अग्निपुराण – अध्याय 059
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
उनसठवाँ अध्याय
अधिवास-विधि का वर्णन
अधिवासकथनम्

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! श्रीहरि का सांनिध्यकरण ‘अधिवासन’ कहलाता है। साधक यह चिन्तन करे कि ‘मैं अथवा मेरा आत्मा सर्वज्ञ सर्वव्यापी पुरुषोत्तमरूप है।’ इस प्रकार भावना करके आत्मा की ‘ॐ’ इस नाम के द्वारा प्रतिपादित होने वाले परमात्मा के साथ एकता करे। तदनन्तर चैतन्याभिमानिनी जीव-शक्ति को पृथक् करके आत्मा के साथ उसकी एकता करे। ऐसा करके स्वात्मरूप सर्वव्यापी परमेश्वर में उसे जोड़ दे। तत्पश्चात् प्राणवायु द्वारा (‘लं’ बीजात्मक) पृथ्वी को अग्निबीज (रं) के चिन्तन द्वारा प्रकट हुई अग्नि में जला दे, अर्थात् यह भावना करे कि पृथ्वी का अग्नि में लय हो गया। फिर वायु में अग्नि को विलीन करे और आकाश में वायु का लय कर दे। अधिभूत, अधिदैव तथा अध्यात्म- वैभव के साथ समस्त भूतों को तन्मात्राओं में विलीन करके विद्वान् पुरुष आकाश में उन सबका क्रमशः संहार करे। इसके बाद आकाश का मन में, मन का अहंकार में, अहंकार का महतत्त्व में और महतत्त्व का अव्याकृत प्रकृति में लय करे ॥ १-५ ॥’

अव्याकृत प्रकृति (अथवा माया ) को ज्ञानस्वरूप परमात्मा में विलीन करे। उन्हीं परमात्मा को ‘वासुदेव’ कहा गया है। उन शब्दस्वरूप भगवान् वासुदेव ने सृष्टि की इच्छा से उस अव्याकृत माया का आश्रय ले स्पर्शसंज्ञक संकर्षण को प्रकट किया। संकर्षण ने माया को क्षुब्ध करके तेजोरूप प्रद्युम्न की सृष्टि की। प्रद्युम्न ने रसस्वरूप अनिरुद्ध को और अनिरुद्ध ने गन्धस्वरूप ब्रह्मा को जन्म दिया। ब्रह्मा ने सबसे पहले जल की सृष्टि की। उस जल में उन्होंने पाँच भूतों से युक्त हिरण्मय अण्ड को उत्पन्न किया। उस अण्ड में जीव शक्ति का संचार हुआ। यह वही जीव-शक्ति है, जिसका आत्मा में पहले उपसंहार बताया गया है। जीव के साथ प्राण का संयोग होने पर वह ‘वृत्तिमान्’ कहलाता है। व्याहृतिसंज्ञक जीव प्राणों में स्थित होकर ‘आध्यात्मिक ‘पुरुष’ कहा गया है। उससे प्राणयुक्त बुद्धि उत्पन्न हुई, जो आठ वृत्तिवाली बतायी गयी है। उस बुद्धि से अहंकार का और अहंकार से मन का प्रादुर्भाव हुआ। मन से संकल्पादियुक्त पाँच विषय प्रकट हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ॥ ६-१२ ॥

इन सबने ज्ञानशक्ति से सम्पन्न पाँच इन्द्रियों को प्रकट किया, जिनके नाम हैं — त्वक्, श्रोत्र, घ्राण, नेत्र और जिह्वा। इन सबको ‘ज्ञानेन्द्रिय’ कहा गया है। दो पैर, गुदा, दो हाथ, वाक् और उपस्थ — ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। अब पञ्चभूतों के नाम सुनो आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी — ये पाँच भूत हैं। इनके ही द्वारा सबका आधारभूत स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। इन तत्वों के वाचक जो उत्तम बीज-मन्त्र हैं, उनका न्यास के लिये यहाँ वर्णन किया जाता है। ‘मं’ यह बीज जीवस्वरूप (अथवा जीवतत्त्व का वाचक) है। वह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक है — इस भावना के साथ उक्त बीज का सम्पूर्ण देह में व्यापक न्यास करना चाहिये। ‘भं’ यह प्राणतत्त्व का प्रतीक है। यह जीव की उपाधि में स्थित है, अतः इसका वहीं न्यास करना चाहिये। विद्वान् पुरुष बुद्धितत्त्व के बोधक बकार अथवा ‘बं’ बीज का हृदय में न्यास करे। फकार (फं) अहंकार का स्वरूप है, अतः उसका भी हृदय में ही न्यास करे । संकल्प के कारणभूत मनस्तत्त्वरूप पकार (पं) का भी वहीं न्यास करे ॥ १३-१८ ॥

