारों का पूर्ववत् क्रमशः पूजन करे। इन द्वारों की दोनों शाखाओं पर प्रदक्षिणक्रम से द्वारपालों की पूजा करनी चाहिये। पूर्व दिशा में द्वारपाल नन्दी और महाकाल की, दक्षिण दिशा में भृङ्गी और विनायक की, पश्चिम दिशा में वृषभ और स्कन्द की तथा उत्तर दिशा में देवी और चण्ड की पूजा करे। द्वार–शाखाओं के मूलदेश में पूर्वादि क्रम से दो-दो कलशों की पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं — पूर्व दिशा में प्रशान्त और शिशिर, दक्षिण में पर्जन्य और अशोक, पश्चिम में भूतसंजीवन और अमृत तथा उत्तर में धनद और श्रीप्रद — इन दो-दो कलशों की क्रमशः पूजा का विधान है। इनके नाम के आदि में ‘प्रणव’ और अन्त में ‘नमः’ जोड़कर चतुर्थ्यन्त रूप रखे यही इनके पूजन का मन्त्र है। यथा — ‘ॐ प्रशान्तशिशिराभ्यां नमः ।’ इत्यादि ॥ १-५ ॥’ लोक दो ग्रह दो, वसु दो, द्वारपाल दो, नदियाँ दो, सूर्य तीन, युग एक, वेद एक, लक्ष्मी तथा गणेश — इतने देवता यज्ञमण्डप के प्रत्येक द्वार पर रहते हैं। इनका कार्य है — विघ्न समूह का निवारण और यज्ञ का संरक्षण पूर्वादि दस दिशाओं में वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, चक्र और कमल की क्रमशः पूजा करे तथा प्रत्येक दिशा में दिक्पाल की पताका का भी पूजन करे। पूजन के मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है — ॐ हूं हः वज्राय हूं फट् । ॐ हूं हः शक्तये हूं फट् । 1 इत्यादि ॥ ६-९ ॥ कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्वनेत्र (अथवा पद्मनेत्र), सुमुख और सुप्रतिष्ठित — ये ध्वजों के आठ देवता हैं, जो पूर्वादि दिशाओं में कोटि-कोटि भूतों सहित पूजनीय हैं। इनके पूजन-सम्बन्धी मन्त्र इस प्रकार हैं — ॐ कुं कुमुदायनमः ।2 इत्यादि। हेतुक (अथवा हेरुक), त्रिपुरघ्न, शक्ति (अथवा वह्नि), यमजिह्व, काल, छठा कराली, सातवाँ एकाङ्घ्रि और आठवाँ भीम — ये क्षेत्रपाल हैं। इनका क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओं में पूर्ववत् पूजन करे। बलि, पुष्प और धूप देकर इन सबको सन्तुष्ट करे। तदनन्तर उत्तम एवं पवित्र तृणों पर अथवा बाँस के खंभों पर क्रमशः पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों की स्थापना करके सद्योजातादि पाँच मन्त्रों द्वारा उनका पूजन करे। सदाशिव पदव्यापी मण्डप का, जो भगवान् शंकर का धाम है तथा पताका एवं शक्ति से संयुक्त है (पाठान्तर के अनुसार पातालशक्ति या पिनाकशक्ति से संयुक्त है), तत्त्वदृष्टि से अवलोकन करे ॥ ९-१४ ॥ पूर्ववत् दिव्य अन्तरिक्ष एवं भूलोकवर्ती विघ्नों का अपसारण करके पश्चिम द्वार में प्रवेश करे और शेष दरवाजों को बंद करा दे (अथवा शेष द्वारों का दर्शनमात्र कर ले ) । प्रदक्षिणक्रम से मण्डप के भीतर जाकर वेदी के दक्षिण भाग में उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूर्ववत् भूतशुद्धि करे। अन्तर्याग, विशेषार्घ्य, मन्त्र- द्रव्यादि-शोधन, स्वात्म पूजन तथा पञ्चगव्य आदि पूर्ववत् करे। फिर वहाँ आधारशक्ति की प्रतिष्ठापूर्वक कलश स्थापन करे। विशेषतः शिव का ध्यान करे। तदनन्तर क्रमशः तीनों तत्त्वों का चिन्तन करे। ललाट में शिवतत्त्व की, स्कन्धदेश में विद्यातत्त्व की तथा पादान्त-भाग में उत्तम आत्मतत्त्व की भावना करे। शिवतत्त्व के रुद्र, विद्यातत्त्व के नारायण तथा आत्मतत्त्व के ब्रह्मा देवता हैं। इनका अपने नाम मन्त्रों द्वारा पूजन करना चाहिये। इन तत्त्वों के आदि-बीज क्रमश: इस प्रकार हैं — ॐ ई आम्’ ॥ १६-२१ ॥ मूर्तियों और मूर्तीश्वरों की वहाँ पूर्ववत् स्थापना करे। उनमें व्यापक शिव का साङ्ग पूजन करके मस्तक पर शिव हस्त रखे। भावना द्वारा ब्रह्मरन्ध्र के मार्ग से प्रविष्ट हुए तेज से अपने बाहर-भीतर की अन्धकार राशि को नष्ट करके आत्मस्वरूप का इस प्रकार चिन्तन करे कि ‘वह सम्पूर्ण दिङ्मण्डल को प्रकाशित कर रहा है।’ मूर्तिपालकों के साथ अपने-आपको भी हार, वस्त्र और मुकुट आदि से अलंकृत करके — ‘मैं शिव हूँ’ — ऐसा चिन्तन करते हुए ‘बोधासि’ (ज्ञानमय खड्ग) – को उठावे । चतुष्पदान्त संस्कारों द्वारा यज्ञमण्डप का संस्कार करे। बिखेरने योग्य वस्तुओं को सब ओर बिखेरकर, कुश की कूँची से उन सबको समेटे उन्हें आसन के नीचे करके वार्धानी के जल से पूर्ववत् वास्तु आदि का पूजन करे। शिव-कुम्भास्त्र और वार्धानी के सुस्थिर आसनों की भी पूजा करे। अपनी-अपनी दिशा में कलशों पर विराजमान इन्द्रादि लोकपालों का क्रमशः उनके वाहनों और आयुध आदि के साथ यथाविधि पूजन करे ॥ २२-२७ ॥ पूर्व दिशा में इन्द्र का चिन्तन करे। वे ऐरावत हाथी पर बैठे हैं। उनकी अङ्ग कान्ति सुवर्ण के समान दमक रही है। मस्तक पर किरीट शोभा दे रहा है। वे सहस्र नेत्र धारण करते हैं। उनके हाथ में वज्र शोभा पाता है। अग्निकोण में सात ज्वालामयी जिह्वाएँ धारण किये, अक्षमाला और कमण्डलु लिये, लपटों से घिरे रक्त वर्णवाले अग्निदेव का ध्यान करे। उनके हाथ में शक्ति शोभा पाती है तथा बकरा उनका वाहन है। दक्षिण में महिषारूढ दण्डधारी यमराज का चिन्तन करे, जो कालाग्नि के समान प्रकाशित हो रहे हैं। नैर्ऋत्य- कोण में लाल नेत्रवाले नैर्ऋत्य की भावना करे, जो हाथ में तलवार लिये, शव (मुर्दे) पर आरूढ हैं। पश्चिम में मकरारूढ, श्वेतवर्ण, नागपाशधारी वरुण का चिन्तन करे। वायव्यकोण में मृगारूढ, नीलवर्ण वायुदेव का तथा उत्तर में भेंड़े पर सवार कुबेर का ध्यान करे। ईशानकोण में त्रिशूलधारी, वृषभारूढ ईशान का, नैर्ऋत्य तथा पश्चिम के मध्यभाग में कच्छप पर सवार चक्रधारी भगवान् अनन्त का तथा ईशान और पूर्व के भीतर चार मुख एवं चार भुजा धारण करनेवाले हंसवाहन ब्रह्मा का ध्यान करे ॥ २८-३२ ॥ खंभों के मूल भाग में स्थित कलशों में तथा वेदी पर धर्म आदि का पूजन करे। कुछ लोग सम्पूर्ण दिशाओं में स्थित कलशों पर अनन्त आदि की पूजा भी करते हैं। इसके बाद शिवाज्ञा सुनावे और कलशों को अपने पृष्ठभाग तक घुमावे। तत्पश्चात् पहले कलश को और फिर वार्धानी को पूर्ववत् अपने स्थान पर रख दे। स्थिर आसन वाले शिव का कलश में और शस्त्र के लिये ध्रुवासन का पूर्ववत् पूजन करके उद्भव मुद्रा द्वारा स्पर्श करे। उस समय भगवान् से इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘हे जगन्नाथ! आप अपने भक्तजन पर कृपा करके इस अपने ही यज्ञ की रक्षा कीजिये।’ — यों रक्षा के लिये प्रार्थना सुनाकर कलश में खड्ग की स्थापना करे। दीक्षा और स्थापना के समय कलश में, वेदी पर अथवा मण्डल में भगवान् शिव का पूजन करे। मण्डल में देवेश्वर शिव का पूजन करने के पश्चात् कुण्ड के समीप जाय ॥ ३३-३७ ॥ कुण्ड–नाभि को आगे करके बैठे हुए मूर्तिधारी पुरुष गुरु की आज्ञा से अपने-अपने कुण्ड का संस्कार करें। जप करने वाले ब्राह्मण संख्यारहित मन्त्र का जप करें। दूसरे लोग संहिता का पाठ करें। अपनी शाखा के अनुसार वेदों के पारंगत विद्वान् शान्तिपाठ में लगे रहें। ऋग्वेदी विद्वान् पूर्व दिशा में श्रीसूक्त, पावमानी ऋचा, मैत्रेय ब्राह्मण तथा वृषाकपि-मन्त्र — इन सबका पाठ करें। सामवेदी विद्वान् दक्षिण में देवव्रत, भारुण्ड, ज्येष्ठसाम, रथन्तरसाम तथा पुरुषगीत — इन सबका गान करें। यजुर्वेदी विद्वान् पश्चिम दिशा में रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, श्लोकाध्याय तथा विशेषतः ब्राह्मणभाग का पाठ करें। अथर्ववेदी विद्वान् उत्तर दिशा में नीलरुद्र, सूक्ष्मासूक्ष्म तथा अथर्वशीर्ष का तत्परतापूर्वक अध्ययन करें ॥ ३८-४३ ॥ आचार्य (अरणी मन्थन द्वारा) अग्नि का उत्पादन करके उसे प्रत्येक कुण्ड में स्थापित करावें । अग्नि के पूर्व आदि भागों को पूर्व-कुण्ड आदि के क्रम से लेकर धूप, दीप और चरु के निमित्त अग्नि का उद्धार करे। फिर पहले बताये अनुसार भगवान् शंकर का पूजन करके शिवाग्नि में मन्त्र- तर्पण करे। देश, काल आदि की सम्पन्नता तथा दुर्निमित्त की शान्ति के लिये होम करके मन्त्रज्ञ आचार्य मङ्गलकारिणी पूर्णाहुति प्रदान करके, पूर्ववत् चरु तैयार करे और उसे प्रत्येक कुण्ड में निवेदित करे। यजमान से वस्त्राभूषणों द्वारा विभूषित एवं सम्मानित मूर्तिपालक ब्राह्मण स्नान मण्डप में जायँ । भद्रपीठ पर भगवान् शिव की प्रतिमा को स्थापित करके ताड़न और अवगुण्ठन की क्रिया करें। पूर्व की वेदी पर पूजन करके मिट्टी, काषाय- जल, गोबर और गोमूत्र से तथा बीच-बीच में जल से भगवत् प्रतिमा को स्नान करावे। तत्पश्चात् भस्म तथा गन्धयुक्त जल से नहलावे। इसके बाद आचार्य ‘अस्त्राय फट् । – इस मन्त्र से अभिमन्त्रित जल के द्वारा मूर्तिपालकों के साथ हाथ धोकर कवच मन्त्र से अभिमन्त्रित पीताम्बर द्वारा मूर्ति को आच्छादित करके श्वेत फूलों से उसकी पूजा करे। तदनन्तर उसे उत्तर-वेदी पर ले जाय ॥ ४४-५०१/२ ॥ वहाँ आसनयुक्त शय्या पर सुलाकर कुङ्कुम में रंगे हुए सूत से अङ्ग का विभाजन करके आचार्य सोने की शलाका द्वारा उस प्रतिमा में दोनों नेत्र अङ्कित करे। यह कार्य शस्त्रक्रिया द्वारा सम्पन होना चाहिये। पहले चिह्न बनाने वाला गुरु नेत्र- चिह्न को अञ्जन से अङ्कित कर दे; इसके बाद वह शिल्पी, जो मूर्ति निर्माण का कार्य पहले भी कर चुका हो, उस नेत्रचिह्न को शस्त्र द्वारा खोदे (अर्थात् खुदाई करके नेत्र की आकृति को स्पष्टरूप से अभिव्यक्त करे)। अर्चा के तीन अंश से कम अथवा एक चौथाई भाग या आधे भाग में सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि के लिये शुभ लक्षण (चिह्न) की अवतारणा करनी चाहिये। शिवलिङ्ग की लंबाई के मान में तीन से भाग देकर एक भाग को त्याग देने से जो मान हो, वही लिङ्ग के लक्ष्मदेह का सब ओर से विस्तार होना चाहिये ॥ ५१-५५ ॥ एक हाथ के प्रस्तरखण्ड में जो लक्ष्मरेखा बनेगी, उसकी गहराई और चौड़ाई उतनी ही होगी, जितनी जौ के नौ भागों में से एक को छोड़ने और आठ को लेने से होती है। इसी प्रकार डेढ़ हाथ या दो हाथ आदि के लिङ्ग से लेकर नौ हाथतक के लिङ्ग में क्रमशः १/२ भाग की वृद्धि करके लक्ष्मरेखा बनानी चाहिये। इस तरह नौ हाथवाले लिङ्ग में आठ जौ के बराबर मोटी और गहरी लक्ष्मरेखा होनी चाहिये। जो शिवलिङ्ग परस्पर अन्तर रखते हुए उत्तरोत्तर सवाये बड़े हों, वहाँ लक्ष्म देह का ‘विस्तार एक-एक जौ बढ़ाकर करना चाहिये । गहराई और मोटाई की वृद्धि के अनुसार रेखा भी एक तिहाई बढ़ जायगी। सभी शिवलिङ्गों में लिङ्ग का ऊपरी भाग ही उनका सूक्ष्म मस्तक है ॥ ५६-५९ ॥ लक्ष्म अर्थात् चिह्न का जो क्षेत्र है, उसका आठ भाग करके दो भागों को मस्तक के अन्तर्गत रखे। शेष छः भागों में से नीचे के दो भागों को छोड़कर मध्य के अवशिष्ट भागों में तीन रेखा खींचे और उन्हें पृष्ठदेश में ले जाकर जोड़ दे। रत्नमय लिङ्ग में लक्षणोद्धार की आवश्यकता नहीं है। भूमि से स्वतः प्रकट हुए अथवा नर्मदादि नदियों से प्रादुर्भूत हुए शिवलिङ्ग में भी लक्ष्मोद्धार अपेक्षित नहीं है। रत्नमय लिङ्गों के रत्नों में जो निर्मल प्रभा होती है, वही उनके स्वरूप का लक्षण (परिचायक) है। मुखभाग में जो नेत्रोन्मीलन किया जाता है, वह आवश्यक है और उसी के संनिधान के लिये वह लक्ष्म या चिह्न बनाया जाता है। लक्षणोद्धार की रेखा का घृत और मधु से मृत्युञ्जय मन्त्र द्वारा पूजन करके, शिल्पिदोष की निवृत्ति के लिये मृत्तिका आदि से स्नान कराकर, लिङ्ग की अर्चना करे। फिर दान-मान आदि से शिल्पी को संतुष्ट करके आचार्य को गोदान दे। तदनन्तर सौभाग्यवती स्त्रियाँ धूप, दीप आदि के द्वारा लिङ्ग की विशेष पूजा करके मङ्गल-गीत गायें और सव्य या अपसव्य भाव से सूत्र अथवा कुश के द्वारा स्पर्शपूर्वक रोचना अर्पित करके न्योछावर दें। इसके बाद यजमान गुड़, नमक और धनिया देकर उन स्त्रियों को विदा करे ॥ ६०-६६ ॥ तत्पश्चात् गुरु मूर्तिरक्षक ब्राह्मणों के साथ ‘नमः’ या प्रणव- मन्त्र के द्वारा मिट्टी, गोबर, गोमूत्र और भस्म से पृथक् पृथक् स्नान करावे। एक एक के बाद बीच में जल से स्नान कराता जाय। फिर पञ्चगव्य, पञ्चामृत, रूखापन दूर करनेवाले कषाय द्रव्य, सर्वौषधिमिश्रित जल, श्वेत पुष्प, फल, सुवर्ण, रत्न, सींग एवं जौ मिलाये हुए जल, सहस्रधारा, दिव्यौषधियुक्त जल, तीर्थ-जल, गङ्गाजल, चन्दनमिश्रित जल, क्षीरसागर आदि के जल, कलशों के जल तथा शिव कलश के जल से अभिषेक करे। रूखेपन को दूर करने वाला विलेपन लगाकर उत्तम गन्ध और चन्दन आदि से पूजन करने के पश्चात् ब्रह्ममन्त्र द्वारा पुष्प तथा कवच- मन्त्र से लाल वस्त्र चढ़ावे। फिर अनेक प्रकार से आरती उतारकर रक्षा और तिलकपूर्वक गीत- वाद्य आदि से, विविध द्रव्यों से तथा जय-जयकार और स्तुति आदि से भगवान् को संतुष्ट करके पुरुष मन्त्र से उनकी पूजा करे। तदनन्तर हृदय- मन्त्र से आचमन करके इष्टदेव से कहे प्रभो! उठिये ‘ ॥ ६७-७३ ॥ फिर इष्टदेव को ब्रह्मरथ पर बिठाकर उसी के द्वारा उन्हें सब ओर घुमाते और द्रव्य बिखेरते हुए मण्डप के पश्चिम द्वार पर ले जाय और वहाँ शय्या पर भगवान् को पधरावे। आसन के आदि- अन्त में शक्ति की भावना करके उस शुभ आसन पर उन्हें विराजमान करे। पश्चिमाभिमुख प्रासाद में पश्चिम दिशा की ओर पिण्डि का स्थापित करके उसके ऊपर ब्रह्मशिला रखे। शिवकोण में सौ अस्त्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित निद्रा-कलश और शिवासन की कल्पना करके, हृदय-मन्त्र से अर्घ्य दे, देवता को उठाकर लिङ्गमय आसन पर शिरोमन्त्र द्वारा पूर्व की ओर मस्तक रखते हुए आरोपित एवं स्थापित करे। इस प्रकार उन परमात्मा का साक्षात्कार होने पर चन्दन और धूप चढ़ाते हुए उनकी पूजा करे तथा कवच- मन्त्र से वस्त्र अर्पित करे। घर का उपकरण आदि अर्पित कर दे। फिर अपनी शक्ति के अनुसार नमस्कारपूर्वक नैवेद्य निवेदन करे। अभ्यङ्ग- कर्म के लिये घृत और मधु से युक्त पात्र इष्टदेव के चरणों के समीप रखे। वहाँ उपस्थित हुए आचार्य शक्ति से लेकर भूमि- पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों के समूह को उनके अधिपतियों सहित स्थापित करके फूल की मालाओं से उनके तीन भागों की कल्पना करे ॥ ७४-८० ॥ वे तीन भाग माया से लेकर शक्ति- पर्यन्त हैं। उनमें प्रथम भाग चतुष्कोण, द्वितीय भाग अष्टकोण और तृतीय भाग वर्तुलाकार है। प्रथम भाग में आत्मतत्व, द्वितीय भाग में विद्यातत्त्व और तृतीय भाग में शिवतत्त्व की स्थिति है। इन भागों में सृष्टिक्रम से एक-एक अधिपति हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम से प्रसिद्ध हैं। तदनन्तर मूर्तियों और मूर्तीश्वरों का पूर्वादि दिशाओं के क्रम से न्यास करे। पृथ्वी, अग्रि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश — ये आठ मूर्तिरूप हैं। इनका न्यास करने के पश्चात् इनके अधिपतियों का न्यास करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं — शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, ईश्वर, महादेव और भीम। इनके वाचक मन्त्र निम्नलिखित हैं — लं, रं, शं, खं, चं, पं, सं हं 3 अथवा त्रिमात्रिक प्रणव तथा ‘हां’ अथवा हृदय-मन्त्र अथवा कहीं- कहीं मूल मन्त्र इनके (मूर्तियों और मूर्तिपतियों के ) पूजन के उपयोग में आते हैं। अथवा पञ्चकुण्डात्मक याग में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – इन पाँच मूर्तियों का ही न्यास करे ॥ ८१-८६ ॥ फिर क्रमशः इनके पाँच अधिपतियों — ब्रह्मा, शेषनाग, रुद्र, ईश और सदाशिव का मन्त्रज्ञ पुरुष सृष्टि-क्रम से न्यास करे। यदि यजमान मुमुक्षु हो तो वह पञ्चमूर्तियों के स्थान में ‘निवृत्ति’ आदि पाँच कलाओं तथा उनके ‘अजात’ आदि अधिपतियों का न्यास करे। अथवा सर्वत्र व्याप्तिरूप कारणात्मक त्रितत्त्व का ही न्यास करना चाहिये। शुद्ध अध्वा में विद्येश्वरों का और अशुद्ध में लोकनायकों का मूर्तिपतियों के रूप में दर्शन करना चाहिये। भोगी (सर्प) भी मन्त्रेश्वर हैं। पैंतीस, आठ, पाँच और तीन मूर्तिरूप तत्त्व क्रमश: कहे गये हैं। ये ही इनके तत्त्व हैं। इन तत्त्वों के अधिपतियों के मन्त्रों का दिग्दर्शन मात्र कराया जाता है। ॐ हां शक्तितत्त्वाय नमः । इत्यादि । ॐ हां शक्तितत्त्वाधिपाय नमः । इत्यादि । ॐ हां क्ष्मामूर्तये नमः । ॐ हां क्ष्मामूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः। इत्यादि । ॐ हां शिवतत्त्वाय नमः । ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये रुद्राय नमः । इत्यादि । नाभिमूल से उच्चरित होकर घण्टानाद के समान सब ओर फैलनेवाले, ब्रह्मादि कारणों के त्यागपूर्वक, द्वादशान्त स्थान को प्राप्त हुए मन से अभिन्न तथा आनन्द-रस के उद्गम को पा लेनेवाले मन्त्र का और निष्कल, व्यापक शिव का, जो अड़तीस कलाओं से युक्त, सहस्रों किरणों से प्रकाशमान, सर्वशक्तिमय तथा साङ्ग हैं, ध्यान करते हुए उन्हें द्वादशान्त से लाकर शिवलिङ्ग में स्थापित करे ॥ ८७-९४ ॥ इस प्रकार शिवलिङ्ग में जीवन्यास होना चाहिये, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थों का साधक है। पिण्डिका आदि में किस प्रकार न्यास करना चाहिये, यह बताया जाता है। पिण्डिका को स्नान कराकर उसमें चन्दन आदि का लेप करे और उसे सुन्दर वस्त्रों से आच्छादित करके, उसके भगस्वरूप छिद्र में पञ्चरत्न आदि डालकर, उस पिण्डिका को लिङ्ग से उत्तर दिशा में स्थापित करे। उसमें भी लिङ्ग की ही भाँति न्यास करके विधिपूर्वक उसकी पूजा करे। उसका स्नान आदि पूजन कार्य सम्पन्न करके लिङ्ग के मूलभाग में शिव का न्यास करे। फिर शक्त्यन्त वृषभ का भी स्नान आदि संस्कार करके स्थापन करना चाहिये ॥ ९५-९८ ॥ तत्पश्चात् पहले प्रणव का, फिर ‘ह्रां हूं ह्रीं ।‘- इन तीन बीजों में से किसी एक का उच्चारण करते हुए क्रियाशक्ति सहित आधाररूपिणी शिला- पिण्डिका का पूजन करे। भस्म, कुशा और तिल से तीन प्राकार (परकोटा) बनावे तथा रक्षा के लिये आयुधों सहित लोकपालों को बाहर की ओर नियोजित एवं पूजित करे। पूजन के मन्त्र इस प्रकार हैं — ॐ ह्रीं क्रियाशक्तये नमः । ॐ ह्रीं महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा।’ निम्नाङ्कित मन्त्र के द्वारा पिण्डिका में पूजन करे — ॐ ह्रीं आधारशक्तये नमः । ॐ ह्रां वृषभाय नमः ।’ ॥ ९९-१०१ ॥ धारिका, दीप्ता, अत्युग्रा, ज्योत्स्रा, बलोत्कटा, धात्री और विधात्री — इनका पिण्डी में न्यास करे; अथवा वामा, ज्येष्ठा, क्रिया, ज्ञाना और वेधा (अथवा रोधा या प्रह्वी) — इन पाँच नायिकाओं का न्यास करे। अथवा क्रिया, ज्ञाना तथा इच्छा-इन तीन का ही न्यास करे; पूर्ववत् शान्तिमूर्तियों में तमी, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया, जरा और भया — इनका न्यास करे; अथवा तमा, मोहा, घोरा, रति, अपज्वरा – इन पाँचों का न्यास करे; या क्रिया, ज्ञाना और इच्छा — इन तीन अधिनायिकाओं का आत्मा आदि तीन तीव्र मूर्तिवाले तत्त्वों में न्यास करे। यहाँ भी पिण्डिका, ब्रह्मशिला आदि में पूर्ववत् गौरी आदि शम्बरों (मन्त्रों) द्वारा ही सब कार्य विधिवत् सम्पन्न करे ॥ १०२-१०६ ॥ इस प्रकार न्यास-कर्म करके कुण्ड के समीप जा, उसके भीतर महेश्वर का, मेखलाओं में चतुर्भुज का, नाभि में क्रियाशक्ति का तथा ऊर्ध्वभाग में नाद का न्यास करे। तदनन्तर कलश, वेदी, अग्नि और शिव के द्वारा नाड़ी संधान- कर्म करे। कमल के तन्तु की भाँति सूक्ष्मशक्ति ऊर्ध्वगत वायु की सहायता से ऊपर उठती और शून्य मार्ग से शिव में प्रवेश करती है। फिर वह ऊर्ध्वगत शक्ति वहाँ से निकलती और शून्यमार्ग से अपने भीतर प्रवेश करती है। इस प्रकार चिन्तन करे। मूर्तिपालकों को भी सर्वत्र इसी प्रकार संधान करना चाहिये ॥ १०७-११० ॥ कुण्ड में आधार-शक्ति का पूजन करके, तर्पण करने के पश्चात्, क्रमशः तत्त्व, तत्त्वेश्वर, मूर्ति और मूर्तीश्वरों का घृत आदि से पूजन और तर्पण करे। फिर उन दोनों (तत्त्व, तत्त्वेश्वर एवं मूर्ति, मूर्तीश्वर) को संहिता मन्त्रों से एक सौ एक सहस्र अथवा आधा सहस्र आहुतियाँ दे। साथ ही पूर्णाहुति भी अर्पण करे। तत्त्व और तत्त्वेश्वरों तथा मूर्ति और मूर्तीश्वरों का पूर्वोक्त रीति से एक- दूसरे के संनिधान में तर्पण करके मूर्तिपालक भी उनके लिये आहुतियाँ दें। इसके बाद द्रव्य और काल के अनुसार वेदों और अङ्गों द्वारा तर्पण करके, शान्ति-कलश के जल से प्रोक्षित कुश- मूल द्वारा लिङ्ग के मूलभाग का स्पर्श करके, होम-संख्या के बराबर जप करे। हृदय-मन्त्र से संनिधापन और कवच-मन्त्र से अवगुण्ठन करे ॥ १११-११५ ॥ इस प्रकार संशोधन करके, लिङ्ग के ऊर्ध्व- भाग में ब्रह्मा और अन्त (मूल) भाग में विष्णु का पूजन आदि करके, शुद्धि के लिये पूर्ववत् सारा कार्य सम्पन्न कर, होम संख्या के अनुसार जप आदि करे। कुश के मध्यभाग से लिङ्ग के मध्यभाग का और कुश के अग्रभाग से लिङ्ग के अग्रभाग का स्पर्श करे जिस मन्त्र से जिस प्रकार संधान किया जाता है, वह इस समय बताया जाता है — ॐ हां हं, ॐ ॐ एं, ॐ भूं भूं बाह्यमूर्तये नमः । ॐ हां वां, आं ॐ आं षां, ॐ भूं भूं वां वह्निमूर्तये नमः । 