॥ नारायणसूक्त ॥ इस सूक्तके ऋषि नारायण, देवता आदित्य-पुरुष और छन्द भूरिगार्षी त्रिष्टुप, निच्यूदा त्रिष्टुप् एवं आर्य्यनुष्टुप् है । इस सूक्त में केवल छः मन्त्र हैं । शुक्लयजुर्वेद में पुरुषसूक्त के १६ मन्त्रों के अनन्तर इसके छः मन्त्र प्राप्त होते हैं । अतः इसे ‘उत्तर नारायणसूक्त’ भी कहा जाता है । इसमें सष्टि के विकास… Read More


॥ बृहत्साम ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने वेदों में सामवेदको अपनी विभूति बताया है – ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ (गीता १०।२२) । सामवेद में अनेक मनोहारी गीत हैं, जिन्हें ‘साम’ कहा जाता है। यथा – रथन्तरसाम, वार्षसाम, बृहत्साम, सेतुसाम, वीङ्कसाम, कल्माषसाम, आज्यदोहसाम, ज्येष्ठसाम इत्यादि। इनका गायन एक विशिष्ट परम्परागत वैदिक पद्धति से किया जाता है, जो अत्यन्त मनोहारी… Read More


॥ अग्निसूक्त ॥ ॥ अग्निसूक्त (क) ॥ इस सूक्त के ऋषि वैश्वामित्र मधुच्छन्दा हैं, देवता अग्नि हैं तथा छन्द गायत्री है । वेद में अग्निदेवता का विशेष महत्व है । ऋग्वेदसंहिता में दो सौ सूक्त अग्नि के स्तवन में प्राप्त हैं । ऋग्वेद के सभी मण्डलों के आदि में ‘अग्निसूक्त’ के अस्तित्व से इस देव… Read More


॥ आकूतिसूक्त ॥ इस सूक्त में शक्तितत्त्व ‘आकूति’ नाम से व्यक्त हुआ है । ‘आकूति’ नाम सभी शक्तिभेदों हेतु समानरूप से व्यवहार में आता है । इस सूक्त में इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया-शक्ति के इन तीन भेदों को ही आकूति कहा गया है । इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि अथर्वाङ्गिरा तथा देवता अग्निस्वरूपा आकूति हैं… Read More


॥ पुरुषसूक्त ॥ वेदों में प्राप्त सूक्तों में पुरुषसूक्त’ का अत्यन्त महनीय स्थान है । आध्यात्मिक तथा दार्शनिक दृष्टि से इस सूक्त का बड़ा महत्त्व है। इसीलिये यह सूक्त ऋग्वेद (१०वें मण्डल का ९०वाँ सूक्त), यजुर्वेद (३१वाँ अध्याय), अथर्ववेद (१९वें काण्डका छठा सूक्त), तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण तथा तैत्तिरीय आरण्यक आदि में किंचित् शब्दान्तर के साथ प्रायः… Read More


॥ रक्षोघ्न सूक्त ॥ ऋग्वेदः – मण्डल ४ सूक्तं ४.४ ऋषि वामदेवो गौतमः छन्दः त्रिष्टुप् शुक्‍लयजुर्वेदः/अध्यायः १३ । ९-१३ तैत्तिरीयसंहिता(विस्वरः)/काण्डम् १/प्रपाठकः २ अनुवाक १४… Read More


॥ रात्रिसूक्त ॥ ऋग्वेद के दशम मण्डल दशम अध्याय का १२७वाँ सूक्त रात्रिसूक्त कहलाता है, इसमें आठ ऋचाएँ पठित हैं, जिनमें रात्रिदेवी की महिमा का गान किया गया है । इस सूक्त में बताया गया है कि रात्रिदेवी जगत् के समस्त जीवों के शुभाशुभ कर्मों की साक्षी है और तदनुरूप फल प्रदान करती हैं ।… Read More


  देवी-सूक्त / वाक्-सूक्त / आत्म-सूक्त / अम्भृाणी-सूक्त भगवती पराम्बा के अर्चनपूजन के साथ देवीसूक्त के पाठ की विशेष महिमा है । ऋग्वेद के दशम मण्डल दशम अध्याय का १२५वाँ सूक्त जिसमें आठ ऋचाएँ हैं ‘वाक्-सूक्त’ कहलाता है । इसे ‘आत्मसूक्त’ भी कहते हैं । इसमें अम्भृण-ऋषि की पुत्री वाक् ब्रह्मसाक्षात्कार से सम्पन्न होकर अपनी… Read More


॥ रुद्रसूक्त ( नीलसूक्त) ॥ भूतभावन भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये रुद्रसूक्त पाठ का विशेष महत्त्व बताया गया है । पूजा में भगवान शंकर को सबसे प्रिय जलधारा है । इसलिये भगवान् शिव के पूजन में रुद्राभिषेक की परम्परा है और अभिषेक में इस ‘रुद्रसूक्त’ की ही प्रमुखता है । रुद्राभिषेक के अन्तर्गत रुद्राष्टाध्यायी… Read More


॥ वैदिक गणेश-स्तवन ॥ गणानां त्वा गणपतिᳬ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिᳬ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (शु०यजु० २३ । १९) हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों-प्राणियों के पालक और समस्त सुख-निधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि… Read More