शब्दतन्मात्रतत्त्व के बोधक नकार ( नं) – का मस्तक में और स्पर्शरूप धकार (धं) का मुखप्रदेश में न्यास करे। रूपतत्त्व के वाचक दकार (दं) – का नेत्रप्रान्त में और रसतन्मात्रा के बोधक थकार (थं)- का वस्तिदेश (मूत्राशय) में न्यास करे । गन्धतन्मात्रस्वरूप तकार (तं) का पिण्डलियों में न्यास करे। णकार (णं) का दोनों कानों में न्यास करके ढकार (ढं) का त्वचा में न्यास करे। डकार (डं) का दोनों नेत्रों में, ठकार ( ठं) का रसना में, टकार (टं)- का नासिका में और जकार (अं) का वागिन्द्रिय में न्यास करे। विद्वान् पुरुष पाणितत्त्वरूप झकार (झं) का दोनों हाथों में न्यास करके, जकार (जं) का दोनों पैरों में, ‘छं’ का पायु में और ‘चं’ का उपस्थ में न्यास करे। ङकार () पृथ्वीतत्त्व का प्रतीक है। उसका युगल चरणों में न्यास करे। घकार ( घं) – का वस्ति में और तेजस्तत्त्वरूप ( गं) का हृदय में न्यास करे। खकार (खं) वायुतत्त्व का प्रतीक है। उसका नासिका में न्यास करे। ककार (कं) आकाशतत्त्वरूप है। विद्वान् पुरुष उसका सदा ही मस्तक में न्यास करे ॥ १९-२५ ॥

हृदय कमल में सूर्य देवता-सम्बन्धी ‘थं’ बीज का न्यास करके, हृदय से निकली हुई जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं, उनमें षोडश कलाओं से युक्त सकार (सं) का न्यास करे। उसके मध्यभाग में मन्त्रज्ञ पुरुष बिन्दुस्वरूप वह्निमण्डल का चिन्तन करे। सुरश्रेष्ठ! उसमें प्रणवसहित हकार (हं) – का न्यास करे। १. ॐ आं नमः परमेष्ठ्यात्मने । २. ॐ आं नमः पुरुषात्मने । ३. ॐ वां नमो नित्यात्मने । ४. ॐ नां नमो विश्वात्मने । ५. ॐ वं नमः सर्वात्मने। ये पाँच शक्तियाँ बतायी गयी हैं।’ स्नानकर्म’ में प्रथमा शक्ति की योजना करनी चाहिये। ‘आसनकर्म’ में द्वितीया, ‘शयन’ में तृतीया, ‘यानकर्म’ में चतुर्थी और ‘अर्चनाकाल’ में पञ्चमी शक्ति का प्रयोग करना चाहिये — ये पाँच उपनिषद् हैं। इनके मध्य में मन्त्रमय श्रीहरि का ध्यान करके क्षकार (क्षं) का न्यास करे ॥ २६-३१ ॥

तदनन्तर जिस मूर्ति की स्थापना की जाती है, उसके मूल मन्त्र का न्यास करना चाहिये। (भगवान् विष्णु की स्थापना में) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ – यह मूल-मन्त्र है। मस्तक नासिका, ललाट, भुख, कण्ठ, हृदय, दो भुजा, दो पिण्डली और दो चरणों में क्रमशः उक्त मूल मन्त्र के एक- एक अक्षर का न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् केशव का मस्तक में न्यास करे। नारायण का मुख में, माधव का ग्रीवा में और गोविन्द का दोनों भुजाओं में न्यास करके विष्णु का हृदय में न्यास करे। पृष्ठभाग में मधुसूदन का, जठर में वामन का और कटि में त्रिविक्रम का न्यास करके जंघा (पिण्डली) में श्रीधर का न्यास करे। दक्षिण भाग में हृषीकेश का, गुल्फ में पद्मनाभ का और दोनों चरणों में दामोदर का न्यास करने के पश्चात् हृदयादि षडङ्गन्यास करे ॥ ३२-३६ ॥

सत्पुरुषों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी! यह आदिमूर्ति के लिये न्यास का साधारण क्रम बताया गया है । अथवा जिस देवता की स्थापना का आरम्भ हो, उसी के मूल मन्त्र से मूर्ति के सजीवकरण की क्रिया होनी चाहिये । जिस मूर्ति का जो नाम हो, उसके आदि अक्षर का बारह स्वरों से भेदन करके अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये । देवेश्वर! हृदय आदि अङ्ग का तथा द्वादश अक्षरवाले मूल मन्त्र का एवं तत्त्वों का जैसे देवता के विग्रह में न्यास करे, वैसे ही अपने शरीर में भी करे । तत्पश्चात् चक्राकार पद्ममण्डल में भगवान् विष्णु का गन्ध आदि से पूजन करे। पूर्ववत् शरीर और वस्त्राभूषणों सहित भगवान्‌ के आसन का ध्यान करे। ऊपरी भाग में बारह अरों से युक्त सुदर्शनचक्र का चिन्तन करे। वह चक्र तीन नाभि और दो नेमियों से युक्त है। साथ ही बारह स्वरों से सम्पन्न है। इस प्रकार चक्र का चिन्तन करने के पश्चात् विद्वान् पुरुष पृष्ठदेश में प्रकृति आदि का निवेश करे। फिर अरों के अग्रभाग में बारह सूर्यो का पूजन करे। तदनन्तर वहाँ सोलह कलाओं से युक्त सोम का ध्यान करे। चक्र की नाभि में तीन वसन (वस्त्र या वासस्थान) का चिन्तन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ आचार्य पद्म के भीतर द्वादशदल पद्म का चिन्तन करे ॥ ३७-४४ ॥