4 इसी प्रकार यजमान आदि मूर्तियों के साथ भी अभिसंधान करना चाहिये। पञ्चमूर्त्यात्मक शिव के लिये भी हृदयादि- मन्त्रों द्वारा इसी तरह संधान कर्म करने का विधान है। त्रितत्त्वात्मक स्वरूप में मूलमन्त्र अथवा अपने बीज मन्त्रों द्वारा संधानकर्म करने की विधि है — ऐसा जानना चाहिये। शिला, पिण्डिका एवं वृषभ के लिये भी इसी तरह संधान आवश्यक है । प्रत्येक भाग की शुद्धि के लिये अपने मन्त्रों द्वारा शतादि होम करे और उसे पूर्णाहुति द्वारा पृथक् कर दे ॥ ११६-१२० ॥ न्यूनता दोष से छुटकारा पाने के लिये शिव-मन्त्र से एक सौ आठ आहुतियाँ दे और जो कर्म किया गया है, उसे शिव के कान में निवेदन करे — ‘प्रभो! आपकी शक्ति से ही मेरे द्वारा इस कार्य का सम्पादन हुआ है, ॐ भगवान् रुद्र को नमस्कार है। रुद्रदेव! आपको मेरा नमस्कार है। यह कार्य विधिपूर्ण हो या अपूर्ण, आप अपनी शक्ति से ही इसे पूर्ण करके ग्रहण करें।’ ‘ॐ ह्रीं शांकरि पूरय स्वाहा।’। ऐसा कहकर पिण्डिका में न्यास करे। तदनन्तर ज्ञानी पुरुष लिङ्ग में क्रिया-शक्ति का और पीठ-विग्रह में ब्रह्मशिला के ऊपर आधाररूपिणी शक्ति का न्यास करे ॥ १२१-१२५ ॥ सात, पाँच, तीन अथवा एक रात तक उसका निरोध करके या तत्काल ही उसका अधिवासन करे। अधिक बिना कोई भी सम्पादित होने पर भी फलदायक नहीं होता। अतः अधिवासन अवश्य करे। अधिवासन काल में प्रतिदिन देवताओं को अपने-अपने मन्त्रों द्वारा सौ-सौ आहुतियाँ दे तथा शिव-कलश आदि की पूजा करके दिशाओं में बलि अर्पित करे ॥ १२६-१२७१/२ ॥ गुरु आदि के साथ रात में नियमपूर्वक वास ‘अधिवास’ कहलाता है। ‘अधि ‘पूर्वक ‘वस’ धातु से भाव में ‘घञ्’ प्रत्यय किया गया है। इससे ‘अधिवास’ शब्द सिद्ध हुआ है ॥ १२८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘प्रतिष्ठा के अन्तर्गत संधान एवं अधिवास की विधि का वर्णन’ नामक छियानवे अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥ 1. सोमशम्भुरचित ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली ‘में मन्त्र का यही स्वरूप उपलब्ध होता है। कुछ प्रतियों में ॐ ह्रूं फट् नमः। ॐ ह्रूं फट् द्वाःस्थशक्तये हुं फट् नमः’ ऐसा पाठ है। 2. कहीं-कहीं-कुं’ के स्थान में ‘कौं’ पाठ है। 3. सोमशम्भु की ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली में इन मन्त्रों का क्रम य र स प व, यह प्रणव’ इस प्रकार दिया गया है। 4. आचार्य सोमशम्भु की ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’ में ये मन्त्र इस प्रकार उपलब्ध होते हैं — ॐ हां हां वा, ॐ ॐ ॐ वा ॐ लूं लूं वा क्ष्मामूर्तये नमः । ॐ हां हां वा, ॐ ॐ ॐ वा ॐ रूं रूं वा वह्निमूर्तये नमः । Content is available only for registered users. 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