June 10, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 054 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ चौवनवाँ अध्याय लिङ्ग-मान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदि का वर्णन लिङ्गमानादिकथनम् श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं दूसरे प्रकार से लिङ्ग आदि का वर्णन करता हूँ, सुनो, लवण तथा घृत से निर्मित शिवलिङ्ग बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है। वस्त्रमय लिङ्ग ऐश्वर्यदायक होता है। उसे तात्कालिक (केवल एक बार ही पूजा के उपयोग में आने वाला) लिङ्ग माना गया है। मृत्तिका से बनाया हुआ शिवलिङ्ग दो प्रकार का होता है — पक्व तथा अपक्व। अपक्व से पक्व श्रेष्ठ माना गया है। उसकी अपेक्षा काष्ठ का बना हुआ शिवलिङ्ग अधिक पवित्र एवं पुण्यदायक है। काष्ठमय लिङ्ग से प्रस्तर का लिङ्ग श्रेष्ठ है। प्रस्तर से मोती का और मोती से सुवर्ण का बना हुआ ‘लौह लिङ्ग उत्तम माना गया है। चाँदी, तांबे, पीतल, रत्न तथा रस (पारद) का बना हुआ शिवलिङ्ग भोग मोक्ष देने वाला एवं श्रेष्ठ है। रस (पारद आदि) के लिङ्ग को राँगा, लोहा (सुवर्ण, ताँबा ) आदि तथा रत्न के भीतर आबद्ध करके स्थापित करे। सिद्ध आदि के द्वारा स्थापित स्वयम्भूलिङ्ग आदि के लिये माप आदि करना अभीष्ट नहीं है ॥ १-५ ॥ ‘ बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर ) — के लिये भी यही बात है। (अर्थात् उसके लिये भी ‘वह इतने अङ्गुल का हो’ – इस तरह का मान आदि आवश्यक नहीं है ।) वैसे शिवलिङ्गों के लिये अपनी इच्छा के अनुसार पीठ और प्रासाद का निर्माण करा लेना चाहिये। सूर्यमण्डलस्थ शिवलिङ्ग को दर्पण में प्रतिबिम्बित करके उसका पूजन करना चाहिये। वैसे तो भगवान् शंकर सर्वत्र ही पूजनीय हैं, किंतु शिवलिङ्ग में उनके अर्चन की पूर्णता होती है। प्रस्तर का शिवलिङ्ग एक हाथ से अधिक ऊँचा होना चाहिये। काष्ठमय लिङ्ग का मान भी ऐसा ही है। चल शिवलिङ्ग का स्वरूप अङ्गुल-मान के अनुसार निश्चित करना चाहिये तथा स्थिर लिङ्ग का द्वारमान, गर्भमान एवं हस्तमान के अनुसार। गृह में पूजित होने वाला चललिङ्ग एक अङ्गुल से लेकर पंद्रह अङ्गुल तक का हो सकता है ॥ ६-८ ॥ द्वारमान से लिङ्ग के तीन भेद हैं। इनमें से प्रत्येक के गर्भमान के अनुसार नौ-नौ भेद होते हैं। (इस तरह कुल सत्ताईस हुए। इनके अतिरिक्त) करमान से नौ लिङ्ग और हैं। इनकी देवालय में पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार सबको एक में जोड़ने से छत्तीस लिङ्ग जानने चाहिये। ये ज्येष्ठमान के अनुसार हैं। मध्यममान से और अधम (कनिष्ठ)- मान से भी छत्तीस-छत्तीस शिवलिङ्ग हैं — ऐसा जानना चाहिये। इस प्रकार समस्त लिङ्गों को एकत्र करने से एक सौ आठ शिवलिङ्ग हो सकते हैं। एक से लेकर पाँच अङ्गुल तक का चल शिवलिङ्ग ‘कनिष्ठ’ कहलाता है, छ: से लेकर दस अङ्गुल तक का चल लिङ्ग ‘मध्यम’ कहा गया है तथा ग्यारह से लेकर पंद्रह अङ्गुल तक का चल शिवलिङ्ग ‘ज्येष्ठ’ जानने योग्य है। महामूल्यवान् रत्नों का बना हुआ शिवलिङ्ग छः अङ्गुल का, अन्य रत्नों से निर्मित शिवलिङ्ग नौ अङ्गुल का, सुवर्णभार का बना हुआ बारह अङ्गुल का तथा शेष वस्तुओं से निर्मित शिवलिङ्ग पंद्रह अङ्गुल का होना चाहिये ॥ ९-१३ ॥ लिङ्ग-शिला के सोलह अंश करके उसके ऊपरी चार अंशों में से पार्श्ववर्ती दो भाग निकाल दे। फिर बत्तीस अंश करके उसके दोनों कोणवर्ती सोलह अंशों को लुप्त कर दे। फिर उसमें चार अंश मिलाने से ‘कण्ठ’ होता है। तात्पर्य यह कि बीस अंश का कण्ठ होता है और उभय पार्श्ववर्ती ३ x ४ = १२ अंशों को मिटाने से ज्येष्ठ चल लिङ्ग बनता है। प्रासाद की ऊँचाई के मान को सोलह अंशों में विभक्त करके उसमें से चार, छः और आठ अंशों द्वारा क्रमशः हीन, मध्यम और ज्येष्ठ द्वार निर्मित होता है। द्वार की ऊँचाई में से एक चौथाई कम कर दिया जाय तो वह लिङ्ग की ऊँचाई का मान है। लिङ्गशिला के गर्भ के आधे भाग तक की ऊँचाई का शिवलिङ्ग ‘अधम’ (कनिष्ठ) होता है और तीन भूतांश (३ x ५ = १५ ) पंद्रह अंशों के बराबर की ऊँचाई का शिवलिङ्ग ‘ज्येष्ठ’ कहा गया है। इन दोनों के बीच में बराबर की ऊँचाई पर सात जगह सूत्रपात (सूत द्वारा रेखा) करे। इस तरह नौ सूत (सूत्रनिर्मित रेखाचिह्न) होंगे। इन नौ सूतों में से पाँच सूतों की ऊँचाई के माप का शिवलिङ्ग ‘मध्यम’ होगा। लिङ्गों की लंबाई (या ऊँचाई) उत्तरोत्तर दो-दो अंश के अन्तर से होगी। इस तरह लिङ्गों की दीर्घता बढ़ती जायगी और नौ लिङ्ग निर्मित होंगे 1 ॥ १४-१८ ॥ यदि हाथ के माप से नौ लिङ्ग बनाये जायँ तो पहला लिङ्ग एक हाथ का होगा, फिर दूसरे के माप में पहले से एक हाथ बढ़ जायगा; इस प्रकार जब तक नौ हाथ की लंबाई पूरी न हो जाय तब तक शिला या काष्ठ की माप में एक-एक हाथ बढ़ाते रहेंगे। ऊपर जो हीन, मध्यम और उत्तम — तीन प्रकार के लिङ्ग बताये गये हैं, उनमें से प्रत्येक के तीन-तीन भेद हैं। बुद्धिमान् पुरुष एक- एक लिङ्ग में विभागपूर्वक तीन-तीन लिङ्ग का निर्माण करावें। छः अङ्गुल और नौ अङ्गुल के शिवलिङ्गों में भी तीन-तीन लिङ्ग निर्माण करावे । स्थिर लिङ्ग द्वारमान, गर्भमान तथा हस्तमान — इन तीन दीर्घ प्रमाणों (मापों) के अनुसार बनाना चाहिये। उक्त तीन मापों के अनुसार ही उसकी तीन संज्ञाएँ हैं — भगेश, जलेश तथा देवेश । विष्कम्भ (विस्तार) के अनुसार लिङ्ग के चार रूप लक्षित करे। दीर्घप्रमाण के अनुसार सम्पादित होनेवाले तीन रूपों में निर्दिष्ट लिङ्ग को शुभ आय आदि से युक्त करके निर्मित करावे। उन त्रिविध लिङ्गों की लंबाई चार या आठ-आठ हाथ की हो — यह अभीष्ट है। वे क्रमशः त्रितत्त्वरूप अथवा त्रिगुणरूप हैं। जो लिङ्ग जितने हाथ का हो, उसका अङ्गुल बनाकर आय-संख्या (८), स्वर-संख्या (७), भूत-संख्या (५) तथा अग्नि-संख्या (३) से पृथक्-पृथक् भाग दे। जो शेष बचे उसके अनुसार शुभाशुभ फल को जाने ॥ १९-२४ ॥ ध्वजादि आयों में से ध्वज, सिंह, हस्ती और वृषभ — ये श्रेष्ठ हैं 2 । अन्य चार आय अशुभ हैं। (सात संख्या से भाग देने पर जो शेष बचे, उसके अनुसार स्वर का निश्चय करे ।) स्वरों में षड्ज,गान्धार तथा पञ्चम शुभदायक हैं। [पाँच से भाग देने पर जो शेष बचे, उसके अनुसार पृथ्वी आदि भूतों का निश्चय करे ।] भूतों में पृथ्वी ही शुभ है। [तीन से भाग देने पर जो शेष रहे, तदनुसार अग्नि जाने।] अग्नियों में आहवनीय अग्नि ही शुभ है। उक्त लिङ्ग की लंबाई को आधा करके उसमें आठ से भाग देने पर यदि शेष सात से अधिक हो तो वह लिङ्ग ‘ आढ्य’ कहा जाता है। यदि पाँच से अधिक शेष रहे तो वह ‘अनाढ्य’ है। यदि छः अंश से अधिक शेष हो तो वह लिङ्ग ‘देवेज्य’ है और यदि तीन अंश से अधिक शेष हो तो उस लिङ्ग को ‘अर्कतुल्य’ माना जाता है। ये चारों ही प्रकार के लिङ्ग चतुष्कोण होते हैं। पाँचवाँ ‘वर्धमान’ संज्ञक लिङ्ग है, उसमें व्यास से नाह बढ़ा हुआ होता है। व्यास के समान नाह एवं व्यास से बढ़ा हुआ नाह — इस प्रकार इन लिङ्गों के दो भेद हो जाते हैं। विश्वकर्म शास्त्र के अनुसार इन सबके बहुत-से भेद बताये जायेंगे। आढ्य आदि लिङ्गों की स्थूलता आदि के कारण तीन भेद और होते हैं। उनमें एक-एक यव की वृद्धि करने से वे सब आठ प्रकार के लिङ्ग होते हैं। फिर हस्तमान से ‘जिन’ संज्ञक लिङ्ग के भी तीन भेद होंगे। उसको सर्वसम लिङ्ग में जोड़ लिया जायगा ॥ २५-२९ ॥ अनाढ्य, देवार्चित तथा अर्कतुल्य में भी पाँच-पाँच भेद होने से ये पच्चीस होंगे। ये सब एक, जिन और भक्त भेदों से पचहत्तर हो जायँगे। सबका आकलन करने से पंद्रह हजार चार सौ शिवलिङ्ग हो सकते हैं। 3 इसी तरह आठ अङ्गुल के विस्तारवाला लिङ्ग भी एकाङ्गुल मान, हस्तमान एवं गर्भमान के अनुसार नौ भेदों से युक्त है। इन सबके कोण तथा अर्द्धकोणस्थ सूत्रों द्वारा कोणों का छेदन (विभाजन) करे। लिङ्ग के मध्यभाग के विस्तार को ही प्रत्येक विभाग का विस्तार मानकर, तदनुसार मध्य, ऊर्ध्व और अधः — इन विभागों की स्थापना करे। मध्यम विभाग से ऊपर का अष्टकोण या षोडश कोणवाला विभाग शिव का अंश है। पाद या मूलभाग से जानुपर्यन्त लिङ्ग का अधोभाग है, यह ब्रह्मा का अंश है तथा जानु से नाभिपर्यन्त लिङ्ग का मध्यम भाग है, जो भगवान् विष्णु का अंश है ॥ ३०-३३ ॥ मूर्धान्तभाग भूतभागेश्वर का है। व्यक्त-अव्यक्त सभी लिङ्गों के लिये ऐसी ही बात है। जिस शिवलिङ्ग में पाँच लिङ्ग की व्यवस्था है, वहाँ शिरोभाग गोलाकार होना चाहिये — ऐसा बताया जाता है। वह गोलाई छत्राकार हो, मुर्गी के अंडे के समान हो; नवोदित चन्द्र के सदृश हो या पुरुष के आकार की हो। [‘पुरुषाकृति’ के स्थान में ‘त्रपुषाकृति’ पाठ हो तो गोलाई त्रपुष के समान आकार वाली हो — ऐसा अर्थ लेना चाहिये।] इस प्रकार एक-एक के चार भेद होते हैं। कामनाओं के भेद से इनके फल में भी भेद होता है, यह बताऊँगा। लिङ्ग के मस्तक भाग का विस्तार जितने अङ्गुल का हो, उतनी संख्या में आठ से भाग दे। इस प्रकार मस्तक को आठ भागों में विभक्त करके आदि के जो चार भाग हैं, उनका विस्तार और ऊँचाई के अनुसार ग्रहण करे। एक भाग को छाँट देने से ‘पुण्डरीक’ नामक लिङ्ग होता है, दो भागों को लुप्त कर देने से ‘विशाल’ संज्ञक लिङ्ग होता है, तीन भागों का उच्छेद कर देने पर उसकी ‘श्रीवत्स’ संज्ञा होती है तथा चार भागों के लोप से उस लिङ्ग को ‘शत्रुकारक’ कहा गया है। शिरोभाग सब ओर से सम हो तो श्रेष्ठ माना गया है। देवपूज्य लिङ्ग में मस्तक भाग कुक्कुट के अण्ड की भाँति गोल होना चाहिये ॥ ३४-३८ ॥ चतुर्भागात्मक लिङ्ग में से ऊपर का दो भाग मिटा देने से ‘त्रपुष’ नामक लिङ्ग होता है। यह(त्रपुष) अनाढ्यसंज्ञक शिवलिङ्ग का सिर माना गया है। अब अर्द्ध-चन्द्राकार सिर के विषय में सुनो —शिवलिङ्ग के प्रान्तभाग में एक अंश के चार अंश करके एक अंश को त्याग दिया जाय तो वह ‘अमृताक्ष’ नाम धारण करता है। दूसरे, तीसरे और चौथे अंश का लोप करने पर क्रमशः उन शिवलिङ्गों की ‘पूर्णेन्दु’, ‘बालेन्दु’ तथा ‘कुमुद’ संज्ञा होती है। ये क्रमशः चतुर्मुख, त्रिमुख और एकमुख होते हैं। इन तीनों को ‘मुखलिङ्ग’ भी कहते हैं। अब मुखलिङ्ग के विषय में सुनो — पूजाभाग की त्रिविध कल्पना करनी चाहिये — मूर्तिपूजा, अग्निपूजा तथा पदपूजा। पूर्ववत् द्वादशांश का त्याग करके छः भागों द्वारा छः स्थानों की अभिव्यक्ति करे। सिर को ऊँचा करना चाहिये तथा ललाट, नासिका, मुख, चिबुक तथा ग्रीवाभाग को भी स्पष्टतया व्यक्त करे। चार भागों (या अंशों) द्वारा दोनों भुजाओं तथा नेत्रों को प्रकट करे। प्रतिमा के प्रमाण के अनुसार मुकुलाकार हाथ बनाकर विस्तार के अष्टमांश से चारों मुखों का निर्माण करे। प्रत्येक मुख सब ओर से सम होना चाहिये। यह मैंने चतुर्मुखलिङ्ग के विषय में बताया है; अब त्रिमुखलिङ्ग के विषय में बताया जाता है, सुनो — ॥ ३९-४४ ॥ त्रिमुखलिङ्ग में चतुर्मुख की अपेक्षा कान और पैर अधिक रहेंगे। ललाट आदि अङ्गों का पूर्ववत् ही निर्देश करे। चार अंशों से दो भुजाओं का निर्माण करे, जिनका पिछला भाग सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हो। विस्तार के अष्टमांश से तीनों मुखों का विनिर्गम (प्राकट्य ) हो । [ अब एकमुखलिङ्ग के विषय में सुनो —] एकमुख पूर्व दिशा में बनाना चाहिये उसके नेत्रों में सौम्यभाव रहे। (उग्रता न हो।) उसके ललाट, नासिका, मुख और ग्रीवा में विवर्तन (विशेष उभाड़) हो। बाहु-विस्तार के पञ्चमांश से पूर्वोक्त अङ्गों का निर्माण होना चाहिये। एकमुखलिङ्ग को बाहुरहित बनाना चाहिये। एकमुखलिङ्ग में विस्तार के छठे अंश से मुख का निर्गमन हितकर कहा गया है। मुखयुक्त जितने भी लिङ्ग हैं, उन सबका शिरोभाग पुषाकार या कुक्कुटाण्ड के समान गोलाकार होना चाहिये ॥ ४५-४८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘लिङ्गमान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदि का वर्णन’ नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥ 1. ‘समराङ्गणसूत्रधार’ में कहा है कि दो-दो अंश की वृद्धि करते हुए तीन हाथ की लंबाई तक पहुँचते-पहुँचते नौ लिङ्ग निर्मित हो सकते हैं-‘द्व्यंशवृद्धा नवैवं स्युराहस्तत्रितयावधे।’ 