उस पद्म में पुरुष–शक्ति का ध्यान करके उसकी पूजा करे। फिर प्रतिमा में श्रीहरि का न्यास करके गुरु वहाँ श्रीहरि तथा अन्य देवताओं का पूजन करे। गन्ध, पुष्प आदि उपचारों से अङ्ग और आवरणों सहित इष्टदेव का भलीभाँति पूजन करना चाहिये। द्वादशाक्षर मन्त्र के एक-एक अक्षर को बीजरूप में परिवर्तित करके उनके द्वारा केशव आदि भगवद्विग्रहों की क्रमशः पूजा करे। द्वादश अरों से युक्त मण्डल में लोकपाल आदि की भी क्रम से अर्चना करे। तदनन्तर, द्विज गन्ध, पुष्प आदि उपचारों द्वारा पुरुषसूक्त से प्रतिमा की पूजा करे और श्रीसूक्त से पिण्डिका की। इसके बाद जनन आदि के क्रम से वैष्णव अग्नि को प्रकट करे। तदनन्तर विष्णुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा अग्नि में आहुति देकर विद्वान् पुरुष शान्ति जल तैयार करे और उसे प्रतिमा के मस्तक पर छिड़ककर अग्नि का प्रणयन करे। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि ‘अग्निं दूतम्०” 1  इत्यादि मन्त्र से दक्षिण-कुण्ड में अग्नि-प्रणयन करे। पूर्वकुण्ड में ‘अग्निमग्निम्० “2  इत्यादि मन्त्र से और उत्तर- कुण्ड में ‘अग्निमग्निं हवीमभिः० ‘ 3  इत्यादि मन्त्र से अग्नि का प्रणयन करे। अग्निप्रणयन-काल में ‘त्वमग्ने द्युभिः०’4  इत्यादि मन्त्र का पाठ किया जाता है ॥ ४५-५१ ॥

प्रत्येक कुण्ड में प्रणव के उच्चारणपूर्वक पलाश की एक हजार आठ समिधाओं का तथा जौ आदि का भी होम करे। व्याहृति मन्त्र से घृतमिश्रित तिलों का और मूलमन्त्र से घी का हवन करे। तत्पश्चात् मधुरत्रय (घी, शहद और चीनी) से शान्ति – होम करे। द्वादशाक्षर मन्त्र से दोनों पैर, नाभि, हृदय और मस्तक का स्पर्श करे। घी, दही और दूध की आहुति देकर मस्तक का स्पर्श करे। तत्पश्चात् मस्तक, नाभि और चरणों का स्पर्श करके क्रमशः गङ्गा, यमुना, गोदावरी और सरस्वती-इन चार नदियों की स्थापना करे। विष्णु-गायत्री 5  से अग्नि को प्रज्वलित करे और गायत्री मन्त्र से उस अग्नि में चरु पकावे। गायत्री से ही होम और बलि दे । तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ५२-५६ ॥

मासाधिपति बारह आदित्यों की तुष्टि के लिये आचार्य को सुवर्ण और गौ की दक्षिणा दे। दिक्पालों को बलि देकर रात में जागरण करे। उस समय वेदपाठ और गीत, कीर्तन आदि करता रहे। इस प्रकार अधिवासन- कर्म का सम्पादन करने पर मनुष्य सम्पूर्ण फलों का भागी होता है ॥ ५७-५८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘देवाधिवास- विधि का वर्णन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

1. अ॒ग्निं दू॒तं पु॒रो द॑धे हव्य॒वाह॒मुप॑ ब्रुवे । दे॒वाँ२ ऽआसा॑दयादि॒ह ॥ (यजु० २२ । १७)
2. अ॒ग्निम॑ग्निं वः स॒मिधा॑ दुवस्यत प्रि॒यं प्रि॑यं वो॒ अति॑थिं गृणी॒षणि॑ । उप॑ वो गी॒र्भिर॒मृतं॑ विवासत दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि वार्यं॑ दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि नो॒ दुवः॑ ॥ (ऋ० मं० ६ । १५ । ६)
3. अ॒ग्निम॑ग्निं॒ हवी॑मभिः॒ सदा॑ हवन्त वि॒श्पति॑म्। ह॒व्य॒वाहं॑ पुरुप्रि॒यम् ॥ (ऋ० मं० १ सू० १२ । २)
4. त्वम॑ग्ने॒ द्युभि॒स्त्वमा॑शुशु॒क्षणि॒स्त्वम॒द्भ्यस्त्वमश्म॑न॒स्परि॑। त्वं वने॑भ्य॒स्त्वमोष॑धीभ्य॒स्त्वं नृ॒णां नृ॑पते जायसे॒ शुचिः॑ ॥ (यजु० ११ । २७)
5. नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

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