2. ‘अपराजित पृच्छा’ के ‘आयाधिकार’ नामक चौसठवें सूत्र में आयों के नाम इस प्रकार दिये गये हैं — ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष (काक)। इनकी स्थिति पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिण क्रम से है। देवालय के लिये ध्वज, सिंह, वृष और गज ये आय श्रेष्ठ कहे गये हैं। अधमों के लिये शेष आय सुखावह हैं। सत्ययुग में ध्वज, त्रेता में सिंह, द्वापर में वृषभ और कलियुग में गजी नामक आय का प्राधान्य है। सिंह नामक आय मुख्यतः राजाओं के लिये कल्याणकारक है; ब्राह्मण के लिये ध्वज प्रशस्त है तथा वैश्य के लिये वृष । ध्वज आप में अर्थलाभ होता है और धूम्र में संताप सिंह आय में विपुल भोग उपस्थित होते हैं। श्वान नामक आय में कलह होता है। वृषभ में धन-धान्य की वृद्धि होती है। गर्दभ में स्त्रियों का चरित्र दूषित होता है। हाथी नामक आय में सब लोग शुभ देखते हैं और काक नामक आय होने पर निश्चय ही मृत्यु होती है। (श्लोक ९-१६) 3. अग्निपुराण अध्याय ५४ के २८वें श्लोक में विश्वकर्मा के कथनानुसार लिङ्ग भेदों की परिगणना की गयी है और सब मिलाकर चौदह हजार चौदह सौ भेद कहे गये हैं। इस प्रकरण का मूल पाठ अपने शुद्धरूप में उपलब्ध नहीं हो रहा है; अतएव यहाँ दी हुई गणना बैठ नहीं रही है। परंतु विश्वकर्मा के शास्त्र ‘अपराजितपृच्छा’ के अवलोकन से इन भेदों पर विशेष प्रकाश पड़ता है। उसके अनुसार समस्त लिङ्ग-भेद १४४२० होते हैं किस प्रकार, सो बताया जाता है — प्रस्तरमय लिङ्ग कम-से-कम एक हाथ का होता है, उससे कम नहीं। उसका अन्तिम आयाम नौ हाथ का बताया गया है। इस प्रकार एक हाथ से लेकर नौ हाथतक के लिङ्ग बनाये जायें तो उनकी संख्या नौ होती है। इनका प्रस्तार यों समझना चाहिये। एक हाथ से तीन हाथतक के शिवलिङ्ग ‘कनिष्ठ’ कहे गये हैं। चार से छ: हाथतक के ‘मध्यम’ माने गये हैं और सात से नौतक के ‘उत्तम’ या ‘ज्येष्ठ’ कहे गये हैं। इन तीनों के प्रमाण में पादवृद्धि करने से कुल ३३ शिवलिङ्ग होते हैं। यथा — एक हाथ, सवा हाथ’, डेढ़ हाथ’, पौने दो हाथ, दो हाथ, सवा दो हाथ’, ढाई हाथ’, पौने तीन हाथ, तीन हाथ’, सवा तीन हाथ, साढ़े तीन हाथ, पौने चार हाथ, चार हाथ, सवा चार हाथ, साढ़े चार हाथ, पौने पाँच हाथ, पाँच हाथ, सवा पाँच हाथ, साढ़े पाँच हाथ, पौने छः हाथ, छ: हाथ, सवा छः हाथ, साढ़े छः हाथ, पौने सात हाथ, सात हाथ, सवा सात हाथ, साढ़े सात हाथ, पौने आठ हाथ”, आठ हाथ, सवा आठ हाथ, साढ़े आठ हाथ, पौने नौ हाथ, नौ हाथ”। इन तैतीसों के नाम विश्वकर्मा ने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं — १. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव १२. शान्त, १३. मनोह्लादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात),१६. वामदेव, १७. अघोर, १८ तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अधोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन,२६. पुण्डरीक, २०. सुवक्त्र, २८. उमातेज, २९. विश्वेश्वर, ३०, त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल । पूर्वोक्त क्रम से पादार्ध वृद्धि करने पर ६५ तक संख्या पहुंचेगी । “ दो अङ्गुल वृद्धि करने पर ९७ ” ” एक अङ्गुल वृद्धि करने पर १९३ ” ” अर्धाङ्गुल वृद्धि करने पर ३८५ ” ” अङ्गुल का चतुर्थाश बढ़ानेपर ७६९ ” ” एक-एक मूंग के मान की वृद्धि करने पर १४४२ ” ” मुद्ग प्रमाण लिङ्गों में प्रत्येक के दस भेद करने पर १४४२० ” Content is available only for registered users. 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